भारत में कई नीतिकार हुए हैं, जिन्होंने भारत के धर्म और राज्य को एक दिशा दी है। उन्हीं नीतिकारों में से एक प्रसिद्ध नीतिकार हैं शुक्राचार्य। ऋषि भृगु के पुत्र और दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की शुक्र नीति आज भी प्रासंगिक मानी जाती है। शुक्रनीति एक प्रसिद्ध नीति ग्रन्थ है। इसकी रचना करने वाले नीतिकार का नाम शास्त्रों में ‘शुक्राचार्य’ के रूप में मिलता है। शुक्रनीति की रचना काल के बारे में कुछ भी पता नहीं है।

विष्णु पुराण के अनुसार शुक्राचार्य की माता ख्याति को संजीवनी मंत्र ज्ञात था। युद्ध में मारे गए दैत्यों को वह पुनः जीवित कर देती थी। अतः देवताओं की विजय के लिए विष्णु ने शुक्राचार्य की माता की हत्या कर दी थी। इसलिए शुक्राचार्य दैत्यों के गुरू बन गए। शुक्राचार्य, देवगुरू बृहस्पति से भी ईर्ष्या रखते थे।

इसके चार अध्यायों में से प्रथम अध्याय में राजा, उसके महत्त्व और कर्तव्य, सामाजिक व्यवस्था, मन्त्री और युवराज सम्बन्धी विषयों का विवेचन किया गया है। शुक्रनीति की सामग्री कामन्दकीय नीतिसार से भिन्न मिलती है। शुक्र ने कौटिल्य एवं कामन्दक के समान ज्ञान की चार शाखाएँ – आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता एवं दण्डनीति को स्वीकार किया है। शुक्राचार्य ने विभिन्न प्रसंगो में दण्ड व नीति का जो महत्त्व बताया है, वह दण्डनीति अर्थात् राजनीति शास्त्र का ही महत्त्व हैं। शुक्रनीति की राज्य संबंधी प्रमुख बातें इस प्रकार हैं –

शुक्रनीति के प्रथम अध्याय में कहा गया है कि प्रजा से अपना वार्षिक कर वेतन के रूप में स्वीकार करने से स्वामी के रूप में स्थित राजा को ब्रह्मा ने प्रजा के पालनार्थ सेवक बनाया है।
शुक्र ने राज्य को एक अनिवार्य एवं स्वाभाविक संस्था स्वीकार किया है क्योंकि इस संसार के अभ्युदय का आधार राज्य है। जिस प्रकार चन्द्रमा समुद्र की वृद्धि का कारण है, उसी प्रकार राज्य जनता की उन्नति एवं प्रगति का मूल आधार है।
शुक्रनीति के अनुसार कार्य करने वाला राजा अपना राज्य-भार उठा सकने में सर्वथा समर्थ होता है।
इस शास्त्र की सहायता से ही राजा अपने आधारभूत दायित्वों की पूर्ति में सफल होता है, किंतु जो राजा नीति का त्याग करके व्यवहार करता है, वह दुःख भोगता है और उसके सेवक भी कष्ट पाते है।
राजा को प्रजासेवक बताकर उसके प्रजापालन के दायित्व पर बल दिया और उसके किसी भी प्रकार के दैवी अधिकार को स्वीकार नहीं किया है।
जो व्यक्ति आपके राज जानने का प्रयास कर रहा है तो समझ जाएं कि वह आपका हितैषी तो कतई नहीं है।
तीनों लोकों में शुक्रनीति के समान दूसरी कोई नीति नहीं है और व्यवहारी लोगों के लिये शुक्र की ही नीति है, शेष सब कुनीति है।

-: शुक्रनीति की विशेष बातें :-

1. आयु को रखें गोपनीय : यदि कोई बिना कारण आपसे आयु पूछता है, तो उसे कतई न बताएं। आपकी आयु का पता चलने पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शत्रु इस बात का किसी तरह से लाभ उठाकर अपने हित में प्रयोग कर सकते हैं। वर्तमान में लाइसेंस, पासपोर्ट या अन्य किसी कार्य के लिए फाॅर्म भरने में इसका खुलासा करना ही होता है। लेकिन कभी-कभी ऐसे मौके या स्थान होते हैं जहां आयु बताना जरूरी नहीं होता।

