सृष्टि की रचना कैसे हुई ?

हम सभी जानते हैं कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की है जिसका सभी धर्म ग्रन्थों एवं पुराणों में अलग-अलग प्रकार से वर्णन किया गया है। सृष्टि की रचना को समझने से पहले हमें यह समझना होगा कि ब्रह्म और ब्रह्मा दो अलग-अलग शक्तियां हैं। ब्रह्म यानि ॐ सृष्टि की उत्पत्ति का कारक है और ब्रह्मा (त्रिदेवों ‘ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव) में से एक) जीवों की उत्पत्ति का कारक है। धर्म का एक अंग यह भी माना गया है कि वह आत्मा, परमात्मा और सृष्टि की उत्पति के सम्बन्ध में लोगों की जिज्ञासा को पूरा करे। क्योंकि मनुष्य को उसके प्रश्नों के उत्तर मिले बिना धर्म के प्रति आस्था दृढ़ नहीं हो सकती और न ही वह आस्तिक बन सकता है। सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों की उत्पत्ति माता-पिता से न होकर इच्छामात्र से सृष्टि रचयिता ब्रह्मा जी करते हैं। जब सृष्टि की रचना हुई तो अन्य प्राणियों को उत्पन्न करने के बाद मनुष्यों को उत्पन्न किया गया।

स्वर्ग में इन्द्र आदि देवताओं द्वारा सनकादिक महर्षियों का स्वागत

ब्रह्मपुत्रों की रचना

ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना हेतू सर्वप्रथम अपनी इच्छा शक्ति से चार मानव बालकों सनत, सनंदन, सनातन और सनत कुमार को उत्पन्न किया तथा सृष्टि रचना का भार उठाने के लिए कहा। परन्तु बालक रुप में उत्पन्न होने के कारण उनमें कोई भी सक्षम नहीं था। क्योंकि उनकी जीवात्मा में प्रेरणा का अभाव था। ब्रह्मा जी द्वारा उत्पन्न मानव बालकों के सक्षम न होने पर वह भगवान विष्णु की शरण में गए।

भगवान विष्णु ने उन्हें ‘चर्तुश्लोकी भागवत’ का ज्ञान दिया। इस ज्ञान को आधार बनाकर ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना के लिए वेदों की रचना की। इसके बाद ब्रह्मा जी ने स्वयं अपने शरीर के विभिन्न अंगों से मानस पुत्रों को उत्पन्न किया। ब्रह्मा जी ने उन्हें वेद ज्ञान दिया और आदेश दिया कि सृष्टि रचना में अपनी भूमिका निभाओ। इस प्रकार धरती पर मानसी सृष्टि का आरम्भ हुआ।

जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने का संकल्प लिया तब उनके

(1) मन से मरीचि (2) नेत्रों से अत्रि (3) मुख से अंगिरा (4) कान से पुलस्त्य (5) नाभि से पुलह (6) हाथ से क्रेतु
(7) प्राण से वशिष्ठ (8) त्वचा से भृगु (रूचि) (9) छाया से कर्दम तथा (10) अंगूठे से दक्ष उत्पन्न हुए।

इसके अतिरिक्त ब्रह्मा जी के

(1) दाहिने स्तन से धर्म (2) पीठ से अधर्म (3) हृदय से काम (4) दोनों भौहों से क्रोध
(5) नीचे के ओठ से लोभ (6) लिंग से समुद्र (7) कण्ठ से सरस्वती तथा (8) गोद से नारद आदि उत्पन्न हुए।

यह सभी ब्रह्मा जी के मानस पुत्र कहे जाते हैं। अन्य देवी-देवताओं की उत्पत्ति का सम्बन्ध इन्हीं से माना जा सकता है। इस सबके बावजूद भी ब्रह्मा जी को लगा कि मेरी बनाई सृष्टि में कोई वृद्धि नहीं हो रही है, तब वह भगवान विष्णु के परामर्श पर भगवान शिव के पास गए और उन्हें अपनी समस्या बताई। भगवान शिव ने उन्हें अपना अर्धनारिश्वर स्वरूप दिखाया।

