विवाह के नेगचार
हिन्दू धर्म में विवाह की रस्में विवाह से काफी दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। शहरों में तो वक्त की कमी के कारण सभी रस्मों का आयोजन नहीं किया जाता, लेकिन गांवों में आज भी शादियां कई-कई दिनों तक चलती हैं। अधिकतर लोग इन रस्मों को अंधविश्वास का नाम देते हैं जबकि शादियों में निभाई जाने वाली इन रस्मों का उद्देश्य शरीर, मन और आत्मा के बीच पवित्र संबंध स्थापित करना होता है। अगर गहराई से देखा जाए तो हम जान जाएंगे कि इन पौराणिक रस्मों का वैज्ञानिक आधार भी है, जैसे –
⁜ मेहंदी में एंटीसेप्टिक गुण होते हैं जो त्वचा को ठंडक प्रदान करते हैं। विवाह के मौके पर यह वर/वधू को मानसिक तनाव और सिरदर्द से आराम दिलाती है।
⁜ हल्दी को चमत्कारिक जड़ी-बूटी कहा गया है, क्योंकि इसमें बहुत सारे औषधीय गुण होते हैं। हल्दी त्वचा के बैक्टीरिया को नष्ट कर देती है। विवाह के समय हल्दी के उबटन का उपयोग वर/वधू के चेहरे पर निखार लाने के लिए किया जाता है। इसका एक कारण वर/वधू को बुरी नजर से बचाना भी होता है।
⁜ कांच की चूड़ियां महिलाओं की कलाई में पहना जाने वाला आकर्षक आभूषण है। कलाईयों में कई एक्यूप्रेशर प्वाइंट होते हैं, जो रक्तप्रवाह को सुचारू रखने में सहायक होते हैं। चूड़ी पहनने से इन पर दबाव पड़ता है।
⁜ सिंदूर हिन्दू महिलाओं के विवाहित होने की निशानी के अतिरिक्त इसके स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं। इसमें हल्दी, पारा, चूना व कुछ अन्य धातु होती हैं। पारा शरीर में रक्तदबाव को सुचारू रखता है।
⁜ महिलाओं द्वारा पांव की उंगलियों में पहने जाना वाला आभूषण है बिछुआ। बिछुए चांदी के होते हैं और चांदी पृथ्वी की ऊर्जा को शरीर में स्थानांतरित करने में सहायक होती है। पैर की दूसरी उंगली में एक विशेष नस होती है जो गर्भाशय से होकर गुजरती है तथा हृदय तक जाती है। इससे गर्भाशय को मजबूती मिलती है तथा नियमित मासिक चक्र में सहायता मिलती है।
⁜ भारतीय वैदिक परम्परा में अग्नि, जल व वायु को प्रमुख देव माना गया है। प्रत्येक धार्मिक कार्य इनको साक्षी मानकर किया जाता है। विवाह की रस्मों में फेरे लेते वक्त हवनकुण्ड को प्रज्जवलित कर अग्नि को साक्षी बनाया जाता है। इनके अतिरिक्त अग्निकुण्ड में पड़ने वाली हवन सामग्री, लकड़ी, घी, चावल तथा अन्य वस्तुओं से वातावरण शुद्ध होता है, जिसका वहां उपस्थित सभी लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए पाठकों की सामान्य जानकारी के लिए हिन्दू विवाह में आयोजित की जाने वाली कुछ रस्मों का विवरण दिया जा रहा है। इनमें कोई त्रुटि अथवा संशोधन होने पर क्षमा प्रार्थी हैं।
