श्राद्ध का महत्त्व
मनुष्य अपने जीवन में पाप और पुण्य दोनों कर्म करता रहता है। उसे अपने पुण्य कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग के सुख और पाप कर्मों के कारण नरक की यातनाएं भोगनी पड़ती हैं। मनुष्य योनि तथा देवयोनि के मध्य होती है प्रेत योनि। इसमें मनुष्य का शरीर वायु रूप में, मोह या द्वेष के कारण पितृलोक में निवास करता है। पित्तरों और देवताओं की योनि ऐसी है कि वह दूर से कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा ग्रहण कर लेते हैं और दूर से की गई स्तुतियों से ही प्रसन्न हो जाते हैं। देवता और पित्तर, वर्तमान, भूतकाल व भविष्य सब जानते हैं और सभी जगह आसानी से पहुंच सकते हैं। देवता और पित्तर गंध व रस तत्त्व से तृप्त होते हैं। जैसे मनुष्यों का आहार अन्न है, पशुओं का आहार तृण है, वैसे ही पित्तरों का आहार अन्न का सारतत्त्व ‘गंध’ और ‘रस’ है। अतः वह अन्न व जल का सारतत्त्व ही ग्रहण करते हैं। शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं रह जाती है। नाम व गोत्र के उच्चारण के साथ जो अन्न-जल आदि पित्तरों को दिया जाता है, विश्वदेव एवं अग्निष्वात हव्य-कव्य को पित्तरों तक पहुंचा देते हैं।
पितृ दोष के लक्षण व उपाय :
मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष में पितृ धरती पर आते हैं। पितृ पक्ष में पितृ दोष की पूजा को उत्तम माना गया है। ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष को अशुभ माना गया है। जिस व्यक्ति की जन्म कुंडली में पितृ दोष बनता है, उसका जीवन संकट और परेशानियों से भरा रहता है। पितृ दोष की स्थिति में घर के मुखिया का सम्मान कम होने लगता है। घर में प्रवेश करते ही मन खराब होने लगता है, कलह और तनाव की स्थिति बनी रहती है। व्यक्ति कर्ज में डूब जाता है या बुरी संगत में पड़ जाता है। पितृ पक्ष में पितृ दोष का उपाय करना अच्छा माना गया है। पूजा करते समय पितरों का स्मरण करें, जीवन में की गई गलतियों की माफी मांगे। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं, जिसमें हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं। किसी की भी मृत्यु इन 16 तिथियों को छोड़कर अन्य किसी दिन नहीं होती है।
पित्तरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का भाव ही श्राद्ध है। श्राद्ध पक्ष वर्षा काल के बाद आता है। मान्यता है कि वर्षा के बाद आकाश पूरी तरह से साफ हो जाता है, इसलिए इस अवधि में हम अपने पित्तरों तक अपने श्रद्धा भाव पहुंचाते हैं। वैसे तो हर अमावस्या और पूर्णिमा को, पित्तरों के लिये श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। लेकिन आश्विन शुक्ल पक्ष के 15 दिन, श्राद्ध के लिये विशेष माने गये हैं। इन 15 दिनों में अगर पित्तर प्रसन्न रहते हैं, तो जीवन में कोई कमी नहीं रहती। लेकिन गलत तरीके से किये गये श्राद्ध से पित्तर नाराज होकर शाप भी दे देते हैं। इसलिये श्राद्ध में निम्न बातों का खास ध्यान रखना चाहिये –
⁜ श्राद्ध की दो प्रक्रियाएं हैं – एक पिंडदान और दूसरी ब्राह्मण भोजन। ब्राह्मणों को भोजन करवाने से अथवा पिण्ड दान से पित्तरों को भोजन दिया जाता है।
⁜ श्राद्ध सामान्यतः 11 बजे से 2 बजे तक किया जाता है। सूर्यास्त के बाद श्राद्ध विधि कभी भी न करें, क्योंकि रात्रि राक्षसों का समय होता है। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं किया जाता है।
⁜ यह संस्कार प्रथम बार मृतक का अंत्येष्टि संस्कार होने के 3, 12 अथवा 17 दिन के बाद किया जाता है। यह संस्कार पुतला, बच्चा और सन्यासी का 3 दिन बाद, वृद्ध और गृहस्थ का 12 दिन बाद और असाध्य रोगी व्यक्ति का 17 दिन बाद किया जाना चाहिए।
⁜ श्राद्ध के दिन घर की प्रमुख महिला सुबह उठकर स्नान करके रसोईघर को गाय के गोबर लिपकर या गंगाजल से पवित्र करके पित्तरों के लिए भोजन बनाएं।
⁜ गाय, कुत्ते, कौए, चींटी और पित्तरदेव को भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों को भोजन करायें।