मानवीय सृष्टि का आरम्भ

ब्रह्मा जी ने शिव के अर्धनारिश्वर स्वरूप से प्रेरणा पाकर अपने शरीर को दो भागों में विभक्त कर दिया। इनमें से एक भाग से पुरुष तत्त्व तथा दूसरे से स्त्री तत्त्व की उत्पत्ति हुई। पुरुष का नाम मनु और स्त्री का नाम शतरूपा हुआ। तब ब्रह्मा ने कहा कि हे मनु! तुम पुरुष हो, मैंने तुम्हें वह शक्ति दी है, जिससे तुम भारी से भारी काम करके अपने परिवार का पालन-पोषण कर सको तथा अपने परिवार की हरसंभव रक्षा कर सको।

हे शतरुपा! तुम्हारा स्त्री का रूप है। मैंने तुमको प्रेम, करूणा, दया, साहस तथा किसी भी परिस्थिति में धैर्य रखने का सामर्थ्य दिया है। तुम दोनों एक-दूसरे के पूरक हो। तुम दोनो में कोई भी एक श्रेष्ठ नहीं बल्कि दोनों ही श्रेष्ठ हो। इस प्रकार मनु और शतरूपा ने मानवीय सृष्टि की शुरुआत की।

महर्षि मनु का वंश परिचय

विश्व में सबसे पहले वैदिक धर्म ही था। महर्षि मनु ने कर्म व्यवस्था के आधार पर समाज को चार वर्णों (क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र) में बांटा। व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसका विभाजन ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास, चार आश्रमों में किया।

मनु द्वारा लिखा गया धर्म ग्रन्थ ‘मनु स्मृति’ विश्व का प्राचीनतम और सबसे अधिक मान्य ग्रन्थ है। इसमें नीति, धर्म और अर्थ व्यवस्था के मानक तय किए गए हैं, जिनसे आधुनिक सामाजिक व्यवस्था का निर्माण हुआ है। इस प्रकार वेद और मनु सभी धर्मों का मूल है।

मनु एवं शतरूपा की कुल पांच सन्तानें थीं जिनमें से दो पुत्र उत्तानपाद एवं प्रियव्रत तथा तीन पुत्री आकूति, देवहूति और प्रसूति थीं। आकूति का विवाह प्रजापति रुचि (भृगु) के साथ और देवहूति का विवाह प्रजापति कर्दम के साथ हुआ। प्रसूति का विवाह प्रजापति दक्ष के साथ हुआ। यह सभी प्रजापति ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। स्वायंभुव मनु के प्रथम पुत्र उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नी थीं। राजा उत्तानपाद के सुनीति से ‘विष्णु भक्त ध्रुव’ तथा सुरुचि से ‘उत्तम’ नामक पुत्र उत्पन्न हुए।

स्वयंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्षमती से विवाह किया था जिनसे आग्निंध्र, यज्ञबाहु, मेधातिथि आदि दस पुत्र उत्पन्न हुए। प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम, तामस और रैवत- यह तीन पुत्र उत्पन्न हुए, जो अपने नाम वाले मनवंतरों के अधिपति हुए। प्रियव्रत के दस पुत्रों में से कवि, महावीर तथा सवन यह तीन नैमिष्ठक ब्रह्मचारी थे और उन्होंने संन्यास धर्म ग्रहण कर लिया था। शेष 7 पुत्र पृथ्वी पर स्थित 7 द्वीपों के अधिपति नियुक्त हुए।

प्रारम्भ में धरती पर सात द्वीप थे – जम्बू, प्लाक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। इसमें से जम्बूद्वीप सभी के बीचों बीच स्थित है। मनु पुत्र राजा प्रियव्रत सम्पूर्ण धरती के और प्रियव्रत के पुत्र राजा अग्निन्ध्र सिर्फ जम्बूद्वीप के राजा थे। जम्बूद्वीप के नौ खंड थे – इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भरतखंड, हरिवर्ष, केतुमाल, रम्यक, कुरुवर्ष और हिरणयमय।

