सनातन धर्म में शिव नाम से प्रसिद्ध शंकर या महादेव त्रिदेवों में सबसे महत्वपूर्ण देवता हैं, जिन्हें शैव मत के अनुयायी सर्वोच्च देवता मानते हैं। यह इकलौते देव हैं जो साकार और निराकार दोनों रूपों में पूजे जाते हैं। भगवान शिव को देवों का देव ‘महादेव’ भी कहा जाता है। इन्हें शम्भू, भोलेनाथ, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधर आदि नामों से भी जाना जाता है। यह मानव चेतना के अन्तर्यामी हैं। वेदों में इन्हें रुद्र कहा गया है। तंत्र साधना में इन्हें भैरव के नाम से जाना जाता है। शिव का एक भरापूरा परिवार है। मान्यता है कि शिवलिंग में उनके परिवार का वास है। इनकी अर्धांगिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके दो पुत्र कार्तिकेय और गणेश तथा एक पुत्री अशोक सुंदरी ‘वनलता’ हैं। अशोक सुंदरी का जन्म सुन्दरवन में कल्पवृक्ष के वरदान स्वरूप हुआ था। रामायण में भगवान राम के कथनानुसार शिव और राम में अन्तर जानने वाला कभी भी शिव या राम का प्रिय नहीं हो सकता।

भगवान शिव से संबंधित बहुत सारे ग्रंथ हैं, जिनमें उनके जीवन चरित्र, रहन-सहन, विवाह और उनके परिवार के बारे में बताया गया है। शिवपुराण में भगवान शंकर के बारे में विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। शिवपुराण के अनुसार भगवान सदाशिव और पराशक्ति अम्बिका से ही भगवान शंकर की उत्पत्ति मानी गई है। शंकर ने ही तप से शिव स्वरूप प्राप्त किया था। उस अम्बिका शक्ति की 8 भुजाएं हैं और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करती है। उस कालरूपी ब्रह्म ‘सदाशिव’ ने ही ‘शक्ति’ के साथ ‘शिवलोक’ नामक क्षेत्र का निर्माण किया था। उस उत्तम क्षेत्र को काशी कहते हैं, यह मोक्ष का स्थान है। यहां शिव और शक्ति अर्थात् कालरूपी ब्रह्म सदाशिव और आदिशक्ति दुर्गा पति-पत्नी के रूप में रहते हैं। यहीं पर जगतजननी ने शंकर को जन्म दिया। इस मनोरम स्थान काशीपुरी को प्रलयकाल में भी शिव और शिवा ने अपने सान्निध्य से कभी मुक्त नहीं किया था।

भगवान शिव स्वयंभू हैं, अर्थात् जिसका ना कोई आदि है और ना अंत। सृष्टि से पूर्व शिव हैं और सृष्टि के विनाश के बाद केवल शिव ही शेष रहते हैं। तभी इन्हें अजर, अमर, अविनाशी कहा जाता है। दुख तथा दुख के कारणों को दूर करने के कारण वह रुद्र कहलाते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार भगवान शिव की उत्पत्ति उनके माथे के तेज से हुई थी। शिव पुराण में भगवान सदाशिव और पराशक्ति अम्बिका से ही भगवान शंकर की उत्पत्ति मानी गई है। इसके अनुसार काशी के आनंदरूप वन में रमण करते हुए दोनों के मन में यह इच्छा उत्पन्न हुई कि किसी दूसरे पुरुष की सृष्टि करनी चाहिए। सनातन धर्म में भगवान शिव को संहार का देवता माना गया है। एक ओर जहां अत्यंत भोले होने के कारण इनका एक नाम भोलेनाथ है वहीं इनका अत्यंत क्रोधी स्वरूप भी प्रसिद्ध है। इसलिए भगवान शंकर को महाकाल भी कहा जाता है। सोमवार का दिन भगवान शिव का ही माना जाता है।

