किसी भी जातक के जीवन में विवाह बहुत महत्त्वपूर्ण कड़ी है। विवाह प्रथा का प्रचलन हजारों वर्ष पहले तब अस्तित्त्व में आया, जब मानव को सभ्य बनाने की प्रक्रिया के तहत धार्मिक नियमों को समाज में प्रचलित किया जा रहा था। विवाह करके एक पत्नी व्रत धारण करना ही सभ्यता की निशानी है। हिंदू समाज में एक विवाहित और पुत्रवती महिला को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

विवाह शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से दो अर्थों में होता है। इसका पहला अर्थ वह क्रिया, संस्कार, विधि या पद्धति है जिससे पति-पत्नी के स्थायी सम्बन्ध का निर्माण होता है। विवाह का दूसरा अर्थ समाज में प्रचलित एवं स्वीकृत विधियों द्वारा स्थापित किया जाने वाला पारिवारिक संबंध और सामाजिक जीवन भी होता है। इसमें समाज पति-पत्नी को कामसुख के उपभोग का अधिकार देता है और पति को पत्नी तथा संतान के पालन एवं भरण-पोषण के लिए बाध्य करता है। महर्षि मनु ने मनुस्मृति में आठ प्रकार के विवाहों का वर्णन किया है। विवाह के यह प्रकार हैं- ब्रह्म विवाह, दैव विवाह, आर्ष विवाह, प्रजापत्य विवाह, असुर विवाह, गन्धर्व विवाह, राक्षस विवाह और पिशाच विवाह। नारद पुराण के अनुसार ब्रह्म विवाह सबसे श्रेष्ठ प्रकार का माना जाता है। समाज में भी ब्रह्म विवाह को अधिक मान्यता प्राप्त है। पूर्व में जिसे गंधर्व विवाह कहा जाता था, आज उसे लव मैरिज की संज्ञा दी जाती है। ऋषि-मुनियों ने गंधर्व विवाह को श्रेष्ठ नहीं माना है। इसलिए गंधर्व विवाह पर सवाल उठते रहते हैं।

ब्रह्म विवाह के लिए घर के बुजुर्गों तथा गुरुओं की सलाह तथा सहमती अवश्य लेनी चाहिए। ब्रह्म विवाह, दैव विवाह, आर्य विवाह और प्राजापत्य विवाह में मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। शुभ मुहूर्त के बिना विवाह नहीं किया जाता है। विवाह के समय अग्नि को साक्षी मानकर मंत्रों के उच्चारण के साथ विवाह सम्पन्न होता है। विवाह में परिवार के लोगों और नाते-रिश्तेदारों का होना जरूरी माना गया है। किसी लड़की को धोखे में रखकर विवाह करना पिशाच विवाह की श्रेणी में आता है। मनुष्य के ऊपर देवऋण, ऋषि ऋण एवं पितृ ऋण- यह तीन ऋण होते हैं। यज्ञादि से देव ऋण, स्वाध्याय से ऋषि ऋण तथा उचित रीति से ब्रह्म विवाह करके, पितरों के श्राद्ध-तर्पण के योग्य धार्मिक एवं सदाचारी पुत्र उत्पन्न करके, पितृ ऋण का परिशोधन होता है। धर्म पालन की परम्परा सुरक्षित रखने के लिए संतान उत्पन्न करना विवाह का परम उद्देश्य है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म में विवाह को एक पवित्र संस्कार के रूप में मान्यता दी गयी है।

विवाह के लाभों में वंशवृद्धि, मैत्रीलाभ, साहचर्य सुख, मानसिक रुप से परिपक्वता, दीर्घायु, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की प्राप्ति प्रमुख है। इसके अलावा समस्याओं से जूझने की शक्ति और प्रगाढ़ प्रेम संबध से परिवार में सुख-शांति मिलती है। इस प्रकार विवाह समाज के सुव्यवस्थित तंत्र का स्तम्भ है।

1. ब्रह्म विवाह : हिंदू धर्म में ब्रह्म विवाह को विवाह का सबसे उत्कृष्ट और आदर्श स्वरूप माना जाता है। यह वर-वधू दोनो पक्षों की सहमति से होता है। ब्रह्म विवाह संस्कार के अनुसार युवती का पिता कन्यादान करके अपने कर्तव्यों की पूर्ति करता है। दोनों पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोग्य वर से कन्या का विवाह निश्चित करना ब्रह्म विवाह कहलाता है। इस विवाह के बाद सामान्यतः कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। वर्तमान समय में प्रचलित विवाह रीति जिसे “Arranged Marriage” कहा जाता है, यह ब्रह्म विवाह का ही नवीनतम रूप माना जाता है। सामान्यतः इस विवाह में वैदिक रीति और नियम का पालन किया जाता है। इस विवाह में कुडंली मिलान को उचित रीति से देख लिया जाता है। हिन्दू धर्म में ब्रह्म विवाह को एक पवित्र-संस्कार के रूप में मान्यता दी गयी है। यह एक सर्वमान्य और सम्मानित परंपरा रही है।

