गरुड़ पुराण का महत्त्व
सनातन धर्म में मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण सुनने का विधान है। इसका श्रवण और मनन करने से सद्गति की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण के दो भाग हैं- पूर्व खण्ड तथा उत्तर खण्ड। गरुड़ पुराण के पूर्व खण्ड में भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, देवी-देवताओं की पूजा, निष्काम कर्म की महिमा, सदाचार, यज्ञ, दान, व्रत के नियम, रोगों का निदान और औषधि आदि की सम्पूर्ण व्याख्या की गई है। गरुड़ पुराण के उत्तर खण्ड में नीतिसार का वर्णन है, जिसमें भगवान विष्णु द्वारा गरुड़ को नरक का परिचय देते हुए काल निर्णय, प्रेत स्वरूप निरूपण, यमलोक का मार्ग, यमलोक का विस्तार, कर्मों के अनुसार जन्म का निर्णय और नरकों का विस्तरित वर्णन किया गया है।
गरुड़ को कश्यप ऋषि का पुत्र और भगवान विष्णु का वाहन माना जाता है। एक बार गरुड़ ने भगवान विष्णु से प्राणियों की मृत्यु, यमलोक यात्रा, नरक-योनियों तथा सद्गति के बारे में अनेक गूढ़ और रहस्ययुक्त प्रश्न पूछे। उस समय भगवान विष्णु ने गरुड़ की जिज्ञासा शांत करते हुये उसके प्रश्नों के उत्तर दिए, जिन्हें गरुड़ पुराण में संकलित किया गया है। गरुड़ पुराण में व्यक्ति के कर्मों के आधार पर दंड स्वरुप मिलने वाले विभिन्न नरकों के बारे में बताया गया है। किस आत्मा को क्या सजा मिलनी है यह उसके कर्म निश्चित करते है।
गरुड़ पुराण में उल्लेखित नरक, मन की विभिन्न अवस्थाओं के प्रतीक माने गए हैं। हालांकि यह बात जरूर है कि उसी तरह के शारीरिक तथा मानसिक परिणाम वास्तविक जीवन में भुगतने पड़ते हैं। अगर मृत्यु के बाद मृतक के पुत्र आदि परिजन पिंडदान नहीं देते तो वह प्रेत बन जाता है। इस पुराण में श्राद्ध-तर्पण द्वारा पित्तरों की मुक्ति के उपायों का विस्तृत वर्णन भी मिलता है।
गरुड़ पुराण के पूर्व खण्ड की प्रमुख बातें –
⁜ गरुड़ पुराण के अनुसार हम जो भी ज्ञान सीखें उसका अभ्यास करते रहना चाहिए, ताकि वह ज्ञान हमारे मस्तिष्क में अच्छे से जम जाए। अभ्यास की महिमा बताते हुए कबीरदास ने भी कहा है –
करत करत अभ्यास के ,जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते, सिल पर करत निशान।।
⁜ जिस घर में ऐसे लोग रहते हैं जो गंदे वस्त्र पहनते हैं, उस घर में कभी भी लक्ष्मी नहीं आती है। जिसके कारण उस घर से सौभाग्य भी चला जाता है और दरिद्रता का निवास हो जाता है।
⁜ संतुलित भोजन करने से निरोगी काया प्राप्त होती है। संतुलित भोजन से ही व्यक्ति सेहत प्राप्त करता है और दूषित भोजन से वह रोगी हो जाता है। भोजन ही हमारे शरीर का मुख्य स्रोत है। अधिकांश बीमारियां इसी वजह से होती है कि हम असंतुलित खान-पान लेते हैं।
⁜ सभी पुराणों में एकादशी व्रत को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। यह व्रत नियमानुसार रखने से लाभ मिलता है। इस दिन सिर्फ फलाहार ही लेना चाहिए, किसी भी प्रकार का व्यसन नहीं करना चाहिए।
⁜ तुलसी को घर में रखने से सभी तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है। इसका प्रतिदिन सेवन करने से किसी भी प्रकार से व्यक्ति को कोई रोग नहीं हो सकता।
