1. हिन्दू धर्म (सनातन परम्परा) : हिन्दू धर्म को विश्व का प्राचीनतम धर्म माना जाता है। इस धर्म की उत्पति वेदों से होने के कारण इसे वैदिक धर्म या सनातन धर्म भी कहा जाता है। अर्थात् यह धर्म सृष्टि के प्रारम्भ से विद्यमान रहा है। अनुयायियों की संख्या के आधार पर यह विश्व का तीसरा बड़ा धर्म है। इस धर्म को मानने वालों की भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है। हिन्दी विश्व में बोली जाने वाली तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। वर्तमान में इस धर्म को मानने वाले अधिकांश लोग भारत, नेपाल और माॅरीशस में पाए जाते हैं। संख्या के आधार पर इसके अधिकतर उपासक भारत में हैं और प्रतिशत के आधार पर नेपाल में हैं।

हिन्दु धर्म स्वप्रेरित धर्म है जिसमें मुख्यतः भावनाओं एवं विचारों का समावेश है। कई जातियों में बंटे होने के कारण इसमें विभिन्न देवी देवताओं की पूजा की जाती है, परन्तु मूल रूप से यह एकेश्वरवादी धर्म है। हिन्दू धर्म एक वैदिक धर्म भी है जिसका प्रमुख आधार चार वेद- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद हैं। इसके अतिरिक्त छः शास्त्र, 18 पुराण, 108 उपनिषद, मनुस्मृति, रामायण, महाभारत और गीता आदि ग्रंथ भी इस धर्म का आधार हैं। गाय को हिन्दू धर्म में माता समान पूजनीय माना गया है। गाय में सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास भी माना जाता है। यह धर्म 84 लाख योनियों के साथ पुनर्जन्म की पद्धति पर आधारित है जिसमें कर्मों की प्रधानता होती है। अर्थात् अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार योनि बदलती है। इस धर्म में बुरे कर्मों का परिणाम नरक और अच्छे कर्मों का परिणाम स्वर्ग के रूप में मान्यता दी गई है।

2. पारसी धर्म : यह धर्म जन्द अवेस्ता नामक धर्मग्रंथ पर आधारित है। इसके संस्थापक पैंगबर जरथुष्ट्र हैं, इसलिये इसे जरथुष्ट्री धर्म भी कहते हैं। पारसी एक ईश्वर को मानते हैं, जिसे अहुरा मजूदा या होरमजूदा कहते हैं। उसका वर्णन वैदिक देवता वरुण से काफी मेल खाता है। ऐतिहासिक रूप से ईरान में पारसी धर्म की शुरुआत ईसा पूर्व 17वीं शताब्दी में हुई। ईसा पूर्व 6वीं शताब्दी तक ईरान एक पारसी देश हुआ करता था। जब पैगंबर मोहम्मद ने सऊदी अरब को इस्लामिक आन्दोलन का केन्द्र बनाया तो इसका असर पारसी धर्म पर भी पड़ा। ईसा पूर्व सातवीं शताब्दी में अरबों ने ईरान को पराजित कर वहाँ के जरथुष्ट्र धर्मावलम्बियों को जबरन इस्लाम में दीक्षित कर लिया था। पैगंबर मोहम्मद ने मक्का और मदीना को अपना पवित्र स्थल बना लिया था। जब वहाँ मुसलमानों को शरण दी गई तो उन्होंने वहाँ के पारसियों को खत्म कर मुस्लिम देश बना लिया गया। अंततः एक पारसी देश मुस्लिम बहुल देश बन गया। हालांकि अरब लोग खुद को वास्तविक मुसलमान मानते हैं।

