सनातन धर्म में विष्णु
सृष्टि के प्रारम्भ से ही भगवान विष्णु ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च शक्ति तथा नियन्ता के रूप में मान्य रहे हैं। विष्णु का सर्वाधिक महत्व भागवत एवं विष्णु पुराण में वर्णन है। सभी पुराणों में भागवत पुराण को सर्वाधिक मान्य माना गया है जिसके कारण विष्णु का महत्व अन्य त्रिदेवों की तुलना में अधिक हो जाता है। त्रिदेवों के अन्य दो रूप ब्रह्मा और शिव हैं। ब्रह्मा जी को सृजन करने वाला और शिव जी को संहारक माना गया है। वेदों में भी अनेकों सूक्त विष्णु को समर्पित है जिसको विष्णु सूक्त कहा गया है। ऋग्वेद के मंडल 1 के सूक्त 22 में विष्णु द्वारा वामन अवतार में तीन पग से तीन लोक मापने का वर्णन है। ऋग्वेद के प्रमुख भाष्यकारों ने भी प्रायः एक स्वर से ‘विष्णु’ शब्द का अर्थ व्यापक ही किया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने भी ‘अतीव उत्तम कर्म वाला’ अर्थ किया है। हिन्दू धर्म के आधारभूत ग्रन्थ पुराणों में विष्णु को विश्व या जगत का पालनहार कहा गया है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में विष्णु जी ने ब्रह्मा जी को जो मूल ज्ञानस्वरूप ‘चर्तुश्लोकी भागवत’ सुनाया था, उसमें भी यही भाव व्यक्त हुआ है, ‘सृष्टि के पूर्व केवल मैं ही मैं था। मेरे अतिरिक्त न स्थूल था, न सूक्ष्म और न दोनों का कारण अज्ञान था। जहाँ यह सृष्टि नहीं है, वहाँ मैं ही मैं हूँ और इस सृष्टि के रूप में जो प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं ही हूँ। प्रलय के बाद जो कुछ बचेगा, वह भी मैं ही हूँ।’ इन सन्दर्भों से विष्णु की सर्वोच्चता तथा सर्वनियन्ता होने की भावना स्पष्ट परिलक्षित होती है।
सृष्टि की स्थिरता में विष्णु की ‘इच्छा’ ही प्रधान है। विष्णु की पत्नी लक्ष्मी हैं। विष्णु अपनी शक्ति लक्ष्मी के सहयोग से सृष्टि का पालन करते हैं। विष्णु का निवास क्षीरसागर में शेषनाग के ऊपर है। उनकी नाभि से कमल उत्पन्न होता है जिसमें ब्रह्मा जी स्थित हैं। विष्णु के लिए कहा गया है कि वह सम्पूर्ण विश्व को अकेले धारण करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय के सुप्रसिद्ध सातवें एवं आठवें श्लोक में भगवान् ने स्वयं अवतार का प्रयोजन बताते हुए कहा है कि ‘जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब सज्जनों के परित्राण और दुष्टों के विनाश के लिए मैं विभिन्न युगों में उत्पन्न होता हूँ।’ विष्णु ने अपने तीन पगों द्वारा असुरों से पृथ्वी, वेद तथा वाणी सब छीनकर इन्द्र को दे दी। यदि वह अवतार रूप में अपनी लीला को प्रकट नहीं करते तो जीव उनके विशेष गुणों को कैसे समझते
सामान्यतः भगवान विष्णु 24 अवतारों की गणना के बावजूद अवतारों की बहुमान्य संख्या दस ही अधिक प्रचलित है –
मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः।
रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धि कल्किश्च ते दशं॥
विष्णु का स्वरूप :
