भारत एक विशाल देश है, लेकिन उसकी विशालता और महानता को हम तब तक नहीं जान सकते, जब तक कि उसे देखें नहीं। इस ओर वैसे अनेक महापुरूषों का ध्यान गया, लेकिन आज से लगभग 2500 वर्ष पहले आदिगुरु शंकराचार्य ने इसके लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होनें पौराणिक मान्यताओं एवं प्रचलित कथाओं के आधार पर भारत में चारों दिशाओं में चार मन्दिर स्थापित किए। यह चारों मन्दिर भारत के प्रसिद्ध तीर्थ चार धाम कहलाते है। धर्म ग्रंथों में 67 तीर्थों का वर्णन आता है, इन्हीें में से बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम की चर्चा चार धाम के रूप में की गई है।

प्राचीन तीर्थ स्थलों पर जाने से आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता है। देवी-देवताओं से जुड़ी कथाएं और परंपराएं मालूम होती हैं। भावी पीढ़ी को प्राचीन संस्कृति को जानने का मौका मिलता है। इसलिए चार धामों को चार अलग-अलग दिशाओं में स्थापित किया गया है। हिन्दुओं की मान्यता है कि जो व्यक्ति इन चारों धाम की यात्रा करता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है।

सतयुग की अपेक्षा त्रेतायुग में, त्रेता की अपेक्षा द्वापरयुग में तथा द्वापर की अपेक्षा कलयुग में मनुष्यों की प्रज्ञाशक्ति, प्राणशक्ति, धर्म और आध्यात्म का ह्रास सुनिश्चित है। यही कारण है कि कृतयुग में शिवावतार भगवान दक्षिणामूर्ति ने मौन व्याख्यान से, त्रेतायुग में ब्रह्मा, विष्णु और शिव के संयुक्त अवतार भगवान दत्तात्रेय ने सूत्रात्मक वाक्यों के द्वारा, द्वापरयुग में नारायणावतार कृष्णद्वैपायन महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विभाग करके एवं शुक, लोमहर्षणादि कथाव्यासों को प्रशिक्षित करके तथा कलियुग में भगवत्पाद शिव अवतार श्रीमद्शंकराचार्य ने चार पवित्र धामों की स्थापना करके सनातन धर्म तथा आध्यात्म को उज्जीवित बनाए रखा।

1. बद्रीनाथ धाम : बद्रीनाथ अथवा बद्रीनारायण भगवान विष्णु को समर्पित एक प्राचीन हिन्दू मन्दिर और पवित्र चार धामों में से एक है। अन्य धाम रामेश्वरम, पुरी और द्वारका हैं। यह उत्तराखण्ड के चमोली जनपद में अलकनन्दा नदी के तट पर स्थित है। इसके आसपास बसे नगर को भी बद्रीनाथ ही कहा जाता है। मौसमी दशाओं के कारण यह मन्दिर वर्ष के छह महीनों ;अप्रैल से नवम्बरद्ध की सीमित अवधि के लिए ही खुला रहता है। इस मन्दिर में भगवान विष्णु के बद्रीनारायण स्वरूप की पूजा होती है। यहाँ उनकी 1 मीटर लंबी शालिग्राम से निर्मित मूर्ति है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसे शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में समीपस्थ नारद कुण्ड से निकालकर स्थापित किया था। बद्रीनाथ मन्दिर का उल्लेख विष्णु पुराण, महाभारत तथा स्कन्द पुराण समेत कई प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। स्कन्दपुराण में बद्रीक्षेत्र को ‘मुक्तिप्रदा’ के नाम से उल्लेखित किया गया है। मन्दिर के ठीक नीचे तप्त कुण्ड नामक गर्म चश्मा है। सल्फर युक्त पानी के इस चश्मे को औषधीय माना जाता है। तीर्थयात्री मन्दिर में जाने से पहले इस चश्मे में स्नान करना आवश्यक मानते हैं। मन्दिर में पानी के दो तालाब भी हैं, जिन्हें क्रमशः नारद कुण्ड और सूर्य कुण्ड कहा जाता है।

बद्रीनाथ की उत्पत्ति : एक बार नारद मुनि भगवान् विष्णु के दर्शन हेतु क्षीरसागर पधारे, जहाँ उन्होंने माता लक्ष्मी को उनके पैर दबाते देखा। नारद ने जब इसके बारे में पूछा, तो अपराधबोध से ग्रसित भगवान विष्णु तपस्या करने के लिए हिमालय को चल दिए। जब वह तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। उनकी इस दशा को देखकर माता लक्ष्मी ने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े होकर एक बद्री के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं। जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया और देखा कि लक्ष्मी हिम से ढकी पड़ी हैं, तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देखकर कहा कि हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा। तुमने मेरी रक्षा बद्री वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बद्री के नाथ ‘बद्रीनाथ’ के नाम से जाना जायेगा।

