पीपल का महत्त्व
भारतीय संस्कृति में पीपल के वृक्ष का बड़ा महत्त्व है। इसको वृक्षों का राजा कहा गया है। इसके सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्तरचेतना पुलकित और प्रफुल्लित होती है। इसके फल बरगद-गूलर की भांति बीजों से भरे तथा आकार में मूँगफली के छोटे दानों जैसे होते हैं। इसके बीज राई के आकार के होते हैं। परन्तु इनसे उत्पन्न वृक्ष विशालतम रूप धारण करके सैकड़ों/हजारों वर्षों तक जीवित रहता है। हिंदू धर्म में भी पीपल वृक्ष का बहुत महत्त्व है। इसे सभी वृक्षों से शुद्ध और पूजनीय माना गया है। इसे विश्व वृक्ष, चेतन वृक्ष और वासुदेव भी कहा जाता है। इसके अनन्त गुणों के कारण इसे देव वृक्ष भी कहा जाता है। पीपल का वृक्ष लगाने वाले की वंश परम्परा कभी विनष्ट नहीं होती। महिलाओं में यह विश्वास है कि पीपल की निरंतर पूजा अर्चना और परिक्रमा करके जल चढ़ाते रहने से पुत्र की प्राप्ति होती है। यदि किसी की कोई कामना है तो उसकी पूर्ति के लिए पीपल के तने के चारों ओर कच्चा सूत लपेटने की भी परंपरा है। हिंदु दर्शन में वर्णन है कि पीपल के पत्ते-पत्ते में देवताओं विशेषतः भगवान विष्णु का वास होता है।
पीपल की पूजा : प्रातःकाल स्नान आदि करने के बाद साफ वस्त्र पहनें। गाय का दूध, तिल और चन्दन मिला हुआ पवित्र जल पीपल की जड़ में अर्पित करें। जल अर्पित करने के बाद धूप बत्ती व दीपक जलाएं और फूल व प्रसाद चढ़ाएं। आसन पर बैठकर या खड़े होकर यह मन्त्र बोलें :-
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे। अग्रतः शिवरूपाय वृक्षाराजाय ते नमः।।
आयुः प्रजां धनं धान्यं सौभाग्यं सर्वसम्पदम्। देहि देव महावृक्ष त्वामहं शरणं गतः।।
पीपल की जड़ में अर्पित थोड़ा-सा जल घर में लाकर छिड़कें। इस प्रकार पीपल की पूजा करने से घर में सुख-समृ(ि और शान्ति बनी रहती है। अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है।
स्कन्द पुराण के अनुसार पीपल के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में अच्युत देव सदैव निवास करते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करने से समस्त देवी-देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं। पीपल, भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णतः मूर्तिमान स्वरूप है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं- समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ। स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त किया है। पीपल की सेवा करने वाले सद्गति प्राप्त करते हैं। इससे पुण्य मिलता है और अदृश्य आत्माएँ तृप्त होकर सहायक बन जाती है। पीपल वृक्ष की प्रार्थना के लिए अश्वत्थ स्तोत्र में पीपल की प्रार्थना का मंत्र भी दिया गया है। प्रसिद्ध ग्रन्थ व्रतराज में अश्वत्थोपासना में पीपल वृक्ष की महिमा का उल्लेख है। अश्वत्थोपनयन व्रत में महर्षि शौनक द्वारा इसके महत्त्व का वर्णन किया गया है।
श्रीमद्भागवत् में वर्णित है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण इस दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए। पीपल के वृक्ष के नीचे मंत्र जप, ध्यान तथा सभी प्रकार के संस्कारों को करना शुभ माना गया है। यज्ञ में प्रयुक्त किए जाने वाले ‘उपभृत पात्र’ (दूर्वी, स्त्रुआ आदि) पीपल-काष्ट से ही बनाए जाते हैं। पवित्रता की दृष्टि से यज्ञ में उपयोग की जाने वाली समिधाएं भी आम या पीपल की ही होती हैं। यज्ञ में अग्नि स्थापना के लिए ऋषिगण पीपल के काष्ठ और शमी की लकड़ी की रगड़ से अग्नि प्रज्वलित किया करते थे। ग्रामीण संस्कृति में आज भी लोग पीपल की नयी कोपलों में निहित जीवनदायी गुणों का सेवनकर उम्र के अंतिम पड़ाव में भी सेहतमंद बने रहते हैं।