शिव का स्वरूप : एक बार ऋषि-मुनियों के मन में जिज्ञासा जागी कि आखिर भगवान शंकर के माता-पिता कौन हैं? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान शिव ने कहा- हे मुनिवर, मेरे जन्मदाता भगवान ब्रम्हा हैं। ऋषियों ने पूछा कि आपके दादा कौन हुए? तब शिव ने कहा कि भगवान श्रीहरि अर्थात् भगवान विष्णु ही मेरे दादाजी हैं। भगवान की इस लीला से अनजान ऋषियों ने फिर से एक और प्रश्न किया कि जब आपके पिता ब्रम्हा हैं, दादा विष्णु, तो आपके परदादा कौन हैं, तब शिव ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि स्वयं भगवान शिव।
ब्रह्मा और विष्णु सदाशिव के आधे अवतार है, परंतु कैलाशपति शिव सदाशिव का पूर्ण अवतार है। वास्तव में ब्रह्मा, विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं हैं परंतु सृष्टि रचना के लिए अलग-अलग रूप लेते है। कुछ लोग सदाशिव, शम्भू और शंकर को एक ही मानते हैं लेकिन ऐसा नहीं है। शास्त्रों में काल रूप भगवान सदाशिव के पांच सिर और धड़ एकदम पारदर्शी और चमकीला बताया गया है। शम्भू अपने एक हाथ में त्रिशूल के साथ दिखाई देते हैं। त्रिनेत्रधारी रूद्र भगवान शंकर के सिर पर चंद्रमा विद्यमान है और वहां से गंगा निरंतर प्रवाहित होती दिखाई देती है। गले में सर्प और बगल में माता पार्वती उनके पास बैठी दिखाई देती हैं।

भगवान सदाशिव के पांच मुख –
(1) सद्योजात – पश्चिममुखी, निर्विकार रूप, सृष्टि रचना हेतू,
(2) वामदेव – उत्तरमुखी, विकार नाशक वामदेव रूप, सृष्टि संहार हेतू,
(3) तत्पुरुष – पूर्वमुखी, सिद्ध पुरुष रूप, अनुग्रह (कृपा) हेतू,
(4) अघोर – दक्षिणमुखी, अघोरी रूप, तिरोभाव (कर्मफल) हेतू,
(5) ईशान – ईशानमुखी, सृष्टि पालन हेतू जगत पालक रूप माने गए हैं।
इसीलिए वह ‘पंचानन’ कहलाने लगे। प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र बने हैं। भगवान शिव के इन पंचमुख के अवतार की कथा पढ़ने और सुनने का बहुत माहात्म्य है।

शिव के दस स्वरूप :

1. योगेश्वर – योगी होने का अर्थ है सृष्टि के भौतिक स्वरूप को साक्षात् अनुभव करना है। अर्थात् जब आपकी आध्यात्मिक यात्रा करने की योग्यता बेहतर होगी तो किसी प्रकार की सांसारिक बाधा आपके मार्ग की रूकावट नहीं बनेंगी। सीमित को अस्तित्व के असीम में विलीन कर देना योगी होना है।

2. भूतेश्वर – सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पांच तत्वों का एक खेल है। इन पांचों तत्वों पर विजय हासिल करना ही वास्तविक भक्ति है। भूतेश्वर का मतलब है जिसने पंच भूतों पर विजय प्राप्त कर ली है।

3. कालेश्वर – समय (काल) जीवन का विशेष आयाम है, यह ब्रह्माण्ड के अन्य तीन आयामों – प्रकाश, ऊर्जा और गति के साथ मेल नहीं खाता। समय को साधना (समय का सदुपयोग) भी एक प्रकार की कला है। यह सृष्टि का सबसे शक्तिशाली आयाम है जो समस्त ब्रह्माण्ड को एकसाथ थामे रखता है।

4. सर्वेश्वर शम्भू – शिव होने का अर्थ है जो है ही नहीं, जो विलीन हो गया, जो अस्तित्व रहित है, वही सबका आधार है और वही सर्वेश्वर है। साधारण चीजों पर महारत पाना विशेष कला है। जैसे कोई छोटा बच्चा भी किसी गेंद को लात मार कर फेंक सकता है, किन्तु जब कोई इस पर महारत पा लेता है तो इसमें एक ऐसी सुंदरता आ जाती है कि आधी दुनिया बैठकर इसे देखती है।

