मृत्यु प्रकृति का अटल सत्य है। जो इस धरती पर आया है, उसे एक दिन यहां से अवश्य जाना है। गरुड़ पुराण के अनुसार जब किसी प्राणी की मृत्यु का समय निकट आता है तो यमराज के दो दूत मरन अवस्था में पड़े प्राणी के पास आ जाते हैं। पापी मनुष्य को यम के दूतों से भय लगता है। जिन लोगों ने जीवन में अच्छे कर्म किए होते हैं उन्हें मृत्यु से भय नहीं लगता। उन्हें मरने के समय अपने सामने दिव्य प्रकाश दिखता है।

भारतीय हिन्दू संस्कृति से सम्बन्धित कई ऐसी रस्में प्रचलित हैं जिनके बारे में हम शायद नहीं जानते हैं। हालांकि जीवन में ऐसे कई अवसर आते हैं जब हमें इन्हें देखने और समझने का मौका मिलता है। दाह संस्कार की रस्में भी इसी प्रकार की हैं, जिन्हें हम अपने परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु के वक्त ही जान पाते हैं। हालांकि कई लोग इन्हें रूढ़िवादी भी मानते हैं, मगर हमारे संस्कारों में निहित यह सभी नियम जितने शास्त्र सम्मत हैं, उतने ही वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरे उतरते हैं।

हिन्दू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक सोलह संस्कार बताए गए हैं। इनमें अन्तिम यानी सोलहवां संस्कार है- अंतिम संस्कार। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जिस व्यक्ति का अंतिम संस्कार नहीं होता उसकी आत्मा मृत्यु के बाद प्रेत बनकर भटकती है और तरह-तरह के कष्ट भोगती है। चाहे व्यक्ति की मृत्यु आकस्मिक दुर्घटना से, हिंसक प्राणी के द्वारा, फांसी से, विष से, अग्नि से, आत्मघात से, रस्सी बंधन से, जल में डूबने से, सर्प दंश से, बिजली/करंट से, अस्त्र/शस्त्र से या विषैले कुत्ते के काटने आदि किसी प्रकार से हुई हुई हो।

हिन्दू मान्यता के अनुसार अन्तिम संस्कार दो प्रकार से किया जाता है –

1. यदि मृतक व्यक्ति का शरीर उपलब्ध हो तो उसका पूरी ‘विधि-विधान के साथ दाह संस्कार’ करना चाहिए। इसमें मुख्यतः चार प्रकार के संस्कार किए जाते हैं –

मृत्यु के तुरत बाद चिता जलाते समय
तेरहवीं के समय बरसी (मृत्यु के एक वर्ष बाद) के समय।

2. जब किसी व्यक्ति का शरीर उपलब्ध न हो तो इसे दुर्मरण (बुरी मौत) कहा जाता है। ऐसी स्थिति में मृत्यु को सामान्य नहीं माना जाता और दाह संस्कार के लिए ‘पुतला दाह संस्कार’ विधि का प्रयोग किया जाता है। इसमें मृतक व्यक्ति का घास-फूस का पुतला बनाकर उसका दाह संस्कार किया जाता है।

अन्तिम संस्कार के नियम :

किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसका क्रियाकर्म किसी योग्य पुरोहित से करवाना चाहिए। अधिकांश स्थानों पर इस विषय में ज्ञानी पुरोहित शीघ्र मिलना कठिन होता है। ऐसी स्थिति में साधारणतः मृत व्यक्ति के अन्तिम संस्कार में क्या करना चाहिए, यहां इसका वर्णन दिया गया है –
हिंदू धर्म में मान्यता है कि मृत्यु के पश्चात् व्यक्ति स्वर्ग चला जाता है अथवा अपना शरीर त्यागकर दूसरे शरीर (योनि) में प्रवेश कर जाता है।
मृत्यु के विषय में यह दो मार्ग, प्रकाशमान एवं अंधकारमय, सनातन हैं। एक से जाने वाला कभी नहीं लौटता, किन्तु दूसरे से जाने वाला लौट आता है।
रात्रि के समय, कृष्ण पक्ष में, दक्षिणायन सूर्य के छः मासों में मरने वाले चन्द्रलोक तक जाते हैं और पुनः लौट आते हैं। दिन में, शुक्ल पक्ष में, उत्तरायण सूर्य के छः मासों में मरने वाले ब्रह्मलोक तक जाते हैं।
हिंदू धर्म में मृत व्यक्ति के पार्थिव शरीर का सूर्यास्त से पूर्व दाह संस्कार करने का नियम है। इससे मृतक की आत्मा को शांति मिलती है और अगले जन्म में प्रवेश के द्वार खुलते हैं।
दाह संस्कार कभी भी सूर्यास्त के बाद नहीं किया जाता। यदि मृत्यु सूर्यास्त के बाद हुई है तो उसका दाह संस्कार अगले दिन सुबह के समय ही किया जा सकता है।
सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से मृतक व्यक्ति की आत्मा को परलोक में कष्ट भोगना पड़ता है और अगले जन्म में उसके किसी अंग में दोष हो सकता है।
अन्तिम संस्कार में शामिल होना पुण्य कर्म है। जिस घर में किसी का देहांत हुआ है, उस घर से 100 गज दूर तक घरों के लोगों को अन्तिम संस्कार में शामिल होकर कंधा देना चाहिए।
गरुड़ पुराण के अनुसार साधु व बच्चों को समाधि दी जाती है और सामान्यजनों का दाह संस्कार किया जाता है। कहीं-कहीं साधु का भी दाह-संस्कार किया जाता है, इसमें कोई दोष नहीं होता।
घर का कोई सदस्य साधु, संन्यासी या परिव्राजक है, जो दूर देश में मरता है, अकाल मृत्यु पाता है, आत्महत्या करता है या दुर्घटनावश मर जाता है, उनके लिए पुतला दाह-संस्कार किया जाता है।
दन्तहीन शिशु व छोटी अवस्था के बच्चों, 5 वर्ष के लड़के तथा 7 वर्ष की लड़की का दाहकर्म नहीं होता।
छोटे बच्चों को घी का लेप लगाकर, नए वस्त्र से ढककर, रिहायशी इलाके से दूर किसी स्वच्छ स्थान पर समाधि देना चाहिए। उनका अस्थि चयन भी नहीं करना चाहिए।
यदि मृत्यु का पहले आभास हो जाए तो व्यक्ति को गंगा जल पिलाना चाहिए एवं तुलसी पत्ता खिलाना चाहिए। अगर खा ना पाए तो मुंह में रख देना चाहिए।
मरणासन्न व्यक्ति को आकाशतल में, ऊपर के तल पर अथवा पलंग/खाट आदि पर नहीं सुलाना चाहिए। अंतिम समय में नीचे पोलरहित भूमि पर ही सुलाना चाहिए।
मृत्यु के उपरांत सर्वप्रथम मृतात्मा को तीर्थ के जल से या गंगाजल से स्नान करा दें अथवा गीले वस्त्र से बदन पोंछकर शुद्ध कर दें। नई धोती या धुले हुए शुद्ध वस्त्र पहनाकर उसकी अर्थी तैयार कर लें।
शमशान ले जाने से पूर्व घर पर कुटुंब के सभी लोग मृत व्यक्ति के पार्थिव शरीर की विधिपूर्वक परिक्रमा करते हैं। सभी परिजन अपनी तरफ से मृतक को नए वस्त्र अर्पित करते हैं।
दाह संस्कार करने वाला व्यक्ति छेद वाले घड़े में जल लेकर चिता पर रखे पार्थिव शरीर की परिक्रमा करता है और अंत में पीछे की ओर घड़े को गिराकर फोड़ दिया जाता है। ऐसा मृत व्यक्ति के शरीर से मोहभंग करने के लिए किया जाता है।
दाह संस्कार के समय पहले सिर की ओर अग्नि देनी चाहिए। पुत्र ;कर्ताद्ध चिता के तीन चक्कर लगाकर चिता की लकड़ी पर घी डालते हुए लंबे डंडे से अग्नि देता है।
आधी चिता जलने के पश्चात् पुत्र मृतक के सिर को लंबे डंडे से तीन बार प्रहार कर फोड़ता है। इस क्रिया को कपाल क्रिया कहा जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि पिता ने पुत्र को जन्म देकर जो ब्रह्मचर्य भंग किया था, उसके ऋण से पुत्र ने उन्हें मुक्त कर दिया।
घर में जहां मृतक को अंत समय रखा गया था, वहां उसकी तस्वीर के सामने दीपक जलाकर शोक मनाया जाता है। मृत आत्मा की अच्छाई के बारे में बातचीत करते है।
जहा अग्नि दिए थे, वहां तीसरे दिन अस्थि संचय करके उसे एक साफ पीतल की थाल में रखकर सफेद कपड़ा ढककर घाट पर ले जाना चाहिए।
दाह संस्कार के बाद बची हुई अस्थियां गंगा या किसी पवित्र नदी में बहाने से मृतक के पाप धुलते हैं।
पातक वाले घर में सूर्यास्त से पूर्व एक समय नमक रहित भोजन करना चाहिए। ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना चाहिए तथा भूमि पर शयन करना चाहिए।
गरुड़ पुराण के अनुसार मृतक की आत्मा 3 दिन तक शमशान में, 10 दिन तक घर में रहती है। इसके बाद यमलोक की यात्रा आरम्भ होती है।
मृत्यु के दिन से 10 दिन तक किसी योग्य ब्राह्मण से गरुड़ पुराण सुनना चाहिए। 10 दिन तक पिण्डदान करने से आत्मा को नया शरीर मिलता है।
ग्यारहवें दिन घर की महिलाएं घर से बाहर कुएं या तालाब पर गौमूत्र, गाय का गोबर, कुशा जल, गौशाला की मिट्टी तथा गंगाजल युक्त पानी से स्नान करके विष्णु स्वरूप ‘शालिग्राम’ का उनकी अष्ट पटरानियों सहित पूजन करती हैं।
बारहवें दिन पितृपूजन कर ब्रह्मभोज कराने से मृतक आत्मा को पितृयोनि प्राप्त होती है। यह पूजन श्रा(कर्ता द्वारा मृतक के सभी पापों के प्रायश्चित के लिए किया जाता है।
मृतक की आत्मा 17 दिनों का सफर तय कर विभिन्न लोकों को पार करती हुई अपने गंतव्य यमलोक तक पहुंचती है। इसीलिए चैथा और 13वीं करने का विधान बना है।
कहीं-कहीं समयाभाव व अन्य कारणों से यह क्रिया 7 या 9 दिन बाद भी की जाती है, लेकिन गरुड़ पुराण के अनुसार यह क्रिया तेरहवें दिन ही करना चाहिए।
अंत्येष्टि कर्म और उसके बाद किए जाने वाले कर्म को सही तरीके से नहीं किए जाने से मृतक की आत्मा भटकती रहती है या वह प्रेतयोनी धारणकर लेती है। अतः उचित वैदिक या पौराणिक तरीके से अर्थी, शवयात्रा, दाह, सवा माह पातक और श्राद्ध के नियमों का पालन करना जरूरी है।

