भगवान श्री कृष्ण विष्णु के 8वें अवतार और हिन्दू धर्म के प्रमुख देवता माने जाते हैं। उनको कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारिकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी जाना जाता हैं। वह वसुदेव और देवकी की 8वीं संतान थे। श्री कृष्ण का जन्म मथुरा के कारावास में और उनका लालन-पालन गोकुल में हुआ था। यशोदा और नन्द उनके पालक माता-पिता थे। 124 वर्षों के जीवनकाल के बाद उन्होंने अपनी लीला समाप्त की।
भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र के दिन रात्री के 12 बजे हुआ था। कृष्ण का जन्मदिन जन्माष्टमी के नाम से भारत, नेपाल, अमेरिका सहित विश्वभर में मनाया जाता है। उनके अवतार समाप्ति के तुरंत बाद परीक्षित (जो अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र तथा अर्जुन के पौत्र थे) के राज्य का कालखंड आता है। राजा परीक्षित के समय से ही कलियुग का आरंभ माना जाता है।
श्रीमद्भागवत के अनुसार यदुवंश के कुलगुरू गर्गाचार्य द्वारा गोकुल में उनका नामकरण संस्कार हुआ था। नाम रखते समय गर्गाचार्य ने बताया कि आपका यह पुत्र प्रत्येक युग में अवतार धारण करता है। कभी इसका वर्ण श्वेत, कभी लाल, कभी पीला होता है। पूर्व के प्रत्येक युगों में शरीर धारण करते हुए इसके तीन वर्ण हो चुके हैं। इस बार ड्डष्णवर्ण का हुआ है, अतः इसका नाम कृष्ण होगा। भगवान कृष्ण का रंग नीले, काले और सफेद रंग का मिश्रित रूप था। भागवत पुराण और विष्णु पुराण में कृष्ण कथा की विस्तृत जानकारी है।

श्री कृष्ण जन्म का कारण एवं उद्देश्य :

पृथ्वी पर द्वापर युग में जब राक्षसों के अत्याचार बढने लगे, तब पृथ्वी गाय का रूप धारण कर अपनी व्यथा सुनाने तथा उद्धार के लिए ब्रह्मा जी के पास गईं। पृथ्वी पर बढ़े हुए पाप कर्म देखकर सभी देवता भी बहुत चिंतित थे। ब्रह्मा जी सब देवताओं व पृथ्वी को साथ लेकर भगवान विष्णु के पास क्षीरसागर गए। भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी एवं सब देवताओं को देखकर उनके आने का कारण पूछा तो पृथ्वी बोली- भगवन्! मैं पाप के बोझ से दबी जा रही हूँ, मेरा उद्धार किजिए। भगवान विष्णु उन्हें आश्वस्त करते हुए बोले – चिंता न करें, मैं नर-अवतार लेकर पृथ्वी पर आऊंगा और पापों से मुक्ति प्रदान करूंगा। कश्यप मुनि मथुरा के यदुकुल में जन्म लेकर वसुदेव नाम से प्रसिद्ध होंगे। मैं ब्रज मण्डल में वासुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से ‘कृष्ण’ के रूप में जन्म लूँगा और उनकी दूसरी पत्नी के गर्भ से मेरी सवारी शेषनाग ‘बलराम’ के रूप में उत्पन्न होंगे। तुम सब देवतागण ब्रज भूमि में जाकर यादव वंश में अपना शरीर धारण करो। मैं कुरुक्षेत्र के मैदान में पापी क्षत्रियों का संहारकर पृथ्वी को पापों से मुक्त करूंगा।

श्री कृष्ण लीला :

श्री कृष्ण गोकुल में गोपियों के साथ रासलीला रचाते और बांसुरी बजाते थे। उनकी बाँसुरी की धुन सुनकर सभी गोकुलवासी, पशु, पक्षी आदि बड़े ही खुश होते थे। उनको यह आवाज बहुत प्रिय लगती थी। श्री कृष्ण और बलराम को शिक्षा-दीक्षा के लिए उज्जैन भेज दिया गया। उज्जैन में दोनों भाइयों ने संदीपनी ऋषि के आश्रम में शिक्षा और दीक्षा प्राप्त करना आरंभ कर दिया। श्री कृष्ण ने अपनी औपचारिक शिक्षा उज्जैन के संदीपनी आश्रम में मात्र कुछ महीनों में पूरी कर ली थी। उसी आश्रम में श्रीकृष्ण की मित्रता सुदामा से हुई। उनकी मित्रता के चर्चे काफी दूर दूर तक थे। शिक्षा-दीक्षा के साथ साथ अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान प्राप्त करके वह वापस आ गए। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता के रूप में आध्यात्मिकता की वैज्ञानिक व्याख्या दी, जो मानवता के लिए आशा का सबसे बड़ा संदेश है और सदैव रहेगी।