1. सगाई : विवाह तय करने से पहले दोनों परिवारों को आपस में बातचीत करके लड़के-लड़की की सहमति जरूर लेनी चाहिए, उसके बाद सगाई की रस्म करनी चाहिए। सगाई की रस्म में लड़की वाले लड़के का तिलक करके मिठाई, फल, मेवा, वस्त्र व सबको मिलाई करते हैं। लड़के की गोद में तौलिया, नारियल, चाँदी का सिक्का देते हैं। लड़के वाले लड़की को शादी का जोड़ा, श्रृंगार का सामान, चूड़ी, मिठाई, फल, मेवा, सोने के गहने तथा एक अँगूठी देते हैं जो कि लड़का लड़की को पहनाता है। सगाई समारोह को हरियाणा, राजस्थान में सगाई, पंजाब में रोका, मारवाड़ियों में तिलक और दक्षिण भारत में निश्चयम या निश्चय थम्बूलम कहा जाता है।
2. गोद भराई : शुभ मुहूर्त देखकर लड़के वाले लड़की के यहां जाकर लड़की को गहने, वस्त्र, चूड़ी, मेहँदी, श्रृंगार का सामान, मिठाई तथा फल आदि देते हैं। लड़की की गोद में बिछाने के लिए तौलिया, एक नारियल, एक चाँदी का सिक्का इत्यादि सामान देते हैं। सभी लोग लड़की को आशीर्वाद देते हैं। इसके बाद शुभ मुहूर्त देखकर परिजनों को निमन्त्रण देने हेतू पीले चावल किए जाते हैं। आजकल शादीकार्ड छपवाने का प्रचलन है।
3. लगन व टीका : तिलक या टीका के अवसर पर लड़के की लगन आती है। लगन लड़की वाले के यहां पंडित से लिखवाई जाती है। दो लगन लिखी जाती है, एक लगन तिलक के सामान के साथ लड़के वालों को देते हैं। दूसरी लगन भात नोतने के समय मामा को देते है। लगन के साथ लड़के के कपड़े, उपहार, समधी-समधन की तीवल, मिठाई, फल आदि देते हैं। लड़के वाले सबकी मिलाई करते हैं व उपहार देते हैं।
4. भात नोतना : विवाह में ननिहाल पक्ष को आमन्त्रित करना भात नोतना कहलाता है। घर में जिसका विवाह होता है, उसकी माँ अपने पीहर जाकर अपने भाईयों व परिजनों को विवाह का निमन्त्रण देती है तथा उनको भेंट स्वरूप कुछ सामान देती है। इसमें गुड़ की भेल, चावल, सवा 5 मीटर लाल या गुलाबी कपड़ा, पाँच तरह की मेवा, सात जोड़ी गोटा लगे नाले, सात गोले, टीके के रुपये, बाँटने के लड्डू आदि सामान होता है।
5. कुम्हार नोतना : कुम्हार नोतने के लिए विवाह से चार-पाँच दिन पहले घर की औरतें कुम्हारी को चाक पूजने आने का दिन व समय बताती हैं और रतिजगे में थापे के सामने रखने की झांवली, 4 बान की सराई, 4 मढ़े के लिए छेद वाली सराई, नहाने का करवा कुंडी लेते हैं। कुम्हारी के हाथ में कलावा बांधते हैं। कुम्हारी भी एक कलावा माँ के सिर में बांधती है। एक दोघड़ जरूर लेती है, दोघड़ को बिरद वाली अपने सिर पर रखकर गीत गाती आती है। घर आकर कोले सिलाते हैं। हल्दी से दोनों तरफ सतिया बनाते हैं। अन्दर आकर दोघड़ को थापे के आगे जमाई रखवाता है। जमाई को नेग मिलता है।
6. चाक पूजना : निश्चित दिन सुबह स्नान करके घर की कुछ औरतें एक परात में चाक पूजने का सामान लेकर चाक पूजने जाती हैं। चाक पूजने के लिए आटा, गुड़, पानी, पीसी हल्दी और कलावा लेकर जाते हैं। कुम्हार के यहाँ पानी से चकले पर चैकोर लीपते हैं। लीपे हुए पर हल्दी से पाँच सतिये बनाते हैं। सतिया निकालकर हल्दी के छींटे मारकर कलावा बांधते हैं। उस पर गुड़ और दाल-चावल चढ़ाते हैं। चाक पर रुपये रखते हैं। आटा और गुड़ कुम्हारी को देते हैं। सब सामान चाक पर रखकर चाक के चारों और कलावा पूर देते हैं।