पद्मपुराण के अनुसार जो व्यक्ति इस वृक्ष को प्रतिदिन जल अर्पित करता है, वह सभी पापों से छुटकारा पाकर स्वर्ग को जाता है। उसकी परिक्रमा करने से आयु लंबी होती है। पीपल में पितरों का वास माना गया है। इसमें सब तीर्थों का निवास भी होता है इसीलिए मुंडन आदि संस्कार पीपल के वृक्ष के नीचे करवाने का प्रचलन है। शुभ एवं धार्मिक अवसर पर पीपल या आम के पत्तों से वंदनवार भी बनाए जाते हैं। धार्मिक श्रद्धालु लोग इसे मन्दिर परिसर में अवश्य लगाते हैं। सूर्योदय होने से पहले पीपल पर दरिद्रता का अधिकार होता है और सूर्योदय के बाद लक्ष्मी जी का अधिकार होता है। इसलिए सूर्योदय से पहले पीपल की पूजा करना निषेध माना गया है। पीपल के वृक्ष को काटना अथवा नष्ट करना ब्रह्महत्या के समान पाप माना गया है। रात्रि में इस वृक्ष के नीचे सोना अशुभ माना जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पीपल का वृक्ष 24 घंटे आक्सीजन छोड़ता है और रात्रि में ज्यादा छोड़ता है जो खतरनाक साबित होती है।
वैज्ञानिक कारण : वैज्ञानिक नजरिए से निरंतर 24 घंटे आक्सीजन देने वाला यह एकमात्र वृक्ष है। अधिकतर वृक्ष दिन में आक्सीजन छोड़ते हैं और कार्बन डाइआक्साईड ग्रहण करते हैं। जबकि इंसानों के विपरित रात को सभी वृक्ष कार्बन-डाइआक्साईड छोड़ते हैं व आक्सीजन लेते हैं। इन्हीं कारणों से यह कहा जाता है कि रात को वृक्ष के नीचे सोना नहीं चाहिए। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार पीपल एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो 24 घंटे आक्सीजन ही छोड़ता है इसलिए इसके पास जाने से कई रोग दूर होते हैं और शरीर स्वस्थ रहता है। इसलिए इसे पूजा जाता है। इसकी छाया गर्मियों में ठंडी तो सर्दियों में गर्म रहती है। इस वृक्ष के पत्ते, फल आदि सभी में औषधीय गुण रहने से यह रोगनाशक भी होता है। उपरोक्त सभी कारणों से पीपल के वृक्ष का पूजन किया जाता है।
सोमवती अमावस्या व्रत : पद्मपुराण के अनुसार पीपल का वृक्ष भगवान विष्णु का रुप है। इसलिए इसे धार्मिक क्षेत्र में श्रेष्ठ देव वृक्ष की पदवी मिली और इसका विधि विधान से पूजन आरंभ हुआ। हिन्दू धर्म में अनेक अवसरों पर पीपल की पूजा करने का विधान है। हिन्दू कैलेंडर वर्ष में अमावस्या जब सोमवार को पड़ती है तब इसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। इस दिन महिलाएं व्रत रखकर पवित्र पीपल के वृक्ष की 108 बार परिक्रमा कर पूजन करती हैं। मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष में साक्षात भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी का वास होता है। इस अवसर पर तीर्थ स्नान का भी विशेष महत्त्व है।
शनैश्चरी अमावस्या व्रत : हिन्दू कैलेंडर वर्ष में अमावस्या जब शनिवार को पड़ती है तब इसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। इस दिन शनिदेव के साथ पीपल की पूजा की जाती है। शनिवार को पीपल की जड़ में जल में दूध और काले तिल मिलाकर चढ़ाने व तेल का चौमुखी दीपक जलाने से अनेक कष्टों का निवारण होता है। जब किसी व्यक्ति पर शनि की साढ़ेसाती चलती है तो पीपल के वृक्ष का पूजन तथा परिक्रमा की जाती है क्योंकि भगवान कृष्ण के अनुसार शनि की छाया इस वृक्ष पर रहती है। इसकी छाया पूजा-पाठ, कथा श्रवण के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के कुप्रभाव से बचने के लिए हर शनिवार पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए। पीपल के वृक्ष पर पितरों का वास भी माना गया है।
विशेष : अगर घर में पीपल का वृक्ष उग आए तो उसे काटने या जलाने की बजाए पूरे विधि विधान से दूसरी जगह पर लगाना चाहिए। पहले 45 दिन तक उसकी पूजा-अर्चना करें, कच्चा दूध चढ़ाएं और फिर इसे जड़ सहित निकालकर किसी दूसरे स्थान पर लगा दें। मान्यता है कि पीपल के वृक्ष पर रात के समय दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी निवास करती है। इसलिए इसे घर के अन्दर नहीं लगाया जाता।