राधा का विवाह :

राधा और कृष्ण को प्रेम का दूसरा रूप माना जाता है। उनका प्रेम इतना पवित्र था कि आज भी लोग उनके प्रेम की मिसालें देते हैं। हम सभी इस सत्य से भली भांति परिचित हैं कि राधा जी, श्रीकृष्ण की प्रेमिका थी, लेकिन यह भी सत्य है कि श्रीकृष्ण का विवाह राधा से नहीं हुआ। आखिर कौन था राधा का पति? आज तक कोई भी इस संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं दे पाया है। भागवत पुराण के अनुसार राधा, माता लक्ष्मी का अवतार थीं और श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार थे। अवतार लेने से पूर्व माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से कहा कि वह उनके अलावा किसी और की जीवन संगिनी नहीं बन सकती।
गर्ग संहिता के अनुसार श्री कृष्ण और राधा का विवाह स्वयं परमपिता ब्रम्हा ने करवाया था। नन्द बाबा बाल गोपाल को अक्सर नंदीग्राम ले जाते थे। एक दिन जब वह नंदीग्राम जा रहे थे तो तेज रोशनी के साथ बहुत तेज तूफान आया। वह रोशनी इतनी तेज थी कि नंद बाबा अपनी आंखें भी नहीं खोल पा रहे थे। उसी समय उन्हें ऐसा लगा जैसे उनके आसपास कोई दिव्य शक्ति है। कहा जाता है कि वो शक्ति साक्षात राधारानी ही थीं। राधा रानी के प्रकट होते ही श्रीकृष्ण भी किशोर रूप में आ गए। उसी समय परमपिता ब्रम्हा ने ललिता और विशाखा के सामने उनका विवाह संपन्न कराया। विवाह के पश्चात् वातावरण पूर्ववत् हो गया। ब्रह्मा जी भी राधा, ललिता और विशाखा समेत अंर्तध्यान हो गए और श्रीकृष्ण ने भी पुनः बाल गोपाल का रूप ले लिया।

राधा की मृत्यु :

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा वृषभानु और कीर्ति की पुत्री थी। राधा का जन्म यमुना नदी के तट पर वृंदावन के नजदीक ‘रायल या रेवल’ गांव में हुआ था। यहां राधाजी का प्राचीन मन्दिर भी है। श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम का प्रतीक मन्दिर बरसाना की पहाड़ी पर बना हुआ है। यहां की लट्ठमार होली बहुत प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण को केवल दो ही चीजें सबसे ज्यादा प्रिय थीं- बांसुरी और राधा। इसलिए श्री कृष्ण बांसुरी को हमेशा अपने पास रखते थे। मथुरा जाने से पहले अन्तिम बार श्रीकृष्ण राधा से मिले थे। मथुरा जाते समय श्रीकृष्ण ने राधा को वचन दिया था कि भविष्य में लोग उनका नाम लेने से पहले राधा का नाम लेंगे। राधा और कृष्ण का प्रेम ऐसा था जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। लेकिन इतना गहरा प्रेम होने के बाद भी उनका मिलन नहीं हुआ। जब भी संसार में प्रेम और त्याग की बात होती है तो सबकी जुबां पर एक ही नाम आता है – राधा और कृष्ण। इसलिए आज भी राधा और कृष्ण का नाम एकसाथ लिया जाता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा का विवाह एक यादव लड़के से हुआ था। ससुराल में रहते हुए राधा ने अपने दांपत्य जीवन की सारी रस्में निभाईं, लेकिन उनका मन श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित था। जीवन के अन्तिम दिनों में एक बार राधा श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका गई। द्वारिका में राधा को कोई नहीं पहचानता था। राधा के अनुरोध पर श्रीकृष्ण ने उन्हें महल में एक सेविका के रूप में नियुक्त किया। लेकिन महल में राधा श्रीकृष्ण के साथ पहले की तरह आत्मीयता को महसूस नहीं कर पा रही थीं। इसलिए उसने महल छोड़ दिया और वापिस अपनी ससुराल आ गई। अन्तिम समय में राधा ने श्रीकृष्ण को याद किया। श्रीकृष्ण के वहां पहुंचने पर राधा ने आखिरी बार बांसुरी की धुन सुनने का आग्रह किया और बांसुरी की धुन सुनते हुए प्राण त्याग दिए।

श्रीकृष्ण द्वारा किए गए विवाह :