7. भट्टी की पूजा : एक थाली में सूखा आटा, गुड़, रोली, मौली, पानी का लौटा लेकर भट्टी के पास जाते हैं। भट्टी पर पानी का छींटा देकर रोली से सतिया बनाते हैं। कढ़ाई झारी पर मौली बाँधते हैं। जिसका विवाह हो उसके भी टीका करके मोली बाँधते हैं और भट्टी की धोंक लगवाते हैं। उसके बाद ही मिठाई बनती हैं। मिठाई जिस कमरे में रखते हैं उसे कोठार कहते हैं। एक थाली में 4 लड्डू, गुड़, सूखा अनाज, कुछ पैसे और एक लौटा पानी भरकर रखते हैं। घी का दीपक जलाते हैं जो कि दिन-रात जलता रहता है जब तक विवाह की रस्में होती है। विवाह का जो भी सामान बनता है, उसमें से अछूता निकाला जाता है जो बाद में पंडित को दे देते हैं।
8. बान (पहले दिन) : बान वाले दिन सुबह के समय थापे रखकर देवी-देवता सराई में रखकर उस पर साड़ी रखते हैं। इसमें हल्दी की गांठ, सुपारी, दूब, कलावा और पैसे डालते हैं। दूल्हा और दुल्हन दोनों के थापे रखते हैं। चैक पूरकर उस पर पट्टा बिछाकर उस के नीचे एक सरईचा में चावल गुड़ रखकर पट्टा पर लड़के/लड़की को बिठाते हैं। पटड़े में कलावा बांधते हैं। बिंदायक के रूप में एक छोटा लड़का बिठाया जाता है। उबटन के लिए जौ और हल्दी को कूटने-पीसने की रस्म की जाती है।
बान की थाल में सात सराई रखकर उसमें घी, तेल, दूध, दही, हल्दी, मेंहदी, रोली रखकर दूब से ईंच लेते हैं। फिर दही व तेल लेकर हथलगी उबटना लगाती है और मंगल गान होता है। शुभकार्य की शुरूआत हल्दी से करना शुभ माना जाता है। गंगा सागर में हल्दी, सुपारी, चाबी का गुच्छा डालकर नहलाते हैं। तेल चढ़ाते समय दूब से रोली, मेहंदी, दही और तेल को छुआ के पांव, घुटना, हाथ, कन्धा और सिर तक सात बार दोनों हाथों से सात सुहागनों द्वारा चढ़ाया जाता है।
जिस तरह से सात फेरे और सात वचन होते हैं, उसी तरह से बान भी सात ही दिए जाते हैं। आजकल केवल फोटो खिंचवाने के बहाने एक बार ही बाना देने का रिवाज प्रचलित है। सबसे पहले पंडित जी बाना देते हैं, उसके बाद अन्य परिजन, रिश्तेदार बाना देते हैं। बाना देते समय महिलाएं मंगल गीत गाती हैं। उपस्थित रिश्तेदार व सगे-सम्बन्धी आशीर्वाद देते हैं। हालांकि ‘बान’ विवाह की एक सामाजिक और सांस्कृतिक रस्म है किन्तु बान का वैज्ञानिक पहलू भी है। इससे ग्रह दोष और नजर दोष निवारण के साथ नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
9. बान (अन्तिम दिन) : अन्तिम बान भात लेने के बाद होता है। बान के दिन तेल उतारते समय दूब से रोली, मेहंदी, दही और तेल को छुआ के पांव, घुटना, हाथ, कन्धा और सिर तक सात बार दोनों हाथों से सात सुहागनों द्वारा उतारा जाता है। इसके साथ झोल की रस्म भी होती है। इसमें परिवार की सुहागन लड़के/लड़की के सिर पर दही लगाती है। भाभी काजल डालती है। बहन आरता करती है। आरती की थाली में आटे का चार मुँह का दीपक, रोली, चावल, राई, मौली रखकर दीपक जलाते हैं। नहाने के बाद लड़के/लड़की को पाटे पर खड़ा करके उसके सिर पर चंदेवा रखा जाता है। माँ अपने आंचल से चार बार छूती है। मामा उसे गोदी में उठाकर अन्दर ले जाते हैं, जहां उसका फेरों के लिए श्रृंगार किया जाता है।
