हिंदू देववाद पर वैदिक, पौराणिक, तांत्रिक और लोकधर्म का प्रभाव भी है। वैदिक धर्म में देवताओं के मूर्त रूप की कल्पना मिलती है। वैदिक मान्यता के अनुसार देवता के रूप में मूलशक्ति सृष्टि के विविध उपादानों में संयुक्त रहती है। सभी उपादानों में एक ही चेतना है। यही चेतना या शक्ति अनेक स्फुर्लिंगों की तरह, नाना देवों के रूप में एक ही परमात्मा की विभूतियाँ हैं। सनातन काल से शक्ति की उपासना का पर्व ‘शारदीय नवरात्र’ प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ मनाया जाता रहा है। सर्वप्रथम भगवान श्रीराम ने समुद्र तट पर इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारम्भ किया था। उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की। तब से असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘नौ रातें’। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र के नौ दिनों में आदिशक्ति के हर रूप की क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्यौहार है जिसे पूरे भारत में उत्साह के साथ मनाया जाता है।

माँ दुर्गा कौन हैं : मां दुर्गा हिन्दुओं की प्रमुख देवी हैं जिन्हें आदिशक्ति, अम्बा, जगदम्बा, सती, पार्वती, भवानी आदि अनेक नामों से भी जाना जाता हैं। यह शाक्त सम्प्रदाय की मुख्य देवी हैं जिनकी तुलना परमब्रह्म से की जाती है। शाक्त सम्प्रदाय हिन्दू धर्म के चार प्रमुख सम्प्रदायों में से एक है। शाक्त साम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है। दुर्गा का निरूपण सिंह पर सवार एक देवी के रूप में किया जाता है। दुर्गा देवी की आठ भुजाएं हैं जिनमें वह अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं। देवी दुर्गा को दक्षिण मे काली चंडी, उत्तर में शाकुम्भरी, पश्चिम में अंबाजी, पूर्व में काली रूप में पूजा जाता है। दुर्गा पूजा या दुर्गोत्सव अथवा शरदोत्सव दक्षिण एशिया में मनाया जाने वाला एक वार्षिक हिन्दू पर्व है जिसमें देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। दुर्गा पूजा का पर्व बुराई के प्रतीक राक्षस महिषासुर पर देवी दुर्गा की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। देवी दुर्गा की उत्पत्ति सभी देवताओं की संयुक्त शक्ति से हुई थी।

माँ दुर्गा के 9 रूप :

1. शैलपुत्री 2. ब्रह्मचारिणी 3. चन्द्रघंटा 4. कूष्माण्डा 5. स्कंदमाता
6. कात्यायनी 7. कालरात्रि 8. महागौरी 9. सिद्धी दात्री

1. शैलपुत्री : नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा स्वरूप में ‘शैलपुत्री’ के नाम से जानी जाती हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। नवरात्र पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। इस देवी ने दाएँ हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएँ हाथ में कमल सुशोभित है। यह सती के पुर्नजन्म रूप में भी जानी जाती हैं। शिव के तिरस्कार से आहत होकर सती ने स्वयं को जलाकर भस्म कर लिया था। यही सती अगले जन्म में पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्मी और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री का विवाह भी फिर से भगवान शिव से हुआ। शिव से विवाह करने के लिए इनको घोर तप करना पड़ा था। इस दिन योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है।

2. ब्रह्मचारिणी : नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। नारदजी के उपदेश से देवी ने भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। वर्षों तक निर्जल और निराहार रहकर कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया। इस कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। कहते है माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से सर्वसिद्धी प्राप्त होती है। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होता है।

3. चंद्रघंटा : नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन माँ दुर्गा की तीसरी शक्ति चंद्रघंटा की पूजा होती है। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाई देने लगती हैं। इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है। देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी माना गया है। इसके मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चन्द्र है। इसीलिए इस देवी को चन्द्रघण्टा कहा गया है। सिंह पर सवार इस देवी की अष्टभुज मुद्रा युद्ध के लिए उद्दत रहने की है। इसके घण्टे की भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस काँपते रहते हैं।

4. कूष्माण्डा : नवरात्र के चैथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन अनाहत चक्र में अवस्थित होता है। अण्ड से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कुष्माण्डा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार था, तब अष्टभुजा धारिणी देवी ने अपनी शक्ति से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा गया है। ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है। यह देवी आधि-व्याधियों से मुक्त करती हैं और सुख-समृद्धी और उन्नति प्रदान करती हैं। अंतः इस देवी की उपासना में भक्तों को सदैव तत्पर रहना चाहिए।

5. स्कंदमाता : नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। इस देवी की चार भुजाएँ हैं। ऊपर की दोनों भुजाओं में कमल पुष्प है। यह नीचे की दायीं तरफ की भुजा से स्कन्द को गोद में पकड़े हुए हैं और नीचे वाली बायीं तरफ की वरदमुद्रा में हैं। स्कन्दमाता अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। स्कन्द कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कन्दमाता नाम से अभिहित किया गया है। इस दिन साधक का मन मूलाधार चक्र में स्थित रहता है। यह कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं, इसलिए इसे पद्मासना देवी भी कहा जाता है।

6. कात्यायिनी : माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। महर्षि कात्यायन ने देवी अम्बा की कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि उन्हें पुत्री प्राप्त हो। माँ भगवती ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाई। भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी। यह पूजा कालिन्दी (यमुना) के तट पर की गई थी। इस देवी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है।

7. कालरात्रि : माँ दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन चर्तुभुजी माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन सहस्रार चक्र में स्थित रहता है। इसकी भक्ति से ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धीयों का द्वार खुलने लगता है। कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्माण्ड की तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है। इनके शरीर का रंग घने अन्धकार की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनकी साँसों से अग्नि की तरह गरम हवा निकलती रहती है। यह गर्दभ की सवारी करती हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।

8. महागौरी : माँ दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। नाम से प्रकट है कि इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चन्द्र और कुन्द के फूल से की गई है। शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती ने कठोर तपस्या की थी, जिससे इनका शरीर काला पड़ गया। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोकर कान्तिमय बना दिया। उनका रूप गौर वर्ण का हो गया, इसीलिए यह महागौरी कहलाई। कहते हैं जो स्त्री बैल पर सवार, चार भुजा धारी, माँ महागौरी की पूजा भक्ति भाव सहित करती है, उसके सुहाग की रक्षा देवी स्वंय करती हैं।

9. सिद्धीदात्री : माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धीदात्री है। यह देवी सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। माना जाता है कि इनकी पूजा करने से बाकी देवीयों कि उपासना भी स्वंय हो जाती है। मान्यता है कि पूर्ण निष्ठा और विधि-विधान के साथ सच्चे मन से इस देवी की उपासना-आराधना करके सभी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और अमृत पद की ओर ले जाता है। हिमाचल के नन्दापर्वत पर इनका प्रसिद्ध तीर्थ है।