भागवत पुराण में श्रीकृष्ण की आठ पत्नियों का वर्णन है, जो उनकी पटरानियां बनीं थी। उनके नाम इस प्रकार हैं – रुक्मिणी, सत्यभामा, जामवंती, कालिंदी, मित्रवृंदा, सत्या (नाग्नजिती), भद्रा और लक्ष्मणा (मद्रा)। उनकी प्रेमिका राधा को हिंदू परंपरा में विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी के अवतार के रूप में माना जाता है। गोपियों को राधा के कई स्वरूप और अभिव्यक्तियों के रूप में माना जाता है।

1. रुक्मिणी : विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री का नाम रुक्मिणी था। वह अत्यधिक सुंदर और सभी गुणों वाली साक्षात लक्ष्मीजी का ही अंश थी। नारद द्वारा श्रीकृष्ण के गुणों का वर्णन सुनने पर रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को अपना पति मान लिया। रुक्मिणी के रूप और गुणों की चर्चा सुनकर श्रीकृष्ण ने भी रुक्मिणी के साथ विवाह करने का निश्चय कर लिया था। रुक्मिणी का एक भाई था, जिसना नाम रुक्मि था। उसने रुक्मिणी का विवाह अपने मित्र शिशुपाल से तय कर दिया था। जब यह बात श्रीकृष्ण को पता चली तो वह विवाह पहले ही रुक्मिणी का हरण कर द्वारिका ले गए। द्वारिका पहुंचने के बाद श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह किया गया।

2. जाम्बवती : सत्राजित नामक एक यादव सैनिक था। उसने भगवान सूर्य की बहुत भक्ति की। जिससे खुश होकर भगवान ने उसे नित्य आठ भार सोना प्रदान करने वाली एक मणि प्रदान की थी। भगवान कृष्ण ने सत्राजित को वह मणि राजा उग्रसेन को भेंट करने को कहा, लेकिन सत्राजित ने उनकी बात नहीं मानी और मणि अपने पास ही रखी। एक दिन सत्राजित अपने भाई प्रसेन के साथ शिकार करने गया। जंगल में शेर ने प्रसेन को मार दिया और वह मणि वहीं रह गई। कुछ दिनों बाद रिछराज जाम्बवन्त को शिकार करते वक्त वह मणि मिली और उसने वह मणि अपने पास रख ली। किन्तु सत्राजित ने मणि चुराने और अपने भाई का वध करने का दोष श्रीकृष्ण पर लगा दिया। इस दोष के मुक्ति पाने के लिए श्रीकृष्ण वह मणि ढूंढने हेतू वन में गए। मणि की तलाश में श्रीकृष्ण उस गुफा तक पहुंच गए, जहां जाम्बवन्त और उसकी पुत्री जाम्बवती रहती थी। श्रीकृष्ण और जाम्बवन्त के बीच 21 दिन तक घोर युद्ध हुआ। युद्ध में पराजित होने पर जाम्बवन्त को श्रीकृष्ण के स्वयं विष्णु अवतार होने की बात पता चली। श्रीकृष्ण का असली रूप जानने पर जाम्बवन्त ने उनसे क्षमा मांगी और अपने अपराध का प्रायश्चित करने के लिए अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

3. सत्यभामा : जाम्बवन्त से वह मणि लेकर श्रीकृष्ण द्वारिका पहुंचे। वहां पहुंचकर श्रीकृष्ण ने वह मणि सत्राजित को दी और खुद पर लगाए दोष को गलत साबित किया। श्रीकृष्ण के निर्दोष साबित होने पर सत्राजित स्वयं को अपमानित महसूस करने लगा। वह श्रीकृष्ण के तेज को जानता था, इसलिए वह बहुत भयभीत हो गया। उसकी मूर्खता की वजह से कहीं श्रीकृष्ण की उससे कोई दुश्मनी न हो जाए, इस डर से सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

4. सत्या (नग्नजिती) : कौशल राज्य के राजा नग्नजित की एक पुत्री बहुत सुंदर और सर्वगुण सम्पन्न थी। अपनी पुत्री के योग्य वर हेतू नग्नजित ने शर्त रखी कि जो क्षत्रिय सात बैलों पर जीत प्राप्त कर लेगा, उसी के साथ नग्नजिती का विवाह किया जाएगा। नग्नजिती भगवान कृष्ण पर मोहित थी और मन ही मन भगवान कृष्ण से विवाह करने का प्रण ले लिया। श्री कृष्ण भी यह बात जान चुके थे। अपनी भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान कृष्ण ने सातों बैलों को अपने वश में करके उन पर विजय प्राप्त की। भगवान का यह पराक्रम देखकर नग्नजित ने अपनी पुत्री का विवाह भगवान कृष्ण के साथ कर दिया।

