हिंदू धर्म में उपवास का विशेष महत्व है। शास्त्रों में मानसिक शान्ति, सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं कि पूर्ति के लिये उपवास करने की मान्यता है। आस्था और शास्त्रों के अनुसार, व्यक्ति सप्ताह के दिन, तिथि या फिर त्यौहार के अनुसार व्रत रखता है। कई लोग मन्नत के अनुसार, दिनभर बिना अन्न ग्रहण किए, तो कई बिना जल ग्रहण किए व्रत रखते हैं। हर कोई अपनी आस्था के अनुसार व्रत रखता है। चिकित्सा शास्त्र के अनुसार भी उपवास करना स्वास्थय सुख में वृद्धि करता है और व्यक्ति को स्वस्थ बने रहने में सहयोग करता है। पाचन तंत्र को आराम देने के लिये एक दिन का उपवास कभी भी किया जा सकता है।

संसार के समस्त धर्मों ने किसी न किसी रूप में व्रत और उपवास को अपनाया है। व्रत के आचरण से पापों का नाश, पुण्य का उदय, शरीर और मन की शुद्धि, अभिलाषित मनोरथ की प्राप्ति और शांति तथा परम पुरुषार्थ की सिद्धि होती है। प्रत्येक व्रत के आचरण के लिए थोड़ा या बहुत समय निश्चित है। जैसे सत्य और अहिंसा व्रत का पालन करने का समय यावज्जीवन कहा गया है, वैसे ही अन्य व्रतों के लिए भी समय निर्धारित है। महाव्रत जैसे व्रत सोलह वर्षों में पूर्ण होते हैं। वेदव्रत और ध्वजव्रत की समाप्ति बारह वर्षों में होती है।

आमतौर पर व्रत रखने को श्रद्धा और भक्ति से ही जोड़कर देखा जाता है। वैदिक धर्म के तीन अंग हैं – यज्ञ, तप और दान। व्रत इनमें से तप के अन्तर्गत आता है। व्रत एवं उपवास पुण्य तिथियों में किए जाते हैं। इसीलिए व्रत में दान किया जाता है। कुछ लोग उपवास किसी सिद्धि को प्राप्त करने के लिए करते हैं तो कुछ लोग तप, साधना और मोक्ष के लिए करते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो यह सोचकर व्रत रखते हैं कि इसी बहाने उनका वजन कम हो जाएगा। वास्तव में व्रत करना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है। व्रत करने से शरीर के भीतर मौजूद विषाक्त पदार्थ साफ हो जाते हैं। व्रत करते समय कुछ नियमों का जरूर पालन करना चाहिए, वरना पूजा का पूरा फल प्राप्त नहीं होता है।

व्रत तीन प्रकार के होते हैं – 1. नित्य, 2. नैमित्तिक और 3. काम्य

1. नित्य व्रत : इनमें ईश्वर भक्ति या आचरणों पर बल दिया जाता है, जैसे सत्य बोलना, पवित्र रहना, इंद्रियों का निग्रह करना, क्रोध न करना, अश्लील भाषण न करना और परनिंदा न करना, प्रतिदिन ईश्वर भक्ति का संकल्प लेना आदि नित्य व्रत हैं। इनका पालन नहीं करने से मानव दोषी माना जाता है।
2. नैमिक्तिक व्रत : इनमें किसी प्रकार पापकर्म होने या दुखों से छुटकारा पाने का विधान होता है। किसी प्रकार के निमित्त के उपस्थित होने पर चांद्रायण प्रभृति, तिथि विशेष में जो व्रत किए जाते हैं वह नैमिक्तिक व्रत हैं।
3. काम्य व्रत : काम्य व्रत किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाते हैं, जैसे पुत्र प्राप्ति के लिए, धन-समृद्धि के लिए या अन्य सुखों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले व्रत काम्य व्रत हैं।

व्रत एवं उपवास के नियम :