5. भोलेनाथ – शिव हमेशा से ही एक शक्तिशाली हस्ती के रूप में देखे गए हैं और साथ ही एक ऐसे रूप में जो दुनियां की ऊंच-नीच से अनजान है। इसलिए शिव का एक रूप भोलेनाथ कहलाता है।

6. नटराज – यह नृत्य के देवता के रूप में शिव का एक महत्वपूर्ण स्वरूप है। नटराज का स्वरूप उल्लास और सृजन का नृत्य प्रस्तुत करता है। इसका अर्थ है कि शास्त्रीय कलाएं मनुष्य में मानसिक स्थिरता लाने के लिए हैं। स्थिरता के बिना असली कला नहीं आ सकती।

7. अर्धनारिश्वर – आमतौर पर शिव को पूर्ण पुरुष कहा जाता है लेकिन अर्धनारिश्वर रूप में उनका आधा भाग एक पूर्ण विकसित नारी है। सृष्टि का विस्तार करने के लिए भगवान शिव ने ब्रह्मा को अपना यह स्वरूप दिखलाया था। आध्यात्म में परमात्मा को पुरुष और आत्मा को स्त्री माना गया है। जब आंतरिक पौरुष और स्त्रैण मिलते हैं तो जीव सतत परमानन्द की स्थिति में पहुंच जाता है।

8. काल भैरव – काल भैरव शिव का अत्यंत विनाशक स्वरूप है। शिव ‘भैरवी यातना’ अर्थात् मृत्यु का भय दूर करने के लिए कालभैरव बन गए। मृत्यु के समय कई जन्म तीव्र तीक्ष्णता के साथ सक्रीय हो जाते हैं यानि जितना भी कष्ट और पीड़ा आपको भोगना है, वो एक क्षण में समाप्त हो जाता है, उसके बाद अतीत का कुछ भी कर्म शेष नहीं रह जाता। मृत्यु तुल्य यातना से शीघ्र मुक्ति प्राप्त करने के लिए इसकी गति तीव्र करनी आवश्यक है, अन्यथा यह लंबे समय तक चलता रहेगा।

9. आदि योगी – योग परम्परा में शिव को ईश्वर के रूप में नहीं पूजा जाता है बल्कि वे आदि योगी यानि प्रथम योगी और आदिगुरु यानी पहले गुरु हैं जिनसे योग विज्ञान की शुरूआत हुई। दक्षिणायन की पहली पूर्णिमा ‘गुरु पूर्णिमा’ है। इसी दिन आदियोगी ने सबसे पहले सप्तऋषियों को इसका ज्ञान दिया था।

10. त्र्यम्बकम् शिव को तीसरे नेत्र के कारण त्र्यम्बकम् कहा गया है। इसका अर्थ है कि उनका ज्ञान ब्रह्माण्ड के चरम बिन्दु तक विस्तृत है। हम जो देखते हैं वह वास्तविक सत्य नहीं है, सम्पूर्ण सत्य जानने के लिए ज्ञान रूपी तीसरे नेत्र की आवश्यकता होती है। यह आंतरिक विकास का विज्ञान है।

शिव के प्रतीक चिन्ह :

भगवान शिव का स्वरूप प्रकृति के बहुत ही करीब है। हिन्दू धर्म में शिव का जटाधारी संन्यासी स्वरूप ही अधिक प्रसिद्ध एवं प्रचलित है। असत् से सत् और अभाव से भाव की भावना को सिद्ध करने के लिए शिव संन्यासी रूप में रहते हैं अर्थात् यदि हमारे पास कुछ भी न हो तो कैसे जिया जा सकता है। साधु-सन्तों का अघोरी स्वरूप इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। शिव अपने शरीर पर भस्म लगाए और ‘ॐ’ के ध्यान में मग्न रहते हैं। इनकी जटा में गंगा और माथे पर चन्द्रमा सुशोभित रहते हैं। शिव का प्रमुख प्रतीक तीसरी आंख माना जाता है। जब यह खुलती है तो शिव ‘तांडव नृत्य’ करते हुए विनाशक और प्रलयंकारी बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त हमें शिव के निम्न प्रतीक चिन्ह देखने को मिलते हैं :