2. ग्रह और गृह के दोष : बहुत से लोग ग्रह दोष से पीड़ित रहते हैं। इसका बखान वह सभी से करते रहते हैं। ऐसे में ग्रहों के कारण मुसीबतों में घिरा व्यक्ति और भी मुसीबतों को अनजाने ही आमंत्रित कर देता है। पुराने समय में लोग संयुक्त परिवार में रहते थे। उनके घर भी बड़े होते थे और सभी के कमरे अलग-अलग होते थे। सभी का अपना व्यक्तिगत जीवन होता था। ऐसे में यह धारणा प्रचलित हुई कि किसी को अपने घर का रहस्य नहीं बताना चाहिए। इससे घर के सदस्यों में आपसी मनमुटाव और अविश्वास की भावना बढ़ती है। घर की बातें घर में ही रखने से जीवन सुखमय बनता है।

3. गुरु मंत्र गुप्त रखें : इसमें कहा गया है जो मनुष्य अपनी पूजा-पाठ और मंत्र को गुप्त रखता है, उसे ही अपने पुण्य कर्मों का फल मिलता है। यदि आपने किसी योग्य गुरु से दीक्षा ली है, तो उसके द्वारा दिया गया गुरुमंत्र गोपनीय रखें। गुरुमंत्र, साधना और तप गोपनीय रखना चाहिए अन्यथा उस पर न तो भगवान की कृपा होती है और न ही मंत्र फलित होता है। इस संबंध में गोपनीयता से ही लाभ मिलता है।

4. धन को रखें गुप्त : आप अपने धन को जितना गोपनीय रखेंगे उतना आपके लिए ही अच्छा होगा। धन को अपने अपरिचित या रिश्तेदारों से गोपनीय रखने की सलाह दी जाती है, वरना कई लोग धन के लालच में आपसे जान-पहचान बढ़ाकर बाद में आपको नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। लेकिन ध्यान रखें यदि अपनी पत्नी से गोपनीय रखेंगे और उसे शक हो गया, तो आपके लिए वही धन दुखदाई साबित होगा। इसलिए आप इस बारे में अच्छे से सोच-विचार कर लें।

5. औषध और औषधि : यदि आप किसी भी प्रकार की दवाई खाते हैं तो उसे गोपनीय रखें। माना जाता है कि दवा का असर भी तब तक रहता है जब तक वह गोपनीय है। चिकित्सक आपकी निजी बातें भी जान सकता है। ऐसे में आपके दुश्मन या आपसे जलने वाले लोग चिकित्सक की मदद से आपके लिए परेशानी या समाज में शर्मिंदगी का कारण बन सकते हैं। लेकिन प्राचीनकाल में हो सकता है कि यह किसी विशेष रोग या औषधि के लिए कहा गया हो। पहले के लोग कुछ लोग दुर्लभ वनस्पति के जानकार भी होते थे।

6. पति-पत्नी का संसार-व्यवहार गोपनीय रखना चाहिए : पति-पत्नी की निजी बातें किसी तीसरे मनुष्य को पता चलना घातक भी सिद्ध हो सकता है। इससे आपका मान सम्मान तो जाता ही रहेगा, साथ ही आपके लिए यह बात मुसीबत और शर्म का भी कारण बन सकती है।

7. दान-पुण्य गोपनीय रखें : आपने जो भी दान दिया है उसे गुप्त रखेंगे तो ही उसका लाभ मिल सकता है। गोपनीय दान देवताओं की नजर में रहता है और जिस दान का बखान किया जा रहा है उसका फल निष्फल हो जाता है। जो मनुष्य दूसरों की तारीफ पाने के लिए या लोगों के बीच अपनी महानता दिखाने के लिए अपने किए गए दान का दिखावा करता हैं, उसके किए गए सभी पुण्य कर्म नष्ट हो जाते हैं। दान एक ऐसा पुण्य कर्म है, जिसे गुप्त रखने पर ही उसका फल मिलता है।

8. मान-अपमान गोपनीय रखें : बहुत से लोगों को अपने मान-सम्मान को बढ़ा चढ़ाकर दिखाने की आदत होती है। इस आदत के कारण कई लोग उनसे ईष्र्या या नफरत करने लगते हैं। साथ ही इस आदत की वजह से उनके अपने उनसे दूरियां बना लेते हैं। मनुष्य को अपने जीवन में किसी न किसी कारण से अपमान झेलना ही पड़ता है। यदि वह मनुष्य अपने अपमान को गुप्त नहीं रखता है तो उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। यदि सार्वजनीक रूप से आपका अपमान किया जा रहा है, तो उसका जमकर प्रतिकार करें। ध्यान रखें कि दोबारा कोई आपके साथ ऐसा नहीं कर पाएं। जो लोग किसी की सहानुभूति अर्जित करना चाहते हैं, वही अपने अपमान के बारे में किसी से चर्चा करते हैं। इससे अन्य लोग भी आपका अपमान करने लगेंगे।