⁜ श्री कृष्ण और विष्णुजी की पूजा के पश्चात् तुलसी की पूजा करने से उत्तम फल मिलता है। इसका प्रसाद में सेवन करने से शारीरिक और मानसिक विकार दूर होते हैं।
⁜ किसी भी देवी, देवता या धर्म ग्रंथों का अपमान करने वाले को एक दिन जिंदगी में पछताना होता है और वह नरक में जाता है। गरुड़ पुराण में ऐसे लोगों के बारे में बहुत कुछ लिखा हुआ है।
⁜ पवित्र नदी, तीर्थ, मन्दिर आदि स्थानों का अपमान करने वाले, पाप कर्म करने वाले, धोखा देने वाले तथा वेद, पुराण और शास्त्रों के अस्तित्त्व पर सवाल उठाने वालों को नरक से कोई नहीं बचा सकता ।
⁜ आपत्तिकाल में जो व्यक्ति एक पांव को स्थिर करके दूसरे पांव को आगे बढ़ाता है, वह बुद्धिमान है। इसलिए अगले स्थान की परीक्षा के बिना पूर्व स्थान का परित्याग नहीं करना चाहिए।
⁜ जो व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) सुनिश्चित अर्थ का परित्याग कर अनिश्चित पदार्थों की आशा करता है उसका अनिश्चित तो नष्ट होता ही है, सुनिश्चित अर्थ भी विनष्ट हो जाता है।
⁜ अर्थदान के द्वारा लोभी मनुष्य को, करबद्ध प्रणाम करके उदारवेता व्यक्ति को, प्रशंसा करके मूर्ख व्यक्ति को और तात्विक चर्चा से विद्वान पुरुष को सन्तुष्ट किया जा सकता है।
⁜ स्वभाव से न कोई किसी का मित्र है और न कोई किसी का शत्रु। कारण विशेष से ही लोग एक-दूसरे के मित्र और शत्रु होते हैं।
⁜ भिक्षुक व्यक्ति संसार को यह शिक्षा प्रदान करते हैं कि दान न देने वाले मनुष्य की यही दशा होती है। इसलिए दान अवश्य देना चाहिए। क्योंकि कृपण का धन अग्नि, चोर अथवा राजा के लिए होता है।
⁜ विद्या का अभ्यास न करने से विद्या, सामर्थ्य शक्ति रहते हुए फटे-पुराने, मैले-कुचले वस्त्रों को धारण करने वाले का सौभाग्य, सुपाच्य भोजन से रोग और चातुर्य नीति से शत्रु का विनाश हो जाता है।
⁜ जो व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) बाल्यावस्था में विद्याध्ययन नहीं करते और युवावस्था में समय एवं धन को नष्ट करते हैं, वह वृद्धावस्था में कुहरे से झुलसने वाले कमल के समान संतप्त जीवन व्यतीत करते हैं।
⁜ मधुर वाणी से रहित और कायर पुरुष के हाथ में शस्त्र वैसे ही निष्फल होते हैं जैसे अंधे की स्त्री का सौंदर्य।
⁜ जिस प्रकार भूख से अत्यन्त पीड़ित होने पर भी सिंह घास नहीं खाता, उसी प्रकार सज्जन मनुष्य दुर्भाग्यवश वैभव रहित होने पर भी न तो दुष्टजनों की सेवा करता है और न उनका सहारा लेता है।
⁜ यह सर्वमान्य है कि सभी व्यक्ति सब कुछ नहीं जानते और कहीं पर भी सभी सर्वज्ञ नहीं है। एक ही व्यक्ति में सभी ज्ञान प्रतिष्ठित रूप में नहीं रहते। इसलिय न तो कोई सर्वविद् है और न अत्यन्त मूर्ख।
⁜ जो मनुष्य पराई स्त्रियों में मातृभाव रखता है, दूसरे के द्रव्यों को मिट्टी के ढेले के समान नगण्य समझता है और सभी प्राणियों में अपने ही स्वरूप का दर्शन करता है, वही विद्वान है।
⁜ जिस व्यक्ति के पास धन है, वही विद्वान समझा जाता है, उसी के मित्र एवं बंधु-बांधव होते हैं। धन रहित मनुष्य को मित्र, पुत्र, स्त्री तथा परिजन छोड़ देते हैं। इस संसार में धन ही सबका बंधु है।
⁜ विद्वान और मधुरभाषी होने पर भी यदि कोई व्यक्ति दरिद्र है तो उसके समयोचित हितकारी वचन को सुनकर भी कोई सन्तुष्ट नहीं होता। उस मनुष्य को किसी प्रकार का खेद नहीं करना चाहिए।