यह राजा अग्निन्ध्र के पुत्रों के नाम पर बने थे। इसमें से भरतखंड को भारतवर्ष कहा जाता था। दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर इसका नाम भारतवर्ष हुआ। भारतवर्ष के भी नौ खंड थे- इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रपर्ण, गर्भस्तिमान, नाभी द्वीप, सौम्य, गन्धर्व और वारुण। यह समुद्र से घिरा हुआ नौंवा द्वीप ‘नाभि’ इनमें से एक है। वैदिक काल में इसका नाम आर्यावर्त था।

ब्रह्मपुत्रों का संक्षिप्त विवरण :

1. मरीचि : ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक मरीचि की उत्पत्ति ब्रह्माजी के मन से हुई थी। इन्हें द्वितीय ब्रह्मा भी कहा गया है। इन्होंने ही भृगु को दण्डनीति की शिक्षा दी है। मरीचि ऋषि ने कला नाम की स्त्री से विवाह किया और उनसे उन्हें कश्यप नामक एक पुत्र मिला। कश्यप की माता ‘कला’ कर्दम ऋषि की पुत्री और ऋषि कपिल देव की बहन थी।

ब्रह्मा के पोते और मरीचि के पुत्र कश्यप ने ब्रह्मा के दूसरे पुत्र दक्ष की 13 पुत्रियों से विवाह किया। महर्षि कश्यप को विवाहित 13 कन्याओं से ही जगत के समस्त जीव-जन्तु उत्पन्न हुए। मुख्यतः इन्हीं कन्याओं से सृष्टि का विकास हुआ और कश्यप सृष्टिकर्ता कहलाए। अतः इनको जगतजननी या लोकमाताएं भी कहा जाता है।

दक्ष की पुत्री अदिति से आदित्य (देवता), दिति से दैत्य, दनु से दानव, सुरसा से राक्षस, अरिष्ठा से गंधर्व, काष्ठा से अश्व, गर्दभ आदि, इला से वृक्ष, लताएं आदि, मुनि से अप्सरागण, क्रोधवशा से सर्प, बिच्छु आदि विषैले जीव, ताम्रा से श्येन, गृध्र आदि हिंसक पक्षी, सुरभि से गौ और महिष आदि, सरमा से श्वपाद (हिंसक पशु) और तिमि से यादोगण (जलीय जंतु) आदि जीव उत्पन्न हुए।

बहुत से विद्वान मानते हैं कि कश्यप ने दक्ष की 17 कन्याओं से विवाह किया था लेकिन ऐसा नहीं है। वो तार्क्ष्य कश्यप थे जिन्होंने विनीता कद्रू, पतंगी और यामिनी से विवाह किया था। इस तरह यह 17 कन्याएं होती है, लेकिन कुछ विद्वान सभी को कश्यप की पत्नी मान कर लिखते हैं। कश्यप ऋषि ने दक्ष की सिर्फ 13 कन्याओं से ही विवाह किया था।

2. अत्रि : ब्रह्मा के नेत्रों से उत्पन्न मानस पुत्र महर्षि अत्रि ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा थे। इनका विवाह कर्दम की पुत्री अनुसूईया से हुआ था। इन दोनों के दत्तात्रेय, दुर्वासा और सोम नाम के तीन पुत्र हुए थे। एक बार जब अत्रि ऋषि बाहर गए हुए थे, तब त्रिदेव अनुसूईया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूईया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी, तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे। तब अनुसूईया ने अपने सतित्त्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी।

