वैदिक वर्ण और आश्रम व्यवस्था
वैदिक काल में मानव समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी। मनुस्मृति में ब्रह्मा के मुख, बांह, जंघा और चरणों से उत्पन्न मानस पुत्रों के लिए अलग-अलग गुण-धर्म बताए गए हैं। इसके अन्तर्गत मानव समाज को कर्म व्यवस्था पर आधारित चार वर्णों में बांटा गया था। मनुस्मृति (4/88-91) के अनुसार वेद पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, करवाना, दान और दक्षिणा लेना यह छः कर्म ब्राह्मणों के बताए गए हैं। प्रजा की रक्षा करना, कर लेना, यज्ञ कराना, दान देना, धर्म ग्रन्थ पढ़ना और विषयों में न लगना यह छः कर्म क्षत्रियों के हैं। पशुपालन, दान देना, यज्ञ कराना, अध्ययन करना, ब्याज और खेती यह छः कर्म वैश्यों के बताए गए हैं। मनु ने शूद्र का एक ही कर्म कहा है कि वह इन चारों वर्णों की निष्कपट होकर सेवा करे। इस वर्ण व्यवस्था को और अधिक सरल बनाने के लिए प्रत्येक वर्ण में मनुष्य की औसत उम्र 100 वर्ष मानकर उनके जीवन को 4 आश्रमों में विभाजित किया गया। व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास, चार आश्रमों में किया गया।
भारतीय समाज में त्याग और भोग का अद्भुत समन्वय है, यह आश्रम व्यवस्था में देख सकते हैं। आश्रम जीवन की वह स्थिति है जिसमें कर्तव्य पालन के लिए पूर्ण परिश्रम किया जाता है। जीवन के चार आश्रम व्यक्तित्व विकास की चार सीढ़ियाँ हैं, जिन पर क्रम से चढ़ते हुए व्यक्ति मोक्ष की प्राप्ति करता है। मनुस्मृति में चारों आश्रमों के कर्तव्यों का विस्तृत वर्णन मिलता है। मनु ने ब्रह्मचारी के जीवन और उसके कर्तव्यों का वर्णन विस्तार के साथ किया है। ब्रह्मचर्य को उम्र के प्रथम 25 वर्ष शरीर, मन और बुद्धि के विकास के लिए निर्धारित किया गया है। दूसरा गृहस्थ आश्रम है जो 25 से 50 वर्ष की आयु के लिए निर्धारित है जिसमें शिक्षा के बाद विवाह करके पति-पत्नी धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हैं। इस दौरान व्यवसाय या कृषि आदि कार्य करते हुए अर्थ और काम का सुख भोगते हैं। 50 से 75 तक की आयु में गृहस्थ भार से मुक्त होकर जनसेवा, धर्मसेवा, विद्यादान और ध्यान का विधान है, इसे वानप्रस्थ कहा गया है। फिर धीरे-धीरे इससे भी मुक्त होकर व्यक्ति संन्यास आश्रम में प्रवेश कर संन्यासियों के ही साथ रहता है।
आश्रम व्यवस्था वास्तव में जीव का व्यवहारिक शिक्षणालय अथवा विद्यालय है। आश्रम का जहाँ शारीरिक और सामाजिक आधार है, वहाँ उसका आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक आधार भी है। जीवन को सार्थक बनाने के लिए चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-की कल्पना की गई है। मोक्ष परम पुरुषार्थ अर्थात् जीवन का अंतिम लक्ष्य है। गृहस्थ में धर्म पूर्वक अर्थ का उपार्जन तथा काम का सेवन होता है। संसार में अर्थ अर्जन तथा काम उपभोग के अनुभव के पश्चात् ही त्याग और संन्यास की भूमिका प्रस्तुत होती है।
गृहस्थाश्रम में अर्थ और काम संबंधी नियमों का पालन उतना ही आवश्यक है जितना ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास में धर्म और मोक्ष संबंधी नियमों का पालन करना आवश्यक है। महर्षि मनु ने चारों आश्रमों में गृहस्थ आश्रम को सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना है, जो सभी कर्मों और आश्रमों का उद्गम है। गीता का कर्मयोग भी कर्म का संन्यास नहीं अपितु कर्म में संन्यास को ही श्रेष्ठ समझता है। आश्रम व्यवस्था को सबसे बड़ी बाधा परम्परा-विरोधी बौ( एवं जैन मतों से हुई, जो आश्रम व्यवस्था को ही नहीं मानते। इससे जीवन का अनुभव प्राप्त किए बिना अपरिपक्व संन्यास से व्यभिचार को बढ़ावा मिलता है।