5. कालिन्दी : एक बार भगवान कृष्ण अपने प्रिय मित्र अर्जुन के साथ वन में घूम रहे थे। थकान दूर करने के लिए वह यमुना नदीं के किनार बैठ गए। वहां उनको एक युवती तपस्या करती हुई दिखाई दी। अर्जुन द्वारा उसका परिचय पूछने पर उसने अपना नाम सूर्यपुत्री कालिन्दी बताया। वह यमुना नदीं में निवास करती है और भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। यह बात जान कर भगवान कृष्ण ने कालिन्दी को अपने भगवान विष्णु के अवतार होने की बात बताई और उसे अपने साथ द्वारिका ले गए। द्वारिका पहुंचने पर भगवान कृष्ण और कालिन्दी का विवाह किया गया।

6. लक्ष्मणा : लक्ष्मणा ने देवर्षि नारद से भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के बारे में कई बातें सुन रखी थी। उसका मन सदैव भगवान के स्मरण और भक्ति में लगा रहता था। मद्र देश की राजकुमारी लक्ष्मणा भगवान विष्णु को ही अपने पति रूप में प्राप्त करना चाहती थी। यह बात उसके पिता वृहत्सेन जानते थे। अपनी पुत्री की इच्छा पूरी करने के लिए उसके पिता ने एक ऐसे स्वयंवर का आयोजन किया, जिसमें लक्ष्यभेद श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कोई दूसरा न कर सके। लक्ष्मणा के पिता ने अपनी पुत्री का विवाह उसी वीर से करने का निश्चय किया, जो पानी में मछली की परछाई देखकर निशाना लगा सके। शिशुपाल, कर्ण, दुर्योधन, अर्जुन आदि कोई भी इस लक्ष्य का भेद न कर सका। तब भगवान कृष्ण ने केवल परछाई देखकर मछली पर निशाना लगाकर स्वयंवर में विजयी हुए और लक्ष्मणा के साथ विवाह किया। बाद में श्रीकृष्ण ने यह विद्या अर्जुन को सिखलाई।

7. मित्रविंदा : अवंतिका (उज्जैन) की राजकुमारी मित्रविंदा के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया गया था। उस स्वयंवर में मित्रविंदा जिसे भी अपने पति रूप में चुनती उसके साथ मित्रविंदा का विवाह कर दिया जाता। उस स्वयंवर में भगवान कृष्ण भी पहुंचे। मित्रविंदा भगवान कृष्ण के साथ ही विवाह करना चाहती था, लेकिन उसका भाई विंद दुर्योधन का मित्र था। इसलिए उसने अपनी बहन को बल से भगवान कृष्ण को चुनने से रोक लिया। जब भगवान कृष्ण को मित्रविंदा के मन की बात पता चली। तब भगवान ने सभी विरोधियों के सामने ही मित्रविंदा का हरण कर लिया और उसके साथ विवाह किया।

8. भद्रा : भगवान कृष्ण की श्रुतकीर्ति नामक एक बुआ कैकय देश में रहती थी। उनकी एक भद्रा नामक कन्या थी। भद्रा और उसके भाई भगवान कृष्ण के गुणों को जानते थे। इसलिए भद्रा के भाइयों ने उसका विवाह भगवान कृष्ण के साथ करने का निर्णय किया। अपनी बुआ और भाईयों के इच्छा पूरी करने के लिए भगवान कृष्ण ने पूरे विधि विधान के साथ भद्रा के साथ विवाह किया।

श्री कृष्ण द्वारा किए गए युद्ध :

भगवान श्रीकृष्ण 64 कलाओं में दक्ष थे। एक ओर वह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे तो दूसरी ओर वह द्वंद्व युद्ध में भी माहिर थे। इसके अलावा श्रीकृष्ण के पास कई अस्त्र-शस्त्र और दिव्यास्त्र थे। भगवान परशुराम ने उनको सुदर्शन चक्र प्रदान किया था, तो दूसरी ओर वह पाशुपतास्त्र चलाना भी जानते थे। श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में कई यूद्धों का संचालन किया, बल्कि कहना चाहिए कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में युद्ध ही युद्ध किए। श्रीकृष्ण की बाल लीला और राधा से प्रेम को देखते हुए, जो ‘रसिक बिहारी’ की छवि निर्मित हुई, वह मध्यकाल के भक्त कवियों द्वारा निर्मित की गई है, ताकि भविष्य में लोग झगड़ा छोड़कर प्रेम से रह सकें।

1. चाणूर और मुष्टिक से युद्ध : श्रीकृष्ण ने 16 वर्ष की उम्र में चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया था। मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया था। कहते हैं कि यह मार्शल आर्ट की विद्या थी, पूर्व में इस विद्या का नाम कलारिपट्टू था। जनश्रुतियों के अनुसार श्रीकृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था। डांडिया रास उसी का एक नृत्य रूप है। इस विद्या का प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण को ही माना जाता है। इसी कारण नारायणी सेना भारत की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गई थी।