भगवान विष्णु अपने नीचे वाले बायें हाथ में पद्म यानि कमल, अपने नीचे दाहिने हाथ में कौमोदकी नाम की गदा, ऊपर वाले बाएँ हाथ में पंचजन्य नामक शंख और अपने ऊपर वाले दाहिने हाथ में सुदर्शन चक्र धारण किए रहते हैं। उनका सम्पूर्ण स्वरूप ज्ञानात्मक है। पुराणों में उनके द्वारा धारण किये जाने वाले आभूषणों तथा आयुधों को भी प्रतीकात्मक माना गया है। विष्णु जी की प्रिय कौस्तुभ मणि, जगत् के निर्लेप, निर्गुण तथा निर्मल क्षेत्रज्ञ स्वरूप का प्रतीक है। उनका श्रीवत्स, प्रधान या मूल प्रकृति का प्रतीक है। कौमोदकी नाम की गदा बुद्धि का प्रतीक है। पंचजन्य शंख पंच महाभूतों के उदय का कारण और तामस अहंकार को बताता है। शारंग धनुष इन्द्रियों को उत्पन्न करने वाला राजस अहंकार बताता है। सुदर्शन चक्र, सात्विक अहंकार का प्रतीक है। वैजयन्ती माला में पंचतन्मात्रा तथा पंचमहाभूतों का संयोग है और उसमें जड़े मुक्ता, माणिक्य, मरकत, इन्द्रनील और हीरा पांचों रत्न पंच तथ्यों का प्रतीकात्मक स्वरूप हैं। विष्णु जी के बाण ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के प्रतीक हैं। वहीं खड्ग विद्यामय ज्ञान का प्रतीक है, जो अज्ञानमय कोश यानि म्यान से आच्छादित रहता है। इस प्रकार समस्त सृजनात्मक उपादान तत्त्वों को विष्णु जी अपने शरीर पर धारण किये रहते हैं। आचार्य सायण ऋग्वेद के अष्टम मण्डल के 25वें सूक्त के 12वें मन्त्र की व्याख्या में भी विष्णु को स्पष्ट रूप से जगतपालक मानते हैं।
श्री विष्णु की आकृति से सम्बन्धित स्तुतिपरक एक श्लोक अति प्रसिद्ध है –
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम्।।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिध्र्यानगम्यम्।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
भावार्थ – जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैय्या पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीले मेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, और जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमल के समान नेत्र वाले, सभी (तीनों) लोकों के स्वामी भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
विष्णु पार्थिव लोकों, विस्तृत अन्तरिक्ष आदि स्वनिर्मित लोकों में तीन प्रकार की गति करने वाले हैं। उनकी यह तीन गतियाँ उद्भव, स्थिति और विलय की प्रतीक हैं। इस प्रकार वह सभी जड़-जंगम के निर्माता भी हैं, पालक भी और विनाशक भी। वह लोकत्रय का अकेला धारक हैं। वह अपने तीन पाद प्रक्षेपों से अकेले ही तीनों लोकों को नाप लेते हैं। लोकत्रय को नाप लेने से भी यह फलित होता है कि लोकत्रय अर्थात् वहाँ के समग्र प्राणी उनके पूर्ण नियंत्रण में हैं। विष्णु भ्रूण रक्षक भी हैं। पुंसवन संस्कार में गर्भ की रक्षा और सुन्दर बालक की उत्पत्ति के लिए विष्णु की प्रार्थना की जाती है। उनके पालक स्वरूप पर स्पष्ट बल देने के कारण ऋग्वेद में अहोरात्र अग्निरूप में भी उन्हें ‘विष्णुर्गोपा परमंपाति’ अर्थात् सबका रक्षक और पालक कहा गया है।