पगड़ी संस्कार : इस संस्कार में किसी परिवार के सब से अधिक उम्र वाले पुरुष की मृत्यु होने पर 13वीं से अगले दिन, घर के सबसे अधिक आयु वाले जीवित पुरुष के सिर पर रस्मी तरीके से पगड़ी (जिसे दस्तार भी कहते हैं) बाँधी जाती है। चूंकि पगड़ी समाज में इज्जत का प्रतीक मानी जाती है, इसलिए इस रस्म से दर्शाया जाता है कि परिवार के मान-सम्मान और कल्याण की जिम्मेदारी अब इस पुरुष के कन्धों पर है। रस्म पगड़ी का संस्कार या तो अंतिम संस्कार के चौथे दिन या फिर तेहरवीं को सामूहिक भोज के साथ आयोजित किया जाता है। इसके माध्यम से मृतक परिवार में लोगों का आना-जाना सामान्य रूप से प्रारंभ होता है।

बरसी : एक साल पूरा होने पर मृतक की बरसी मनाई जाती है, जिसमें ब्रह्मभोज कराया जाता है व मृतक का श्राद्ध किया जाता है ताकि मृतक पितृ बनकर सदैव उस परिवार की सहायता करते रहें। इस दौरान एक वर्ष तक व्रत, त्यौहार आदि किसी भी मांगलिक का आयोजन नहीं करना चाहिए ताकि दिवंगत आत्मा को कोई कष्ट नहीं पहुंचे। हमारे पूर्वजों को, पितरों को जब मृत्यु उपरांत भी शांति नहीं मिलती और वह इसी लोक में भटकते रहते हैं, तो हमें पितृ दोष लगता है। पितृदोष से मुक्ति हेतु हर महीने अमावस्या के दिन पितरों की आत्मिक शांति के लिए पिंडदान और तर्पण अवश्य करना चाहिए। इन सभी क्रियाओं को करने का मुख्य उद्देश्य मृतक की आत्मा को शांति पहुंचाना व उसके द्वारा किए गए गलत कर्मों हेतु माफ करना है। क्योंकि जब भी कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा कर्म करता है तो उसका प्रभाव परिवार के सभी व्यक्तियों पर होता है। इनसे हर परिवार को जीवनचक्र का ज्ञान व कर्मों के फलों का आभास कराया जाता है।