सनातन संस्कृति में प्राचीन काल से ही मस्तिष्क पर तिलक लगाने की परम्परा चली आ रही है। नित्य शौच आदि से निवृत्त होकर, स्नान-ध्यान करने के पश्चात् अपने ईष्टदेव का पूजन-अर्चन करने की परम्परा प्रचलित है। ईष्टदेव का पूजन करने के पश्चात् मस्तिष्क पर भगवान के आशीर्वाद रूप में तिलक लगाया जाता है। बिना तिलक लगाए ना तो पूजा की अनुमति होती है और ना ही पूजा संपन्न मानी जाती है। तिलक दोनों भौहों के बीच माथे पर लगाया जाता है। भारतीय सन्त सम्प्रदाय में शरीर के बारह स्थानों पर तिलक करने का विधान है – सिर, ललाट, कंठ, हृदय, दोनों बाहें, दोनों बाहुमूल, नाभि, पीठ, दोनों बगल। तिलक के द्वारा यह भी जाना जा सकता है कि आप किस सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखते हैं। यह मन को एकाग्र और शांत रखने में सहायक है। इससे ग्रहों की उर्जा संतुलित होती है और भाग्य विशेष रूप से मदद करने लगता है।

मानव शरीर में मूलाधार, स्वाधिष्ठान (पेट), मणिपुर (नाभि), अनाहत (हृदय), विशुद्ध (गला), आज्ञा (मस्तिष्क) और सहस्त्रार (सिर) आदि सात सूक्ष्म ऊर्जा केंद्र होते हैं, जिन्हें चक्र कहते हैं। मस्तिष्क के मध्य में स्थित आज्ञा चक्र को सक्रिय करने के लिए मस्तिष्क पर तिलक लगाना आवश्यक होता है। ज्योतिष में आज्ञाचक्र बृहस्पति का केन्द्र है। इसे गुरु का प्रतीक-प्रतिनिधि माना गया है। बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं। इसलिए साधना ग्रन्थों में इसे गुरुचक्र के नाम से अभिग्रहित किया गया है।

मस्तिष्क पर तिलक लगाना शुभ और सात्विकता का प्रतीक माना जाता है। सफलता प्राप्ति के लिए रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुमकुम का तिलक लगाने की प्रथा है। प्रत्येक उंगली से तिलक लगाने का अपना-अपना महत्त्व है। जैसे मोक्ष की इच्छा रखने वाले को अंगूठे से तिलक लगाना चाहिए, शत्रु नाश करना चाहते हैं तो तर्जनी से, धनवान बनने की इच्छा है तो मध्यमा से और सुख-शान्ति चाहते हैं तो अनामिका से तिलक लगाएं। काली हल्दी का टीका नए कार्य में आपकी सफलता में मददगार साबित होगा। देवताओं को मध्यमा उंगली से तिलक लगाया जाता है। जो जातक तिलक के ऊपर चावल लगाता है, लक्ष्मी उसके आकर्षण में बंध जाती है और सदा अंग-संग रहती है। आरती के साथ, आदर, सत्कार और स्वागत के लिए भी तिलक लगाया जाता है।

सनातन धर्म में शैव, शक्ति, वैष्णव और गाणपत्य सबके अलग-अलग तिलक होते हैं। शैव परंपरा में चंदन की तीन आड़ी रेखा यानि त्रिपुंड लगाया जाता है। शक्ति के आराधक चंदन या कुंकुम की बजाय सिंदूर का तिलक लगाते हैं। वैष्णव परंपरा में 64 प्रकार के तिलक बताए गए हैं। वैष्णव पंथ राम मार्गी और कृष्ण मार्गी परंपरा में बंटा हुआ है। इनके भी अपने-अपने मत, मठ, पीठ और गुरु हैं। साधु-संतों में पहचान के लिए अलग-अलग तिलक होते हैं। इसीलिए वैष्णव परंपरा में तिलकों के इतने प्रकार हैं।

