विश्वकर्मा कौन है ?
आदिकाल से ही शिल्पकार विश्वकर्मा अपने विशिष्ट ज्ञान एवं विज्ञान के कारण न केवल मानवों अपितु देवगणों द्वारा भी पूजनीय और वंदनीय हैं। स्कन्द पुराण में भगवान विश्वकर्मा के वशंजों की चर्चा की गई है। स्कन्द पुराण में नागर खण्ड के अध्याय 6 में शिल्पी का बोध रथकार शब्द से ही कराया गया है। उनको गृहस्थ जैसी संस्था के लिए आवश्यक सुविधाओं का निर्माता और प्रवर्तक माना गया है। विष्णु पुराण के पहले अंश में विश्वकर्मा को देवताओं का वर्धकी या देव-बढ़ई कहा गया है।
माना जाता है कि प्राचीन काल की सभी राजधानियाँ, सतयुग का स्वर्ग लोक, त्रेता युग की लंका, द्वापर युग की द्वारिका और कलयुग का हस्तिनापुर आदि विश्वकर्मा द्वारा ही रचित थे। विष्णु का सुदर्शन चक्र, शिव का त्रिशूल, कुबेर का पुष्पक विमान, कर्ण के कवच-कुण्डल तथा यमराज का दण्ड भी इनके द्वारा ही रचित थे।

ब्रह्मा के मानस पुत्र धर्म की पत्नी दक्ष पुत्री वसु से उत्पन्न सातवें पुत्र वास्तु थे, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्तक थे। इन्हीं वास्तुदेव की पत्नी अंगिरसी (अंगिरा ऋषि की पुत्री भुवना) से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए थे। अपने पिता की भांति विश्वकर्मा भी आगे चलकर वास्तुकला के अद्वितीय आचार्य बने। हंस पर आरूढ़ वृद्धकाय विश्वकर्मा अपने चारों हाथों में कंबासूत्र, जलपात्र, पुस्तक और ज्ञानसूत्र धारण किए हुए हैं। स्कंद पुराण के अनुसार इनका विवाह देवगुरू बृहस्पति की पुत्री आकृति के साथ हुआ था। इनके पाँच पुत्र- मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी एवं दैवज्ञ हैं। यह पांचों पुत्र क्रमशः लोहा, लकड़ी, कांसा, मिट्टी और सोना-चांदी के कला विशेषज्ञ थे।
1. मनु का विवाह अंगिरा ऋषि की कन्या कंचना के साथ हुआ था। इन्होंने लौह सृष्टि का निर्माण किया है। इनके वंशज लौहे के औजार और हथियार बनाने का कार्य करते हैं।
2. मय का विवाह पराशर ऋषि की कन्या सौम्या देवी के साथ हुआ था। इन्होने इन्द्रजाल सृष्टि की रचना की थी। इनके वंशज लकड़ी से सम्बन्धित कार्य करते हैं।
3. त्वष्टा का विवाह कौशिक ऋषि की कन्या जयन्ती के साथ हुआ था। इनके वंशज ताम्रक के रूप में जाने जाते है। इनके वंशज तांबे की मूर्ति और बर्तन बनाने का कार्य करते हैं।
4. शिल्पी का विवाह भृगु ऋषि की पुत्री करूणा के साथ हुआ था। इनके वंशज शिल्पकार, संगतराश और मूर्तिकार भी कहलाते हैं।
5. दैवज्ञ का विवाह जैमिनी ऋषि की कन्या चन्द्रिका के साथ हुआ था। इनके वशंज स्वर्णकार के रूप में जाने जाते हैं। यह स्वर्ण (सोना) व रजत (चांदी) धातु के शिल्पकर्म करते है।
विश्वकर्मा के पांचों पुत्र लोकहित के लिये अनेकानेक पदार्थों को उत्पन्न करने वाले तथा दुर्ग, भवन, मन्दिर एवं मुर्तियां आदि बनाने वाले तथा अलंकारों की रचना करने वाले हैं। अपने व्यवसाय की वृद्धि और समृद्धि की अभिलाषा रखने वाले व्यक्तियों को विश्वकर्मा की पूजा अवश्य करनी चाहिए।
भृगु पत्नी दिव्या के पुत्र त्वष्टा ‘मय’ को भी विश्वकर्मा के नाम से जाना जाता था। इनकी तीन पत्नियां रति, प्राप्ति व नंदी तथा अनेक पुत्र-पुत्रियां बताई गई हैं। सूर्य पत्नी संज्ञा तथा गणेश पत्नी ऋद्धि और सिद्धि अंगीरावंशी विश्वकर्मा की पुत्रियां मानी गई हैं। विश्वकर्मा नाम के ऋषि भी हुए हैं। ऋग्वेद में इन्द्र व सुर्य का विशेषण रूप में भी विश्वकर्मा शब्द प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेद में विश्वकर्मा सुक्त के नाम से 14 ऋचाएं लिखी हुई हैं। जिनके प्रत्येक मन्त्र पर लिखा है, ‘ऋषि विश्वकर्मा भौवन देवता’ आदि। यही सुक्त यजुर्वेद के अध्याय 17, मन्त्र 16 से 31 तक 16 मन्त्रों में भी मिलता है।