प्रजा की रक्षा करना एवं उनके सुख-दुख का ख्याल रखना राजा का प्रमुख कर्तव्य होता है। अपनी प्रजा के हितों का ख्याल हर राजा का नैतिक दायित्व है। मुख्य रूप से प्रजा के भरण पोषण की व्यवस्था, मकान की व्यवस्था, कपड़े की आवश्यकता की पूर्ति, शिक्षा की व्यवस्था, प्रजा की सुरक्षा व्यवस्था आदि अनेक कार्य होते हैं, जो राजा को अपनी प्रजा के लिए करने होते हैं। इन सब कर्तव्यों को जब राजा पूर्ण करने का यत्न करता है तो उसे हम प्रजा के पिता स्वरूप मानते हैं। इसलिए वेदों ने राजा को पिता के समान ही स्वीकार किया है। राजतंत्र में प्रथा थी कि राजगुरू, राजा का राजतिलक (शपथ ग्रहण) करते समय, राजा को तलवार भेंट करके कहता है – इससे अपराधी को दण्ड दें। जब राजा आशीर्वाद लेने के लिए झुकता था तब उसकी पीठ पर मोर पंख का दण्ड मारकर कहता है – यह धर्म का दण्ड है जो तुम्हारे लिए है। मान्यता है कि ईश्वर ने अत्याचारियों के भय से डरी हुई प्रजा की रक्षा के लिए इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा तथा कुबेर के अंश से राजा का निर्माण किया। इसका अर्थ है कि दिव्य शक्तियों के समान राजा भी प्रजा का कल्याण करें।

सप्तांग राज्य का सिद्धान्त :

भारतीय राजदर्शन में मनु द्वारा प्रतिपादित सप्तांग राज्य सिद्धान्त अत्यन्त चर्चित है। इसके अनुसार, राज्य एक शरीर की भाँति है जिसके सात अंग हैं। यह सभी राज्य-रूपी शरीर की प्रकृतियां है जिनके बिना राज्य संचालन की कल्पना करना कठिन है।

मनुस्मृति के अध्याय 9 के श्लोक 294 में राज्य के सात अंग गिनाये गये हैं- (1) स्वामी अर्थात् राजा, (2) मंत्री परिषद, (3) पुर/दुर्ग अर्थात् राजभवन, (4) कोष, (5) राष्ट्र अर्थात् प्रशासनिक व्यवस्था, (6) दण्ड अर्थात् न्यायिक व्यवस्था तथा (7) मित्र अर्थात् विदेश नीति।

इन सात अंगों से निर्मित राज्य का प्रत्येक अंग एक विशिष्ट कार्य करता है। मनु के अनुसार यदि इनमें से किसी भी एक अंश की उपेक्षा होती है तो राजा के लिये राज्य का कुशल संचालन सम्भव नहीं है। महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद महाराज युधिष्ठिर को भीष्म ने राजधर्म का उपदेश दिया था। युधिष्ठर को समझाते हुए भीष्म पितामह कहते हैं – ‘जिन गुणों को आचरण में लाकर राजा उत्कर्ष लाभ करता है, राजा को चाहिए कि वह इन गुणों से युक्त होने का प्रयास करें।’ यह गुण निम्नवत हैं –

1. स्वामी अर्थात् राजा :
राजा स्वधर्मों का आचरण करे। आस्तिक रहते हुए दूसरे के साथ प्रेम का व्यवहार न छोड़ें। हठ छोड़कर सदा ही प्रीति का पालन करे।
राजकीय कार्यों के संपादन हेतु नियत कर्तव्यों और दायित्वों का न्यायपूर्वक निर्वाह करे, परन्तु जीवन में कटुता न आने दें।
राजा शुद्घ रहकर, मर्यादा का पालन करे। प्रजा को धर्म कार्य में प्रवृत्त करें। किसी से घृणा न करे।
ईर्ष्या रहित होकर प्रजा की सदा रक्षा करे। स्त्रियों का अधिक सेवन न करे। आत्मसंयमी रहे।
स्वास्थ्यवर्धक, शुद्ध और स्वादिष्ट भोजन करे, परन्तु अहितकर भोजन कभी न करे।

2. मंत्री परिषद :
अपने लोगों से हुई अपनी गुप्त मंत्रणा को कभी भी प्रकट न करे।
जिन्होंने कभी अपकार किया हो, उन पर कभी विश्वास न करें।
निष्कपट भाव से गुरूजनों की सेवा करे।
कार्यकुशल हो परंतु अवसर के ज्ञान से शून्य न हो।
बिना सोचे समझे अकस्मात किसी पर क्रोध न करे।

3. पुर/दुर्ग अर्थात् राजभवन :
दम्भहीन होकर विद्वानों का सत्कार करे, अर्थात् विद्वानों को अपने राज्य का गौरव माने।
जो राजभक्त न हों ऐसे भ्रष्ट और निकृष्ट लोगों से कभी भी गुप्तचरी का कार्य न कराये।
दुष्टों को अपना अभीष्ट कार्य न कहें, अर्थात् उन्हें अपनी गुप्त योजनाओं की जानकारी कभी न दें।
अपने मनोरथ की पूर्ति के लिए कभी नीच लोगों का सहारा न लें, अन्यथा देर सबेर उनके उपकार का प्रतिकार अपने सि(ांतों की बलि चढ़ाकर देना पड़ सकता है।

4. कोष (अर्थ संग्रह) :
क्रूरता का व्यवहार न करते हुए प्रजा से अर्थ संग्रह करे।
दानशील हो, परंतु यह ध्यान रखे कि दान अपात्रों को न मिले।
श्रेष्ठ पुरूषों (किसानों) से उनका धन (भूमि) न छीने।
ईमानदारी से (उत्कोचादि भ्रष्ट साधनों से नहीं) धन पाने की इच्छा करे।
किसी पर कृपा करते समय उस पर कोई आक्षेप न करे।

5. प्रशासनिक व्यवस्था :
शूरवीर बने परंतु बढ़-चढ़कर बातें न करे। राजा को मितभाषी और शूरवीर होना चाहिए।
राजा साहसी हो, परंतु उसका साहस निष्ठुर न होने पाए।
उद्दण्डता छोड़कर विनीत भाव से मानवीय भावनाओं का सदा सम्मान करे।
उचित कानून-व्यवस्था का पालन करते हुए शासन व्यवस्था चलाएं।

6. दण्ड और न्यायिक व्यवस्था :
दुष्ट लोगों के साथ मेल-मिलाप न करे, अर्थात् राष्ट्रद्रोही व समाजद्रोही लोगों को कभी संरक्षण न दे।
उचित जांच किये बिना (क्षणिक आवेश में आकर) किसी व्यक्ति को कभी भी दंडित न करे।
विश्वास पर खरा उतरने वाला हो, केवल पिण्ड छुड़ाने के लिए किसी को सांत्वना या भरोसा न दे।
बिना जाने किसी पर कोई प्रहार न करे। शत्रुओं को मारकर किसी प्रकार का शोक न करे।

7. मित्र अर्थात् विदेश नीति :
दीनता दिखाते हुए ही प्रिय भाषण करे।
बंधु बांधवों के साथ कभी लड़ाई-झगड़ा न करे।
कोमल हो, परन्तु तुम अपकार करने वालों के लिए नहीं।
किसी को पीड़ा पहुंचाए बिना ही अपना काम करता रहे।