10. गेरु का थापा : गेरु से दो थापे रखे जाते हैं, एक लगन का और एक बींद का। अगले दिन एक थापा चाक और एक बान का। बान के चार या पांच थापे रखते हैं। लड़के के विवाह में बहू आने पर एक थापा और रखा जाता है। थापा रखने के बाद ढाई पाव खिचड़ी लड़की के विवाह में और सवा किलो लड़के के विवाह में चढ़ती है। सभी चीजों में एक-एक कलावा, सवा रुपया, एक सुपारी व एक हल्दी की गांठ व दूब डालते हैं।
11. मेहँदी का थापा : जिसका विवाह होता है उसके हाथ में चावल देकर सभी देवी-देवताओं और पितरों की धोक लगवाई जाती है और मेहँदी का थापा लगवाते हैं। अपने पित्तरों, कुलदेवी तथा देवों से विवाह का कार्य अच्छे ढंग से सम्पन्न होने की प्रार्थना करके परिवार के सभी सदस्यों द्वारा धोक लगाई जाती है। घी का दीपक रातभर जलाया जाता है। देवी-देवताओं के गीत गाए जाते हैं। किसी के यहाँ घी के हाथ से भी थापा लगाया जाता है। रतिजगे के गीतों में तिलवा, मेहँदी, जकड़ी व दीवला गाया जाता है।
12. रतिजगा : विवाह से एक दिन पहले रात को रतिजगा होगा। रतिजगे में मेहँदी घुलती है। मेहँदी की पांच बिन्दी थापे के पास लगाते हैं। थापे में 7 घेरे बनाए जाते हैं। घेरों पर मेहंदी, रोली व मैदा से बिंदिया लगाते हैं। बहन-बेटी की गोद में गोला व रुपए रखते हैं। थापा रखने वाली का मुँह पूरब की तरफ होना चाहिए। थापे के दोनो कोणों से माला लगाते हैं व बीच में चाँदी का रुपया लगाते हैं। थापे के आगे 4 बर्तन रखते हैं। एक बर्तन में मैदा, बेसन, चावल, साबुत मूंग रखते हैं। शादी से पहले दूल्हा और दुल्हन दोनों को हाथ-पैरों पर मेहंदी लगाना शुभ होता है। मान्यता है कि मेहंदी का रंग जितना गहरा चढ़ेगा, उतना ही गहरा रिश्ता होता है।
13. भात भरना : जिसका विवाह होता है उसकी ननिहाल पक्ष के लोग विवाह वाले दिन या एक दिन पहले विवाह में शामिल होने के लिए आते हैं। लड़के/लड़की की माँ द्वार पर उनके स्वागत की रस्में करती है। उसके मामा सभी परिजनों के लिए वस्त्र, आभूषण, मिठाई, फल इत्यादि सामान भेंट स्वरूप लाते हैं। थाल में सभी सामान तथा दान के रूपए रखते हैं तथा सबकी मिलाई करते हैं।
14. गौर पूजना : एक सराई में मिट्टी की गौर बनाकर उस का काजल टिकी, बिन्दी, मांग, लाल कपड़े से ओढ़ा कर थाली में बिठा लो। गौर के पास 4 लड्डू रखते हैं। कलावा को तोड़कर रोली में लगाकर गौर पूजते हैं फिर लड़की के सिर पर कलावा रखते हैं। गौर के पास पुजते वक्त पैसे रुपये रखते हैं। भाभी सुहाग पीटारी मिनसती है। जिस स्थान पर फेरे होते हैं उसी स्थान पर गौर की पूजा होती है। माता गौरी के गीत गाए जाते हैं।