तिलक चार प्रकार से बनाए जाते हैं-

1. कुमकुम – रोली और कुमकुम के तिलक से आकर्षण बढ़ता है, आलस्य दूर होता है। यह हल्दी और चुना से मिलाकर बना होता है जो हमारे मस्तिष्क को कैल्शियम प्रदान कर, आज्ञा चक्र की शुद्धि करते हुए ज्ञान चक्र को प्रज्ज्वलित करता है।
2. केसर – केसर के तिलक से यश बढ़ता है, कार्य पूरे होते हैं। केसर का तिलक लगाने से मस्तिष्क ठंडा व शीतल रहता। केसर का तिलक भी आज्ञा चक्र को प्रज्ज्वलित करता है।
3. चंदन – चंदन का तिलक मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करते हुए मानसिक शान्ति भी देता है।
4. भस्मी – भस्म या राख के तिलक से दुर्घटनाओं से रक्षा होती है। यह तिलक वैराग्य की अग्रसर करते हुए मस्तिष्क के रोम कूपों के विषाणुओं को भी नष्ट करता है।

तिलक लगाने के नियम :

बिना स्नान किए तिलक ना लगाएं तथा तिलक लगाकर कभी न सोएं।
तिलक पहले अपने ईष्ट देव या भगवान को लगाएं, फिर स्वयं को तिलक लगाएं।
सामान्यतः स्वयं को अनामिका उंगली से तथा दूसरे को अंगूठे से तिलक लगाएं।
संगम तट पर स्नान के बाद तिलक लगाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
तिलक लगाने से तनाव कम होता है, मन को शांति मिलती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक ग्रहों के अनुसार तिलक लगाने से ग्रह शांत रहते हैं।
तिलक लगाकर मांस, मदिरा का सेवन न करें।

किस तिलक से क्या लाभ होता है?

चन्दन के तिलक से एकाग्रता बढती है, आलस्य दूर होता है।
रोली और कुमकुम के तिलक से आकर्षण बढ़ता है।
केसर के तिलक से यश बढ़ता है, कार्य पूरे होते हैं।
गोरोचन के तिलक से विजय की प्राप्ति होती है।
अष्टगंध के तिलक से विद्या बुद्धि की प्राप्ति होती है।
भस्म या राख के तिलक से दुर्घटनाओं और मुकदमेबाजी से रक्षा होती है।

किस ग्रह को मजबूत करने के लिए कौन-सा तिलक लगाएं?

⁜ सूर्य – लाल चन्दन का तिलक अनामिका उंगली से लगाएं।
⁜ चन्द्रमा – सफेद चन्दन का तिलक कनिष्ठा उंगली से लगाएं।
⁜ मंगल – नारंगी सिन्दूर का तिलक अनामिका से लगाएं।
⁜ बुध – अष्टगंध का तिलक कनिष्ठा उंगली से लगाएं।
⁜ बृहस्पति – केसर का तिलक तर्जनी उंगली से लगाएं।
⁜ शुक्र – रोली और अक्षत अनामिका उंगली से लगाएं।
⁜ शनि, राहु, केतु – कंडे या धूप बत्ती की राख तीन उंगलियों से लगाएं।

तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व : ललाट पर तिलक धारण करने से मस्तिष्क को शांति और शीतलता मिलती है तथा बीटाएंडोरफिन और सेराटोनिन नामक रसायनों का स्राव संतुलित मात्रा में होने लगता है। इन रसायनों की कमी से उदासीनता और निराशा के भाव पनपने लगते हैं। अतः तिलक उदासीनता और निराशा से मुक्ति प्रदान करने में सहायक है।

आकर्षण के लिए कैसे बनाएं तिलक : ताम्बे के पात्र में थोड़ी-सी रोली लेकर, इसमें थोड़ा-सा गुलाब जल मिलाएं। इसका पेस्ट बनाकर पहले अपने ईष्टदेव को तिलक लगाएं, फिर स्वयं को तिलक करें।

विजय और शक्ति के लिए कैसे बनायें तिलक : लाल चन्दन घिसकर चांदी के या शीशे के पात्र में रख लें। इसको देवी दुर्गा की प्रतिमा के सामने रखकर 27 बार ‘ॐ दुं दुर्गाय नमः’ का जाप करें। अब इस चन्दन को देवी के चरणों में लगाएं। इसके बाद चन्दन को माथे और बाहों पर लगाएं।