अक्सर आपने देखा होगा कि लोग अपने घरों में, मन्दिरों में, संस्थानों आदि में स्वास्तिक बनाते है। कुछ इसे अपने घर के दरवाजे पर बनाते हैं। लेकिन ऐसा क्यों किया जाता है? क्या कभी इसके बारे में जानने की कोशिश की है? आज हम आपको स्वस्तिक के बारे में वो सभी बातें बताने जा रहे है जो आपको जानना जरूरी है।

हिन्दू धर्म जितना विशाल और गहन है, उसकी मान्यताएं और प्रक्रियाएं भी उतनी ही विशद और विस्तृत हैं। भारतीय हिन्दू संस्कृति में स्वस्तिक को अत्यन्त प्राचीन काल से मंगल प्रतीक माना जाता रहा है। सभी शुभ कार्यों में स्वास्तिक का अलग-अलग तरीके से प्रयोग होता रहा है, फिर चाहे वह विवाह हो, बच्चे का मुंडन हो या कोई पूजा। किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिन्ह अंकित करके उसका पूजन किया जाता है।

स्वास्तिक शब्द संस्कृत के शब्द सु + अस्ति + क से मिलकर बना है जिसका मतलब होता है – शुभ और कल्याण करने वाला। सनातन धर्म में जहां ॐ को परब्रह्म का स्वरूप माना गया है, वहीं स्वास्तिक को धन की देवी लक्ष्मी और बुद्धि के देवता भगवान गणेश का प्रतीक माना गया है। स्वस्तिक पूजा का मन्त्र –

स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।।
स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।।

अर्थात् महान् कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें। जिसको संसार के सब पदार्थों ;जीवोंद्ध का स्मरण है, ज्ञानस्वरूप पूषा ;सूर्य देवद्ध हमारा कल्याण करें। चक्रधारा के समान जिनकी गति को कोई रोक नहीं सकता, वह गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदधारी (वेदवाणी के स्वामी) बृहस्पति हमारा कल्याण करें।

‘स्वस्तिक’ शब्द की निरुक्ति है – ‘स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः’ अर्थात् कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है। इस प्रकार स्वस्तिक शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है।

असल में स्वस्तिक का यह चिन्ह क्या दर्शाता है, इसके पीछे ढेरों तथ्य हैं। स्वास्तिक में 4 रेखाएं होती हैं, जिनका आकार एक समान होता है। बीच की सीधी रेखाएं सूर्य की चार भुजाओं की प्रतीक 4 दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण की ओर इशारा करती हैं। इनके सिरों से जुड़ी सीधी व लेटी रेखाएं 4 वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद की प्रतीक हैं और इन रेखाओं के बाहरी सिरे सृष्टि के रचनाकार भगवान ब्रह्मा के 4 सिरों को दर्शाती हैं।

स्वास्तिक चार रेखाओं के मध्य में स्थित 4 बिन्दु 4 देवों यानी ब्रह्मा, विष्णु, महेश ;शिवद्ध और गणेश के प्रतीक हैं। इसके अतिरिक्त इन बिन्दुओं की तुलना 4 पुरुषार्थ, 4 आश्रम और 4 लोकों से की जाती है। मान्यता है कि यदि स्वास्तिक की 4 रेखाओं को ब्रह्मा के 4 सिर माना जाए तो मध्य में मौजूद बिंदु भगवान विष्णु की नाभि है, जिसमें से भगवान ब्रह्मा प्रकट होते हैं। इसके अलावा यह मध्य भाग संसार के एक धुर से शुरू होने की ओर भी इशारा करता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार स्वास्तिक के प्रयोग से घर के वास्तु दोष भी दूर होते हैं।

स्वास्तिक में श्रीगणेश की छवि: स्वास्तिक ऐसा प्रतीक है, जो सर्वोपरि भी है और शुभ एवं मंगलदायक भी है। विघ्नहर्ता श्री गणेश जी की प्रतिमा की भी स्वास्तिक चिन्ह से संगति है। श्री गणेश जी के सूँड़, हाथ, पैर, सिर आदि अंग इस तरह से चित्रित होते हैं कि यह स्वास्तिक की चार भुजाओं के रूप में प्रतीत होते हैं। ‘ॐ’ को भी स्वास्तिक का प्रतीक माना जाता है। इस एक शब्द को ब्रह्माण्ड का सार माना जाता है।

स्वस्तिक का रंग लाल क्यों :

