हिन्दू धर्म का परिचय
हिन्दू धर्म को विश्व का प्राचीनतम धर्म माना जाता है। इस धर्म की उत्पति वेदों से होने के कारण इसे वैदिक धर्म या सनातन धर्म भी कहा जाता है अर्थात् यह धर्म सृष्टि के प्रारम्भ से विद्यमान रहा है। इस धर्म को मानने वाले अधिकांश लोग भारत, नेपाल और माॅरीशस में पाए जाते हैं। अनुयायियों की संख्या के आधार पर यह विश्व का तीसरा बड़ा धर्म है। इतिहासकार इसे हड़प्पा संस्कृति से जोड़कर कुछ हजार वर्ष पुराना धर्म मानते हैं। उनके अनुसार 1700 ई.पू. इस सभ्यता के अन्त में मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ जो आर्य कहलाते थे।
भारतवर्ष को प्राचीन ऋषियों ने ‘हिन्दुस्थान’ नाम दिया था, जिसका अपभ्रंश ‘हिन्दुस्तान’ है। हिन्दू शब्द का अर्थ सिन्धु नदी से भी लिया जाता है। संस्ड्डत में सिन्धु शब्द के दो मुख्य अर्थ हैं – पहला, सिन्धु नदी जो मानसरोवर के पास से निकल कर लद्दाख और पाकिस्तान से बहती हुई अरब सागर में मिलती है, दूसरा, कोई समुद्र या जलराशि। बृहस्पति आगम के अनुसार हिमालय के प्रथम अक्षर ‘हि’ एवं सिन्धु का अन्तिम अक्षर ‘न्दु’, इन दोनों अक्षरों को मिलाकर शब्द बना हिन्दु और यह भू-भाग हिन्दुस्थान कहलाया।
हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।।
अर्थात् हिमालय से प्रारम्भ होकर सिन्धु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है। ऋग्वेद में आर्यों के निवास स्थान को सप्तसिंधु प्रदेश कहा गया है। ऋग्वेद की नदी स्तुति के अनुसार यहां पर सिन्धु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), शुतुद्रि (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुषिणी (रावी) और अस्किनी (चेनाब) आदि सात नदियाँ थीं। आर्यों से ही भारत का नाम आर्यावर्त पड़ा। सिन्धु नदी के दूसरी तरफ के निवासियों को ईरानवासी हिन्दू कहते थे, जो ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ करते थे। उनकी देखा-देखी अरब हमलावर भी तत्कालीन भारतीयों को हिन्दू और उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहने लगे। चूंकि उस समय भारत में केवल वैदिक मान्यता वाले आर्य लोग रहते थे और किसी धर्म का उदय नहीं हुआ था, इसलिए हिन्दू शब्द सभी भारतीयों के लिए राष्ट्रीयता के रूप में प्रयुक्त होता था। कालान्तर में विदेशियों ने इसको धर्म के सन्दर्भ में प्रयोग करना शुरु कर दिया।
हिन्दू की परिभाषा : जो व्यक्ति वेदों को मानता हो, यज्ञोपवित धारण करता हो, हवन-यज्ञ करता हो, पित्तरों में श्रद्धा रखता हो तथा धरती, गाय, जननी, बड़ी बहन और भाभी को माँ समान मानता हो हिन्दू कहलाता है।
‘ॐ’, ‘स्वास्तिक’, ‘तिलक’, ‘यज्ञोपवित’, ‘कलश’, ‘गरुड़ घंटी’ और ‘शंख’ आदि हिन्दू धर्म के प्रमुख प्रतीक चिन्ह हैं।
हिन्दू धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में एक अभौतिक आत्मा होती है, जो सनातन, अव्यक्त, अप्रमेय और विकार रहित है। केवल मनुष्य में ही नहीं, बल्कि हर पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, यानि कि हर जीव में आत्मा होती है। इनमें से केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण द्वारा आत्मा के लक्षण इस प्रकार बताए गए हैं:-