माता अनुसूईया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। सम्पूर्ण ऋग्वेद दस मण्डलों में विभक्त है। प्रत्येक मण्डल के मन्त्रों के ऋषि अलग-अलग हैं। उनमें से ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि हैं। इसीलिये यह मण्डल ‘आत्रेय मण्डल’ कहलाता है।

3. अंगिरा : महर्षि अंगिरा ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं। स्मृति (दक्ष), श्रद्धा (कर्दम) और सुरूचि (मरिची) इनकी तीन पत्नियां थीं। इनकी तपस्या से उत्पन्न तेज के प्रभाव से स्वयं अग्निदेव ने इन्हें प्रथम अग्नि का सम्मान दिया। अग्निदेव से प्रसन्न होकर इन्होंने सम्मानपूर्वक उन्हें देवताओं को हवि पहुँचाने का कार्य सौंपा। अग्निदेव अपनी पत्नी स्वाहा के माध्यम से देवताओं को उनका भाग पहुंचाते हैं, इसलिए हवन में प्रत्येक आहूति के बाद स्वाहा बोला जाता है।

माना जाता है कि अंगिरा से ही शिव, भृगु, अत्रि आदि ने वेद ज्ञान प्राप्त किया। इन्होंने वेदों की ऋचाओं के साथ ही अपने नाम से ‘अंगिरा स्मृति’ की रचना की। अंगिरा स्मृति के अनुसार बिना कुशा के धर्मानुष्ठान, बिना जल स्पर्श के दान, संकल्प, बिना माला के जाप, निष्फल होते हैं।

4. पुलस्त्य : विष्णु पुराण के अनुसार इन्हें प्रथम मन्वन्तर के सप्तर्षियों में से एक माना जाता हैं। पुलस्त्य ऋषि का विवाह कर्दम ऋषि की नौ कन्याओं में से एक हविर्भूवा से हुआ था। इन्होंने अपने एक यज्ञ में केवल स्वर्ण पात्रों का ही उपयोग किया था एवं ब्राम्हणों को इतना दान दिया कि वह उसे ले जा भी न पाये और काफी कुछ वहीं छोड़ गये। जो कालान्तर में युधिष्ठिर को मिला, उन्होंने भी उस बचे हुए स्वर्ण से अपना राजसूय यज्ञ किया।

विशेष: एक बार पुलस्त्य मेरु पर्वत पर तपस्या कर रहे थे। इन्होंने उस समय उन्हें परेशान करने वाली अप्सराओं को शाप दे दिया कि जो स्त्री इनके सामने आएगी, वह गर्भवती हो जाएगी। वैशाली के राजा की कन्या इडविडा असावधानी से इनके सामने आकर गर्भवती हो गई। बाद में उसका पुलस्त्य से विवाह हुआ और उसने ‘विश्रवा’ नामक पुत्र को जन्म दिया। रावण इन्हीं विश्रवा का पुत्र और पुलस्त्य का पौत्र था। कहते हैं पुलस्त्य ऋषि के शाप के कारण गोवर्धन पर्वत एक मुट्ठी रोज कम होता जा रहा है।

5. पुलह : सोलह प्रजापतियों में पुलह ऋषि का भी नाम आता है। गौतम ऋषि ने भी पुलह ऋषि से ज्ञान प्राप्त किया। यह महर्षि शिवजी के बड़े भक्त थे। इन्होंने काशी में पुल्हेश्वर नामक लिंग की स्थापना की। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शिव ने अपना श्रीविग्रह प्रकट किया था। पुलह ऋषि का वर्णन पुराणों तथा अन्य ग्रंथों में मिलता है। लगातार जप, तप करने में लीन रहने वाले पुलह ऋषि ने जगत को आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक शांति प्रदान करने का कार्य किया।