⁜ सत्य के पालन से धर्म की रक्षा होता है। सदा अभ्यास करने से विद्या की रक्षा होती है। मार्जन के द्वारा पात्र की रक्षा होती है और शील से कुल की रक्षा होती है।
⁜ उद्योग, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम, उत्तम व्यक्ति के यह छः प्रकार के कर्तव्य कहे गये हैं। यदि उद्योग करने पर भी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं होती तो उसमें भाग्य ही कारण है, तथापि मनुष्य को सदा पुरुषार्थ करते रहना चाहिए। प्रयत्न से विरत नहीं होना चाहिए।
⁜ व्यक्ति अपने सुख या दुःख का स्वयं ही हेतु हैं। पूर्व जन्मों में किए गए कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। मनुष्य निश्चित ही अपने पूर्वसंचित कर्मफल का परित्याग करने में समर्थ नहीं होता।
⁜ जिस अवस्था, जिस समय, जिस दिन, जिस रात्रि, जिस मुहूर्त अथवा जिस क्षण जैसा होना निश्चित है, वह वैसा ही होगाऋ अन्यथा नहीं हो सकता। पूर्व जन्मों में अर्जित की गई विद्या, दान दिया गया धन तथा किए गए कर्मफल अवश्य ही दूसरे जन्मों में आगे-आगे मिलते रहते हैं।
⁜ पराधीनता ही दुःख है और स्वाधीनता ही सुख। जो मनुष्य सम्मान से प्रसन्न नहीं होता, अपमान से क्रुद्ध नहीं होता एवं क्रोध में कठोर वचन नहीं बोलता, उसे साधु पुरुष समझना चाहिए।
⁜ छः कानों तक पहुंची हुई गुप्त मन्त्रणा नष्ट हो जाती है। अतः मन्त्रणा को चार कानों तक ही सीमित रखना चाहिए। दो कानों तक स्थित मन्त्रणा को तो भगवान ब्रह्मा भी जानने में समर्थ नहीं है।
⁜ विद्या सम्पन्न, बुद्धिमान एवं पुरुषों में श्रेष्ठ एकमात्र सुपुत्र से भी मनुष्य का कुल वैसे ही सुशोभित हो जाता है जैसे एक ही चन्द्रमा से आकाश मण्डल चमकने लगता है।
⁜ मनुष्य को पांच वर्ष तक पुत्र का पालन प्यार से करना चाहिए। दस वर्ष तक उसे अनुशासित रखना चाहिए तथा सोलह वर्ष की अवस्था होने पर उसके साथ मित्रवत् व्यवहार करना चाहिए।
⁜ संयुक्त परिवार में छोटे भाई-बहनों को बड़े भाई के प्रति पिता के समान आदर भाव रखना चाहिए। क्योंकि पिता की मृत्यु के पश्चात वह सभी छोटे भाई-बहनों का पालन-पोषण करता है।
⁜ एकता से कम शक्तिशाली समुदाय भी अत्यधिक शक्ति सम्पन्न हो जाता है, जैसे तृण को बटकर बनाई गई रस्सी से हाथी भी बांध लिया जाता है।
⁜ मनुष्य को भूलकर भी दुष्ट एवं छोटे शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिएऋ क्योंकि भली प्रकार से न बुझाई गई अग्नि भी संसार को भस्म कर सकती है।
गरुण पुराण के नीतिसार के अनुसार –
⁜ जहां जीवन है, वहां मृत्यु भी निश्चित है। जो प्राणी जन्म ग्रहण करता है, उसे समय आने पर मरना भी पड़ता है और जो मरता है, उसे जन्म लेना पड़ता है। पुनर्जन्म का यह सिद्धान्त सनातन धर्म की अपनी विशेषता है।
⁜ मृत्यु के बाद अपने कर्मों के अनुसार जीवात्मा सूक्ष्म शरीर धारण करके स्वर्ग या नरक भोगता है। माता-पिता एवं बन्धु-बान्धव, औषध, तप और दान आदि कोई भी मृत्यु से रक्षा करने में समर्थ नहीं है।
⁜ मृत्यु के बाद केवल मनुष्यों को यमदूतों द्वारा पकड़कर यमराज के पास ले जाया जाता है। क्योंकि अन्य प्राणियों को तत्काल दूसरी योनि में जन्म मिल जाता है।
⁜ जो व्यक्ति दया और धर्म से रहित हैं, अहंकारी हैं, धन और मान के मद से चूर हैं, दुष्ट लोगों की संगति में रहते हैं तथा जिनका चित्त विषयों में आसक्त है, ऐसे व्यक्ति नरक में गिरते हैं।