शाम को चैक पूरकर उस पर चौकी बिछाकर लाल कपड़ा बिछाते हैं, नाल बाँधते हैं, लड़की को पाँचों गहने, कोले, बूजली, पाजेब, चुटकी पहनाकर गोटे वाली चुनरी ओढ़ाते हैं। एक परात में पानी, कच्चा दूध, साबुत हल्दी डाल कर रखते हैं। कुंडी पर मौली बाँधकर सवा किलो धान रखते हैं। गौर देने वाली का गठजोड़ा बाँधा जाता है। लड़की अपने पैर परात में रखकर बैठती है। फिर सभी लोग लड़की के साथ चारों तरफ सात फेरी लगाते हैं। फेरी देते समय थोड़े-थोड़े धान लेते रहते हैं और उस पर डालते रहते हैं। बीच-बीच में लड़की के पैर भी छूते रहते हैं। दूब से पैर धोकर सब लड़की को शगुन देते हैं और आशीर्वाद देते हैं। गौर का सामान लड़की के ससुराल जाता है।
15. माढ़ा (मण्डा) बांधना : विवाह वाले दिन सुबह मुँह अँधेरे में या तारों की छाँव में जमाई से बंधवाते हैं। उसी समय कंगना पंडित बांधता है। लड़के के विवाह में पांचवां थापा बहू आने से पहले रखते हैं। जहां बहू को बैठाकर पूजा करवाते हैं। उस कपड़े के नीचे सवा पांच किलो चावल बिछाते हैं।
16. निकासी : वर को दूल्हा बनाकर गाजे-बाजे के साथ मंगलगान गाकर घोड़ी या रथ पर बिठाकर दुल्हन लिवाने के लिए बारात के साथ भेजा जाता है। इस रीत को निकासी कहते है। सर्वप्रथम तेल-बान के बाद वर को उबटन लगाकर नहलाते हैं। गद्दे/गलीचे पर बिठाया जाता है। वर को नए वस्त्र पहनाकर जीजा/दोस्त उसका श्रृगांर करते हैं। मामा टाई, पगड़ी, कलंगी, साफा, सेहरा बाधंते हैं। कमर में गुलाबी कपड़ा ;फेंटाद्ध शगुन के सामान के साथ बांधा जाता है। इसमें रीति अनुसार गोला, अनाज और रुपये रखते हैं। घोड़ी को चने की दाल खिलाई जाती है। लड़के का मामा लड़के की वारफेरी कर घोड़ी पर पैसे न्यौछावर करता है। बहन मूंग बखेरती है। सभी बाराती नाचते हुए मन्दिर तक जाते हैं। मन्दिर में धोक लगाकर बारात प्रस्थान किया जाता है।
17. तोरण / ढुकाव : घर के द्वार पर जहाँ वरमाला की रस्म की अदायगी करनी होती है, वहाँ पर चैक पूरकर सजी हुई चैकी रखी जाती है। घर के द्वार के ऊपर तोरण टांगा जाता है। घर की औरतें तोरण और ढुकाव के गीत गाती हैं। दूल्हा चैकी पर खड़ा होकर नीम की डाली को तोरण से छुआता है। साली सात बार नीम झारी करती है, साली को वर की तरफ से नेग मिलता है। आजकल सालियाँ द्वार पर रिबन भी कटवाती हैं। इसके बाद कन्या की माँ/भाभी/बहन तिलक करके मिन्नती है और नारियल रुपया देती है। जंवाई के कान या माथे पर चांदी के सिक्के से दही लगाती है। मधु मिश्रित दही (मधुपर्क) तथा पान खिलाती है, सूट पर लगी तनी या क्लिप खोलती है। वर के जीजा/दोस्त वधू पक्ष पर इत्र का छिड़काव करते हैं, जिससे मन के साथ-साथ वातावरण भी महक जाता है। वधू इस क्रिया के दौरान सबसे नजर बचाकर चावल की पिंडी (चावल का एक छोटा लड्डू सात बार सूई में से निकाला हुआ) वर के ऊपर से फेंकती है, यह क्रिया पति पर कामण करना कहलाती है। मुख्य द्वार पर खड़े होकर बारातियों का स्वागत करते हैं। कहीं-कहीं वर पक्ष के खास लोगों को माला पहनाई जाती है।