2. द्वारिका धाम : द्वारिका धाम गुजरात के देवभूमि द्वारिका जिले में स्थित एक नगर तथा हिन्दू तीर्थस्थल है। यह हिन्दुओं के चार सर्वाधिक पवित्र धामों में से एक है। यह सात पुरियों में एक पुरी है। यह नगर भारत के पश्चिम में समुन्द्र के किनारे पर स्थित है। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने इसे बसाया था। यह भगवान श्रीकृष्ण की कर्मभूमि है। श्री कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, गोकुल में पले-बढ़े, पर राज उन्होने द्वारिका में किया। यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया, धर्म की जीत कराई। शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। द्वारिका उस जमाने में सम्पूर्ण भारतवर्ष की राजधानी बन गई थी। बड़े-बड़े राजा यहां बहुत-से मामलों में भगवान कृष्ण की सलाह लेने आते थे। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।

द्वारका के दक्षिण में एक लम्बा ताल है। इसे ‘गोमती तालाब’ कहते है। इसके नाम पर ही द्वारका को गोमती द्वारका कहते है। इस गोमती तालाब के ऊपर नौ घाट है। सरकारी घाट का नाम निष्पाप कुण्ड है। यात्री सबसे पहले इस निष्पाप कुण्ड में नहाकर अपने को शुद्ध करते है। गोमती के दक्षिण में पांच कुंए है। निष्पाप कुण्ड में नहाने के बाद यात्री पहले इन पांच कुंओं के दर्शन करते है, उसके बाद रणछोड़ मन्दिर की ओर जाते है। रणछोड़ का दर्शन करने के बाद मन्दिर की परिक्रमा की जाती है। यहां स्थित त्रिविक्रमजी के मन्दिर में एक बहुत बड़ा तहखाना है, जिसमें शिवलिंग और पार्वती की मूर्ति स्थापित है। कुशेश्वर शिव मन्दिर के दक्षिण में भगवान का भण्डारा है और भण्डारे के दक्षिण में शंकराचार्य द्वारा स्थापित प्रसिद्ध शारदा पीठ है।

3. जगन्नाथ पुरी : जगन्नाथ पुरी या श्री जगन्नाथ मन्दिर एक हिन्दू मन्दिर है, जो भगवान श्री कृष्ण के एक रूप जगन्नाथ को समर्पित है। यह भारत के ओडिशा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी में स्थित है। 2वीं शताब्दी में राजा अनंगपाल द्वारा इस मन्दिर का पुनर्निमाण किया गया। जगन्नाथ शब्द का अर्थ जगत के स्वामी होता है। इनकी नगरी ही जगन्नाथपुरी या पुरी कहलाती है। इस मन्दिर को हिन्दुओं के चार धामों में से एक गिना जाता है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मन्दिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा, इस मन्दिर के मुख्य देव हैं। इनकी काष्ठ की मूर्तियां, गर्भ गृह में एक रत्न मण्डित पाषाण चबूतरे पर स्थापित हैं। इस मन्दिर की वार्षिक ‘रथ यात्रा उत्सव’ विश्व प्रसिद्ध है। यह मन्दिर वैष्णव परंपराओं और संत रामानंद से जुड़ा हुआ है। गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के संस्थापक श्री चैतन्य महाप्रभु कई वर्षों तक पुरी में रहे थे।

मन्दिर से जुड़ी एक मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण ने अपनी देह का त्याग किया और उनका अंतिम संस्कार किया गया तो शरीर के एक हिस्से को छोड़कर उनकी पूरी देह पूरी देह पंचतत्व में विलीन हो गई। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण का हृदय एक जिंदा इंसान की तरह ही धड़कता रहा। मान्यता है कि वो दिल आज भी सुरक्षित है और और भगवान जगन्नाथ की लकड़ी की मूर्ति के अंदर है। जगन्नाथ पुरी मंदिर की तीनों मूर्तियां हर 12 साल में बदली जाती हैं। इसलिए हर वर्ष आषाड़ महीने में शुक्ल पक्ष की द्वतीय तिथि को जगन्नाथ जी की रथ यत्र निकाली जाती है। पुरानी मूर्तियों की जगह नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं। मंदिर में सिर्फ उसी पुजारी को अंदर जाने की इजाजत होती है जिसे मूर्तियां बदलनी होती हैं। मान्यता है कि इन मूर्तियों की पूजा-अर्चना मन्दिर निर्माण से कहीं पहले से की जाती रही है। सम्भव है, कि यह प्राचीन जनजातियों द्वारा भी पूजित रही हो। आधुनिक काल में, यह मन्दिर काफी प्रसिद्ध और सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों और प्रकार्यों में व्यस्त है। जगन्नाथ मन्दिर का एक बड़ा आकर्षण यहां की रसोई है। यह रसोई भारत की सबसे बड़ी रसोई के रूप में जानी जाती है। इस विशाल रसोई में भगवान को चढ़ाने वाले महाप्रसाद को तैयार करने के लिए 500 रसोईए तथा उनके 300 सहयोगी काम करते हैं।