2. दैव विवाह : देव विवाह के अंतर्गत जब भी कोई राजा यज्ञ करवाता था तो वह अपनी इच्छा के अनुसार दान के रूप में अपनी पुत्री को यज्ञ करवाने वाले ऋषि को सौंप देते थे। ऋषि भी उनके आग्रह और इच्छा को नहीं टालते थे। किसी सेवा कार्य, विशेषतः धार्मिक अनुष्ठान के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना दैव विवाह कहलाता है। दैव विवाह और आर्ष विवाह को मध्यम श्रेणी में रखा गया है, लेकिन इसमें कन्या की सहमति होना जरूरी है, तभी यह विवाह मध्यम माना जाएगा अन्यथा यह निकृष्ट माना जाएगा। प्राचीनकाल में यह विवाह इसलिए प्रचलित थे क्योंकि उस समय धर्म की उन्नति और सृष्टि के विस्तार हेतु इस तरह के विवाह की आवश्यकता होती थी। वर्तमान समय में यह प्रथा पूर्णतः विलुप्त हो चुकी है।

3. आर्ष विवाह : कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष से एक गाय-बैल का जोड़ा एवं अन्य कुछ घरेलू सामान लेकर धर्मपूर्वक जो कन्यादान किया जाता है, उसे आर्ष विवाह कहते है। पुराणों के अनुसार जब भी किसी सन्यासी या ऋषि को गृहस्थी बसाने की इच्छा जागृत होती थी तो गुरु द्वारा अनुमति मिलने के बाद वह अपनी पसंद की कन्या के पिता को कन्या के मोल के रूप में गाय या बैल की एक जोड़ी देकर विवाह का प्रस्ताव रखते थे। कन्या के पिता को अगर यह प्रस्ताव मंजूर होता था तो वह इसे स्वीकार कर लेते थे, अन्यथा सम्मान के साथ गाय या बैलों को लौटा दिया जाता था। आजकल गाय, बैल के स्थान पर धनादि अन्य वस्तुएं लेकर अपनी कन्या को देना आधुनिक आर्ष विवाह कहा जा सकता है।

4. प्रजापत्य विवाह : इस प्रकार के विवाह में विवाह की इच्छा से प्रेरित युवक और युवती द्वारा स्वेच्छा से अपने परिजनों की सहमति से विवाह करना प्रजापत्य विवाह कहलाता है। प्राचीनकाल में किया जाने वाला स्वयंवर का आयोजन भी प्रजापत्य विवाह का ही रूप है। प्रजापत्य विवाह की एक मुख्य विशेषता यह थी कि ऐसे विवाहों में कन्या की मर्जी कोई मायने नहीं रखती थी। कन्या का पिता बिना उससे पूछे किसी अभिजात्य वर्ग के युवक के साथ विवाह निर्धारित कर देता था। कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना भी प्रजापत्य विवाह कहलाता है।

5. गंधर्व विवाह : परिवार वालों की सहमति के बिना युवक-युवतियों द्वारा स्वयं बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह करना गंधर्व विवाह कहलाता है। इस विवाह का वर्तमान स्वरूप है प्रेम विवाह। दुष्यंत और शकुन्तला ने भी गंधर्व विवाह किया था। उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। इस प्रकार के विवाह समाज के लिए सबसे ज्यादा घातक सिद्ध हो रहे हैं। इसे किसी भी रूप में आदर्श विवाह की संज्ञा नहीं दी जाती, लेकिन वह इस रिश्ते को कानूनी रूप प्रदान करते हैं। गंधर्व विवाह करने वालों का न तो परिवार होता है और न ही समाज। उनकी संतानों का भविष्य भी अंधकार में होता है।

6. असुर विवाह : कन्या को खरीदकर, आर्थिक रूप से विवाह कर लेना असुर विवाह कहलाता है। वर पक्ष द्वारा कन्या पक्ष को यथाशक्ति धन देकर किये जाने वाले विवाह को असुर विवाह कहते है। इसमें कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष से विवाह के लिए एकमुश्त निश्चित धन की मांग की जाती है। असुर विवाह के अन्तर्गत इच्छुक युवक उस कन्या का मोल देकर उससे विवाह कर लेता था।