प्राचीन दंत कथा के अनुसार कहा जाता है कि शिव-पार्वती विवाह के समय तोरण और पर्वत नाम के दो असुर बाधा उत्पन्न कर रहे थे। शिव बारात लेकर पहुंचे तो तोरण का वध किया। पर्वत को वरदान था कि वह पुरुष के हाथों नहीं मरेगा, उसका वध पार्वती ने किया। मान्यता है कि उसी दिन से ही द्वार पर दूल्हे द्वारा तोरण मारना और फेरों के दौरान वधू द्वारा पत्थर पर पैर रखकर तीन फेरे लेने की रस्में शुरू हुई।
18. वरमाला : वरमाला की परम्परा हमारे समाज में बहुत पुरानी है। आदिकाल से स्वयंवर की प्रथा चल रही है, जिसमें पहले वधू वर को और बाद में वर वधू को वरमाला पहनाता है। उपस्थित बाराती फूलों की वर्षा करके और तालियाँ बजाकर इस खुशी के मौके का इजहार करते हैं।
19. सजनगोठ : बारातियों की सेवा से निवृत्त होकर कन्या पक्ष के लोग, फेरों से पहले या बाद में, जो भी रिवाज हो, वर पक्ष के प्रमुख जनों को आदरपूर्वक बिठाकर मनुहार और प्यार से उन्हें खाना खिलाते हैं, यह रीत सजनगोठ कहलाती हैं। सजनगोठ के लिए वर के पिता, भाई, मामा, जीजा आदि सभी को बिठाया जाता है। सबसे पहले वर पक्ष वाले पितरों की थाली निकालते हैं। इसे ‘मिनसाई’ भी कहते हैं। कहीं-कहीं पर बहू परोसा निकालकर रुपये रखकर दुल्हन के पास भेजा जाता है। वधू पक्ष वाले अपने हाथों से सबका मुँह मीठा करवाकर मिलनी (रुपये) देते हैं, इसे साख जलेबी कहते हैं। बाद में आदर पूर्वक भोजन करवाया जाता है।
20. कन्यादान (फेरे) : माता-पिता या कन्यादान करने वाला जोड़ा कन्यादान तक उपवास रखता है। पंडित द्वारा वर और वधू के परिजनों की उपस्थिति में पिता से पूजा करवाकर यह कार्य प्रारम्भ किया जाता है। मंत्रोच्चारण के साथ पंडित जी फेरे करवाते हैं। पंडित जी परम्परानुसार चार या सात फेरे करवाते हैं। तीन फेरों में कन्या अपने पांव के अँगूठे से लोढ़ी या पत्थर को छूकर आगे चलती है, चैथे फेरे में वर आगे होता है। हर फेरे में भाई खील बिखेरता है। सात वचनों को निभाने की हामी भरवाई जाती है।
घर की औरतें विवाह के मंगल गीत गाती हैं। अपने समधियों को सीठनें भी देती हैं। जूता छिपाने का नेग भी सालियों को मिलता है। कहीं-कहीं वधू की बहनें शिक्षा पढ़ती हैं, उन्हें वर पक्ष की ओर से नेग मिलता है। फेरों पर बैठने के बाद साली वर-वधू पर नूनराई भी करती है, जिस पर वर पक्ष द्वारा उसे नेग दिया जाता है। वर का जीजा अगर सेहरा पढ़े तो उन्हें वधू पक्ष की ओर से नेग दिया जाता है। फेरों पर दूल्हा जूते उतार कर बैठता है तब दुल्हन की बहनें जूते छिपा देती हैं और वापस करने के लिए नेग दिया जाता है।
21. विदाई : वर और वधू द्वारा कन्या के घर का देहरी पूजन किया जाता है। रीत हो तो कन्या द्वारा घर में मेहँदी या रोली के थापे लगवाए जाते हैं। किसी के यहाँ लड़की मूंग बिखेरती हुई जाती है। गाड़ी में बिठाते वक्त बेटी की गोद में कुख सिलावा का डिब्बा दिया जाता है। विदाई के रुपये भी घर की सभी औरतें कन्या को देती हैं। वाहन के पहिये के नीचे नारियल गोला को रखते हैं और पहिये पर पानी डालते हैं। वाहन चलने के बाद समधी-समधी आपस में गले मिलते हैं। अपने द्वारा हुई गलतियों की क्षमा मांगते हुए विदाई की रस्म पूरी करते हैं। कई परिवारों में इस वक्त वर पक्ष के बुजुर्ग को मिलनी भी देते हैं।