भारतीय संस्कृति में लाल रंग का सर्वाधिक महत्त्व है। मांगलिक कार्यों में इसका प्रयोग सिन्दूर, रोली या कुमकुम के रूप में किया जाता है। लाल रंग शौर्य एवं विजय का प्रतीक है। लाल रंग प्रेम, रोमांच व साहस को भी दर्शाता है। धार्मिक महत्त्व के अलावा वैज्ञानिक दृष्टि से माना जाता कि लाल रंग व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है। हमारे सौर मण्डल में मौजूद ग्रहों में से एक मंगल ग्रह का रंग भी लाल है। यह एक ऐसा ग्रह है जिसे साहस, पराक्रम, बल व शक्ति के लिए जाना जाता है। यह कुछ कारण हैं जो स्वास्तिक बनाते समय केवल लाल रंग के उपयोग की ही सलाह देते हैं। स्वास्तिक की आकृति भगवान श्रीगणेश का स्वरूप, विष्णु का प्रतीक और सूर्य का आसन माना जाता हैं। सभी धर्मों में स्वस्तिक का महत्त्व बताया गया है। इसे विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

सिंधु घाटी सभ्यता में स्वास्तिक :

सिंधु घाटी की खुदाई के दौरान स्वास्तिक प्रतीक चिन्ह मिला। माना जाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग भी सूर्य पूजा को महत्त्व देते थे। इस सभ्यता के लोगों का व्यापारिक संबंध ईरान से भी था। इसमें भी सूर्य उपासना का महत्त्व दर्शाया गया है। प्राचीन फारस में स्वास्तिक की पूजा का चलन सूर्य उपासना से जोड़ा गया था। जर्मनी, चीन, जापान आदि कई देशों में इसका प्रयोग किया जाता है। नेपाल में यह हेरंब के नाम से जाना जाता है।

मैसोपोटेमिया में विजय प्राप्त करने हेतु अस्त्र-शस्त्र पर स्वास्तिक चिन्ह का प्रयोग किया जाता था। हिटलर ने भी इस स्वास्तिक चिन्ह को अपनाया था। इस प्रकार मध्य एशियाई देशों में भी स्वास्तिक का निशान मांगलिक एवं सौभाग्य का सूचक माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार जब यूरोपीय लोग भारत आए थे तो वह इस चिन्ह के सकारात्मक प्रभाव से प्रभावित हुए थे। इस तरह वह लोग इस चिन्ह को भारत के बाहर ले गए और उपयोग करने लगे।

बौद्ध और जैन धर्म में स्वास्तिक :

बौद्ध धर्म में स्वास्तिक को अच्छे भाग्य का प्रतीक माना गया है। बौद्ध धर्म में स्वास्तिक का आकार गौतम बुद्ध के हृदय स्थल पर दिखाया गया है। यह भगवान बुद्ध के पदचिन्हों को दिखाता है, इसलिए इसे इतना पवित्र माना जाता है। यही नहीं स्वास्तिक का निशान भगवान बुद्ध के हृदय, हथेली और पैरों में भी अंकित है। स्वास्तिक का महत्त्व बौद्ध धर्म से कहीं ज्यादा जैन धर्म में है। जैन धर्म में यह सातवें जिन का प्रतीक है। श्वेताम्बर जैन संस्कृति में स्वास्तिक अष्टमंगल का मुख्य प्रतीक है।

ज्योतिष विज्ञान में स्वास्तिक का महत्त्व :

1. पूजा करने में लिए : जब आप अपने घर के मन्दिर में ईष्ट देवता की स्थापना करें तो सबसे पहले उस जगह पर स्वास्तिक बनाये, इससे देवता शीघ्र प्रसन्न होते है और मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

2. मनोकामना पूर्ण करने के लिए : अगर आपकी इच्छा काफी समय से पूर्ण नहीं हो रही है तो किसी मन्दिर में जाकर कुमकुम से उल्टा स्वास्तिक बना दें, इससे जल्द ही आपकी मनोकामना पूर्ण हो जायेगी। मनोकामना पूर्ण होने पर उसी जगह पर सीधा स्वास्तिक बना दें।

3. समृद्धि के लिए : घर की सुख और समृद्धि के लिए घर के बाहर कुमकुम, रोली या सिंदूर से स्वास्तिक चिन्ह बनायें। इससे देवी-देवता घर में प्रविष्ट होकर सुख, समृद्धि और शांति लाते हैं।

4. नींद के लिए : अगर आपको रात में नींद नहीं आती है या बुरे सपने आते है तो घर के मन्दिर में अपनी तर्जनी ऊँगली से स्वास्तिक बनायें, इससे आपको तुरंत ही आराम मिलेगा और अच्छी नींद आएगी।

5. व्यापार में लाभ के लिए : व्यापार में लाभ के लिए घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में गुरुवार के दिन गंगाजल से धोकर वहां फर्श पर हल्दी से स्वास्तिक बनायें और पूजा करें। इससे जल्द ही आपको व्यापार में लाभ मिलेगा।