मन, वचन और कर्म से शरीर को पवित्र करना ही संस्कार है। संस्कार, संस्कृत भाषा का शब्द है। संस्कार से निर्मित होती है संस्कृति। संस्कार शब्द का अधिक उपयुक्त पर्याय अंग्रेजी का शब्द ‘सेक्रामेंट’ हो सकता है जिसका अर्थ है धार्मिक अनुष्ठान। संस्कार का सामान्य अर्थ है- किसी व्यक्ति, वस्तु और स्थान को शुद्ध करके उपयोगी बनाना। किसी साधारण या विकृत वस्तु को विशेष क्रियाओं द्वारा उत्तम बना देना ही उसका संस्कार करना है। इसी तरह किसी साधारण मनुष्य को विशेष प्रकार की धार्मिक क्रिया-प्रक्रियाओं द्वारा श्रेष्ठ बनाना ही सुसंस्कृत करना कहा जाता है। अतः गर्भस्थ शिशु से लेकर मृत्युपर्यंन्त जीव के मलों का शोधन, सफाई आदि कार्य विशिष्ट विधिक क्रियाओं व मंत्रों से करने को संस्कार कहा जाता है। संस्कार कई प्रकार के होते हैं, जैसे- व्यक्तिगत संस्कार, परिवारिक संस्कार, सामाजिक संस्कार, धार्मिक संस्कार आदि। हमारी सारी प्रवृतियों और चित्तवृत्तियों का संप्रेरक हमारे मन में पलने वाला संस्कार होता है। संस्कार से ही हमारा सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन पुष्ट होता है और हम सभ्य कहलाते हैं। संस्कार ही समाज में व्यक्ति की स्थिति स्पष्ट करते हैं।

संस्कारों का महत्व :

1. संस्कार शिक्षा के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में मनुष्य का सामाजिकरण करते हैं।
2. संस्कार व्यक्तित्त्व के विकास में सहायक होते हैं। इससे व्यक्ति सामाजिक दायित्वों के प्रति सजग रहता है।
3. संस्कार जीवन में आवश्यक नैतिक गुणों जैसे दया, क्षमा, समर्पण आदि के विकास में सहायक होते हैं।
4. संस्कारों से ही मनुष्य अपने परिवार व समाज के रीति-रिवाजों से परिचित होता है।

संस्कारों के द्वारा व्यक्ति अपने समाज की सांस्कृतिक परम्पराओं तथा आदर्शों से परिचित होता है। व्यक्तित्त्व निर्माण में संस्कारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। संस्कार विरुद्ध आचरण असभ्यता की निशानी है। संस्कार मनुष्य को पाप और अज्ञान से दूर रखकर उचित आचार-विचार और ज्ञान-विज्ञान से संयुक्त करते हैं। संस्कार का अभिप्राय उन धार्मिक कृत्यों से हैं जो किसी व्यक्ति को अपने समुदाय का योग्य सदस्य बनाकर उसके शरीर, मन और मस्तिष्क को पवित्र करते हैं। यह इसलिए भी आवश्यक है कि व्यक्ति जब शरीर त्याग करेे तो सद्गति को प्राप्त हो। वेद और पुराणों में अनेकों संस्कार बताए गए है किंतु धर्मज्ञों के अनुसार उनमें से मुख्य सोलह संस्कारों में ही सारे संस्कार सिमट जाते हैं। लेकिन वर्तमान में कुछ लोग इन संस्कारों को मनमाने तरीके से करके भिन्नता का परिचय देते हैं, जो कि वेद विरुद्ध है। वेदों के अलावा गृहसूत्रों में संस्कारों का उल्लेख मिलता है। मनुस्मृति में इनके बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है।

हिंदू दर्शन के अनुसार मृत्यु के बाद मात्र यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है। यह सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक होता है। यह संस्कार मनुष्य के पूर्वजन्मों से ही नहीं आते, अपितु माता-पिता के संस्कार भी गुणसूत्रों के माध्यम से उसमें सूक्ष्म रूप में प्रविष्ट होते हैं, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्त्व प्रभावित होता है। बालक के गर्भधारण की परिस्थितियाँ भी इन पर प्रभाव डालती हैं। यह संस्कार ही प्रत्येक जन्म में संगृहीत ;एकत्रद्ध होते चले जाते हैं, जिससे अच्छे-बुरे दोनों कर्मों का एक विशाल भंडार बनता जाता है, इसे संचित कर्म कहते हैं। इन संचित कर्मों का कुछ भाग एक जीवन में भोगने के लिए उपस्थित रहता है और यही जीवन में प्रेरणा का कार्य करता है। अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने में अच्छे-बुरे कर्म करता है। जिससे मनुष्य के व्यक्तित्त्व का निर्माण होता है। फिर इन कर्मों से अच्छे-बुरे नए संस्कार बनते रहते हैं तथा इन संस्कारों की एक अंतहीन श्रृंखला बनती चली जाती है।