2. कंस से युद्ध : कंस से युद्ध तो श्रीकृष्ण ने जन्म लेते ही शुरू कर दिया था। कंस के कारण ही श्रीकृष्ण को बचपन में ही पूतना, शकटासुर, कालिया, यमुलार्जन, धेनुक, बकासुर, प्रलंब, अरिष्ठ आदि अनेक असुरों का वध करना पड़ा। कंस, देवकी का चचेरा भाई और कृष्ण का मामा था। वह अपने पिता उग्रसेन को राजपद से हटाकर स्वयं शूरसेन जनपद का राजा बन बैठा था। कंस अपने पूर्व जन्म में कालनेमि नामक असुर था, जिसे संजीवनी बूटी लेने जाते समय हनुमान ने मारा था।

3. जरासंध से युद्ध : कंस वध के बाद जरासंध से श्रीकृष्ण ने कई बार युद्ध किए। जरासंध कंस का ससुर था इसलिए उसने श्रीकृष्ण को मारने के लिए मथुरा पर कई बार आक्रमण किया। उसने मथुरा पर 18 बार चढ़ाई की जिसमें से 17 बार वह असफल रहा। उसने काशी, कौशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, कश्मीर और गांधार आदि अनेक राजाओं को परास्त कर सभी को अपने अधीन बना लिया था। इनको भीम ने जरासंध का वधकर स्वतंत्र किया था। पुराणों में जरासंध जन्म की विस्तृत चर्चा मिलती है।

4. कालयवन से युद्ध : जरासंध ने 18 बार मथुरा पर चढ़ाई की। अंतिम चढ़ाई में मथुरा पर आक्रमण करने के लिए उसने एक विदेशी शासक कालयवन को भी प्रेरित किया। इस युद्ध के बाद कृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ा। कालयवन से युद्ध करते हुए श्रीकृष्ण रणभूमि छोड़कर भागने लगे, तो कालयवन भी उनके पीछे भागा। भागते हुए श्रीकृष्ण एक गुफा में चले गए। कालयवन भी वहीं घुस गया। गुफा में उसने एक दूसरे मनुष्य को सोते हुए देखा और कृष्ण समझकर कसकर लात मारी। उस सोते हुए मनुष्य ने जब आंखें खोली तो उसे कालयवन दिखाई दिया। कालयवन उसके देखने से तत्काल क्रोधाग्नि में जलकर भस्म हो गया। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले, वह इक्ष्वाकु वंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचकुन्द थे, जो तपस्वी और प्रतापी थे।

5. कृष्ण और अर्जुन का युद्ध : एक बार कृष्ण और अर्जुन में द्वंद्व युद्ध हुआ था। यह श्रीकृष्ण के जीवन का भयंकर द्वंद्व युद्ध था। माना जाता है कि यह युद्ध कृष्ण की बहन सुभद्रा की प्रतिज्ञा के कारण हुआ था। इस युद्ध में दोनों ने अपने-अपने सबसे विनाशक शस्त्र क्रमशः सुदर्शन चक्र और पाशुपतास्त्र निकाल लिए थे, लेकिन देवताओं के हस्तक्षेप करने से ही वह दोनों शांत हुए थे।

6. भगवान शिव और कृष्ण का जीवाणु युद्ध : श्री कृष्ण ने असम में बाणासुर और भगवान शिव से युद्ध के समय ‘माहेश्वर ज्वर’ के विरुद्ध ‘वैष्णव ज्वर’ का प्रयोग कर विश्व का प्रथम जीवाणु युद्ध लड़ा था। बाणासुर को भगवान शिव ने अपना पुत्र माना था, इसलिए उन्होंने उसकी जान बचाने के लिए श्रीकृष्ण से युद्ध किया था। चन्द्रवंशीय अनिरुद्ध श्रीकृष्ण का पौत्र और प्रद्युम्न का पुत्र था। इनके रूप पर मोहित होकर बाणासुर की पुत्री उषा माया से अनिरुद्ध का अपहरण कर अपनी राजधानी शेणितपुर ले गई। श्री कृष्ण और बलराम ने बाणासुर को युद्ध में परास्त किया और अनिरुद्ध को उषा सहित द्वारिका ले लाए।