4. रामेश्वरम् धाम : रामेश्वरम् हिंदुओं का एक पवित्र तीर्थ है। यह तमिलनाडु के रामनाथपुरम् जिले में स्थित है। यह तीर्थ हिन्दुओं के चार धामों में से एक है। यहां स्थापित शिवलिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। भारत के उत्तर में काशी की जो मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम् की है। रामेश्वरम् चेन्नई से लगभग 425 मील दक्षिण-पूर्व में है। यह हिन्द महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर समुद्र से घिरा हुआ एक सुंदर शंख आकार का द्वीप है। बहुत पहले यह द्वीप भारत की मुख्य भूमि के साथ जुड़ा हुआ था, परन्तु बाद में सागर की लहरों ने इसको मिलाने वाली कड़ी को काट डाला, जिससे वह चारों ओर पानी से घिरकर टापू बन गया। रामेश्वरम् का मन्दिर भारतीय शिल्पकला और निर्माण-कला का एक सुंदर नमूना है। इसका प्रवेशद्वार चालीस फीट ऊंचा है। यहां के मन्दिर का तीसरे प्राकार का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है। प्राकार में और मन्दिर के अन्दर सैकड़ों विशाल खंभें है, जो देखने में एक-जैसे लगते हैं, परंतु पास जाकर देखा जाए तो हर खंभे पर बेल-बूटे की अलग-अलग कारीगरी दिखाई देती है। भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व यहां पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया था, जिस पर चढ़कर वानर सेना लंका पहुंची व वहां विजय पाई। बाद में राम ने विभीषण के अनुरोध पर धनुषकोटि नामक स्थान पर यह सेतु तोड़ दिया था। आज भी इस 30 मील (48 किमी) लंबे आदि-सेतु के अवशेष सागर में दिखाई देते हैं।

आदिगुरु शंकराचार्य : शंकराचार्य आमतौर पर अद्वैत परम्परा के पीठों के मुखिया के लिये प्रयोग की जाने वाली उपाधि है। शंकराचार्य हिन्दू धर्म में सर्वोच्च धर्मगुरु का पद है जो कि बौद्ध धर्म में दलाईलामा एवं ईसाई धर्म में पोप के समकक्ष है। इससे पूर्व धर्मगुरु की उपाधि केवल भगवान श्रीकृष्ण को ही प्राप्त थी। इस पद की परम्परा भारत के प्रसिद्ध चार धामों के संस्थापक आदिगुरु शंकराचार्य जी ने आरम्भ की। इनका जन्म 508 ई.पू. तथा मृत्यु 476 ई.पू. हुई थी। चार पीठों के इतिहास में इनका जन्म 2631 युधिष्ठिर संवत् माना गया है, जो भारत में विक्रम संवत् से पूर्व प्रचलित था। स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। इन्होंने आठ वर्ष की अवस्था में नर्मदा नदी के तट पर स्थित ओंकारनाथ आश्रम के गुरु गोविन्द नाथ जी से संन्यास ग्रहण किया तथा सोलह वर्ष की अवस्था में सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त मत का प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया। इन्होंने केदारनाथ धाम में जीवित समाधि ग्रहण की थी।

इतिहास में एक अन्य सन्त शंकराचार्य हुए जिनका जन्म 788 ई. में केरल में कालपी अथवा काषल नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम विश्वागुरु और माता का नाम सुभद्रा था। इनकी वेशभूषा और जीवन भी लगभग आदि शंकराचार्य की तरह ही था। वह चार पीठों में से किसी एक पीठ के आचार्य थे। इतिहाकारों ने इनको आदि शंकराचार्य समझ लिया। यह भारत के महान् दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक थे। तीर्थों के प्रति हमारे देशवासियों में बड़ी भक्ति भावना है, इसलिए शंकराचार्य ने उत्तर में बद्रीनाथ के निकट ज्योर्तिपीठ, दक्षिण में रामेश्वरम् के निकट श्रृंगेरी पीठ, पूर्व में जगन्नाथपुरी में गोवर्धन पीठ और पश्चिम में द्वारिकापीठ की स्थापना की। शंकराचार्य ने इन पीठों की स्थापना करके देशवासियों को पूरे भारत के दर्शन करने का सहज अवसर दे दिया।