शिवलिंग : शिवलिंग को शिव के निराकार स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। ब्रह्माण्ड में दो ही चीजें सत्य हैं ऊर्जा और पदार्थ। हमारा शरीर पदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बनकर शिवलिंग कहलाते हैं। शिव पुराण में शिवलिंग की उत्पत्ति का वर्णन अग्नि स्तंभ के रूप में किया गया है जो अनादि व अनंत है और समस्त कारणों का कारण है। अथर्ववेद के स्तोत्र में एक स्तम्भ की प्रशंसा की गई है, संभवतः इसी से शिवलिंग की पूजा शुरू हुई हो। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है। आकार के अनुसार शिवलिंग तीन प्रकार के होते हैं- उत्तम, मध्यम और अधम। चार अंगुल ऊंचे वेदी से युक्त, सुंदर शिवलिंग को उत्तम शिवलिंग कहा जाता है। उससे आधा मध्यम तथा मध्यम से आधा अधम आकार कहलाता है।

※ तीसरा नेत्र – शिव का प्रमुख प्रतीक तीसरी आंख माना जाता है। जब यह खुलती है तो शिव ‘तांडव नृत्य’ करते हुए विनाशक और प्रलयंकारी बन जाते हैं। शिव को त्र्यम्बकम् अर्थात् त्रिनेत्रधारी कहा जाता है।

जटा – भगवान शिव की जटाएं अंतरिक्ष की प्रतीक हैं। इनकी जटा में गंगा और माथे पर चन्द्रमा सुशोभित रहते हैं। जब गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ तब भगवान शिव ने इसे अपनी जटाओं में धारण किया था।

नाग – भगवान शिव के गले में नाग तीन बार लिपटा रहता है जो हमारे शरीर में स्थित तीन नाड़ियों इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना का प्रतीक है। यह मन के बुरे भावों पर नियन्त्रण रखने का प्रतीक है, यानि दुश्मनों को वश में रखें। अर्थात् हमारे आसपास कितने ही बुरे लोग क्यों न हो, अगर आप सही हैं तो वे आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

भस्म – कपड़े तन ढकने के लिए होते हैं, हमेशा ऐसे वस्त्र धारण करने चाहिए जो सुलभ हों। महंगे कपड़े आपको अपने लोगों से दूर कर सकते हैं। भस्म सांसारिक मोह माया से मुक्त होने का प्रतीक है। भस्म की तरह संसार नश्वर है।

मृग छाल – अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अहंकार का दमन करना आवश्यक है। बाघ हिंसा और अहंकार का प्रतीक है।

त्रिशूल – त्रिशूल के तीन शूल तीनों कालों वर्तमान, भूत और भविष्य के दृष्टि सूचक है।

डमरू – डमरू स्वयं ध्वनि (वाणी) का प्रतीक है। परिस्थिति के अनुसार सोच समझकर बोलना चाहिए।

रुद्राक्ष की माला – भगवान शिव के आंसू से उत्पन्न वृक्ष के बीजों को रुद्राक्ष कहते हैं। अपनी विशेषताओं के अनुसार यह संख्या में 12 होते हैं। शिव आराधना में रुद्राक्ष की माला का विशेष महत्त्व है।

नंदी – बैल को धर्म का प्रतीक माना गया है। हमारा वाहन अर्थात् जीने का सिद्धान्त धर्मयुक्त होना चाहिए। इसी से हमें शांति और सफलता मिलेगी। बैल के चारों पैर चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रतीक हैं। बैल की पूजा का तात्पर्य गौवंश की रक्षा से भी है।

