भारत में अनेकों महान् नीतिज्ञ हुए जिन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर कुछ जीवन सूत्र निर्मित किए जिन्हें नीतिसार या नीति-शास्त्र कहते हैं। इतिहास में भीष्म नीति, विदुर नीति, मनु नीति (मनुस्मृति), चार्वाक नीति, शुक्र नीति, बृहस्पति नीति, परशुराम नीति, गर्ग नीति आदि नीतियां प्रचलित हैं। चाणक्य के बाद भी कई महान नीतिज्ञ हुए हैं] जैसे भर्तृहरि, हर्षवर्धन, बाणभट्ट आदि। इसी कड़ी में विदुर नीति के अंतर्गत नीति सिद्धांतों का सुंदर वर्णन किया गया है। विदुर धृतराष्ट्र के सौतेले भाई थे जो एक दासी के पुत्र थे। युद्ध के बाद विदुर पांडवों के भी मंत्री हुए। महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत के ‘उद्योग पर्व’ में इस चर्चा का वर्णन मिलता है। इसमें राजा और प्रजा के दायित्वों की विधिवत व्याख्या की गई है। विदुर नीति वास्तव में महाभारत युद्ध से पूर्व युद्ध के परिणाम के प्रति आशंकित हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के साथ उनका संवाद है।
‘महाभारत’ की कथा के महत्त्वपूर्ण पात्र विदुर कौरव-वंश की गाथा में अपना विशेष स्थान रखते हैं। विदुर नीति जीवन-युद्ध की नीति ही नहीं, जीवन-प्रेम, जीवन-व्यवहार की नीति के रूप में अपना विशेष स्थान रखती है। वर्तमान में राज्य व्यवस्था, व्यवहार और दिशा निर्देशक सिद्धान्तों की विवेचना करने वाली नीतियों में चाणक्य नीति और विदुर-नीति का विशेष महत्त्व है। महात्मा विदुर, धृतराष्ट्र को समझाते हुए कहते हैं –
जिस प्रकार नदी पार करने के लिए नाव ही एकमात्र साधन होता है, उसी प्रकार स्वर्ग के लिए सत्य ही एकमात्र सीढ़ी है, कुछ और नहीं, किन्तु आप इसे नहीं समझ रहे हैं।
दो प्रकार के पुरुष स्वर्ग के भी ऊपर स्थान पाते हैं – एक, शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने वाला और दूसरा, निर्धन होने पर भी दान देने वाला।
केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है। एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। विद्या ही परम संतोष देने वाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देने वाली है।
मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत से लोग उसका आनंद उठाते हैं। आनंद उठाने वाले तो बच जाते हैं परन्तु पाप करने वाला अकेला दोष का भागी होता है।
अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, कर्तव्य, दुःख सहने की शक्ति और धर्म में स्थिरता – यह गुण जिस मनुष्य को पुरुषार्थ करने से नहीं रोक पाते वही बुद्धिमान या पंडित कहलाता है।
जिस व्यक्ति के कर्तव्य, सलाह और पहले से लिए गए निर्णय को केवल काम संपन्न होने पर ही दूसरे लोग जान पाते हैं, वही बुद्धिमान कहलाता है।
बुद्धिमान तथा ज्ञानी लोग दुर्लभ वस्तुओं की कामना नहीं रखते, न ही खोयी हुए वस्तु के विषय में शोक करना चाहते हैं तथा विपत्ति की घड़ी में भी घबराते नहीं हैं।
जो व्यक्ति किसी विषय के बारे में धैर्यपूर्वक सुनते हैं, उस विषय को शीघ्र समझ लेते हैं। अपने कार्यों को कामना से नहीं बल्कि बुद्धिमानी से संपन्न करते हैं, तथा किसी के बारे में बिना पूछे व्यर्थ की बात नहीं करते हैं, वही बुद्धिमान कहलाते हैं।
जो व्यक्ति पहले निश्चय करके, रूप रेखा बनाकर काम को शुरू करता है तथा काम के बीच में कभी नहीं रुकता और समय को नहीं गँवाता और अपने मन को वश में किये रखता है, वही पण्डित कहलाता है।
जो निर्भीक होकर बात करता है, कई विषयों पर अच्छे से बात कर सकता है, तर्क-वितर्क में कुशल है, प्रतिभाशाली है और शास्त्रों में लिखी बातों को शीघ्रता से समझ सकता है, वही पण्डित कहलाता है।
जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को क्लेश हो, धर्म का उल्लंघन करना पड़े, शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो, उसे प्राप्त करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।
जो व्यक्ति विश्वास का पात्र नहीं है, उसका विश्वास कभी नहीं करना चाहिए। किन्तु जो विश्वास के योग्य है, उस पर भी अधिक विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है, वह मूल उद्देश्य का भी नाश कर डालता है।
संसार के सात सुख प्रमुख है- उत्तम स्वास्थ, माता-पिता का आर्शीवाद, धन प्राप्ति का साधन, वश में रहने वाला पुत्र, प्रिय बोलने वाली भार्या, मनोरथ पूर्ण कराने वाली विद्या, भौतिक सुख-सुविधा के साधन – अर्थात् इन सात साधनों से संसार में सुख उपलब्ध होता है।
दूसरे से ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, असंतुष्ट रहने वाला, क्रोध करने वाला, शंकालु और पराश्रित (दूसरों पर आश्रित रहने वाला) इन छह प्रकार के व्यक्ति सदा दुखी रहते हैं।
काम, क्रोध और लोभ यह तीन प्रकार के नरक यानि दुखों की ओर जाने के मार्ग है। यह तीनों आत्मा का नाश करने वाले हैं, इसलिए इनसे हमेशा दूर रहना चाहिए।
मूढ़ चित वाला नीच व्यक्ति बिना बुलाए ही अंदर चला आता है, बिना पूछे ही बोलने लगता है तथा जो विश्वास करने योग्य नहीं है, उस पर भी विश्वास कर लेता है।
पराई स्त्री के स्पर्श से काम, पराए धन से लोभ, क्रोध से मित्रता का नाश और शत्रुता उत्पन्न होते हैं।