पौराणिक कथाओं के अनुसार रुद्राक्ष को शिवजी की आंख का अश्रु माना गया है। श्रावण मास में शिव आराधना का विशेष महत्व है। इसलिए शिव जी को प्रिय लगने वाली सभी क्रियाएं श्रावण मास में संपन्न की जाती हैं, चाहे वह व्रत हो, अभिषेक हो, स्तुति हो, बिल्वपत्र अर्पण हो या फिर रुद्राक्ष धारण करना। रुद्राक्ष को प्राचीन काल से ग्रह शांति, नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा और आध्यात्मिक लाभ के लिए आभूषण के रूप रूप में प्रयोग किया जाता रहा है। एक सामान्य प्रकार के रुद्राक्ष में 5 चेहरे होते हैं, और इन्हें शिव के पांच चेहरे का प्रतीक माना जाता है। इन्हें केवल काले या लाल धागे या शायद ही कभी सोने की चेन पर पहना जाना चाहिए।

सदाबहार वनस्पति रुद्राक्ष के वृक्ष की सर्वाधिक पैदावार दक्षिण पूर्व एशिया में होती है। यह भारत के हिमालय प्रदेशों गंगोत्री और यमुनोत्री, पहाड़ी क्षेत्रों तथा पूर्वांचल प्रदेशों में भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। रुद्राक्ष इसके फल की गुठली होता है। इसमें दिखने वाली धारियांे को प्रचलित भाषा में रुद्राक्ष का मुख कहा जाता है। यह धारियां एक से लेकर चैदह तक की संख्या में हो सकती हैं। परन्तु ग्यारह प्रकार के रुद्राक्ष विशेष रूप से प्रयोग में आते हैं। मान्यता अनुसार एकमुखी रुद्राक्ष अतिशुभ माना जाता है। इसे साक्षात् शिव का स्वरूप माना गया है, वहीं दोमुखी रुद्राक्ष को शिव-पार्वती का संयुक्त रूप माना जाता है। अनिष्ट ग्रहों की शांति हेतु रुद्राक्ष की अहम् भूमिका होती है। वैज्ञानिक शोध में भी पाया गया है कि रुद्राक्ष पहनने से व्यक्ति के चारों ओर अदृश्य आभामंडल बन जाता है, जिससे व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। सामान्यतः महिलाओं में रुद्राक्ष धारण करने की परम्परा नहीं है, केवल साध्वियां ही रुद्राक्ष धारण करती देखी गई हैं।

रुद्राक्ष पहनने के नियम :

रुद्राक्ष कलाई, कंठ और गले में धारण किया जाता है। इसे कंठ प्रदेश तक धारण करना सर्वोत्तम होता है।
कलाई में बारह, कंठ में छत्तीस और हृदय पर एक सौ आठ दानों की माला धारण करना चाहिए।
रुद्राक्ष की माला धारण करने के पूर्व शिव जी को समर्पित करें तथा उसी से मंत्र जाप करना चाहिए।
मांस, मदिरा या तामसिक भोजन के शौकीन व्यक्ति को रुद्राक्ष धारण नहीं करना चाहिए।
सोते समय रुद्राक्ष के टूटने का डर भी रहता है, इसलिए सोने से पहले रुद्राक्ष को उतार देना चाहिए।
रुद्राक्ष धारण करके जातकर्म संस्कार से पूर्व नवजात शिशु के नजदीक बिल्कुल भी न जाएं।
शिवजी को जीवन और मृत्यु से परे माना जाता है। अतः रुद्राक्ष पहनकर शवयात्रा में नहीं जाना चाहिए।

राशि के अनुसार रुद्राक्ष :

1. मेष – अग्निदेव से सम्बन्धित तीन मुखी
2. वृष – बौद्धिक विकास के लिए छः मुखी
3. मिथुन – ब्रह्मा का प्रतीक चार मुखी
4. कर्क – अर्ध-नारिश्वर रूपी दो मुखी
5. सिंह – द्वादश आदित्य बारह मुखी
6. कन्या – सबसे शुभ एक मुखी
7. तुला – गणेश के प्रतीक आठ मुखी
8. वृश्चिक – कालाग्नि रुद्र स्वरूप पांच मुखी
9. धनु – देवी दुर्गा के प्रतीक नौ मुखी
10. मकर – भगवान विष्णु का प्रतीक दस मुखी
11. कुंभ – सप्तमातृकाओं का प्रतीक सात मुखी
12. मीन – हनुमान के प्रतीक ग्यारह मुखी

आजकल बाजार में एक और मनका उपलब्ध है जिसे भद्राक्ष कहते हैं। यह एक जहरीला बीज है, जो भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार के इलाकों में काफी उगता है। देखने में यह दोनों बीज एक जैसे दिखते हैं। आप अंतर पता नहीं कर सकते। अगर आप इसे हाथ में लेते हैं और अगर आप संवेदनशील हैं, सिर्फ तभी आपको अंतर पता चलेगा। इसे शरीर पर नहीं पहनना चाहिए, लेकिन इन्हें कई जगहों पर असली मनकों की तरह बेचा जा रहा है। यह महत्वपूर्ण है कि आप अपनी माला एक विश्वसनीय स्रोत से प्राप्त करें।