6. क्रेतु : क्रेतु का जन्म ब्रह्माजी के हाथ से हुआ था। इनकी गणना सप्तर्षियों में भी की जाती है। ब्रह्मा की आज्ञा से उन्होंने दक्ष प्रजापति की पुत्री क्रिया और सन्नति से विवाह किया था। कहते हैं कि क्रेतु और सन्नति से ‘बालखिल्य’ नामक 60 हजार पुत्र हुए। इन बालखिल्यों का आकार अंगूठे के बराबर माना जाता है। वराहकल्प में क्रेतु ऋषि ही महाभारत काल में ऋषि वेदव्यास हुए। पुराणों के अनुसार बालखिल्य मुनियों के वरदान से ही महर्षि कश्यप के यहां गरूड़ का जन्म हुआ।

7. वशिष्ठ : महर्षि वशिष्ठ वैदिक काल के विख्यात ऋषि थे। ऋषि वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक हैं। उनकी पत्नी का नाम अरुन्धती है। महर्षि वशिष्ठ सातवें और अंतिम ऋषि थे जिन्हें ईश्वर द्वारा सत्य का ज्ञान एक साथ हुआ था और जिन्होंने वेदों का दर्शन किया (वेदों की रचना की ऐसा कहना अनुचित होगा क्योंकि वेद तो अनादि है)। वशिष्ठ राजा दशरथ के कुल गुरु और श्री राम के गुरु भी थे। वशिष्ठ ने वशिष्ठ संहिता ग्रन्थ की रचना भी की। वशिष्ठ संहिता में ज्योतिष विद्या और वैदिक प्रणाली का वर्णन किया गया है।

वशिष्ठ के नाम से ही कुल परंपरा का प्रारंभ हुआ। आगे चलकर उनके कुल के अन्य वेदज्ञ लोगों ने भी अपना नाम वशिष्ठ रखकर इस कुल की प्रतिष्ठा को बरकरार रखा। वशिष्ठ ऋषि का कामधेनु गाय और सूर्यवंश की पुरोहिताई के कारण विश्वामित्र से झगड़ा हुआ था। ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने विश्वामित्र से युद्ध किया था, जिसमें वशिष्ठ के सभी पुत्र मारे गए थे। वशिष्ठ ऋषि के एक पुत्र का नाम शक्ति और पौत्र का नाम पराशर था। महाभारत लिखने वाले महर्षि वेदव्यास पराशर के पुत्र थे।

8. भृगु ‘रुचि’ : महर्षि भृगु की कई पत्नियों का उल्लेख आर्ष ग्रन्थों में मिलता है। महर्षि भृगु की पहली पत्नी ख्याति योग शक्ति सम्पन्न तेजस्वी महिला थी। दैत्यगुरू शुक्राचार्य इनकी दूसरी पत्नी दिव्या के पुत्र थे। इसलिए दैत्यों के साथ हुए देवासुर संग्राम में मारे गए दैत्य सैनिकों को वह अपने योगबल से जीवित कर देती थी। जिससे नाराज होकर श्रीहरि विष्णु ने इनकी पत्नी का सिर अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया। विष्णु ने उनकी पत्नी को मारा था, जिससे क्रोधित होकर महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को लात मारी, किन्तु भगवान विष्णु ने उन्हें क्षमा कर दिया। इस घटना से एक लोकोक्ति बनी –

क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।
का हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात।।

अपनी पत्नी की हत्या करने के कारण महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को शाप दिया कि तुम्हें बार-बार पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ेगा। महर्षि अपनी पत्नी को योगबल से जीवित कर गंगा तट पर आ जाते हैं एवं तमसा नदी की रचना करते हैं। इनकी ज्योतिष शास्त्र में रूचि होने के कारण इन्हें रुचि भी कहा जाता है। महर्षि ने भृगु संहिता ग्रंथ की रचना की। इस संहिता द्वारा किसी भी जातक के तीन जन्मों का फल निकाला जा सकता है। ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करने वाले ग्रह-नक्षत्रों पर आधारित इस ग्रन्थ के माध्यम से आज भी जीवन और कृषि के लिए भविष्यवाणियां की जाती हैं। महर्षि के कालखण्ड में कागज और छपाई की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। कालान्तर में जब लिखने की विधा विकसित हुई, तब कुछ विद्वानों ने इन ऋचाओं को लिपिबद्ध करने का काम किया।

