हिंदू धर्म में पीपल, नीम और तुलसी की तरह ‘वट वृक्ष’ का भी बहुत महत्त्व है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिमूर्ति की तरह ही वट (बड़), पीपल व नीम की ‘त्रिवेणी’ को माना जाता है। अनेक व्रत व त्यौहारों में वटवृक्ष की पूजा की जाती है। यह आस्था के ऊपर निर्भर करता है। इसकी जड़े शाखाओं से निकलकर हवा में लटकती हैं तथा बढ़ते हुए धरती के भीतर घुस जाती हैं एवं स्तंभवत बन जाती हैं। इसका फल छोटा गोलाकार एवं लाल रंग का होता है, जिसमें बीज पाया जाता है। इसका बीज बहुत छोटा होता है, किन्तु इसका पेड़ बहुत विशाल होता है। इसकी पत्ती चैड़ी एंव लगभग अण्डाकार होती है।

बरगद का वृक्ष एक दीर्घजीवी विशाल वृक्ष है, अतः इसे ‘अक्षयवट’ भी कहा जाता है। इसकी छाया सीधे मन पर असर डालती है और मन को शांत बनाये रखती है। अकाल में भी यह वृक्ष हरा-भरा रहता है। अतः इस समय पशुओं को इसके पत्ते और लोगों को इसके फल पर निर्वाह करना सरल होता है। इसकी पत्ती, शाखाओं एवं कलिकाओं को तोड़ने से दूध जैसा रस निकलता है जिसे लेटेक्स अम्ल कहा जाता है। इसकी शाखाओं और पत्तों से दूध निकलता है जिसका प्रयोग तांत्रिक करते हैं। इसकी छाल और पत्तों से औषधियां भी बनाई जाती हैं। जहाँ तक संभव हो अधिक से अधिक बरगद का वृक्ष लगायें और लगवाएं। यह प्रकृति के सृजन का प्रतीक है, इसलिए संतान के इच्छित लोग इसकी विशेष पूजा करते हैं।

बरगद का धार्मिक महत्व : हिन्दू परंपरा में इसे पूज्य माना जाता है। इसके पूजन से और इसकी जड़ में जल देने से पुण्य प्राप्ति होती है। अलग-अलग देवों से अलग-अलग वृक्ष उत्पन्न हुए, यक्षों के राजा मणिभद्र से वटवृक्ष उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार पीपल को विष्णु का प्रतीक माना जाता है, उसी प्रकार बरगद को शिव का प्रतीक माना जाता है। इसकी छाल में विष्णु, जड़ में ब्रह्मा और शाखाओं में शिव का वास माना जाता है।

वट सावित्री व्रत : उत्तर भारत में वट सावित्री व्रत का बहुत महत्त्व है। यह ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी से अमावस्या तक 3 दिन मनाया जाता है। मान्यता है कि सुहागिन महिलाएं यह व्रत पति की लंबी उम्र और संतान प्राप्ति के लिए सावित्री देवी के साथ वट वृक्ष की पूजा करती हैं। इसका महत्त्व करवाचौथ जैसा होता है। इस दिन महिलाएं नित्यकर्म, स्नानादि करके समस्त पूजन सामग्री के साथ देवी सावित्री और सत्यवान की प्रतिमा लेकर निकट के वट वृक्ष के पास जाएं। वहां वट वृक्ष के नीचे सावित्री देवी की मूर्ति स्थापित कर बरगद के पेड़ की पूजा शुरू करें। वट वृक्ष पर जल चढ़ाएं। इसके बाद पुष्प, अक्षत, फूल, भीगा चना और मिठाई अर्पित करें। अब कच्चे धागे को 3 या 7 बार वट वृक्ष में परिक्रमा करते हुए लपेटें। इसके बाद हाथ में काला चना लेकर व्रत कथा को सुनें या पढ़ें। कथा सुनने के बाद चने का बायना निकलकर अपनी सास को देकर आशीर्वाद लें।

बरगद के वृक्ष की उपासना :

वटवृक्ष की जड़ में भगवान् शिव का ध्यान करते हुए नियमित जल अर्पित करें। इसके बाद उसके नीचे बैठकर ‘ॐ नमः शिवाय’ का कम से कम 11 माला जाप करें। प्रतिदिन बरगद की जड़ में जल डालें।
शनिवार को वटवृक्ष के नीचे बैठकर शनि मंत्र का जाप करने और इसकी पूजा करने वाले को कभी भी कोई ग्रह पीड़ा नहीं दे सकता। इसकी पूजा के लिए इसके तने पर काला सूत तीन बार लपेटें, तेल का चैमुखा दीपक जलाएं और वृक्ष की परिक्रमा करते हुए कृपा की प्रार्थना करें।
अमावस्या के दिन पीला सूत, फूल और जल लेकर प्रातःकाल वट वृक्ष के निकट जाएं। वट वृक्ष के नीचे घी का दीपक जलाएं। वृक्ष की जड़ में जल और पुष्प अर्पित करें। वटवृक्ष की 9 बार परिक्रमा करें और पीला सूत उसके तने में लपेटते जाएँ और सुखद दाम्पत्य जीवन की प्रार्थना करें।