नन्दी गण : वीरभद्र, नंदी, भृंगी, रिटी, टुंडी, श्रृंगी, नन्दिकेश्वर, बेताल, पिशाच, तोतला, भूतनाथ आदि प्रमुख शिवगण हैं। इनमें से वीरभद्र ने ही प्रजापति दक्ष के यज्ञ का विध्वंश किया था।

भांग – सांसारिक मोह-माया का बंधन, भांग के नशे की तरह होता है। भगवद्भक्ति से हर प्रकार का सांसारिक नशा उतर जाता है।

शिव-पार्वती का विवाह :

शिव-पार्वती के विवाह को महाशिवरात्रि के रूप मनाने के दो कारण बताए जाते हैं। पहला यह कि इस दिन भगवान शंकर का विवाह हुआ था। दूसरा यह कि फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव प्रथम सोमनाथ ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए थे। शिव पुराण में शिव-पार्वती के विवाह का विस्तृत वर्णन दिया गया है। भगवान शंकर ने सबसे पहले सती से विवाह किया था। यह विवाह बड़ी कठिन परिस्थितियों में हुआ था क्योंकि सती के पिता दक्ष इस विवाह के पक्ष में नहीं थे। हालांकि उन्होंने अपने पिता ब्रह्मा के कहने पर सती का विवाह भगवान शंकर से कर दिया। राजा दक्ष द्वारा शंकर का अपमान करने के कारण सती ने यज्ञ में कूदकर आत्मदाह कर लिया था। इसके बाद शंकर घोर तपस्या में चले गए और शिव बन गए।

सती ने बाद में हिमवान के यहां पार्वती के रूप में जन्म लिया। उस दौरान पृथ्वी पर तारकासुर नामक दैत्य का आतंक व्याप्त था। ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के अनुसार उसका वध शिवपुत्र ही कर सकता था। लेकिन शिवजी तो तपस्या में लीन थे। देवताओं ने शिवजी का विवाह पार्वती से करने के लिए एक योजना बनाई तथा कामदेव को तपस्या भंग करने के लिए भेजा। कामदेव ने तपस्या तो भंग कर दी लेकिन वह खुद भस्म हो गए। देवताओं के अनुरोध और माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर बाद में शिवजी ने पार्वती से विवाह किया। इससे कार्तिकेय का जन्म हुआ जिसने तारकासुर का अन्त किया। शिव पुराण में कार्तिकेय जन्म कथा का विशेष महात्म्य है।

इस विवाह में शिवजी बारात लेकर पार्वती के यहां पहुंचे। शिवजी की बारात में हर तरह के लोग, गण, देवता, दानव, दैत्य आदि थे। शिव पशुपति हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीव उनकी विवाह में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे। इस बारात को देखकर माता पार्वती की माँ मैना देवी बहुत डर गई और कहा कि वह अपनी बेटी का हाथ ऐसे दुल्हे के हाथ में नहीं सौंपेगी। माता पार्वती ने स्थिति को बिगड़ते देखकर शिवजी से प्रार्थना की कि वह हमारे रीति-रिवाजों के अनुसार तैयार होकर आएं। इसके बाद शिवजी को दैवीय जल से नहलाकर पुष्पों से तैयार किया गया और उसके बाद ही उनका विवाह हुआ।

विवाह के दौरान वर-वधू दोनों की वंशावली घोषित की जानी थी। एक राजा के लिए उसकी वंशावली सबसे अहम चीज होती है जो उसके जीवन का गौरव होता है। पार्वती की वंशावली का बखान खूब धूमधाम से किया गया, परंतु जब शिवजी की वंशावली का बखान करने की बारी आई तो सभी चुप हो गए। बाद में नारदजी ने बात को संभाला और शिवजी के अविनाशी गुणों का बखान किया।