⁜ भोजन से चार भाग गाय, कुत्ता, कौआ व चींटी के लिए निकालें। कुत्ते और कौए का भोजन, कुत्ते और कौए को ही खिलायें। चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं।
⁜ श्राद्ध में आमंत्रित ब्राह्मण पित्तरों के प्रतिनिधि स्वरूप होते हैं। अतः ब्राह्मणों को भोजन दोनों हाथों से परोसें, एक हाथ से परोसा गया भोजन राक्षस (नकारात्मक शक्तियां) छीन लेते हैं।
⁜ ब्राह्मण स्वस्तिवाचन तथा वैदिक पाठ करें तथा गृहस्थ एवं पित्तर के प्रति शुभकामनाएं व्यक्त करें।
⁜ श्राद्ध तर्पण में दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल से पित्तरों को तृप्त किया जाता है। पित्तरों के निमित्त अग्नि में गाय का दूध, दही, घी एवं खीर अर्पित करें।
⁜ यज्ञ की बहन और दान की पत्नी दक्षिणा है। दान का फल दक्षिणा देने पर ही मिलता है। अन्नदान से अन्न और वस्त्रदान से वस्त्र पित्तरों तक पहुंचाया जाता है।
⁜ श्राद्ध के भोजन में चना, मसूर, उड़द, कुलथी दाल, सत्तू, मूली, गाजर, बैंगन, लौकी, सरसों, मांस आदि न पकायें। श्राद्ध के भोजन में काला नमक व काला जीरा भी निषिद्ध माने गए हैं।
⁜ आर्थिक समस्या या अन्य कारणों से यदि कोई व्यक्ति बड़ा श्राद्ध नहीं कर सकता, लेकिन अपने पित्तरों की शांति के लिए वास्तव में कुछ करना चाहता है, तो उसे पूर्ण श्रद्धाभाव से अपने सामथ्र्य अनुसार उपलब्ध अन्न, साग-पात, फल और दक्षिणा किसी ब्राह्मण को उसके घर पर ही आदर भाव से दे देनी चाहिए।
⁜ यदि उपरोक्त में से कुछ भी करने में असमर्थ हो तो हाथ में पानी का लौटा लेकर सूर्य को अर्ध्य दें। अपने दोनों हाथ उठाकर सूर्यदेव से प्रार्थना करनी चाहिए कि, ‘हे सूर्य देव! मैंने अपने हाथ आपके समक्ष फैला दिए हैं, मैं अपने पित्तरों की मुक्ति के लिए आपसे प्रार्थना करता हूँ, मेरे पित्तर संतुष्ट हो’। इससे भी व्यक्ति को पितृ ऋण से मुक्ति मिल सकती है।
⁜ घर में किए गए श्राद्ध का पुण्य, तीर्थ स्थल पर किए गए श्राद्ध से आठ गुना अधिक मिलता है। जो भी श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है उसकी स्मरणशक्ति, धारणाशक्ति, पुत्र-पौत्रादि एवं ऐश्वर्य की वृद्धि होती।
श्राद्ध कब करें : जिस तिथि को घर में किसी महिला या पुरुष का निधन हुआ हो, उसी तिथि को संबंधित व्यक्ति का श्रा( किया जाता है। लेकिन यदि मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो तो इसके कुछ खास बातें यहां बता रहे हैं –
⁜ सौभाग्यवती स्त्री का श्राद्ध नवमी के दिन किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे अविधवा नवमी माना गया है।
⁜ यदि कोई व्यक्ति संन्यासी रहा है तो उसका श्राद्ध द्वादशी के दिन किया जाता है।
⁜ बीमारी, शस्त्राघात या किसी अन्य दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति का श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है।
⁜ यदि हमें अपने किसी पूर्वज के निधन की तिथि नहीं मालूम हो तो उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इसीलिए इसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है।
⁜ आश्विन शुक्ल की प्रतिपदा को दादी और नानी का श्राद्ध करने का विधान है।
श्राद्ध में कौए, श्वान और गाय का महत्व :
⁜ गाय में सभी देवी-देवताओं का वास माना गया है। किसी गाय को घास खिलाने से भी पित्तर प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार आप पित्तरों को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद लेकर अपने कष्ट दूर कर सकते हैं।
⁜ पितृपक्ष अशुभ होने से अवशिष्ट खाने वाले को ग्रास देने का विधान है। श्वान और कौए पित्तरों के वाहक हैं। एक भूमिचर है, दूसरा नभचर। दोनों गृहस्थों के निकट और सभी जगह पाए जाने वाले जीव हैं।
⁜ श्वान निकट रहकर सुरक्षा प्रदान करता है और निष्ठावान माना जाता है, इसलिए पितृ का प्रतीक है।
⁜ कौए को गृहस्थ और पितृ के बीच श्राद्ध में दिए गए पिंड और जल का वाहक माना गया है।