हिन्दू धर्म के अनुसार 24 घंटे में दिन के चार और रात के चार कुल मिलाकर आठ प्रहर होते हैं। एक प्रहर औसतन लगभग तीन घंटे या साढ़े सात घटी का होता है। सूर्योदय के समय दिन का प्रथम पहर प्रारम्भ होता है। धार्मिक कार्य या विशेष अनुष्ठानों का आयोजन इन प्रहरों को ध्यान में रखकर किया जाता है।

1. प्रथम पहर ‘पूर्वान्ह’ : यह पहर प्रातः 6 से 9 बजे तक का होता है। इसको दिन का पहला पहर भी कहते हैं। यह पहर आंशिक सात्विक और आंशिक राजसिक होता है, नकारात्मक बिल्कुल नहीं होता है। इस पहर में सोना नहीं चाहिए। क्रोध नहीं करना चाहिए और घर में गंदगी बिल्कुल नहीं रखनी चाहिए। इस पहर में जन्म लेने वाले बच्चे जीवन में खूब उन्नति करते हैं। इस पहर में पूजा-पाठ करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। पूजा के समय घर में चंदन या गुलाब की सुंगध वाली अगरबत्ती जलाएं।

2. द्वितीय पहर ‘मध्यान्ह’ : इस पहर की शुरुआत सुबह 9 से दोपहर 12 बजे तक होती है। इस दिन का दूसरा पहर कहते हैं, इसमें कार्य शक्ति बढ़ जाती है। इस पहर में पेड़-पौधे नहीं लगाने चाहिए। इसके साथ ही मांगलिक काम करने से बचना चाहिए। इस पहर में जन्म लेने वाले बच्चे राजनीति या प्रशासनिक सेवा में खूब नाम कमाते हैं।

3. तृतीय पहर ‘अपरान्ह’ : यह पहर दोपहर 12 से सायं 3 तक होता है। इसको दिन का तीसरा पहर भी कहते हैं, यह तमोगुणी पहर होता है। इसमें कार्यक्षमता कम होती है। इस पहर में भोजन करना उत्तम माना जाता है, लेकिन इस दौरान सोना नहीं चाहिए। इस पहर में जन्म लेने वाले बच्चों को शुरुआत में शिक्षा में बाधा आती है, साथ ही उनका स्वभाव जिद्दी होता है। इस पहर में नए काम की शुरुआत कर सकते हैं।

4. चतुर्थ पहर ‘सायंकाल’ : यह पहर सायं 3 से सायं 6 बजे तक होता है। यह दिन का चैथा पहर होता है। यह सात्विक तो है, लेकिन तमोगुण की प्रधानता होती है। इस पहर में विश्राम कर सकते हैं, लेकिन भोजन नहीं करना चाहिए। इस पहर के दौरान नया कार्य शुरू करना अशुभ माना जाता है। इस समय में जन्म लेने वाले बच्चे फिल्म, मीडिया और गलैमर के क्षेत्र में नाम-यश कमाते हैं, प्रेम-विवाह की संभावना ज्यादा होती है।

5. पंचम पहर ‘प्रदोष’ : यह पहर सायं 6 से रात्रि 9 बजे तक होता है। इसको रात का प्रथम पहर भी कहा जाता है। इस पहर को सतोगुणी पहर भी कहते हैं। इस समय मन्दिर में पूजा उपासना का विशेष महत्व होता है। घर में पूजा के स्थान पर घी या तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए। इस पहर में जन्म लेने वालों को आमतौर पर आंखों और हड्डियों की समस्या होती है। इस समय भोजन करना और सोना वर्जित है।

6. षष्टम पहर ‘निशिथ’ : यह पहर रात 9 से 12 बजे तक होता है। यह पहर तामसिक और राजसिक होता है यानि पूरी तरह से नकारात्मक नहीं होता है। इस पहर में जन्म लेने वालों के अंदर कलात्मक क्षमता काफी होती है। लेकिन उनकी शिक्षा में बाधा के योग बनते हैं। इस पहर में घर में बने खाने का कुछ हिस्सा किसी पशु को खिलाना चाहिए। ऐसा करने से आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है। इस पहर में नई चीजें नहीं खरीदनी चाहिए।

7. सप्तम पहर ‘त्रियामा’ : यह पहर रात 12 से 3 बजे के बीच होता है। इसे मध्यरात्रि भी कहा जाता है। यह पहर शुद्ध रूप से तामसिक है। इस पहर में स्नान बिल्कुल ना करें और आवश्यक ना हो तो भोजन भी ना करें। इस पहर में जन्म लेने वाले अपने घर से दूर जाकर सफलता पाते हैं और इनके परिवार से संबंध अच्छे नहीं होते हैं।

8. अष्टम पहर ‘उषाकाल’ : यह पहर रात 3 से प्रातः 6 के बीच होता है। इसको रात का अंतिम पहर भी कहते हैं। यह पहर शुद्ध रूप से सात्विक होता है, आध्यात्मिक कामों के लिए अच्छा होता है। इस पहर में सोकर में उठ सकें तो अच्छा होगा। इस पहर में जन्म लेने वाले बच्चे आमतौर पर तेजस्वी और आध्यात्मिक होते हैं। इस पहर में शिवलिंग पर नियम से जल चढ़ाया जाए तो जीवन में सारी समस्याएं दूर हो जाती है।