3. यहूदी धर्म : हज़रत आदम की परंपरा में आगे चलकर हज़रत इब्राहिम हुए और फिर हज़रत मूसा। ईसा से लगभग 1500 वर्ष पूर्व हुए हज़रत मूसा ने यहूदी धर्म की स्थापना की थी। यहूदी एकेश्वरवाद में विश्वास करते हैं। यहूदियों के प्रार्थना स्थल को सिनेनाग कहते हैं। मूर्ति पूजा को इस धर्म में पाप समझा जाता है। इस धर्म में ईश्वर और उसके नबी यानि पैगम्बर की मान्यता प्रधान है। ईसाई व इस्लाम धर्म का आधार यही परंपरा और विचारधारा है। इसलिए इसे इब्राहिमी धर्म भी कहा जाता है। यह सिर्फ एक धर्म ही नहीं बल्कि पूरी जीवन पद्धति है तथा इस्राइल और हिब्रू भाषाईयों का राजधर्म है। यहूदी धर्मग्रंथ अलग-अलग लेखकों द्वारा कई सदियों के अंतराल में लिखे गए हैं। यह मुख्यतः इब्रानी व अरामी भाषा में लिखे गए हैं। इनके धार्मिक ग्रन्थों में तनख, तालमुद तथा मिद्रश प्रमुख हैं।

4. बौद्ध धर्म : ईसाई और इस्लाम धर्म से पूर्व बौद्ध धर्म की उत्पत्ति हुई थी। बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला हुआ एक धर्म और महान दर्शन है। भारत में ई.पू. छठी शताब्दी में गौतम बुद्ध द्वारा बौद्ध धर्म की स्थापना हुई थी। यह विश्व का चौथा सबसे बड़ा धर्म है एवं त्रिपिटक इनके प्रमुख धर्मग्रंथ हैं। बौद्ध धर्म में प्रमुख सम्प्रदाय महायान, थेरवाद, वज्रयान, और नवयान हैं, सभी गौतम बुद्ध के सिद्धान्त ही मानते हैं। गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का नौंवा अवतार माना गया है।

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पू., जब कपिलवस्तु की महारानी मायादेवी अपने नैहर देवदह जा रही थीं, तो रास्ते में लुम्बिनी वन (वर्तमान में दक्षिण मध्य नेपाल) में हुआ। 35 वर्ष की उम्र में उन्होने बोधि पाई और वह बुद्ध बन गये। उन्होंने पहला धर्मोपदेश वाराणसी के पास सारनाथ में दिया था। इसी स्थान पर सम्राट अशोक ने बुद्ध की स्मृति में एक स्तम्भ बनवाया था। इस स्तम्भ के चक्र को भारत के राष्ट्रीय ध्वज में स्थान दिया गया है। बुद्ध की मृत्यु 80 वर्ष की अवस्था में 483 ई.पू. में कुशीनारा (देवरिया, उत्तर प्रदेश) में हुई थी। बुद्ध ने अपने अनुयाईयों को चार आर्यसत्य, अष्टांगिक मार्ग, दस पारमिता, पंचशील आदि की शिक्षाएं प्रदान की है।

भगवान बुद्ध ने निर्वाण-प्राप्ति को सरल बनाने के लिए निम्नलिखित दस शील (कर्तव्य) पर बल दिया। बुद्ध ने अपने अनुयायियों को ‘पंचशील’ का पालन करने की शिक्षा दी हैं। गृहस्थों के लिए केवल प्रथम पाँच शील तथा भिक्षुओं के लिए दसों शील मानना अनिवार्य था। –

(1) जीव हत्या न करना, (2) झूठ बोलने से विरत रहना,
(3) चोरी न करना, (4) मद्य-सेवन न करना,
(5) पराई स्त्रियों से दूर रहना, (6) नृत्य-गान आदि से दूर रहना,
(7) असमय भोजन न करना, (8) सुखप्रद बिस्तर पर नहीं सोना,
(9) किसी प्रकार की संपत्ति न रखना, (10) धन-संचय न करना।

बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र त्यौहार ‘बुद्ध पूर्णिमा’ है, जो की वैशाख मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा के ही दिन बुद्ध का जन्म, ज्ञान की प्राप्ति एवं निर्वाण की प्राप्ति हुई। बुद्ध ने अपने शिष्यों को धर्म के 24 नियम बताए, जो सारनाथ के अशोक चक्र की 24 तिल्लियों के रूप में निरूपित किये गये हैं।