त्रिनेत्रधारी शिव : शिव पुराण के अनुसार एक बार पार्वती जी ने भगवान शिव के पीछे जाकर उनकी दोनों आंखें अपनी हथेलियों से बंद कर दी। इससे सारे संसार में अंधकार छा गया। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव की एक आंख सूर्य है और दूसरी चन्द्रमा। अंधकार होते ही समस्त संसार में हाहाकार मच गया। तब भोलेनाथ ने तुरन्त अपने माथे से अग्नि निकालकर पूरी दुनिया में रौशनी फैला दी। यह रोशनी इतनी तेज थी कि इससे पूरा हिमालय जलने लगा। यह देखकर माता पार्वती घबरा गई और तुरन्त अपनी हथेलियां भगवान शिव की आंखों से हटा दी। तब शिवजी ने मुस्कुराकर अपनी तीसरी आंख बंद की। इससे पूर्व पार्वती को ज्ञात नहीं था कि शिव त्रिनेत्रधारी हैं। शिव विवाह प्रसंग में कामदेव द्वारा शिव को आकर्षित करने का प्रयास करने पर क्रोधित होकर शिव ने अपनी तीसरी आंख खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया था।

द्वादश (12) ज्योतिर्लिंग : हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार जहां-जहां शिवजी स्वयं प्रगट हुए उन स्थानों पर स्थित शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है। वैसे तो भारत में लाखों शिव मन्दिर है लेकिन ज्योतिर्लिंग का अपना एक विशेष महत्व है। भारत में शिव से संबंधित 12 ज्योतिर्लिंग प्रसिद्ध हैं। प्रत्येक का अलग इतिहास और कथानक है। इनके दर्शन मात्र से सारे पाप धुल जाते है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातः और सायंकालीन सन्ध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का पाप स्मरण मात्र से मिट जाता है। भगवान शिव की आराधना में इन ज्योतिर्लिंगों की पवित्र यात्रा महत्वपूर्ण है। यह ज्योतिर्लिंग निम्न प्रकार हैं –

1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग – चन्द्र द्वारा स्थापित, सोमनाथ ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य के सौराष्ट्र में स्थित है।

2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग – यह ज्योतिर्लिंग आंध्रप्रदेश में कृष्णा नदी के पास श्रीशैल नामक पर्वत पर स्थित है।

3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग – यह ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश में उज्जैन शहर में मौजूद है। यहां प्रत्येक 12 वर्ष बाद कुम्भ का मेला आयोजित किया जाता है।

4. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग – यह ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में नर्मदा नदी के तट पर स्थित है।

5. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग – यह ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड राज्य में हिमालय की चोटी पर स्थित केदारनाथ मन्दिर में है।

6. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग – यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र राज्य के पुणे में भीमा नदी के पास स्थित है।

7. विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग – यह ज्योतिर्लिंग उत्तरप्रदेश राज्य के काशी शहर में स्थित है।

8. त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग – यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र राज्य के नासिक में गोदावरी नदी के पास स्थित है।

9. वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग – यह ज्योतिर्लिंग झारखंड राज्य के संथाल नामक स्थान पर स्थित है।

10. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग – नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य में स्थित है।

11. रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग – यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडू राज्य में स्थित है। यह मन्दिर हिन्दू धर्म के प्रमुख चार धामों में से एक है। इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं भगवान राम ने की थी और सेतु का निर्मार्ण किया था।

12. घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग – यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र राज्य के दौलताबाद के पास स्थित है।

शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। एक ओर शिव के मस्तक पर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वह अर्धनारिश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। शिव पुराण सहित किसी भी ग्रंथ में ऐसा नहीं लिखा है कि भगवान शिव या शंकर भांग, गांजा आदि का सेवन करते थे। बहुत से लोगों ने भगवान शिव के ऐसे भी चित्र बना लिए हैं जिसमें वह चिलम पीते हुए नजर आते हैं। यह दोनों की कृत्य भगवान शंकर का अपमान करने जैसा है। यह भगवान शंकर की छवि खराब किए जाने की साजिश है।

