अधिकार और कर्तव्य का बड़ा घनिष्ठ संबंध है। वास्तव में अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब हम यह कहते हैं कि घर और समाज में रहकर हमारे कुछ अधिकार हैं तो हमें यह भी समझना चाहिए कि घर और समाज में रहते हुए हमारे कुछ कर्तव्य भी बन जाते हैं। अनिवार्य अधिकारों का अनिवार्य कर्तव्यों से नित्य संबंध है। कर्तव्य मानव के किसी कार्य को करने या न करने के उत्तरदायित्व के लिए दूसरा शब्द है। सामान्यतः कर्तव्य शब्द का अभिप्राय उन कार्यों से होता है, जिन्हें करने के लिए व्यक्ति नैतिक रूप से प्रतिबद्ध होता है। इस शब्द से यह बोध होता है कि व्यक्ति किसी कार्य को अपनी इच्छा, अनिच्छा या केवल बाह्य दबाव के कारण नहीं करता है अपितु आंतरिक नैतिक प्ररेणा के कारण ही करता है।

आजकल जिसे हम कर्तव्य के नाम से जानते हैं, प्राचीनकाल में वही हमारे देश में विधि थी। विधि का पालन करना सबके लिए वैसे ही अनिवार्य था जैसे आज कानून का पालन करना अनिवार्य है। विधि विधेयात्मक होती है, जबकि कानून दण्डात्मक होता है। इन दोनों में मौलिक अंतर है। कर्तव्य दो प्रकार के होते हैं- नैतिक तथा कानूनी। नैतिक कर्तव्यों का संबंध अंतःकरण की प्रेरणा अथवा मानवता की भावना से उचित कार्य की प्रवृत्ति से होता है। इन कर्तव्यों का निर्धारण और सरंक्षण राज्य द्वारा नहीं होता। कानूनी कर्तव्यों का पालन न करने पर व्यक्ति, राज्य द्वारा निर्धारित दंड का भागी हो जाता है। इन्हीं कर्तव्यों का अध्ययन राजनीतिक शास्त्र में होता है।

प्राचीनकाल में धार्मिक समूहों के हस्तक्षेप से राजा के सीमित अधिकार की मान्यता प्रचलित हुई। परिवार और संपत्ति पर मातृसत्तात्मक समाज में माता का तथा पितृसत्तात्मक समाज में पिता का अधिकार होता था। हमने परमात्मा को नहीं देखा, हमने भगवान को नहीं देखा, लेकिन हमने अपने माता-पिता को साकार देखा है। हमारे माता-पिता इस संसार में हमारे लिए भगवान का ही रूप हैं। जिस स्थान पर किसी महापुरुष के चरण पड़े हों, उस स्थान को पवित्र जानकर उसकी परिक्रमा की जाती है। अधिकतर मन्दिरों में परिक्रमा का एक पथ ;रास्ताद्ध बना होता है, इसे ‘प्रदक्षिणा’ कहा जाता है। माता-पिता की प्रदक्षिणा को बहुत उत्तम माना है। भगवान गणेश ने भी अपने माता-पिता की प्रदक्षिणा से ही परमपद प्राप्त किया था।

संसार में माता-पिता का जो स्थान है, वह सचमुच देवताओं से भी कहीं बढ़कर है। शास्त्रों में माता-पिता के लिए कहा जाता है, ‘मातृ देवोः भव’ अर्थात् माँ देवता के समान है। ‘पितृ देवोः भवः’ अर्थात् पिता देवता के समान है और ‘आचार्य देवोः भवः’ अर्थात् हमारे जो आचार्य (अध्यापक) हैं, वो देवता के समान हैं। माता-पिता और गुरु की आज्ञा को हितकारी समझकर उनकी पालना करनी चाहिए। यह सदैव हितकारी वचन बोलते हैं, आपकी भलाई के लिए बोलते हैं, इसलिए उनको देवता तुल्य माना गया है।