5. जैन धर्म : जैन धर्म भी बौद्ध धर्म की तरह श्रमण परम्परा से निकला हुआ एक प्राचीन धर्म है। जैन धर्म की स्थापना छठी शताब्दी में महावीर स्वामी द्वारा की गई । इनके बचपन का नाम वर्धमान था। वर्धमान महावीर का जन्म 540 वैशाली गणराज्य के कुंडलपुर में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था। 12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद उन्हे केवलज्ञान प्राप्त हुआ। 468 में 72 वर्ष की आयु में महावीर की मृत्यु (निर्वाण) बिहार राज्य के पावापुरी (राजगीर) में हो गई। जैन धर्म के सभी तीर्थंकर क्षत्रिय कुल में हुए थे। इससे पता चलता है कि पूर्वकाल में जैन धर्म, क्षत्रियों का धर्म था, लेकिन आजकल अधिकांश वैश्य लोग ही इसके अनुयायी हैं। जैन धर्म में श्रावक और मुनि दोनों के लिए पांच व्रत बताए गए है। तीर्थंकर आदि महापुरुष जिनका पालन करते है, वह महाव्रत कहलाते है :

1. अहिंसा – किसी भी जीव को मन, वचन, काया से पीड़ा नहीं पहुँचाना।
2. सत्य – हित, मित, प्रिय वचन बोलना।
3. अस्तेय – बिना दी हुई वस्तु को ग्रहण नहीं करना।
4. ब्रह्मचर्य – मन, वचन और कर्म से वासना का त्याग करना।
5. अपरिग्रह – सांसारिक भोगों में आसक्ति का बुद्धिपूर्वक त्याग।

जैन धर्म में आत्मशुद्धि पर अत्यधिक बल दिया गया है। जहां मुनि इन व्रतों का सूक्ष्म रूप से पालन करते है, वहीं श्रावक स्थूल रूप से करते है। जैन धर्म का परम पवित्र और अनादि मूलमंत्र ‘पंच परमेष्ठी मंत्र’ है –

णमो अरिहंताणं – अरिहंतों को नमस्कार
णमो सिद्धाणं – सिद्धों को नमस्कार
णमो आयरियाणं – आचार्यों को नमस्कार
णमो उवज्झायाणं
– उपाध्यायों को नमस्कार
णमो लोए सव्वसाहूणं – सर्व साधुओं को नमस्कार

जैन धर्म के धार्मिक स्थल, जिनालय या मंदिर कहलाते हैं। इनके धर्मग्रंथ आगम, पुराण, महापुराण व तत्त्वार्थ सूत्र हैं। इनमें वैदिक दर्शन का प्रभाव भी दिखाई पड़ता है।

6. ईसाई धर्म : हज़रत इब्राहिम की परंपरा में ही आगे चलकर 5वीं ई.पू. ईसा मसीह हुए। उनका जन्म फिलिस्तीन के बेथलेहम में नाजारेथ के एक यहूदी बढ़ई परिवार में हुआ था। ईसा मसीह की माता का नाम मेरी और पिता का नाम जोसफ था। इनकी माता मेरी ‘मरियम’ जब कुँवारी थीं, तब यीशु उनके गर्भ में परमेश्वर की कृपा से चमत्कारिक रूप से आये थे। ईसा मसीह की शिक्षाओं पर आधारित ईसाई धर्म (मसीही या क्रिश्चियन) प्राचीन यहूदी परंपरा से निकला एकेश्वरवादी धर्म है। ईसा मसीह के 12 शिष्यों ने ईसाई धर्म की नींव रखी थी। इसकी शुरूआत प्रथम सदी में फिलिस्तीन में हुई, जिसके अनुयायी ईसाई कहलाते हैं।

ईसाइयों का दावा है कि परमसत्ता का नाम ‘GOD’ है, जो एक विद्वान पुरुष हैं। परमेश्वर इस सृष्टि के रचयिता हैं और इसके शासक भी। उन्होंने आज तक केवल एक बेटा पैदा किया और वह ईसा मसीह यानी जीसस है, जो पतन हुए सभी मनुष्यों को पाप और मृत्यु से बचाने के लिए जगत में देहधारण कर आए थे। सभी मनुष्य ‘Aadam’ और ‘Eve’ की संतान है। मनुष्यों को पाप से बचाने के लिये परमेश्वर शरीर में आए, यह बात ही यीशु का परिचय है और यही बात ईसाई धर्म का प्रमुख आधार है।