⁜ ऐसे लोगों को काल रूपी सर्प आधि (मानसिक रोग) और व्याधि (शारीरिक रोग) से युक्त व्यक्ति के समीप बिना बताए ही आ जाता है। उसका आहार और उसकी सभी चेष्टाएं कम हो जाती हैं।
⁜ प्राण निकलते समय आंखे उलट जाती हैं, नाड़ियां कफ से रूक जाती हैं और सांस लेने में तकलीफ होती है। उसे सौ बिच्छुओं के एक साथ डंक मारने जैसी पीड़ा का अहसास होने लगता है।
⁜ अन्तिम क्षणों में प्राणी को दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है, जिससे वह लोक-परलोक को देखने लगता है। यमदूत उसे घोर नरक यातनाओं को दिखाते हुए दो या तीन मुहूर्त में यमलोक ले जाते हैं।
⁜ अनेक जन्मों तक भी कर्मफल का कभी नाश नहीं होता। जब तक मनुष्य अपने शुभ-अशुभ कर्मों का फल नहीं भोग लेता, तब तक उसे मनुष्य शरीर प्राप्त नहीं होता।
⁜ प्राणियों के साथ द्रोह करके भरण-पोषण किए गए अपने शरीर को यहीं छोड़कर व्यक्ति अंधकार की पराकाष्ठा ‘अन्धतामिस्त्र’ नामक नरक में जाता है।
⁜ झूठ बोलने वाला, बेईमानी करने वाला, दान नहीं देना या दान देकर पश्चाताप करने वाला और दूसरे की आजीविका का हरण करने वाला वैतरणी में पड़ता है।
⁜ मनुष्य जन्म प्राप्त होने पर भी जो व्यक्ति धर्म की रक्षा के लिए अपेक्षित कर्म नहीं करता, केवल इन्द्रियों के वशीभूत रहता है, वह वृद्धावस्था में व्याधियों से ग्रसित होकर मृत्यु को प्राप्त होता है।
⁜ ब्रह्मविवाह की विधि से ब्याही गई पत्नी से उत्पन्न धार्मिक तथा पुत्रवान मनुष्यों की दुर्गति कभी नहीं होती। एक धर्मात्मा पुत्र सम्पूर्ण कुल को तार देता है।
⁜ विद्वान व परोपकारी पुत्र का मुख देखकर मनुष्य पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है। पौत्र का स्पर्श करके देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण तीनों ऋणों से मुक्त हो जाता है।
⁜ तिल, लोहा, सोना, कपास, नमक, सप्तधान्य, भूमि और गौ – यह अष्ट महादान पापों का नाश करता है। इनमें से एक का दान भी पवित्र करने वाला है। धान, जौ, गेहूं, ज्वार, बाजरा, मक्का और चना यह सप्त धान्य हैं।
⁜ दान के लिए जब कभी श्रद्धा उत्पन्न हो जाए और सुपात्र मिल जाए, वही समय उपयुक्त है। दान देने वाले को पुण्य मिलता है और दान लेने वाले को दोष नहीं लगता।
⁜ दान श्रद्धा से किया जाता है, अतुल धनराशि से नहीं। पूर्व जन्मों में किए हुए दान के फलस्वरूप यहां धन प्राप्त हुआ है, ऐसा मानकर दान देना चाहिए।
⁜ पुत्र द्वारा माता-पिता के निमित्त जो दान सुपात्र को दिया जाता है, उससे पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र के साथ वह व्यक्ति स्वयं भी पवित्र हो जाता है।
⁜ सुपात्र को श्रद्धापूर्वक दान देने वाला कभी असाध्य रोगों से ग्रस्त नहीं होता। उसे नरक यातना नहीं प्राप्त होती और मृत्युकाल में उसे यमदूतों से कोई भय नहीं होता।
⁜ घर में किसी की मृत्यु के समय गरुड़ पुराण का पाठ करना चाहिए। गरुड़ पुराण का पाठ कभी भी कर सकते हैं किन्तु इसका पाठ अमावस्या को करना ज्यादा उत्तम है।
⁜ गरुड़ पुराण का पाठ अगर भाव समझकर किया जाय तो यह बिलकुल भी भय पैदा नहीं करता। गरुड़ पुराण के भाव को समझने के लिए इसके साथ गीता भी जरूर पढ़ें।