7. राक्षस विवाह : कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना राक्षस विवाह कहलाता है। मुगलकाल में इस प्रकार के विवाह के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। यदि किसी राजा या उसके शागिर्द को कोई युवती पसंद आ जाती थी तो वह उससे विवाह का आग्रह करते थे। यदि परिजन न मानें तो उन्हें डराया और धमकाया जाता था। अंततः कन्या की इच्छा के बिना उसे प्रताड़ित करके, अपहरण करके विवाह कर लिया जाता था। इसे किसी भी रूप में आदर्श विवाह की संज्ञा नहीं दी जाती।

8. पैशाच विवाह : कन्या की मदहोशी, गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि का लाभ उठाकर उससे शारीरिक सम्बन्ध बना लेना और उससे विवाह करना पैशाच विवाह कहलाता है। इसे सबसे निकृष्ट श्रेणी का विवाह कहा जाता है, क्योंकि इसमें अज्ञात रूप से कन्या के साथ सम्बन्ध बनाया जाता है। आजकल होने वाले बलात्कार राक्षस विवाह और पैशाच विवाह का मिलाजुला रूप कहा जा सकता है।

विवाह के अन्य प्रकार :

1. स्वयंवर : स्वयंवर प्राचीनकाल की आर्य विवाह प(ति थी, जिसमें कन्याएं अपनी स्वेच्छा से अपने पति का चयन करती थी। स्वयंवर का उद्देश्य उपयुक्त उम्मीदवारों में से अपनी पसंद के वर के साथ कन्या का विवाह करना होता है। यह समारोह लड़की के पिता द्वारा आयोजित किया जाता था। सभी राज्यों के राजाओं को स्वयंवर के लिए आमंत्रित किया जाता था और उनके लिए प्रतियोगिताएं भी रखी जाती थी। साथ ही अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए जो राजा प्रतियोगिता में विजय होता था, उसे पति के रूप में स्वयंवर द्वारा चुना जाता था। वैदिक काल में यह प्रथा समाज के चारों वर्णों में प्रचलित थी। इस परंपरा के अन्तर्गत रामायण काल में सीता स्वयंवर और महाभारत काल में द्रोपदी स्वयंवर का वर्णन मिलता है। प्राचीनकाल और मध्यकाल में यह परंपरा राजा राजवाड़ों में भी हुआ करती थी, लेकिन कुछ समय बाद इसको बंद कर दिया गया और पिता द्वारा चुने गए वर से कन्या का विवाह तय किया जाना अनिवार्य हुआ।

2. बाल विवाह : बाल विवाह केवल भारत में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में होते आए हैं। इसमें लड़कियों का विवाह 18 वर्ष की आयु से पूर्व कर दिया जाता हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में नगरीय क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक बाल विवाह होते है। बाल विवाह की घटनाएं बिहार में सबसे अधिक जबकि हिमाचल प्रदेश में सबसे कम होती है। भारत में यह प्रथा शुरू से नहीं थी। यह मुगल सल्तनत के समय में अस्तित्त्व में आया, जब राजशाही प्रथा प्रचलन में थी। भारतीय लड़कियों को विदेशी शासकों द्वारा बलात्कार और अपहरण से बचाने के लिये बाल विवाह को एक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता था। बाल विवाह को शुरु करने का एक और कारण था कि बड़े बुजुर्गों में अपने पौत्रों को देखने की चाह अधिक होती थी, इसलिये वो कम आयु में ही बच्चों की विवाह कर देते थे, जिससे कि मरने से पहले वो अपने पौत्रों के साथ कुछ समय बिता सकें। भारत सरकार द्वारा बाल विवाह को रोकने के लिए लड़के की उम्र 21 वर्ष और लडकियों की उम्र 18 वर्ष निर्धारित कर दी गयी। ‘बाल-विवाह’ ऐसा विवाह है जिसके बंधन में आने वाले दोनों पक्षकारों में से कोई एक या दोनों बालक है। ‘बालक’ से अभिप्राय ऐसा व्यक्ति जोकि यदि पुरुष है तो, इक्कीस वर्ष की आयु पूरी नहीं की है और यदि नारी है तो, अठारह वर्ष की आयु पूरी नहीं की हैं।