7. इस्लाम धर्म : इस्लाम धर्म के संस्थापक मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जन्म 570 ई. में मक्का में हुआ था। इनके पिता का नाम अब्दुल्लाह और माता का नाम अमीना था। इनकी शादी 25 वर्ष की अवस्था में खदीजा नामक विधवा के साथ हुई। इनकी एकमात्र पुत्री का नाम फातिमा एवं दामाद का नाम अली हुसैन था। हज़रत मोहम्मद की मृत्यु 8 जून, 632 ई. को हुई। इन्हें मदीना में दफनाया गया। वह शांति की जिंदगी गुजारते थे। मक्का के लोग उनको चाहते थे और उन पर भरोसा करते थे। वास्तव में लोग उन्हें ‘अल् अमीन’ या ‘अमानतदार’ कहा करते थे।

लगभग 613 ई. के आसपास मोहम्मद साहब ने लोगों को उपदेश देना आरंभ किया था। इस समय उनको अलग धर्म के रूप में न देखकर ईश्वर की सत्ता का समर्थक माना जाता था। इसी घटना को इस्लाम का आरंभ जाता है। उनका कहना था कि खुदा सिर्फ एक है और वह स्वयं मोहम्मद उसका रसूल ‘पैगम्बर’ हैं। सन् 632 ई. में पैगम्बर मोहम्मद साहब का देहांत हो गया। उनकी मृत्यु तक इस्लाम के प्रभाव से अरब के सारे कबीले एक राजनीतिक और सामाजिक सभ्यता का हिस्सा बन गये थे। इसके बाद इस्लाम में खिलाफत का दौर शुरु हुआ। अरबों ने पहले मिस्र और उत्तरी अफ्रीका पर विजय हासिल की तथा फारसी साम्राज्यों को हराया। इसके बाद पूर्वी दिशा में उनका साम्राज्य फैलता गया। 12वीं सदी तक यह लोग भारत तक पहुँच गए।

इस्लाम के दो प्रमुख वर्ग हैं – शिया और सुन्नी। दोनों के इस्लामी नियम अलग हैं, लेकिन आधारभूत सिद्धान्त मिलते-जुलते हैं।

8. सिख धर्म : सिख धर्म (खालसा या सिखमत) 15वीं सदी में भारतीय गुरु शिष्य परम्परा से निकला एक प्रमुख धर्म है। इसकी शुरुआत गुरु नानक देव जी ने की थी। सिख धर्म में कुल 10 गुरु हुए हैं। अंतिम गुरु गोविंद सिंह जी थे। सिख धर्म के दस गुरुओं की शृंखला में प्रथम गुरु नानक देव जी का जन्म 1469 ई. को तलवंडी, पंजाब में हुआ था। यहां का गुरूद्वारा ‘ननकाना साहिब’ विश्व प्रसिद्ध है। अब यह हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है।

गुरु गोबिंद सिंह जी ने जब 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की, तब उन्होंने एक सिख के निम्न पांच प्रतीक चिन्ह ‘पंज कक्कड़’ बताए –

1. केश : कभी अपने बाल नहीं कटवाना।
2. कंघा : अपने पास एक लकड़ी की कंघी रखना।
3. कड़ा : हाथ में लोहे का कड़ा पहनना।
4. किरपाण : अपने पास कटार या तलवार रखना।
5. एक सूती अंतर्वस्त्र पहनना।

सिख धर्म के लोग ‘गुरुमुखी’ (पंजाबी) भाषा बोलते हैं। पंजाबी भाषा में शिष्य को सिख कहा जाता है। सिख एक ईश्वर को मानते हैं, जिसे एक-ओंकार कहते हैं। इनका मानना है कि ईश्वर अकाल और निरंकार है। सिख धर्म के अनुयायियों को खालसा कहा जाता है। इस धर्म में अकाली, नामधारी तथा उदासी सम्प्रदाय प्रमुख हैं। सिखों के धार्मिक ग्रन्थ को ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ कहते हैं। इनके धार्मिक स्थल को गुरुद्वारा कहते हैं।