9. कर्दम : कर्दम ऋषि की उत्पत्ति ब्रह्मा जी की छाया से हुई थी। कर्दम ऋषि ने स्वयंभुव मनु की द्वितीय कन्या देवहूति से विवाह कर नौ कन्याओं तथा एक पुत्र की उत्पत्ति की। कन्याओं के नाम कला, अनुसुईया, श्रद्धा, हविर्भूवा, गति, क्रिया, अरुन्धती, शान्ति और अशान्ति थे तथा एकमात्र पुत्र का नाम कपिल था। कपिल को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, जो उनके 24 अवतारों के क्रम में शामिल हैं। कर्दम ऋषि ने विवाह पूर्व सतयुग में सरस्वती नदी के किनारे भगवान विष्णु की घोर तपस्या की थी। उसी के फलस्वरूप भगवान विष्णु कपिलमुनि के रूप में कर्दम ऋषि के यहां जन्में।

कर्दम ऋषि विवाह नहीं करना चाहते थे। परन्तु भगवान विष्णु के परामर्श पर स्वायंभुव मनु एक दिन देवहुति को लेकर कर्दम ऋषि के आश्रम गए। देवहूति की बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर उन्होंने विवाह की स्वीकृति दी। परंतु कर्दम ऋषि ने शर्त रखी थी कि पुत्र होने के बाद में ब्रह्मचर्य धारण करके संन्यास ले लूंगा। यह सुनकर भी देवहूति ने विवाह के लिए हां भर दी थी।

कर्दम ऋषि की नौ कन्याओं का जन्म और एक पुत्र का जन्म भी बड़ी विचित्र परिस्थिति में हुआ था। कहते हैं कि कर्दम ऋषि भूल ही गए थे कि उन्होंने विवाह किया है। देवहूति की सेवा से प्रसन्न होकर जब वह उसे वरदान मांगने की बात कहते हैं, तब देवहूति के स्मरण कराने पर कर्दम ऋषि ने योगबल से एक विमान का निर्माण किया। दोनों उसमें सवार होकर पृथ्वी का भ्रमण करते रहे। विमान में ही नौ कन्याओं का जन्म हुआ। तब कर्दम ऋषि ने कहा कि अब मैं संन्यास ले लूं। देवहूति ने कहा कि स्वामी! आपको संन्यास लेने से कौन रोक सकता है परंतु अभी भी आपका वचन पूरा नहीं हुआ है, आपने पुत्र प्राप्ति के बाद संन्यास लेने का कहा था और अब इन कन्याओं का विवाह भी तो करना है। इस तरह कर्दम ऋषि पुनः संसार में उलझ गए।

10. प्रजापति दक्ष : भगवान ब्रह्मा के पैर के अंगुठे से प्रजापति दक्ष की उत्पत्ति हुई। प्रजापति दक्ष का पहला विवाह स्वायंभुव मनु की तृतीय पुत्री प्रसूति से हुआ। फिर उन्होंने उन्होंने प्रजापति वीरण की कन्या आक्सिनी को पत्नी बनाया। आक्सिनी को वीरणी भी कहा जाता है। प्रसूति से दक्ष की 24 कन्याएं थीं। दक्ष की दूसरी पत्नी विरणी से दक्ष की 60 कन्याएं थीं। इस प्रकार दक्ष की 84 पुत्रियां थीं। समस्त देव, दानव, दैत्य, गंधर्व, अप्सराएं, पशु, पक्षी, मानव आदि समस्त प्राणी इन्हीं कन्याओं से उत्पन्न हुए। दक्ष की यह सभी कन्याएं, देवी, यक्षिणी, पिशाचिनी आदि कहलाईं। उक्त कन्याओं और इनकी संतानों को ही किसी न किसी रूप में पूजा जाता है। सभी की अलग-अलग कहानियां हैं।