7. नरकासुर से युद्ध : नरकासुर को भौमासुर भी कहा जाता है। कृष्ण अपनी आठों पत्नियों के साथ द्वारिका में सुखपूर्वक रह रहे थे। एक दिन स्वर्गलोक के राजा देवराज इंद्र ने बताया कि दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर भौमासुर से युद्ध करने के लिए चल पड़े। भौमासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था, इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और घोर युद्ध करते हुए सत्यभामा की सहायता से उसका वध कर दिया। श्रीकृष्ण ने भौमासुर द्वारा अपहरण करके लाई गई 16,100 कन्याओं को मुक्त कर दिया। श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर किया था। इसी दिन की याद में दीपावली के ठीक एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी मनाई जाने लगी।

8. कृष्ण-जाम्बवंत युद्ध : एक बार भगवान श्रीकृष्ण का जाम्बवंत से द्वंद्व युद्ध हुआ था। जाम्बवंत रामायण काल में थे और उनको अजर-अमर माना जाता है। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम जाम्बवती था। जाम्बवंत से भगवान श्रीकृष्ण को मणि के लिए युद्ध करना पड़ा था। यह युद्ध 21 दिनों तक चला था। यह मणि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पिता सत्राजित के पास थी। किसी कारण सत्राजित ने श्रीकृष्ण पर आरोप लगा दिया कि यह मणि उन्होंने चुराई है। इस आरोप के विरोध में कृष्ण-जाम्बवंत का युद्ध हुआ।

9. महाभारत युद्ध : महाभारत का युद्ध कौरवों तथा पांडवों के बीच हुआ था। यह युद्ध श्रीकृष्ण ने स्वयं लड़ा नहीं था लेकिन उन्होंने इस युद्ध का संचालन जरूर किया था। महाभारत का युद्ध कलियुग के आरंभ होने से पूर्व हुआ था, जो 18 दिनों तक चला था। इस युद्ध में ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था।

श्रीमदभगवद्गीता : कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया था वह श्रीमद्भगवदगीता के नाम से प्रसिद्ध है। सभी हिन्दू ग्रंथों में, श्रीमद्भगवत गीता को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि इसमें एक व्यक्ति के जीवन का सार है। गीता में सांख्य योग, कर्म योग, भक्ति योग, राजयोग, एक ईश्वरावाद आदि पर बहुत ही सुंदर तरीके से चर्चा की गई है।

10. पौंड्रक-कृष्ण युद्ध : चुनार देश का प्राचीन नाम करुप्रदेश था। वहां के राजा का नाम पौंड्रक था। पौंड्रक को उसके मूर्ख और चापलूस मित्रों ने यह बताया कि असल में वही परमात्मा वासुदेव और विष्णु का अवतार है, मथुरा का राजा कृष्ण नहीं। कृष्ण तो ग्वाला है। पुराणों में उसके नकली कृष्ण का रूप धारण करने की कथा आती है। राजा पौंड्रक नकली चक्र, शंख, तलवार, मोर मुकुट, कौस्तुभ मणि, पीले वस्त्र पहनकर खुद को कृष्ण कहता था। उसने कई बार भगवान कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। अपने मित्र काशीराज की सहायता से पौंड्रक ने श्रीड्डष्ण के विरुद्ध युद्ध किया। पौंड्रक का वध कर श्रीकृष्ण पुनः द्वारिका चले गए। भगवान श्रीकृष्ण अंतिम वर्षों को छोड़कर कभी भी द्वारिका में 6 महीने से अधिक नहीं रहे।

श्री कृष्ण के पूर्वज :

ब्रह्मा के मानस पुत्र ऋषि अत्री और सती अनुसूईया से चंद्र जन्मे। इसके बाद देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा और चन्द्रमा के मेल से बुध पैदा हुए। बुध और इला से पुरुरवा का जन्म हुआ। इसके बाद पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी के विवाह से छः पुत्रों का जन्म हुआ, जिनमें आयु नाम के पुत्र से नहुष और नहुष के बेटे हुए ययाति। ययाति की पत्नी देवयानी और शर्मिष्ठा से क्रमशः यदु और पुरु जन्में। यदुवंश में श्री ड्डष्ण हुए और पुरुवंश में अर्जुन पैदा हुए। भगवान श्री कृष्ण के पूर्वज महाराजा यदु थे। इस प्रकार श्री कृष्ण और अर्जुन चन्द्रवंशी थे। श्रीकृष्ण की तीन बहनें भी थीं –

(1) देवकी की पुत्री, जिसे कंस ने कारावास में ही मार दिया था,
(2) रोहिणी की पुत्री-सुभद्रा,
(3) मुंहबोली बहन द्रौपदी।