-: सामाजिक आन्दोलन :-

1. बिश्नोई समाज : बिश्नोई समाज के संस्थापक गुरु जम्भेश्वर जी का जन्म विक्रम संवत् 1508 (1451 ई.) में भाद्रपद बदी अष्टमी को नागौर के पीपासर गांव में हुआ था। राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित जाम्भो जी का धर्म स्थल समराथल बिश्नोई समाज के 8 तीर्थों में प्रमुख तीर्थ स्थल है। बिश्नोई समाज के लोग जाम्भो जी को भगवान् विष्णु का अवतार मानते हैं। जाम्भो जी अपने माता-पिता की एकमात्र संतान थे। इनके पिताजी का नाम लोहट जी पंवार तथा माता का नाम हंसा देवी (केसर) था। जन्म के बाद 7 वर्षों तक मौन रहने और 27 वर्ष तक गौपालन के बाद गुरु जम्भेश्वर जी ने लगभग 34 वर्ष की आयु में विक्रमी संवत् 1542 में (1485 ई.) ‘पाहल’ पिलाकर बिश्नोई संप्रदाय की स्थापना की थी। बिश्नोई अपने आराध्य गुरु जम्भेश्वर के बताए 29 नियमों का पालन करते हैं। इनमें एक नियम वन्य जीवों की रक्षा और वृक्षों की हिफाजत से जुड़ा है। बिश्नोई समाज के लोग जंगली जानवर और पेड़ों के लिए अपनी जान का नजराना पेश करने को तैयार रहते हैं। बिश्नोई समाज के बलिदानियों की याद में जोधपुर जिला के गांव खेजड़ली में मेला आयोजित किया जाता है। इस गांव के 363 बिश्नोई लोगों ने अमृता देवी के नेतृत्व में खेजड़ी के वृक्ष को बचाने के लिए बलिदान दिया था। बिश्नोई धर्म का प्रमुख नारा है, ‘सिर साठे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण’ अर्थात् यदि सिर कटवाकर (जान देकर) पेड़ बच जाएं तो भी सस्ता है। सन् 1487 में जब जबरदस्त सूखा पड़ा तो जाम्भो जी ने लोगों की बड़ी सेवा की।

2. आर्य समाज : आर्य समाज एक हिन्दू समाज सुधार आन्दोलन है। आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानन्द सरस्वती ने शनिवार, 10 अप्रैल 1875 (चैत्र शुक्ल पंचमी, विक्रमी सम्वत् 1932) को बंबई में अपने गुरू मथुरा के स्वामी विरजानन्द की प्रेरणा से की थी। यह आंदोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू धर्म में सुधार के लिए प्रारम्भ हुआ था। आर्य शब्द का अर्थ है – श्रेष्ठ और प्रगतिशील। अतः आर्य समाज का अर्थ हुआ श्रेष्ठ और प्रगतिशील लोगों का समाज, जो वेदों के अनुकूल चलने का प्रयास करते हैं। स्वामी दयानन्द सरस्वती (1824-1883) आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। उनके बचपन का नाम ‘मूलशंकर था। उनके पिता का नाम किशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था। स्वामी जी की मृत्यु 30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के दिन सन्ध्या के समय हुई थी।

आर्य समाज के दस नियम :

(1) सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदि-मूल परमेश्वर है।
(2) ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करने योग्य है।
(3) वेद सब सत्यविद्याओं की पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।
(4) सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोडने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।
(5) सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।
(6) संसार का उपकार मानव मात्र का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
(7) सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य बर्ताव करना चाहिये।
(8) अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।
(9) केवल अपनी ही उन्नति से संतुष्ट नहीं रहना चाहिये, सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।
(10) सब मनुष्यों को सामाजिक व सर्वहितकारी नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने में स्वतंत्र रहना चाहिए।

भक्ति आंदोलन :