शिव पुराण में भगवान शिव द्वारा श्रीराम का ध्यान लगाने की बात कही गई है। इसके बारे में एक कथा प्रचलित है कि एक बार माता पार्वती ने शिव के ध्यान से उठने के बाद शिव से पूछा कि आप तो स्वयं ही देवों के देव हैं, इसलिए तो आपको देवाधिदेव कहते हैं। फिर आप समाधि में किसका ध्यान करते हैं। तब शिव ने पार्वती से कहा कि वह जल्दी ही इसका जवाब माता पार्वती को देंगे। इसके बाद भगवान शिव कौशिक ऋषि के सपने में आए और ऋषि कौशिक को राम रक्षा स्त्रोत लिखने का आदेश दिया।

तब ऋषि कौशिक ने सपने में ही शिव से प्रार्थना करते हुए कहा कि वह राम रक्षा स्त्रोत लिखने में सक्षम नहीं हैं। तब शिव ने ऋषि कौशिक को ज्ञान प्राप्ति की शक्ति दी जिसके बाद ऋषि कौशिक ने राम रक्षा स्त्रोत लिखा। उसके बाद शिव ने माता पार्वती को राम रक्षा स्त्रोत पढ़कर सुनाया और कहा कि वह विष्णु के अवतार श्रीराम का ध्यान करते हैं, क्योंकि राम नाम का एक जाप विष्णु जी के सहस्त्र नाम अर्थात् हजारों नाम के बराबर है, इसलिए राम ही शिव के आराध्य हैं।

शिव का सार स्वरूप :

1. बुराई को खत्म करना : भगवान शिव को विनाश के लिए जाना जाता है। शिव का यह रूप मन में भय पैदा करने वाला है लेकिन बुराई का खत्म होना बेहद जरूरी होता है और शिव इसी के लिए जाने जाते हैं।

2. शांत रहकर खुद पर नियंत्रण रखना : शिव से बड़ा कोई योगी नहीं हुआ, किसी परिस्थिति से खुद को दूर रखते हुए उस पर पकड़ रखना आसान नहीं होता। महादेव एक बार ध्यान में बैठ जाएं तो दुनिया इधर से उधर हो जाए, उनका ध्यान कोई भंग नहीं कर सकता है। शिव का यह रूप स्वयं पर नियंत्रण रखना सिखाता है।

3. नकारात्मक चीजों को भी सकारात्मक होकर लेना : समुद्र मंथन से जब विष बाहर आया तो सभी ने कदम पीछे खींच लिए थे, क्योंकि विष कोई नहीं पी सकता था। ऐसे में महादेव ने स्वयं विष (हलाहल) पिया और उन्हें नीलकंठ नाम दिया गया। इस घटना से बहुत बड़ा सबक मिलता है कि हम भी जीवन में आने वाली निगेटिव चीजों को अपने अंदर रख लें, लेकिन उसका असर न खुद पर और न ही दूसरों पर हावी होने दें।

4. हर समय समान भाव रखना : शिव का संपूर्ण रूप देखकर यह संदेश मिलता है कि हम जिन चीजों को अपने आस-पास देख भी नहीं सकते, उसे उन्होंने बड़ी आसानी से अपनाया है। तभी तो उनकी विवाह पर भूतों की मंडली पहुंची थी और शरीर में भभूत लगाए भोलेनाथ के गले में सांप लिपटा होता है।

5. जीवनसाथी के प्रति सम्मान : शिव का यह रूप जगजाहिर है। हिंदू मान्यताओं के हिसाब से परफेक्ट पार्टनर महादेव को ही माना जाता है। इसीलिए शिव को अर्धनारिश्वर भी कहा जाता है।

6. अपनी राह स्वयं चुनना : शिव की जीवन शैली हो या उनका कोई अवतार, वह हर रूप में बिल्कुल अलग हैं। फिर वो रूप सबसे पहले प्रसन्न होने वाले भोलेनाथ का हो, तांडव करते हुए नटराज हो, विष पीने वाले नीलकंठ या अर्धनारिश्वर। वह हर रूप में जीवन को सही राह देते हैं।