22. बहू आने पर : बहू आने पर उस को गाड़ी से उतार कर सिर पर लोटे में आम या अशोक के पत्तों की डाली रखकर लाते हैं। सास दरवाजे पर आरता करती है। टीका करके वारफेर करके अन्दर लाते हैं। ननद दरवाजे पर वार रुकाई लेती है। अन्दर आने पर पूजा के स्थान पर बैठाकर छींटा लगवाते हैं। लड्डू से दीया बाती करवाते हैं। लड़के व बहू के सिर पर सात तार पूरकर गले में हार की तरह लड़का व बहू माँ को पहनाता है। दुल्हन चावल से भरे एक कलश को गिराकर अपने ससुराल में प्रवेश करती है। इसके बाद वह अपने पैरों को लाल सिंदूर के मिश्रण में डुबोती है और फर्श पर पैर के निशान छोड़कर घर में प्रवेश करती है। दुल्हन को सहज बनाने के लिए शादी के कई खेल खेले जाते हैं।
23. देवी धाम : अगले दिन सुबह दुल्हन के नहाने और सिर धोने के बाद सभी दूल्हा-दुल्हन को लेकर मन्दिर जाते हैं। देवी-देवताओं की धोक लगाकर साठकी खेलते हैं। दूल्हन के साथ देवर और ननदोई सात-सात बार आपस में नीम की डाली से एक-दूसरे को हल्के-हल्के मारते हैं। प्रथा के अनुसार यह रस्म निभाने तक कुछ खाया नहीं जाता। वर की ससुराल की ओर से आई हुई मिठाई देवताओं पर चढ़ाते हैं।
24. कांगना जुआ : दूल्हा-दुल्हन के हाथों के बंधे कांगना को खोलना, दूध युक्त जल में अँगूठी खोजना, मुट्ठी खोलना आदि खेल बहू को उस परिवार के साथ जोड़ता है। कांगना जुआ दूल्हा-दुल्हन को वह भाभी खिलाती है, जिसने काजल डाला हो। दोनों आपस में कांगना में लगी सात गांठ को एक-एक करके खोलते हैं।
दूल्हे को एक हाथ से खोलने की और दुल्हन को दोनों हाथ से खोलने की इजाजत होती है, कई जगह यह रस्में मायके में पूरी की जाती है। सात सुहागन बैठाकर सुहाली और लड्डूओं में हाथ लगवाते हैं। चार-चार लड्डू सबको देते हैं। थैली में बहू से हाथ डलवाते हैं जितने पैसे हाथ में आते हैं, उन पैसो को लड़कियो में बांट देते हैं। देवर भाभी की गोद में बैठकर कहेगा ‘भाभी तुमको बेटा मेरे को बहू’ भाभी नेग देती है, फिर देवर उठता है।
अच्छा दिन देखकर सिरगुंधी करते हैं। थाल में दाल, चावल व रूपये रखकर सभी औरतें वारफेर करती हैं। सब सामान लड़की को देती हैं। फिर मढ़ा सीला देते हैं। नदी व तालाब पर जाकर, देवताओं के आगे का देने का सामान देते हैं। देवी-देवता उठा कर रख देते हैं। बाकी सब समान थैली में भरकर तालाब पर ले जाते हैं। हल्दी व पानी से चैक लीप कर, सतिया बनाकर कुछ सामान उस पर रखते हैं और बाकी समान तालाब में सीला देते हैं