यदु के पिता का नाम ययाति था। ययाति प्रजापति ब्रह्मा की 8वीं पीढ़ी में हुए थे। ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- पुरु, यदु, तुर्वस, अनु और द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनद कहा गया है। शुक्राचार्य ने ययाति को वचनभंग के कारण वृद्ध होने का श्राप दिया। ययाति ने अपनी वृद्धावस्था अपने पुत्रों को देकर उनका यौवन प्राप्त करना चाहा। पुरू के अतिरिक्त कोई पुत्र इस पर सहमत नहीं हुआ। इसलिए पुरु को राजा घोषित किया गया।
ययाति ने अपने बड़े पुत्र यदु से रुष्ट होकर उसे शाप दिया कि यदु या उसके पुत्रों को कभी राजपद प्राप्त नहीं होगा। कहते हैं कि यदु के बाद अधिकतर यदुओं को उस काल में कभी भी राज्य का सुख हासिल नहीं हुआ। वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते रहे और उनको हर जगह से पलायन ही करना पड़ा। ययाति ने दक्षिण-पूर्व दिशा में तुर्वसु को (प्राचीन पंजाब प्रदेश), पश्चिम में द्रुहु को (सिन्ध-गुजरात प्रांत), दक्षिण दिशा में यदु को (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) और उत्तर दिशा में अनु को (हिमाचल प्रदेश) राजा नियुक्त किया तथा पुरु को शेष भू-मंडल के राज्य पर अभिषिक्त कर स्वयं वन को चले गए। ययाति के राज्य का क्षेत्र अफगानिस्तान के हिन्दूकुश से लेकर असम तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक था।

श्री कृष्ण का वंश : भगवान शंकर के शाप से जब कामदेव भस्म हो गया तो उसकी पत्नी रति अति व्याकुल होकर पति वियोग में बहुत दुखी हो गई। उसने अपने पति की पुनः प्राप्ति के लिये देवी पार्वती और भगवान शंकर को तपस्या करके प्रसन्न किया। पार्वती जी ने उन्हें चिरयौवन का आशीर्वाद दिया और कहा कि तेरा पति द्वापर युग में श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेगा और तुझे वह शंबरासुर के यहाँ मिलेगा। देवी रति पति से मिलने की आशा में श्रीकृष्ण के अवतार की उत्कण्ठा के साथ ब्रह्मलोक में प्रतीक्षा करने लगी। समय आने पर देवी रति शंबरासुर के महल में मायावती के नाम से दासी का कार्य करने लगी। कहीं-कहीं इसका नाम विद्यावती बताया गया है। इधर द्वारिका में रुक्मणी ने एक सुन्दर बालक को जन्म दिया। उसका नाम प्रद्युम्न रखा गया।

शम्बरासुर नाम का एक शक्तिशाली दैत्य भगवान कृष्ण के समकक्ष द्वापर युग में हुआ था। शम्बरासुर को यह श्राप था कि रुक्मिणी के गर्भ से उत्पन्न होने वाले भगवान श्रीकृष्ण के प्रथम पुत्र के हाथों उसकी मृत्यु होगी। जब शंबरासुर को पता चला कि उसका शत्रु यदुकुल में जन्म ले चुका है तो उसने प्रद्युम्न का जन्म के छठे दिन द्वारिका से अपहरण कर लिया और समुद्र में फेंक दिया। समुद्र में प्रद्युम्न को एक मत्स्य ने निगल लिया। मछुआरों ने जाल डालकर उस मत्स्य को पकड़ लिया और उसे शम्बरासुर को भेंट कर दिया। शम्बरासुर ने उसे पकाने के लिये अपने रसोइयों को दिया। रसोइयों ने जब मत्स्य का पेट काटा तो उससे एक अत्यन्त सुन्दर जीवित बालक निकला। शंबरासुर ने वह बालक मायावती नामक सेविका को दे दिया। मायावती जो कि पूर्व जन्म में कामदेव की पत्नी रति थी, उस बालक को बेटे की तरह पालने लगी। बाद में देवर्षि नारद ने उसे बताया कि जिसे तुम बेटा बनाकर पाल रही हो वह तुम्हारा पूर्व जन्म का पति कामदेव है। श्रीकृष्ण की माया से शीघ्र ही प्रद्युम्न युवा हो गया। प्रद्युम्न का रूप लावण्य इतना अद्भुत था कि वह साक्षात् श्री कृष्णचन्द्र ही प्रतीत हो रहा था। देवताओं की सहायता से प्रद्युम्न ने शीघ्र ही युद्ध कौशल की शिक्षा प्राप्त कर ली।