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नाय, भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो, न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।
अर्थात् यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न तो मरता ही है तथा न ही यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
हिन्दू धर्म स्वप्रेरित धर्म है जिसमें सामाजिक भावनाओं एवं विचारों का समावेश है। यह धर्म अपने अन्दर अलग-अलग उपासना पद्धतियां, मत, सम्प्रदाय और दर्शन समेटे हुए है। सभी को समान आदर-सम्मान प्राप्त है। इस धर्म का आदर्श वाक्य ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ है। यह धर्म आत्मा की 84 लाख योनियों के साथ पुनर्जन्म की पद्धति पर आधारित है जिसमें कर्मों की प्रधानता होती है। इस धर्म में मान्यता है कि बुरे व पाप कर्मों का परिणाम नरक और अच्छे व पुण्य कर्मों का परिणाम स्वर्ग की प्राप्ति है। अर्थात् अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार योनि बदलती है। इन योनियों का विभाजन चार प्रकार से होता है, जिन्हें अण्डज, स्वेदज, उद्भज और जरायुज कहा जाता है। अण्डे से उत्पत्ति होने के कारण पक्षियों की योनि अण्डज तथा पशुओं और मनुष्य योनि जरायुज योनियां कही गई हैं।
हिन्दुओं के उपासना स्थल को मन्दिर कहते हैं। मन्दिर में एक या अधिक देवताओं की उपासना होती है। गर्भगृह में ईष्टदेव की मूर्ति प्रतिष्ठित होती है। मूर्तिपूजा हिन्दुओं के लिये ईश्वर की भक्ति करने का एक प्रमुख साधन है। इससे ईश्वर के निराकार स्वरूप को किसी भी मनचाहे सुन्दर रूप में देखा जा सकता है। वैदिक काल में मन्दिर नहीं होते थे। उस समय ईशोपासना अग्नि के स्थान पर यज्ञ द्वारा होती थी, जिसमें एक सोने की चतुर्भुजी मूर्ति ईश्वर के प्रतीक रूप में स्थापित की जाती थी। आर्य लोग हवन-यज्ञ और वैदिक मंत्रों से विभिन्न देवताओं इन्द्र, अग्नि, सोम और वरुण आदि की पूजा करते थे। उनके लिये हवन कुंड में घी, दूध, दही, जौ, इत्यादि की आहुति दी जाती थी। महर्षि मनु ने ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्’ अर्थात् वेद ही धर्म का मूल है, कहकर इसे सभी धर्मग्रन्थों का आधार बताया है।
मनुस्मृति के अनुसार सनातन हिन्दू धर्म के निम्न 10 नियम माने गए हैं –
1. ईश्वर ही सत्य है : सृष्टि रचयिता ईश्वर के साकार और निराकार रूप को जानना ज्ञान है। आत्म स्वरूप निराकार परमेश्वर एक है, जो माता-पिता के प्रतीक साकार रूप में हमारे साथ रहता है।
2. संध्या वंदन : प्रतिदिन दोनों समय हवन-यज्ञ, पूजा-आरती, भजन-कीर्तन करना आवश्यक है।
3. व्रत एवं उपवास : सुख की प्राप्ति तथा दुःख की निवृत्ति के लिए व्रत और उपवास श्रेष्ठ उपाय हैं।
4. तीर्थयात्रा : हिन्दू धर्म और संस्कृति में तीर्थों का विशेष महत्त्व है। तीर्थ यात्रा का असली उद्देश्य आत्मा का उद्धार करना है। तीर्थ का अर्थ है तीन अर्थों धर्म, काम व मोक्ष की प्राप्ति।
5. सेवा और दान देना : सभी कत्र्तव्यों में श्रेष्ठ ‘सेवा’ का बहुत महत्व बताया गया है। रक्षा का एक रूप है सेवा। प्रत्येक व्यक्ति को सेवा कार्य हेतू अपनी आय का एक हिस्सा दान देना चाहिए।
6. धार्मिक त्यौहार : उन त्यौहारों, पर्वों या उत्सवों को मनाने का महत्व अधिक है जिनका उल्लेख धर्म ग्रन्थों में मिलता है। मनमाने त्यौहार मनाने से धर्म की हानि होती है।