आचार्य शंकर का जन्म केरल के मालाबार क्षेत्र के कालड़ी नामक स्थान पर नम्बूद्री ब्राह्मण शिवगुरु एवं आर्याम्बा के यहां हुआ था। यह 45 वर्ष तक जीवित रहे थे, लेकिन आदि शंकराचार्य केवल 32 वर्ष तक जिंदा रहे थे। इन्होंने 30 वर्ष तक योग व अद्वैत तत्त्व ‘ब्रह्मज्ञान’ की साधना की तथा इसके बाद धर्म प्रचार करने लगे। वेदांत प्रचार में संलग्न रहकर इन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना भी की। 45 वर्ष की अल्प आयु में 833 ई. में केदारनाथ के समीप स्वर्गवासी हुए थे। इनका मानना था कि परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूपों में रहता है।

शंकराचार्य के चार पीठ : हिंदू धर्म की एकजुटता और व्यवस्था के लिए चार पीठों की परंपरा को जानना आवश्यक है। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में बौद्ध धर्म का प्रादुर्भाव होने से यहां के सनातन वैदिक धर्म का प्रभाव कम होने लगा था। वैदिक धर्म की रक्षा के लिए शंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों में चार पीठों की स्थापना की थी। हिंदू धर्म का समस्त संत समाज शंकराचार्य द्वारा नियुक्त चार पीठों के अधीन है। इनसे ही भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वाह होता है। चार पीठों के संतों को छोड़कर अन्य किसी को गुरु बनाना हिंदू संत धारा के अन्तर्गत नहीं आता। शंकराचार्य ने इन पीठों की स्थापना के साथ-साथ उनके पीठाधीशों की भी नियुक्ति की, जो बाद में स्वयं शंकराचार्य कहलाए जाने लगे। जो व्यक्ति किसी भी पीठ के अंतर्गत संन्यास लेता हैं वह इनके ‘दसनामी संप्रदाय’ में से किसी एक सम्प्रदाय प(ति की साधना करता है। इन पीठों में आदि शंकराचार्य से आज तक जितने भी गुरु और उनके शिष्य हुए हैं उनकी गुरु-शिष्य परंपरा का इतिहास संरक्षित है। जो भी गुरु या गुरु का शिष्य समाधि लेता था उनकी तिथि वहां के इतिहास में दर्ज होती थी। यह चार पीठ निम्न हैं –

1. ज्योर्तिपीठ : उत्तरांचल के बद्रीनाथ में स्थित है ज्योर्तिपीठ। इस पीठ के अन्तर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘गिरि’, ‘पर्वत’ एवं ‘सागर’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त सम्प्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस पीठ का महावाक्य ‘अयमात्मा ब्रह्म’ है। इस पीठ के अंतर्गत ‘अथर्ववेद’ को रखा गया है। ज्योर्तिपीठ के प्रथम पीठाधीश आचार्य तोटक बनाए गए थे।

2. शारदा पीठ : शारदा (कालिका) पीठ गुजरात में द्वारकाधाम में स्थित है। शारदा पीठ के अन्तर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले सन्यासियों के नाम के बाद ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त सम्प्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस पीठ का महावाक्य है ‘तत्त्वमसि’ तथा इसके अन्तर्गत ‘सामवेद’ को रखा गया है। शंकराचार्य जी के शिष्य हस्तामलक (पृथ्वीधर) शारदा पीठ के प्रथम पीठाधीश थे।

3. गोवर्धन पीठ : गोवर्धन पीठ भारत के पूर्वी भाग में उड़ीसा राज्य के जगन्नाथ पुरी में स्थित है। गोवर्धन पीठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले सन्यासियों के नाम के बाद ‘आरण्य’ सम्प्रदाय विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त सम्प्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस पीठ का महावाक्य है ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ तथा इस पीठ के अन्तर्गत ‘ऋग्वेद’ को रखा गया है। इस पीठ के प्रथम पीठाधीश आदि शंकराचार्य के प्रथम शिष्य पद्मपाद हुए।

4. वेदान्त ज्ञानपीठ : वेदान्त ज्ञानपीठ भारत के दक्षिण में तमिलनाडू राज्य के रामेश्वरम् में स्थित है। इसको शृंगेरी पीठ भी कहा जाता है। वेदान्त ज्ञानपीठ के अन्तर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘सरस्वती’, ‘भारती’ तथा ‘पुरी’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त सम्प्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस पीठ का महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है तथा पीठ के अन्तर्गत ‘यजुर्वेद’ को रखा गया है। इस पीठ के प्रथम पीठाधीश आचार्य सुरेश्वरजी थे, जिनका पूर्व में नाम मण्डन मिश्र था।