1. संकल्प – सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। हाथ में जल, अक्षत (चावल) और पुष्प लेकर अपने सामथ्र्य के अनुसार उस दिन व्रत रखने और पूजा करने का संकल्प लें। संकल्प ही व्रत का मूल भाव होता है, किंतु इसकी सार्थकता तभी होती है, जब किसी कार्य को किसी दृढ़ निश्चय के साथ किया जाये।
2. पूजा-अर्चना – अपने ईष्टदेव या उस वार/तिथि के विशेष देवता की षोडशोपचार या सामान्य विधि से पूजा करें। दीपक जलाएं, भोग लगाएं और व्रत की कथा पढ़ें या सुनें।
3. आहार के नियम – अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार निर्जला (बिना पानी पिए), जलीय (केवल पानी पीकर), दुग्धाहार (केवल दूध पीकर) या फलाहार (फल, मेवे, सेंधा नमक युक्त सात्विक वस्तुएं) का पालन करें। सामान्यतः व्रत में अन्न (गेहूं, चावल, साधारण नमक आदि) का सेवन वर्जित होता है।
4. संयम और आचरण – व्रत के दौरान मन, वाणी और कर्म से पवित्रता बनाए रखें। क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहें तथा भगवान के नाम का जाप या कीर्तन करें। जब आपका मन कंट्रोल में रहेगा तो खाने वाली चीजों को खाने का मन नहीं करेगा।
5. पारण (व्रत खोलना) – व्रत का समापन अगले दिन सूर्योदय के बाद नियमानुसार पूजा-पाठ और दान-दक्षिणा करने के बाद ही भोजन (अन्न) ग्रहण करके किया जाता है।

व्रत एवं उपवास के दौरान सावधानियाँ :

※ प्रातःकाल की पूजा करने से पहले ही नित्यक्रियाओं से निवृत हो जाना चाहिए। इस दिन भी अन्य दिनों की तरह अपने ईष्ट देव की पूजा करनी चाहिए। अपने ईष्ट देव की पूजा करने के बाद ही उपवास से जुडे अन्य देवी -देवता कि पूजा करनी चाहिए।
※ प्रातःकाल स्नान करके घर और पूजा स्थल की अच्छे से सफाई करें। पूजा हमेशा विधि-विधान एवं श्रद्धा के साथ करें। इस प्रकार व्रत करने से देवी-देवता प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। जीवन में सफलता की प्राप्ति होती है। मन और इन्द्रियों को संयम में रखने की क्षमता आती है।
※ व्रत के दौरान कुछ आवश्यक पोषक तत्त्वों को लेना जरूरी है, वरना व्रत करना आपके लिए तकलीफदेह हो सकता है।
※ व्रत के समय सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। कोशिश करें कि वो पौष्टिक हो न कि फैट से भरा हुआ। किसी भी प्रकार का तामसिक या फिर गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए।
※ उपवास के दौरान पूरी तरह से सात्विक भोजन करना चाहिए। इसके लिए अपने भोजन में ताजे फल और कुछ सब्जियां, दूध और दूध से बने व्यंजन, सूखे मेवे शामिल कर सकते हैं।
※ महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान व्रत नहीं करना चाहिए। क्योंकि उन दिनों के व्रत मान्य नहीं होते हैं। गर्भवती महिलाओं को व्रत रखने से बचना चाहिए।
※ नवरात्रि में उपवास का मुख्य उद्देश्य मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करना है। इसके लिए अपने दिन की शुरुआत प्रार्थना से करें, मंदिरों में जाकर देवी के दर्शन करें और धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल हों।
※ उपवास के दौरान शरीर में पानी की कमी होने का खतरा बना रहता है। इसलिए व्रत के दौरान ढेर सारा पानी पिएं। हर्बल टी, दूध और फलों के जूस को भी अपने मील में शामिल करें।
※ नवरात्रि के उपवास में अनाज और दाल खाने की मनाही होती है। इनकी जगह कुट्टू, सिंघाड़ा और राजगिरे का उपयोग कर सकते हैं। उपवास में खाने के लिए तैयार किए जाने वाले फलाहार में सेंधा नमक का उपयोग कर सकते हैं।
※ नवरात्रि के उपवास के दौरान प्याज और लहसुन से दूर रहना चाहिए और शाकाहारी भोजन करना चाहिए। बहुत ज्यादा तेल और मसाले वाला भोजन नहीं करना चाहिए। फ्राइड चीजें खाने से बचना चाहिए।
※ उपवास के दिन के विषय में कहा गया है, कि इस दिन दिन में सोना उपवास के पुन्य फलों में कमी करता है। आसन करना और भ्रमण करना उपयुक्त रहता है।
※ व्रत करने वाले व्यक्ति को आचमन किये बिना क्रियाएं करना व्यर्थ होता है। नहाते-धोते, खाते-पीते, सोते, छिंकते समय और गलियों में घूमकर आने के बाद आचमन अवश्य करना चाहिए। यदि जल न मिलें तो दक्षिण के कोने का स्पर्श भी किया जा सकता है।