मनुस्मृति में (9/158-160) मनुष्य के धर्मपुत्र, पुत्रिका पुत्र व विजातीय पुत्र सपिंडी कहे गऐ हैं। इनके अतिरिक्त महर्षि मनु ने व्यक्ति के निम्न 12 प्रकार के पुत्र बताए हैं।

मनुस्मृती (9/161-171) के अनुसार यह छः पुत्र पिता की सम्पत्ति के अधिकारी होते हैं –

क्षेत्रज (दूसरी अविवाहित स्त्री से), औरस (दूसरी पालित स्त्री से), दत्तक (दूसरी सजातिय स्त्री का पुत्र),
कृत्रिम (सजातिय अनाथ), गूढोत्पन्न (विजातिय अनाथ), अपबिद्ध (त्यागा हुआ),

मनुस्मृति (9/172-179) के अनुसार यह पिता के परिजन हैं, परन्तु सम्पत्ति के अधिकारी नहीं होते –

कानीन (अविवाहित कन्या का), सहोढ़ (विवाहित गर्भवती कन्या का), क्रीत (खरीदा गया),
पौर्नभव (विधवा से नियोग द्वारा), स्वयंदत्त (दिया गया), शौद्र (व्यभिचार से),

आज के जमाने में बच्चे माता-पिता की पारी पूरी होने की प्रतीक्षा नहीं करना चाहते हैं। वह माता-पिता का सम्मान तो दूर रहा, उनकी उपलब्धियों व संसाधनों को हस्तगत करने की फिराक में लगे रहते हैं। माता-पिता यह सब जानते हुए कि उनकी सन्तान उनसे छल कर रहा है, उसे नजरन्दाज करते जाते हैं। सन्तान जैसा बर्ताव माता पिता के प्रति करता है, उसका अनुकरण उनकी सन्ताने भी करेंगी। माता-पिता के कदमों में स्वर्ग होता है, उनके आशीर्वाद से हमें हर क्षेत्र में सफलता मिलती है। माता-पिता की सेवा भगवान की ही सेवा है। उन्होंने हम पर अनगिनत उपकार किये हैं, जिसका बदला चुका पाना असंभव है।

माता-पिता व संतान का नाता पवित्र है। माता-पिता को ही प्रथम गुरु समझा जाता है। माता-पिता ही जीवन का मार्ग दिखलाते हैं। माता-पिता के अनंत उपकार संतान पर रहते हैं। जग में सब कुछ दोबारा मिल जाता है, लेकिन माता-पिता नहीं मिलते। वह भी एक जमाना था, जब श्रवण कुमार जैसे पुत्र ने अपने अंधे माता-पिता की सेवा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। आजकल लोग पैसे और सफलता के पीछे ही भाग रहे हैं और माता-पिता को भूलते जा रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो माता-पिता को वृद्ध हो जाने पर वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं। लानत है ऐसे बच्चों को जो अपने माता-पिता के अंतिम समय में उन्हें छोड़ देते हैं। क्या इसी दिन के लिए वो माता-पिता अपनी जान न्योछावर करके उस संतान का लालन पालन करते हैं।

संतान का कर्तव्य :-

अपने माता-पिता को सम्मान के साथ देखें। उनकी राय स्वीकारें।
उनके दोस्तों और प्रियजनों से अच्छी तरह से बोलें।
खाली समय में उनसे बातचीत करें और उनकी बातचीत में सम्मिलित हों।
वह क्या और क्यों कह रहे हैं, उनकी इस भावना पर ध्यान दो।
अपने माता-पिता कभी साथ ऊँची आवाज में बात न करें।
उनकी उपस्थिति में दूसरों के साथ कानाफूसी न करें।
उनकी उम्र का सम्मान करें और उनकी बात काटने से बचें।
उनका नेतृत्व स्वीकार करें। उनकी सलाह और निर्देश के अनुसार कार्य करें।
उनके विचारों को न तो घटिया बताये न ही उनकी आलोचना करें।
उनके सामने अपने पैर करके या उनकी ओर अपनी पीठ कर के बैठने से बचें।
नियमित रूप से उनके पास जायें। कहने से पहले उनके आवश्यक काम करें।