7. हवन एवं यज्ञ कर्म : यज्ञ 5 प्रकार के होते हैं: ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ, अतिथि यज्ञ।
8. संस्कारों का पालन करना : सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक पवित्र 16 संस्कार संपन्न किए जाते हैं, जिनका पालन करना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है।
9. धर्म प्रचार : हिन्दू धर्म में सभी को वेद-शास्त्र पढ़ना और उसका प्रचार-प्रसार करना आवश्यक है।
10. न्याय और मोक्ष : लोक सेवा करते हुए धर्मसंगत निर्णय करना न्याय है। धर्मपूर्वक न्याय करते हुए सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त करना मोक्ष है।
हिन्दू धर्म में गाय : गाय को हिन्दू धर्म में माता समान पूजनीय माना गया है। गाय एक महत्त्वपूर्ण पालतू पशु है जो संसार में प्रायः सर्वत्र पाई जाती है। हिन्दु धर्म के अनुसार –
गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढ़ा मतिः। पुनर्जन्मनि विश्वासः स वह हिन्दुरिति स्मृतः।।
अर्थात् जिसकी गौमाता में भक्ति हो, प्रणव ;¬द्ध पूज्य मन्त्र हो, पुनर्जन्म में विश्वास हो, वही हिन्दू है।
गाय की महिमा को समझकर ऋषि-मुनियों ने गाय को माता का दर्जा दिया और कार्तिक शुक्ल अष्टमी के दिन ‘गोपाष्टमी’ की परम्परा स्थापित की। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन से ही गायों को चराना आरम्भ किया था। इससे पहले वह केवल गाय के बछड़ों को चराते थे। इस दिन गाय और उनके बछड़ों का श्रृंगार करके उनकी आरती उतारी जाती है। धरती पर प्रथम दिव्य ‘कामधेनू’ गाय की उत्पत्ति समुद्र मन्थन से हुई थी। यह गाय ऋषियों को दी गई ताकि उसके अमृत तुल्य दूध का उपयोग यज्ञ, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए किया जा सके। गाय का दूध मनुष्यों के लिए अमृत समान माना गया है। पंचगव्यों या पंचामृत में इसको अवश्य मिलाया जाता है। गाय में सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास भी माना जाता है। हिन्दू धर्म की संस्कृति और आत्मा गाय को माना गया है। इसलिए हिन्दू घरों में प्रतिदिन पहली रोटी गाय को दी जाती है।
हिन्दू धर्म में मांसाहार अच्छा नहीं माना जाता, क्योंकि मांस तामसिक पदार्थ है और इससे जीवहत्या होती है। व्यक्ति को शाकाहारी होना आवश्यक नहीं है, हालांकि शाकाहार को सात्विक आहार माना जाता है। आवश्यकता से अधिक तला-भुना आहार ग्रहण करना राजसिक माना गया है।
हिन्दू धर्म का आधार : हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वर्णन आता है। इसमें विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा की जाती है परन्तु मूल रूप से यह एकेश्वरवादी धर्म है। हिन्दू धर्म के चार मुख्य सम्प्रदाय हैं:-
(1) वैष्णव – यह विष्णु या उसके अवतारों को मानते हैं;
(2) शैव – यह शिव या उसके अवतारों को परमेश्वर मानते हैं;
(3) शाक्त – यह देवी दुर्गा या उसके अवतारों को परमशक्ति मानते हैंद्; और
(4) स्मार्त – यह परमेश्वर के भौतिक स्वरूप ‘साधु-सन्तों’ को मानते हैं और ईश्वर के विभिन्न रूपों को एकसमान मानते हैं।