जगत पालक होने के कारण उन्हें यदा-कदा विविध प्रपंचों का भी सहारा लेना पड़ता है। जैसे- देवताओं को समुद्र मंथन का परामर्श देते हुए असुरों से छल करने का सुझाव देना तथा कामोद्दीपक मोहिनी रूप धारणकर असुरों को मोहित करके देवताओं को अमृत पिलाना। इस सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि जगत पालक होने के कारण वह परिणाम देखते हैं। यदि छल करके भी अन्याय का नाश होता है तो वह छल करने से भी नहीं हिचकते। रामावतार में छिपकर बाली को मारना तथा ड्डष्णावतार के समय महाभारत के यु( में अनेक छलों का विधायक बनना उनके इसी दृष्टिकोण का परिचायक है। कुछ लोग इन कथाओं की मनमानी व्याख्या ईश्वर विरोध के रूप में करते हैं। परन्तु इन्हें सान्दर्भिक ज्ञान की दृष्टि से देखना इसलिए आवश्यक है क्योंकि पुराणों या तत्सम्बन्धी ग्रन्थों में यह प्रसंग विपरीत स्थितियों में सामान्य रूप से विशिष्ट कर्तव्य ज्ञान हेतु ही किये गये हैं।
विष्णु-लक्ष्मी विवाह कथा :
एक बार लक्ष्मीजी के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन हुआ। माता लक्ष्मी पहले ही मन ही मन विष्णुजी को पति रूप में स्वीकार कर चुकी थीं लेकिन नारद मुनि भी लक्ष्मीजी से विवाह करना चाहते थे। नारदजी ने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी। तब नारदजी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गए। विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया। हरि रूप लेकर जब नारद लक्ष्मी जी के स्वयंवर में पहुंचे तो उन्हें विश्वास था कि वह उन्हें ही वरमाला पहनाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी।
नारदजी वहां से उदास होकर लौट रहे थे कि रास्ते में एक जलाशय में उन्होंने अपना चेहरा देखा। अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान रह गए, क्योंकि उनका चेहरा बंदर जैसा लग रहा था। ‘हरि’ का एक अर्थ विष्णु होता है और एक वानर होता है। भगवान विष्णु ने नारद को वानर रूप दे दिया था। नारद समझ गए कि भगवान विष्णु ने उसके साथ छल किया। उनको भगवान पर बड़ा क्रोध आया। नारद सीधे बैकुंठ पहुंचे और आवेश में आकर भगवान को श्राप दे दिया कि आपको मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर जाना होगा। जिस तरह मुझे स्त्री का वियोग सहना पड़ा है उसी प्रकार आपको भी वियोग सहना होगा।
ब्रह्मा के समझाने पर नारद विष्णु भक्त बने और नारायण नाम जपने लगे। लेकिन श्राप कभी व्यर्थ नहीं जाता, इसलिए भगवान विष्णु को राम के रूप में जन्म लेकर पत्नी-वियोग सहना पड़ा। लक्ष्मी से विवाह के बाद इन्हें लक्ष्मी नारायण के नाम से पूजा जाने लगा। एकल रूप में यह सत्यनारायण के नाम से पूजे जाते हैं। ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष द्वितीया को नारद जयंती मनाई जाती है। देवगुरू वृहस्पति के शिष्य, देवर्षि नारद को महर्षि व्यास, महर्षि वाल्मीकि और महाज्ञानी शुकदेव का गुरु माना जाता है। इन्होंने संगीत की शिक्षा ब्रह्मा से ली थी। नारद हमेशा अपनी वीणा की मधुर तान से विष्णु का गुणगान करते रहते हैं।