पवित्र सोलह संस्कारों का महत्त्व :

हिंदू धर्म में सोलह संस्कारों का बहुत महत्त्व है। सभी संस्कारों का वर्णन किसी एक ग्रन्थ या शास्त्र में नहीं मिलता। कुछ संस्कारों का वर्णन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित पदम् पुराण, स्कन्द पुराण, नारद पुराण और गरुड़ पुराण आदि में मिलता है और कुछ संस्कारों का वर्णन विभिन्न सूत्रग्रन्थों में मिलता है। पुराणों के अनुसार मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है। इनमें पहला गर्भाधान संस्कार और मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार है। गर्भाधान के बाद पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण आदि सभी संस्कार नवजात शिशु का दैवीय जगत से संबंध स्थापना के लिये किये जाते हैं। गर्भाधान से विद्यारंभ तक सोलह संस्कारों में पहले तीन (गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन) को अन्तर्गर्भ या गर्भस्थ संस्कार तथा बाद के संस्कारों को बहिर्गर्भ या गुणाधीन संस्कार कहते हैं। गर्भस्थ संस्कारों के अन्तर्गत शिशु के पूर्व जन्मों से आये धर्म एवं कर्म से सम्बन्धित दोषों तथा गर्भ में आई विकृतियों के मार्जन के लिये संस्कार किये जाते हैं।

वर्तमान में प्रचलित सोलह संस्कार निम्नानुसार है :-

1. गर्भाधान संस्कार 2. पुंसवन संस्कार 3. सीमंतोन्नायन संस्कार 4. जातकर्म संस्कार
5. नामकरण संस्कार 6. निष्क्रमण संस्कार 7. अन्नप्राशन संस्कार 8. चूड़ाकर्म संस्कार
6. कर्णवेध संस्कार 10. केशांत संस्कार 11. यज्ञोपवीत संस्कार 12. वेदारंभ (शिक्षा) संस्कार
13. समावर्तन संस्कार 14. विवाह संस्कार 15. अंत्येष्टि/अन्तिम संस्कार 16. श्रोताधाम या श्राद्धकर्म

उपरोक्त संस्कारों के अलावा भी व्यक्ति के अनेकों संस्कार होते हैं जो हमारी दिनचर्या और जीवन के महत्त्वपूर्ण घटनाक्रमों से जुड़े हुए हैं, जिन्हें जानना प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य माना गया है। इन्हें पारिवारिक संस्कार कहते हैं। इनसे जीवन के रोग और शोक मिट जाते हैं तथा शांति और समृद्धि का रास्ता खुलता है। यह संस्कार ऐसे हैं जिसको निभाने से हम हमारे जीवन को सुंदर बनाते हैं। इस प्रकार हिन्दू धर्म के सोलह संस्कार सम्पन्न किए जाते हैं। इनका विस्तृत विवरण आगे दिया गया है।

चरणामृत या पंचामृत क्या है ?

जब हम मन्दिर जाते हैं तो पंडितजी चरणामृत या पंचामृत देते हैं। लगभग सभी लोगों ने चरणामृत पीया होगा। लेकिन बहुत कम लोग ही इसकी महिमा और इसको बनाने की प्रक्रिया को जानते होंगे। चरणामृत का अर्थ होता है भगवान के चरणों का अमृत और पंचामृत का अर्थ है ‘पांच अमृत’ यानि पांच पवित्र वस्तुओं से बना। पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर को मिलाकर बनाया जाता है। इन पांच पदार्थों के मिश्रण से बनने वाला पंचामृत मन को शांति प्रदान करने वाला होता है। चरणामृत में तुलसी, तिल और औषधीय तत्त्वों से युक्त गंगाजल मिला होता हैं। दोनों को ही पीने से व्यक्ति के भीतर धार्मिक संस्कारों की उत्पत्ति होती है। जो चरणामृत का सेवन करता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। इसलिए मन्दिर में हमेशा तांबे के लोटे में तुलसी मिला जल रखा ही रहता है। आयुर्वेद की दृष्टि से चरणामृत और पंचामृत स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा माना गया है।