14वीं शताब्दी से 17वीं शताब्दी के दौरान जब उत्तर भारत मुस्लिम शासन के अधीन था, भक्ति आंदोलन मध्य तथा उत्तरी भारत में व्यापक रूप से प्रचलित हुआ। इस आंदोलन की शुरुआत शिक्षकों तथा संतों के एक अनौपचारिक समूह द्वारा की गयी थी। चैतन्य महाप्रभु, वल्लभाचार्य, सूरदास, मीरा बाई, कबीरदास, रहिमदास, तुलसीदास, रविदास, नामदेव, तुकाराम, जम्भेश्वर आदि अनेक मनीषियों ने समय-समय पर भक्ति आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने सिखाया कि लोग जाति-धर्म, रीति-रिवाजों तथा पाण्डित्य की गूढ़ताओं के व्यर्थ भार का त्याग करके ईश्वर के प्रति अपने असीम प्रेम को साधारण तरीके से भी प्रकट कर सकते हैं।

इस अवधि के दौरान विभिन्न भारतीय राज्यों और प्रान्तों की स्थानीय भाषाओं में गद्य (कहानी) तथा पद्य (कविता) के रूप में भक्ति साहित्य की बाढ़-सी आ गयी थी। भक्ति आंदोलन, सम्पूर्ण भारत में अलग-अलग अनेक आंदोलनों के रूप में फैल गया। हालांकि उत्तर भारत में, भक्ति आंदोलन तथा शिया मुसलमानों के चिश्ती नाम से प्रसिद्ध सूफी आंदोलन के बीच अंतर कर पाना मुश्किल है। मुस्लिम धर्म में आस्था रखने वाले लोगों ने इसे ‘सूफियाना विचार’ के तौर पर अपनाया जबकि हिंदुओं ने ‘वैष्णव भक्ति’ के रूप में मान्यता दी। भारत और इंडोनेशिया में सूफियों का बहुत प्रभाव हुआ। मोइनुद्दीन चिश्ती, बाबा फरीद, निजामुदीन जैसे भारतीय सूफी संत इसी कड़ी का हिस्सा थे।

धर्मों का वर्गीकरण :

धार्मिक प्रभाव से उत्पन्न परंपराएं धर्म के विशेष समूह में आती हैं। अब्राहमिक धर्म की उत्पत्ति मध्य-पश्चिम एशिया में, वैदिक धर्म की उत्पत्ति उत्तर भारत में और सुदूर पूर्वी धर्म की उत्पत्ति पूर्वी एशिया में हुई। क्षेत्रीय प्रभाव का एक अन्य समूह अफ्रीकी प्रवासी धर्म जिसकी उत्पत्ति मध्य-पश्चिम अफ्रीका में हुई।
अब्राहमिक धर्म जो सबसे बड़ा धर्म समूह है जिसमें ईसाई, इस्लाम, यहूदी और बहाई आदि धर्म मुख्य रूप से शामिल हैं। अब्राहम कुलपति से इस नाम की उत्पत्ति हुई और यह एकेश्वरवाद पर विश्वास करता है। आज, विश्व के करीब 3.4 अरब लोग इस धर्म के अनुयायी हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के आसपास के क्षेत्रों के अलावा यह दुनिया भर में व्यापक रूप से फैला है। कई अब्राहमिक संगठन दूसरे मतों को ग्रहण करने लगे हैं।
भारतीय वैदिक धर्म की उत्पत्ति विशाल भारत में हुई और इसमें धर्म एवं कर्म जैसी कई महत्वपूर्ण अवधारणाएं शामिल हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप, पूर्व एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और रूस के एक अलग हिस्से पर है। मुख्य भारतीय धर्मों में हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन धर्म शामिल हैं
पूर्व एशियाई धर्मों में कई एशियाई धर्म शामिल हैं जैसे कि ताओ (चीन) या वोडो (जापान या कोरियाई)। अर्थात् ताओ धर्म और कन्फ्यूशीवाद दोनों धर्मों पर गैर-धार्मिक विद्वानों द्वारा दावा किया गया है।

19वीं सदी से, नए धार्मिक आंदोलन को नया धार्मिक मत का नाम दिया गया है, अक्सर पुरानी परंपराओं को ही समकालिक कर पुनर्जीवित किया गया है।