25. पगफेरा : विवाह के कुछ दिन बाद ससुराल से दूल्हन का भाई उसे लेने जाता है तब उसके साथ मेल के रुपये भेजे जाते हैं। सास की साड़ी-ब्लाउज भेजी जाती है, साथ में फल और मिठाई भी जाती है। पगफेरे पर जब बेटी घर पहुँचती है तब मांढा और रखड़ी खुलवाने की रस्म भी निभाई जाती है। इसके लिए हलवा सात कन्याओं में बांटा जाता है। फिर मांढा खोलकर दूसरी जगह या तो रख दिया जाता है या सवा महीने के लिए बांध दिया जाता है। पहली बार जँवाई जब भोजन करता है तो घर की स्त्रियाँ जीजा एवं जँवाई के गीत गाती हैं। विदा करते वक्त बेटी को चुनड़ी ओढ़ाकर देहली (दहलीज) की धोक लगवाकर विदा किया जाता है।
26. बच्चे का जन्म : निष्क्रमण संस्कार को छठी भी कहते हैं। छठी वाले दिन जच्चा नहाने के बाद हवन से पहले कुछ नहीं खाती। मूंग की दाल और शमा के चावल बनते हैं। एक सराई दीवार पर चिपकाते हैं, गोबर की गौर बनाकर लाल कपडे़ में लपेट कर रखते हैं। तेल का दीया जलाकर रखते हैं फिर छलनी ढकते हैं, ताकि बच्चे को नजर ना पडे़। बच्चे की बुआ काजल लगाती हैं। गंगाजल में हल्दी डालकर बच्चे के नाखूनों पर लगाते हैं। कलावा व पैसे से सास-बहू या जच्चा-बच्चा पूजते हैं। पूजा का सामान गाय को खिला दें। लड़का होने के बाद पांच या सात सतिये रखते हैं या रोली के थापे लगते हैं। सफेद रूमाल पर लाल, पीली, हरी और काली बिंदी लगाते हैं। रूमाल को जच्चा के कमरे के गेट पर उल्टा लटकाते हैं। यह नेग सास करती है इसे चरवा बोलते हैं। हवन के लिए जच्चा को देवर पल्ला पकड़कर लाता है। छठी वाले दिन बच्चे को तगड़ी, पोची, चन्दा, सूरज गले में डालते है। छठी वाले दिन बच्चे के कपड़े और तौलिये यह सब बुआ के होते हैं।
27. कुआं पूजन : कुआं पूजन एक ऐसी परम्परा है जो अब कुएं के अभाव में धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। चांद, सूरज, पीपल, बरगद, कुआं आदि के पूजन की परम्परा व्यक्ति को प्रकृति से जोड़े रखती है। इस परम्परा का आशय है जिस प्रकार कुएं का पानी कभी समाप्त नहीं होता उसी प्रकार जच्चा का दूध समाप्त न हो। पहले घरेलू कार्यों हेतू जल प्राप्ति का एकमात्र स्रोत कुआं होता था। इस परम्परा से कुएं का अस्तित्त्व बना रहता था। आजकल बोरिंग, हैंडपंप व वाटर सप्लाई की व्यवस्था से कुएं का महत्व कम हो गया है।
हिन्दू धर्म में जलवा पूजन दो बार किया जाता है। एक, जब लड़का बारात लेकर निकलता है तब घुड़चढ़ी के बाद कुआं पूजन करके वहीं से बारात लेकर निकल जाते हैं। दूसरा, पुत्र के पैदा होने पर कुआं पूजन किया जाता है। इस अवसर पर महिलाएं मांगलिक गीत गाती हैं। समस्त परिजन एकत्रित होकर नाचकर खुशी मनाते हैं। मान्यता है कि कृष्ण जन्म के ग्यारहवें दिन माँ यशोदा ने प्रथम बार जल का पूजन किया था। जल पूजन को ही कुआं पूजन या जलवा पूजन कहते हैं। आजकल कुछ लोग पुत्री के जन्म पर भी जलवा पूजन करने लगे हैं।
28. नहान : पांच नहान करने होते हैं। एक छठी के दिन, दूसरा हवन के दिन, तीसरा और चौथा अच्छा दिन देखकर करते हैं। पांचवां कुएं वाले दिन सवा महीने पर होता है।