3. विधवा/विधुर विवाह : हिन्दू धर्मानुसार विवाह को बहुत ही महत्त्वपूर्ण विषय मानकर बताया गया है कि विवाह कब, किससे और कैसे करें। किन्तु तलाक या पति की मौत के बाद फिर से विवाह करने के बारे में स्पष्ट निर्देश नहीं दिये गए हैं। इसलिए विवाह करने के पहले दोनों पक्ष की कुंडली अच्छे से परख लें, फिर विवाह करें। प्राचीनकाल में वंश वृद्धि के लिए पुरुषों के पुर्नविवाह की परम्परा तो विद्यमान थी, परन्तु महिलाओं को यह अधिकार नहीं था। समाज में सती प्रथा का प्रचलन था। राजा राममोहन राय और महर्षि दयानन्द सरस्वती जैसे महापुरुषों के प्रयासों से इसका अन्त हुआ। परिणामस्वरूप आज लोगों की सोच बदल रही है। इसी कारण आज विधवाओं को भी समाज में बराबरी का सम्मान दिया जा रहा है। परिवार में इकलौते पुत्र की मृत्यु पर वंश वृद्धि के लिए समाज में ‘नियोग’ व्यवस्था भी प्रचलित थी। आज महिलाओं का सामाजिक स्वरूप बदल रहा है। विधवा महिलाएं रंगीन वस्त्र भी पहन रही है और विवाह भी कर रही हैं। उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में विधवा विवाह का प्रचलन है जिसे नाता कहा जाता है। कोई स्त्री पुनर्विवाह का निर्णय लेती है, तो इसके लिए वह स्वतंत्र है। जिस घर कि वह पहले बहु थी अर्थात्् उसके मृतक पति की संपत्ति पर उसका कोई संवैधानिक अधिकार नहीं होता। जहां वह पुनर्विवाह के बाद जाएगी, वहीं उसका अधिकार माना जाएगा। बच्चों के सम्बन्ध में निर्णय आपसी सहमति या कानून द्वारा किया जा सकता है।

4. बहुविवाह : हिन्दू धर्म अनुसार बहुविवाह सही है या गलत इसके पक्ष या विपक्ष में कई तर्क दिए जा सकते हैं। लेकिन इस सबंध में शास्त्र क्या कहते हैं यह स्पष्ट नहीं है। प्राचीनकाल में अनेक राजाओं की एक से अधिक पत्नियां होती थी। राजा दशरथ की भी तीन-तीन पत्नियां थी। ऐसे में यह माना जा सकता है कि हिन्दू समाज में बहुविवाह प्राचीनकाल में ही प्रचलन में रहा था। बहुविवाह से जीवन में कई तरह के क्लेश उत्पन्न होते हैं। इस तरह के विवाह में व्यक्ति को अनेक कष्टों और विपत्तियों का सामना तो करना ही पड़ता है, साथ ही परिवार में परस्पर प्रेम, सहानुभूति और सहयोग की भावना का भी पतन होता है। राजा दशरथ ने बहुविवाह किया इसका परिणाम क्या हुआ यह सभी जानते हैं। भगवान श्रीराम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ या ‘आदर्श पुरुष’ इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में हर क्षेत्र में वेदों की बातों का अनुसरण किया। उन्होंने एक पत्नीव्रत के वैदिक आदर्श को पुनः स्थापित किया और यही अनुकरण उनके भाईयों ने भी किया। है। एक से अधिक पत्नियों की मौजूदगी से अनेक सांसारिक आपदाओं का जन्म होता है।

5. रिश्ता अगर विदेश में करना हो :
भारतीय अप्रवासियों की बढ़ती संख्या और इसके फलस्वरूप विदेशों में होने वाले विवाह के कारण इस प्रकार के विवाह की संख्या बढ़ती जा रही है। विदेशों में बसे भारतीयों के साथ विवाह में सावधानी न बरतने और तथ्यों की पर्याप्त जानकारी न होने के कारण कई समस्याएं भी खड़ी हो जाती हैं। ऐसे मामलों में विभिन्न कारणों से, जैसे घरेलू हिंसा, विवाहेत्तर संबंधों, वीजा प्राप्त करने में विलम्ब, एकतरफा विवाह-विच्छेद अथवा पति/पत्नी को छोड़ देने तक की नौबत आ जाती है।

यदि आप एन.आर.आई. से विवाह कर रहे हैं, तो निम्न सावधानी बरतना जरूरी है –

कोई भी निर्णय जल्दी में न करें और किसी भी कारण से ऐसा करने के लिए दबाव में न आएं।
घर बैठे, फोन पर या ई-मेल के जरिए मामलों को अंतिम रूप न दें।
किसी ब्यूरो, एजेंट, दलाल अथवा बिचैलिए पर आंख मूंदकर विश्वास न करें।
किसी कारण से नकली दस्तावेज बनवाने अथवा कोई अनुचित लेनदेन करने के लिए सहमत न हो।
पंजीकृत एजेंसियों के दबाव में आकर विदेश में अथवा किसी दूर-दराज के स्थान पर विवाह संपन्न कराने के लिए सहमत न हों।