आश्रम व्यवस्था के चरणों का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी आयु के आधार पर जीवन के सभी चार चरणों में आश्रय लेता है। यह अवस्थाएँ उन कर्तव्यों का स्तरीकरण करती हैं जिन्हें मनुष्य को अपने जीवनकाल में अभ्यास करना होता है। यह चार विभाग प्राचीन मनु की लिपियों में स्पष्ट हैं। ऐसी कार्यप्रणाली के साथ तत्कालीन समाज ने सामाजिक संस्थाओं को एक साथ रखने का भी लक्ष्य रखा। कम उम्र से ही आदमी को नैतिकता, आत्म-संयम, बुद्धिमत्ता, व्यावहारिकता, प्रेम, करुणा और अनुशासन के मार्ग दिखाए गए। उन्हें लालच, क्रूरता, सुस्ती, घमंड और कई अन्य दोषों से दूर रहने के लिए निर्देशित किया गया। यह व्यवस्था बड़े पैमाने पर समाज के लिए भी फायदेमंद साबित हुई। जीवन के चार आश्रमों के अनुसार एक आदमी को 4 चरणों में अपने जीवन का नेतृत्व करने की व्यवस्था प्रचलित थी। प्राचीन काल में प्रचलित चारों आश्रमों का वर्णन इस प्रकार हैं –
1. ब्रह्मचर्य : ब्रह्मचर्य, उपनयन संस्कार के साथ प्रारंभ और समावर्तन संस्कार के साथ समाप्त होता है। इसके पश्चात् विवाह करके मुनष्य दूसरे आश्रम गृहस्थ में प्रवेश करता है। यह जीवन का पहला चरण है जो 25 वर्ष तक रहता है। इस अवस्था में मनुष्य विद्यार्थी जीवन जीता है और ब्रह्मचर्य का पालन करता है। इस आश्रम में व्यक्ति के सभी कर्तव्यों का निर्धारण इस प्रकार किया जाता है, जिससे उसका शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक विकास बिना किसी बाधा के हो सके। इस चरण का आदर्श वाक्य ‘मनुष्य को स्वयं को प्रशिक्षित करने के लिए प्रशिक्षित करना’ है। ब्रह्मचर्य आश्रम के पश्चात् व्यक्ति को यह विकल्प करने की स्वतंत्रता है कि वह गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करे अथवा सीधे संन्यास ग्रहण करे।
2. गृहस्थ : गृहस्थी मानव समाज का आधार स्तंभ है। इसमें समाज एवं संसार के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन किया जाता है। मनुस्मृत्ति के चतुर्थ एवं पंचम अध्याय में गृहस्थ के कर्तव्यों का विवेचन किया गया है। गृहस्थाश्रम धर्म, अर्थ एवं काम की त्रिवेणी है। यह आश्रम सच्ची कर्मभूमि है जिसमें ब्रह्मचर्य आश्रम की शिक्षाओं को मूर्तरुप दिया जाता है। यह चरण 25वें वर्ष से शुरू होता है और 50 साल तक रहता है। गृहस्थ व्यक्ति को अपने पारिवारिक और सामाजिक दोनों कर्तव्यों कों संतुलित रखना होता है। उसे एक बेटे, भाई, पति, पिता और सामुदायिक कर्तव्यों का निर्वहन करना होता है। वह अपने घर का प्रबंधन करता है और बाहर की दुनिया को भी देखता है।
3. वानप्रस्थ : जब मनुष्य के सिर के बाल सफेद हो रहे हैं और उसके शरीर पर झुर्रियाँ पड़ रही हैं, तब वह जीवन के तीसरे आश्रम वानप्रस्थ में प्रवेश करता है। यह अवस्था 50वें वर्ष से शुरू होकर 75 वर्ष की आयु तक रहती है। उसके बच्चे बड़े हो जाते हैं और वह धीरे-धीरे भौतिक संबंधों से दूर हो जाता है। यह सेवानिवृत्ति के लिए उसकी उम्र है और एक ऐसे रास्ते पर चलना शुरू करता है जो उसे दिव्य की ओर ले जाएगा।
4. संन्यास : मनुष्य के जीवन का अंतिम चरण तब आता है जब वह अपने सांसारिक संबंधों को पूरी तरह से समाप्त कर देता है। यह चरण 75वें वर्ष से शुरू होता है और मृत्यु तक रहता है। इस समय वह पारिवारिक सम्बन्धों और व्यक्तिगत भावनात्मक जुड़ावों से पूरी तरह मुक्त हो जाता है। वह एक तपस्वी बन जाता है। प्रथम तीन आश्रमों ओर उनके कत्र्तव्यों के पालन के पश्चात् ही संन्यास की व्यवस्था की गई है।
आश्रम व्यवस्था हिंदू समाज की वास्तविक जीवन व्यवस्था है। व्यक्ति का कर्तव्य आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करना होता है। यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि आयु में परिवर्तन के साथ ही व्यक्ति की योग्यता, कार्यक्षमता, दृष्टिकोण, रूचियों एवं मनोवृत्तियों में भी परिवर्तन होता रहता है। व्यक्ति के इन विभिन्न गुणों के अनुसार ही उसे कुछ प्रमुख दायित्व सौंपे जाते हैं और उसके जीवन को धर्मानुकूल बनाकर सुव्यवस्थित किया जाता है। समाज में दोनों तरह के लोगों की आवश्यकता होती है- एक ‘संन्यासी’ जो धर्म को आगे बढ़ाने के लिए सब कुछ छोड़ देता है और दूसरा ‘गृहस्थी’ जो सामाजिक संस्था के भीतर रहता है तथा कर्म और धर्म के बीच संतुलन बनाता है। वर्तमान में आश्रम व्यवस्था खत्म हो चुकी है। आश्रमों के खत्म होने से संघ भी नहीं रहे। संघ के खत्म होने से राज्य भी मनमाने हो चले हैं। वर्तमान में जो आध्यात्मिक केन्द्र हैं, वह सभी भ्रष्ट हो चुके हैं।