दक्ष के पुत्रों की दास्तान : सर्वप्रथम उन्होंने दस सहस्र हर्यश्व नामक पुत्र उत्पन्न किए थे। यह सब समान स्वभाव के थे। पिता की आज्ञा से यह सृष्टि के निमित्त तप में प्रवृत्त हुए, परंतु देवर्षि नारद ने उन्हें तप से भटकाकर विरक्त बना दिया। संसार से विरक्ति होने के कारण सभी ब्रह्मचारी रहे और उन्होंने विवाह नहीं किया। इसके बाद दक्ष ने एक सहस्र शबलाश्व (सरलाश्व) नामक पुत्र उत्पन्न किए। यह भी देवर्षि के उपदेश से यति हो गए। इस पर दक्ष ने नारद को शाप दे दिया कि तुम दो घड़ी से अधिक कहीं स्थिर न रह सकोगे।

11. धर्म : धर्म का विवाह, प्रजापति दक्ष की 24 पुत्रियों से हुआ, जिनमें दक्ष-प्रसूति की 14 तथा दक्ष-वीरणी की 10 पुत्री शामिल हैं। धर्म की पत्नी वसु के आठवें पुत्र वास्तु से भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था।

12. अधर्म : अधर्म की पत्नी हिंसा के पुत्र असत्य और पुत्री अनीति ने आपस में विवाह किया। इससे इनके 2 पुत्र भय और नरक तथा 2 पुत्री माया और वेदना हुए। इन्होंने भी आपस में विवाह किया। भय और माया के मृत्यु व दुख तथा नरक और वेदना के व्याधि, जरा, शोक व रोग आदि चार पुत्र हुए। यह सभी अविवाहित रहे।

13. काम देव : रति (दक्ष) – विवरण उपलब्ध नही

14. क्रोध : अशान्ति (कर्दम) – विवरण उपलब्ध नही

15. लोभ : शान्ति (कर्दम) – विवरण उपलब्ध नही

16. समुद्र : वर्षिणी (वरुण देव) समुद्र मंथन से लक्ष्मी, 14 रत्न, शिवअंश जलंधर

17. सरस्वती : हिन्दू धर्म की प्रमुख त्रिदेवियों में से एक माता सरस्वती को ज्ञान की देवी माना गया है। हिन्दू धर्म ग्रंथों में सरस्वती को ब्रह्मा की प्रथम पत्नी के रूप में स्थापित किया गया है। इनकी प्रतिमा ब्रह्मा के साथ पत्नी रूप में कहीं नहीं मिलती। पृथक रूप में देवी सरस्वती की चार भुजाएं हैं, जिनमें वह पुस्तक, अक्षमाला, वीणा या कमंडल धारण करती हैं। हंस पर विराजमान माँ सरस्वती ने धवल वस्त्र धारण किए हैं। उनका एक हाथ प्रायः वरदमुद्रा में रहता है। सरस्वती का पूजन विद्या की अधिष्ठात्री देवी के रूप में होता है। इनकी उपासना करने से मूर्ख भी विद्वान् बन सकता है।

18. नारद : हिन्दु धर्म ग्रन्थों के अनुसार नारद मुनि ब्रह्मा के पुत्र हैं। इन्होंने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया। देवर्षि नारद धर्म-प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर दिया और समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है। अट्ठारह महापुराणों में एक नारदोक्त पुराण ‘बृहन्नारदीय पुराण’ के नाम से प्रख्यात है। मान्यता है भगवान विष्णु ने 24 अवतारों में देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वततंत्र ‘नारद-पांचरात्र’ का उपदेश दिया, जिसमें सत्कर्मों के द्वारा भव-बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाया गया है। नारद जी ने जिन अनेक धर्म-आख्यायिकाओं को कहा है, 25,000 श्लोकों का वह महाग्रन्थ ही नारद महापुराण है।