शेषनाग की शैय्या क्यों: क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान विष्णु शेषनाग पर ही क्यों सोते हैं? भगवान विष्णु के इसी स्वरूप के लिए शास्त्रों में लिखा गया है ‘शान्ताकारं भुजगशयनं’ यानी शांत स्वरूप तथा भुजंग यानी शेषनाग पर शयन करने वाले देवता भगवान विष्णु। हिन्दू धर्म के अनुसार शेषनाग भगवान विष्णु की उर्जा का प्रतीक हैं जिसे वह नियंत्रित रखते हैं। मानव जीवन का प्रत्येक पल कर्तव्य एवं जिम्मेदारियों से जुड़ा होता है। जो कालरूपी नाग की तरह भय, बेचैनी एवं चिंताएं पैदा करता है। इन दायित्वों को पूरा करने के साथ-साथ अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का सिलसिला भी चलता रहता है। अतः भगवान विष्णु का शांत स्वरूप ऐसे बुरे वक्त में संयम एवं धीरज के साथ जीवन की सभी मुश्किलों पर काबू पाने की प्रेरणा देता है।
विष्णु के चरणों में लक्ष्मी क्यों: शास्त्रों में या भगवान विष्णु की किसी भी तस्वीर को देखें तो आप पाएंगे कि माँ लक्ष्मी सदैव उनके चरणों में बैठी उनके चरण दबाती ही दिखती हैं। लक्ष्मी कृपा के लिए भगवान विष्णु की कृपा पाना अत्यन्त अवश्यक है क्योंकि लक्ष्मी उन्हीं के चरणों में रहती हैं। विष्णु के पास जो लक्ष्मी हैं वह धन और सम्पत्ति है। लक्ष्मी उन्हीं के वश में रहती है जो हमेशा सभी के कल्याण का भाव रखता हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, अलक्ष्मी अपनी बहन लक्ष्मी से बेहद ईष्र्या रखती हैं। वह बिल्कुल भी आकर्षक नहीं हैं, उनकी आंखें भड़कीली, बड़े-बड़े दांत और बाल फैले हुए हैं। यहां तक कि जब भी देवी लक्ष्मी अपने पति के साथ होती हैं, अलक्ष्मी वहां भी उन दोनों के साथ पहुंच जाती थीं। अपनी बहन का यह बर्ताव देवी लक्ष्मी को बिल्कुल पसंद नहीं आया और उन्होंने अलक्ष्मी से कहा कि तुम मुझे और मेरे पति को अकेला क्यों नहीं छोड़ देती। इस पर अलक्ष्मी ने कहा कि कोई मेरी आराधना नहीं करता, मेरा पति भी नहीं है, इसलिए तुम जहां जाओगी,
मैं तुम्हारे साथ रहूंगी। इस पर देवी लक्ष्मी क्रोधित हो गईं और आवेग में उन्होंने अलक्ष्मी को श्राप दिया कि मृत्यु के देवता तुम्हारे पति हैं और जहां भी गंदगी, ईष्र्या, लालच, आलस, रोष होगा, तुम वहीं रहोगी। इसलिए माता लक्ष्मी अपने पति भगवान विष्णु के चरणों में बैठकर उनके चरणों की गंदगी को दूर करती रहती हैं, ताकि अलक्ष्मी उनके निकट न आ सकें। इस तरह वह पति को पराई स्त्री से दूर रखने की हर संभव कोशिश कर रही हैं।
भगवान विष्णु और लक्ष्मी की इस प्रतिमा के माध्यम से वुळछ लोग अपने वुळतर्कों द्वारा यह दिखाना चाहते हैं कि औरत की जगह उसके पति के चरणों में ही होती हैं, चाहे वह स्वयं लक्ष्मी ही क्यों न हो। परंतु वास्तव में ऐसा नही हैं। शास्त्रों के अनुसार महिलाओं के हाथ में देवगुरु बृहस्पति वास करते हैं और पुरुषों के पैरों में दैत्यगुरु शुक्राचार्य का वास होता हैं। अतः जब कोई महिला अपने पति के पैर दबाती हैं तो देव और दानवों के मिलन से धन लाभ होता है। इसीलिए माँ लक्ष्मी विष्णु जी के पैर दबाती रहती हैं।
