हिन्दू ग्रंथों और शास्त्रों में तीन प्रमुख देव हैं जिनमें ब्रह्मा सृजन के देव बताये गये हैं जो कमल पर विराजमान रहते हैं। ब्रह्मा की उत्पत्ति विष्णु की नाभि से निकले कमल में हुई थी। भागवत पुराण में कहा गया है कि ब्रह्मा वह है जो ‘कारणों के सागर’ से उभरता है। ब्रह्मा को स्वयंभू ;स्वयं जन्म लेने वालाद्ध और वेद निर्माता भी कहा जाता है। कई लोग गलती से इन्हें ‘ब्रम्ह’ भी मान लेते हैं। जबकि ब्रह्म शब्द ईश्वर के लिए प्रयुक्त होता है। हिन्दू ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मा के 17 मानस पुत्र माने गए हैं। सनत, सनन्दन, सनातन, सनत कुमार भी ब्रह्मपुत्र थे, लेकिन सृष्टि रचना में इनका कोई योगदान नहीं था। सभी देवी, देवता, मानव और राक्षस ब्रह्मा जी के वंशज माने गए हैं। इनके अतिरिक्त ब्रह्मा जी पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि सभी जीवों के भी पितामह हैं।

ब्रह्मा का स्वरूप :

व्यास द्वारा रचित पुराणों में मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा को चार मुख और चार भुजाओं वाले देवता के रूप में चित्रित किया जाता है। यह चारों दिशाओं में एक साथ देख सकते हैं। उनके चार मुख निरंतर चार वेदों का जाप करते रहते हैं। भगवान ब्रह्मा हमेशा लाल वस्त्र पहने होते हैं। ब्रह्मा जी कमल के पुष्प पर विराजमान रहते हैं, जो पवित्रता और शुभता का प्रतिनिधित्व करता है। अक्सर चित्रों में उन्हें सफेद दाढ़ी में देखा गया है, जो उनके अस्तित्व की प्रकृति का प्रतीक है। वह अपने हाथों में क्रमशः वरमुद्रा, अक्षरसूत्र, वेद तथा कमण्डल धारण किए हैं। ऊपरी दाहिने हाथ में एक माला है जिसके माध्यम से सृष्टि का निर्माण हुआ और ऊपरी बाएं हाथ में एक पुस्तक है जो ज्ञान का प्रतीक है, निचले बाएँ में कमंडल या जलपात्र है, जो प्रकृति और जीवन के सार को दर्शाता है। वह अपने किसी भी हाथ में हथियार नहीं रखते हैं।

हिन्दू धर्म ग्रंथों में ब्रह्मा जी की तीन पत्नियों का वर्णन मिलता है – सरस्वती, सावित्री और गायत्री। देवी सरस्वती को ब्रह्मा की प्रथम पत्नी के रूप में स्थापित किया गया है। सावित्री सूर्य की किरणों से उत्पन्न हुई थी। सूर्य किरणों को सविता भी कहते हैं। देवी सावित्री के विषय में अधिक विवरण नहीं मिलता। हालांकि यह भी सत्य है कि सरस्वती ब्रह्मा की मानस पुत्री थी जो उनके कण्ठ से उत्पन्न हुई थीं। हिंदू पौराणिक कथाओं में ब्रह्मा और सरस्वती की कहानी सबसे असंगत कहानियों में से एक है। प्रजापति ब्रह्मा के अपनी पुत्री पर आसक्त होने की कथा मिलती है जो परवर्ती साहित्य में विस्तृत रूप से दुहराई गई है। फिर भी हम देखते हैं कि इसे सामूहिक चेतना द्वारा दबाया नहीं गया है और ना ही इसे अन्य विभिन्न कहानियों द्वारा मिटाया गया है। शायद इसे किसी भी व्यभिचारपूर्ण इरादे वाले व्यक्ति के लिए चेतावनी देने वाली कहानी के रूप में संरक्षित रखा गया है।

उपासना की दृष्टि से जो महत्त्व विष्णु, शिव, शक्ति, गणपति और सूर्य को प्राप्त है, वह ब्रह्मा को नहीं मिला। प्रमुख देवता होने पर भी इनकी पूजा बहुत कम होती है। इसका एक कारण यह बताया जाता है कि इन्होंने अपनी पुत्री सरस्वती पर वुळदृष्टि डाली थी, दूसरा, सावित्री के श्राप के कारण तथा तीसरा, जब भगवान सदाशिव ने विष्णु और ब्रह्मा को ज्योति स्तम्भ की थाह लेने के लिए भेजा तो ब्रह्मा ने लौटकर असत्य कहा था। इन कथाओं के प्रति नैतिक दृष्टिकोण के कारण परवर्ती समाज में ब्रह्मा की मान्यता घटती गई।