हिन्दु धर्म के 4 वेद और 6 शास्त्रों पर आधारित 18 पुराण, 108 उपनिषद, मनुस्मृति, रामायण, महाभारत और गीता आदि धार्मिक ग्रन्थ इसके मुख्य आधार हैं। यह सभी ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं। इनके अतिरिक्त इस धर्म में 4 चरण (सत्य, तप, पवित्रता और दान), 4 पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष), 4 आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास), 4 पीठ (ज्योतिर्पीठ, शारदापीठ, गोवर्धनपीठ और श्रृंगेरीपीठ), 4 कुम्भ (हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक), 4 धाम (जगन्नाथ, द्वारिका, बद्रीनाथ और रामेश्वरम), 4 छोटी धाम (गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ), 4 मास (सौर, चंद्र, नक्षत्र और सावन), चातुर्मास (श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक), 4 पद (ब्रह्मपद, रुद्रपद, विष्णुपद, सिद्ध पद) आदि का महत्व भी है।
हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रन्थ :
हिंदू धर्म के पवित्र ग्रन्थों को दो भागों में बाँटा गया है- श्रुति और स्मृति। श्रुति हिन्दू धर्म के सर्वोच्च ग्रन्थ हैं। किसी भी युग में इनमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। स्मृति ग्रन्थों में देश-कालानुसार बदलाव हो सकता है। श्रुति के अन्तर्गत केवल वेद आते हैं। वेदों को ‘श्रुति’ यानि सुना हुआ भी कहते हैं। वेद श्रुति इसलिये कहे जाते हैं क्योंकि वेदों को परमात्मा ने स्वयं ऋषियों को सुनाया था। पुराण, शास्त्र, मनुस्मृति, भगवद गीता, धर्मसूत्र एवं आगम शास्त्र आदि स्मृति ग्रन्थ हैं। रामायण और महाभारत में हिन्दुओं का इतिहास है। अगर श्रुति और स्मृति में कोई विवाद होता है तो श्रुति ही मान्य होगी। सभी स्मृति ग्रन्थ वेदों की प्रशंसा करते हैं। इनको वेदों से निचला स्तर प्राप्त है, पर यह ज्यादा आसान हैं और अधिकांश हिन्दुओं द्वारा पढ़े जाते हैं।
वेदों की संख्या चार है – ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। वेदों के चार उपवेद भी बताए हैं। इनके नाम क्रमशः स्थापत्यवेद, गान्धर्ववेद, धनुर्वेद तथा आयुर्वेद हैं। प्रत्येक वेद के चार विभाग हैं- संहिता, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद। ‘संहिता’ को मूल वेद माना जाता है, यह वेदों का मन्त्र भाग है जबकि, शेष तीन इनकी व्याख्या करते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों में गद्य रूप में यज्ञ, वेदमन्त्रों तथा देवताओं की व्याख्या की गई है। आरण्यक ग्रन्थों में आध्यात्मिक ज्ञान और जीवन दर्शन की बातें लिखी हुई हैं। उपनिषद गुरुकुल की ‘गुरु शिष्य परम्परा’ का आदर्श उदाहरण हैं। उपनिषदों की संख्या 108 मानी जाती है। दर्शन शास्त्रों की संख्या छः हैं – सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त। वेदव्यास रचित पुराणों की संख्या 18 मानी गई हैं।
आरम्भ में वेद श्रुति रूप में रहे और बाद में इन्हें लिपिबद्ध किया गया। वेदवेत्ता महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान आदि वेदों के प्रमुख विषय हैं। जैमिनी, व्यास, पराशर, कात्यायन, याज्ञवल्क्य, सायण और पाणिनी आदि अनेक ऋषियों को वेदों का सर्वज्ञाता माना जाता है। इन ऋषियों ने वैदिक ऋचाओं में छिपे ज्ञान का बड़ी ही सूक्ष्मता के साथ अध्ययन किया है।