गणेश और लक्ष्मी की पूजा क्यों: पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार लक्ष्मी जी को स्वयं पर अभिमान हो गया कि सारा जगत उनकी पूजा करता है और उनकी कृपा पाने के लिए लालायित रहता है। भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी का घमण्ड व अहंकार दूर करने के उद्देश्य से उनसे कहा कि भले ही सारा संसार आपकी पूजा करता है और आपकी कृपा के लिए व्याकुल रहता है, किन्तु आप में एक बहुत बड़ी कमी है। जब माता लक्ष्मी ने अपनी उस कमी को जानना चाहा तो विष्णु जी ने कहा कि आप निःसन्तान होने के कारण अपूर्ण है। जब तक कोई स्त्री मां नहीं बनती तब तक वह पूर्ण नहीं होती। यह जानकर माता लक्ष्मी को बहुत दुःख हुआ।
उन्होंने अपनी सखी पार्वती को अपनी पीड़ा बताई और उनसे उनके दो पुत्रों में से गणेश को उन्हें गोद देने को कहा। माता लक्ष्मी का दुःख दूर करने के उद्देश्य से पार्वती जी ने अपने पुत्र गणेश को उन्हें गोद दे दिया। तभी से भगवान गणेश माता लक्ष्मी के दत्तक-पुत्र माने जाने लगे। गणेश को पुत्र रूप में पाकर माता लक्ष्मी अति प्रसन्न हुईं। उन्होंने गणेश जी को यह वरदान दिया कि जो व्यक्ति मेरी पूजा के साथ तुम्हारी पूजा नहीं करेगा, मैं उसके पास नहीं रहूंगी। इसलिए सदैव लक्ष्मी जी के साथ भगवान गणेश की पूजा की जाती है।
बिना बुद्धि के धन नहीं : गणेश भगवान को बुद्धि और ऋद्धि-सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसलिए कहा जाता है कि लक्ष्मी (धन) आने पर अगर बुद्धि का उपयोग ना किया जाए, तो लक्ष्मी को रोक पाना मुश्किल हो जाता है। इसलिए दिवाली की शाम को मां लक्ष्मी के साथ गणेश जी की पूजा की जाती है।
विवाह में गणेश जी का महत्त्व : पुराणों में शिव, सती और पार्वती विवाह, राम-सीता विवाह, रुक्मणी और कृष्ण विवाह, तुलसी विवाह और गणेश विवाह के साथ ही विष्णु-लक्ष्मी विवाह का भी रोचक प्रसंग पढ़ने को मिलता है। इस कथा प्रसंग में विष्णु और देवताओं द्वारा भगवान गणेश का अपमान करने का उल्लेख मिलता है जिसके चलते जब विष्णु जी बारात लेकर निकले, तब गणेश जी ने अपने मूषक से कहकर संपूर्ण रास्ता खुदवा दिया था। बाद में जब गणेश जी को मनाया गया और उनकी विधिवत पूजा की गई, तब बारात आगे बढ़ सकी थी। इसलिए विवाह आदि प्रत्येक शुभ कार्यों में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है।
भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के उपाय :-
※ यदि भगवान विष्णु को शीघ्र प्रसन्न करना हो तो भगवान शिव की पूजा करनी अति अनिवार्य बताई गई है।
※ भगवान विष्णु भगवान शंकर के परम भक्त हैं। शिव और विष्णु को एक मानकर ही पूजा करें। यदि आप उन्हें भिन्न-भिन्न मानकर पूजा करेंगे तो दोनों आपकी पूजा स्वीकार नहीं करेंगे।
※ भगवान विष्णु के 1008 नामों का पाठ करें, उनकी आरती करें तथा विष्णु चालीसा का पाठ करें।
※ भगवान विष्णु को पारिजात के फूल की माला या पीले फूलों की माला भी चढ़ाएँ और तुलसी दल डालकर भोग चढ़ाएं। पारिजात के वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान विष्णु का ध्यान करें।
※ भगवान विष्णु के दान किसी भी जरूरतमंद और निर्धन व्यक्ति को दें तथा पशु-पक्षियों को भोजन दें।
※ भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए सत्यनारायण की कथा भी की जाती है।