प्रद्युम्न ने शंबरासुर को ललकारा और युद्ध में परास्त कर उसका वध कर दिया तथा देवी रति के साथ द्वारिका पहुंचे। वह असुर अनेक प्रकार की माया रचकर युद्ध करने लगा। किन्तु प्रद्युम्न ने महाविद्या के प्रयोग से उसकी माया को नष्ट कर दिया और अपने तीक्ष्ण तलवार से शंबरासुर का सिर काटकर पृथ्वी पर डाल दिया। उनके इस पराक्रम को देखकर देवतागणों ने उनकी स्तुति करते हुए आकाश से पुष्प वर्षा की। जब वह नव-दम्पति द्वारिका पहुंचे तो रुक्मिणी सहित वहाँ की समस्त स्त्रियां साक्षात् श्रीकृष्ण के प्रतिरूप प्रद्युम्न को देखकर आश्चर्य चकित रह गईं। रुक्मिणी सोचने लगीं कि यह नर श्रेष्ठ किसका पुत्र है? न जाने क्यों इसे देखकर मेरा वात्सल्य उमड़ रहा है। मेरा बालक भी बड़ा होकर इसी के समान होता, किन्तु उसे तो न जाने कौन प्रसूतिकागृह से ही उठा कर ले गया था। उसी समय श्री कृष्ण भी अपने माता-पिता देवकी और वसुदेव तथा भाई बलराम के साथ वहां आ पहुंचे। श्रीकृष्ण तो अन्तर्यामी थे किन्तु उन्हें नर लीला करनी थी इसलिये वह बालक के विषय में अनजान बने रहे। तब देवर्षि नारद ने वहां आकर सभी को प्रद्युम्न की आद्योपान्त कथा सुनाई और वहां उपस्थित समस्त जनों के हृदय में हर्ष व्याप्त गया।

महाभारत युद्ध के पश्चात् श्रीकृष्ण 35 वर्षों तक जीवित रहे और द्वारिका में अपनी आठ पत्नियों के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। उनकी आठ पत्नियों के प्रत्येक पत्नी से 10 पुत्र उत्पन्न हुए, जो इस प्रकार हैं:-

1. रुक्मिणी : प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, सुदेष्ण, चारुदेह, सुचारू, चरुगुप्त, भद्रचारू, चारुचंद्र, विचारू और चारू।
2. सत्यभामा : भानु, सुभानु, स्वरभानु, प्रभानु, भानुमान, चंद्रभानु, वृहद्भानु, अतिभानु, श्रीभानु और प्रतिभानु।
3. जाम्बवंती : साम्ब, सुमित्र, पुरुजित, शतजित, सहस्त्रजित, विजय, चित्रकेतु, वसुमान, द्रविड़ और क्रतु।
4. सत्या : वीर, चन्द्र, अश्वसेन, चित्रगु, वेगवान, वृष, आम, शंकु, वसु और कुन्ति।
5. कालिंदी : श्रुत, कवि, वृष, वीर, सुबाहु, भद्र, शांति, दर्श, पूर्णमास और सोमक।
6. लक्ष्मणा : प्रघोष, गात्रवान, सिंह, बल, प्रबल, ऊर्ध्वग, महाशक्ति, सह, ओज और अपराजित।
7. मित्रविन्दा : वृक, हर्ष, अनिल, गृध्र, वर्धन, अन्नाद, महांस, पावन, वह्नि और क्षुधि।
8. भद्रा : संग्रामजित, वृहत्सेन, शूर, प्रहरण, अरिजित, जय, सुभद्र, वाम, आयु और सत्यक।

कहीं-कहीं वर्णन है कि उनकी 16108 रानियों के 1,61,080 पुत्र थे। गांधारी के श्राप के कारण उनके सभी पुत्र आपस में लड़कर मर गए थे और उनका वंश समाप्त हो गया।

श्रीकृष्ण का देहत्याग :

एक दिन सभी कृष्णवंशी एक यदु पर्व पर सोमनाथ के पास प्रभास क्षेत्र में एकत्रित हुए। वहां सभी मदिरा पीकर एक-दूसरे को मारने लगे। इस तरह श्री कृष्ण को छोड़कर सभी मारे गए। इससे दुखी होकर बलराम ने जीवित समाधि ले ली। एक बार श्री कृष्ण वन में एक वृक्ष के नीचे आराम कर रहे थे। उसी समय जरा नामक एक शिकारी ने श्रीकृष्ण को मृग समझकर विषयुक्त बाण चला दिया, जो उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्रीकृष्ण ने इसी को बहाना बनाकर देह त्याग दी। जहां भगवान ने प्राण त्यागे थे, वहां बने मंदिर में वृक्ष के नीचे लेटे हुए श्री कृष्ण की आदमकद प्रतिमा है। उसके समीप ही हाथ जोड़े शिकारी जरा खड़ा हुआ है। मान्यता के अनुसार श्री कृष्ण ने अपने पिछले अवतार में, जब वह श्रीराम थे, बाली को छुपकर तीर मारा था। यही बाली इस युग में जरा बनकर आया और प्रभु ने अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी उन्होंने बाली को दी थी।