विष्णु और शिव का विरोध करने वाले असुर और देवों पर भी वह सहज ही अनुकंपा करते थे। अतः दोनों ही संप्रदायवालों ने इनकी उपेक्षा की है। इस प्रकार भारतीय धर्म में ब्रह्मा का ना तो कोई धार्मिक सम्प्रदाय खड़ा हो सका और ना ही ब्रह्मा की पृथक मूर्तियाँ स्थापित हुई। पूरी दुनिया में भगवान विष्णु और शिव के अनेक मन्दिर हैं, लेकिन ब्रह्माजी का मन्दिर केवल एक ही है। यह मंदिर अजमेर से लगभग 15 किलोमीटर दूर पुष्कर में एक झील के किनारे पर बना हुआ है। यह मन्दिर जयपुर शहर से लगभग 150 किमी. और दिल्ली से लगभग 437 किमी. की दूरी पर स्थित है। यहां पर प्रतिवर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं का आगमन होता है। सम्पूर्ण विश्व में सिर्फ पुष्कर ही एक ऐसा क्षेत्र है जहां पर ब्रह्मा जी की प्रतिमा स्थापित की गई है। ब्रह्माजी का केवल एक मन्दिर ही क्यों है? इस सवाल का जवाब पुष्कर के मन्दिर में छुपा है। यहां सावित्री रूठी हुई और नाराज हैं। इसीलिए ब्रह्मा के मन्दिर से बिल्कुल अलग, उन्होंने पहाड़ पर अपना बसेरा बनाया हुआ है। यह तो सभी जानते हैं कि मानवीय सृष्टि की रचना परमपिता ब्रह्मा ने की। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रह्मा से भारी भूल हो गई थी। जिससे उनकी पत्नी न सिर्फ उनसे रूठ गई, बल्कि उनको श्राप भी दिया और सदा के लिए उनका साथ भी छोड़कर चली गई। इस श्राप के पीछे एक पौराणिक कथा है।

पद्मपुराण के अनुसार समुद्र मंथन के पश्चात् वज्रनाश नामक राक्षस ने पृथ्वीवासीयों को बहुत परेशान कर रखा था। वज्रनाश राक्षस से पृथ्वीवासीयों की रक्षा के लिए ब्रह्मदेव ने उसका वध कर दिया। उससे युद्ध करते समय उनके हाथों से कमल पुष्प गिर गया। जहां यह पुष्प गिरा उस स्थान पर एक झील का निर्माण हो गया जिसको ‘पुष्कर झील’ कहा गया। राक्षस वध के पश्चात् भगवान ब्रह्मदेव ने सृष्टि के कल्याण हेतु और मानव जाति को दुष्ट शक्तियों से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से यज्ञ का अनुष्ठान किया। ब्रह्मदेव यज्ञ करने के लिए नियत समय पर पहुंच गए, लेकिन उनकी पत्नी सावित्री समय पर नहीं पहुंच सकी। पूजा का शुभ मुहूर्त बीतता जा रहा था। एक-एक करके सभी देवी-देवता यज्ञ स्थली पर पहुंचते गए, लेकिन सावित्री का कोई अता-पता नहीं था। जब शुभ मुहूर्त निकलने लगा, तब कोई उपाय न देखकर ब्रह्मा ने वहां उपस्थित नन्दिनी गाय के मुख से गायत्री को प्रकट किया और उनसे विवाह कर अपना यज्ञ पूरा किया। उसी दौरान देवी सावित्री वहां पहुंची और ब्रह्मा के बगल में दूसरी स्त्री को बैठा देख क्रोधित हो गई। उन्होंने ब्रह्माजी को श्राप दिया कि प्रमुख देवता होने के बावजूद इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। इसके बाद गायत्री भी ब्रह्मा को त्यागकर सुमेरु पर्वत पर स्थित हो गई और सदा के लिए तपस्या में लीन हो गईं। गायत्री में तीनों देवियों के गुण विद्यमान हैं।

गायत्री का प्राचीन मन्दिर भी पुष्कर शहर में है। देवी गायत्री को शान्त करने के लिए ब्रह्मा ने ‘गायत्री मन्त्र’ की रचना की, परन्तु सावित्री ने इस मंत्र को भी शापित कर दिया। बाद में ब्रह्मा की आज्ञा से विश्वामित्र ने इस मन्त्र को पुनर्जीवित किया। पवित्रता के आधार पर इस मन्त्र का जाप महिलाओं के लिए वर्जित माना गया है। लेकिन सावित्री का गुस्सा इतने में ही शांत नहीं हुआ। उसने विवाह कराने वाले ब्राह्मण को भी श्राप दिया कि चाहे जितना दान मिले, ब्राह्मण कभी संतुष्ट नहीं होंगे। उन्होंने गाय को कलियुग में गंदगी खाने और नारद को आजीवन अविवाहित रहने का श्राप दिया। अग्निदेव भी सावित्री के कोप से बच नहीं पाए, उन्हें भी कलियुग में अपमानित होने का श्राप मिला। क्रोध शांत होने के बाद सावित्री पुष्कर के पास की पहाड़ियों पर जाकर तपस्या में लीन हो गई और फिर वहीं की होकर रह गई। कहते हैं कि यहीं रहकर सावित्री भक्तों का कल्याण करती हैं।

पुष्कर में जितनी अहमियत ब्रह्मा की है, उतनी ही सावित्री की भी है। सावित्री को सौभाग्य की देवी माना जाता है। मान्यता है कि यहां पूजा करने से सुहाग की लंबी उम्र होती है। यही वजह है कि महिलाएं यहां आकर प्रसाद के तौर पर मेहंदी, बिंदी और चूड़ियां चढ़ाती हैं और सावित्री से पति की लंबी उम्र मांगती हैं। वर्तमान में धरती पर इसी सावित्री देवी की पूजा ‘वट सावित्री व्रत’ के रूप में की जाती है।

नोट : हिन्दू धर्म ग्रंथों में सुमेरु पर्वत का वर्णन सोने के समान अलौकिक चमकीले रंग का है। इसे ब्रह्मा समेत समस्त देवी-देवताओं का निवास स्थान कहा गया है। विष्णु पुराण के अनुसार, रात्रि के समय यह पर्वत दूर से ही प्रकाशित होता है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार, यह पर्वत पृथ्वी की नाभि पर स्थित है। मत्स्य पुराण और भागवत पुराण में इसकी ऊंचाई 84 हजार योजन बताई गई है। जावा द्वीप (इंडोनेशिया) में प्रचलित लोक कथाओं में भी मेरु पर्वत का जिक्र देव शक्तियों के घर के रूप में मिलता है।