भारतीय संस्कृति में महिलाओं के लिए श्रृंगार का अत्यधिक महत्व होता है। विवाहित (सुहागन) महिलाओं के लिए 16 श्रृंगार बहुत अहम माने जाते हैं, लेकिन आजकल इन 16 में से कोई आधे भी अपना ले तो गनीमत है। फैशन की खुमारी कुछ इस तरह चढ़ी है कि 16 श्रृंगार के मायने पूरी तरह से बदल चुके हैं। आजकल लोग इन परंपराओं को नहीं मानते और यदि कोई मान्यता देता भी है तो उसे अपनी सहूलियत के हिसाब से बदल देता है। इसमें भी कोई ताज्जुब नहीं कि कामकाजी महिलाओं को 16 श्रृंगार के नाम तक भी नहीं मालूम होंगे। सोलह श्रृंगार का रिश्ता हमेशा से ही औरतों की खूबसूरती के साथ जुड़ता आया है। यदि दूसरे शब्दों में कहा जाये तो सोलह श्रृंगार और औरतों की खूबसूरती के बीच में चोली-दामन जैसा ही रिश्ता है। लेकिन यह जानने से पहले कि महिलाओं के सोलह श्रृंगार में कौन-कौन से साजो-सामान आते हैं, यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिरकार यह सोलह श्रृंगार होते क्या हैं और इनका महिलाओं के जीवन में क्या महत्त्व है। महिलाओं की सुंदरता और खुद को संवारने के लिए किया गया श्रृंगार अधूरा है, यदि उनके श्रृंगार में सोलह श्रृंगार शामिल न हो। हिन्दू महिलाओं के सोलह श्रृंगार का रिश्ता उनके सुहाग से जुड़ा होता है। सोलह श्रृंगार उनके सुहाग को लंबी उम्र के साथ साथ उनके घर परिवार की खुशियों को बरकरार रखने में मदद करता है।

अतः यहां महिलाओं के प्रमुख 16 श्रृंगारों का वर्णन किया जा रहा है।

1. स्नान करना : प्रातः काल उठकर सबसे पहले हम शौच आदि से निवृत होकर स्नान करते है, फिर अपने इष्टदेव की आराधना करते है और उसके बाद अपनी जीविकोपार्जन के लिए कर्म करते है। नौं छिद्रों वाले अत्यन्त मलिन शरीर से दिन-रात मल निकलता रहता है, अतः प्रातःकाल स्नान करने से शरीर की शुद्धि होती है। स्नान के अनेक प्रकार काव्यों में वर्णित मिलते हैं। इनमें सबसे अधिक लोकप्रिय स्नान जलविहार या जलक्रीड़ा है। इसमें अधिकांशतः स्नान के जल को पुष्पों से सुरभित कर लिया जाता था, जैसे आजकल ‘बाथसाल्ट’ का प्रयोग किया जाता है। एक प्रकार के साबुन का भी प्रयोग होता था जो ‘फेनक’ कहलाता था और जिसमें से झाग भी निकलते थे। स्नान के पहले उबटन लगाने का भी प्रचलन था। इसका दूसरा नाम अंगराग है। अनेक प्रकार के चंदन, अर्क, और सुगंध मिलाकर इसे बनाते थे। सर्दी और गर्मी में यह अलग प्रकार का बनाया जाता था। सुगंध और शीतलता के लिए इसका प्रयोग करते थे। स्नान के पश्चात् स्वच्छ एवं सुन्दर वस्त्र धारण किए जाते हैं।

2. बाल संवारना : स्नान के पश्चात् बालों को धूप में सुखाते हैं। महिलाओं में चंदन की लकड़ी के धुएं से बालों को सुगंधित करके मोती और फूल गूंथने का रिवाज था। बालों की सुंदरता बढ़ाने के लिए गजरा भी लगाया जाता था। महिलाएं जूड़ा बनाकर भी उस पर गजरा लगा सकती हैं या फिर चोटी बनाकर भी इसे बालों के ऊपर बांध सकती हैं। बालों के साथ ही चंदन का लेप लगाकर चेहरे का श्रृंगार किया जाता है। गाल, मस्तक और भवों के आसपास केसर, कुमकुम या लाल और श्वेत चंदन से अनेक प्रकार के फूल-पत्ती और बिंदी बनाई जाती थीं। ठोडी पर काजल के छोटे-छोटे तिल बनाने का भी रिवाज था। आजकल यह कार्य ब्यूटी पाॅर्लर में किया जाता है। आभूषणों की तो अनन्त परंपरा थी, जिन्हें पुरुष और महिला दोनों ही धारण करते थे। मध्यकाल में तो आभूषणों का प्रयोग इतना बढ़ा कि शरीर का शायद ही कोई भाग बचा हो जहाँ गहने न पहने जाते हों।

3. मांग में सिन्दूर : हिन्दू धर्म में विवाहित महिलाएं अपनी मांग में सिंदूर अवश्य लगाती हैं जो उनके सुहागिन होने की प्रमुख निशानी होता है। महिलाएं अपने पति की लम्बी उम्र की कामना के लिए अपनी मांग में सिंदूर अवश्य लगाती हैं। सिंदूर सिर के बिलकुल मध्य भाग में लगाया जाता है क्योंकि यह जगह अति संवेदनशील होती है। शरीर की समस्त क्रियाएं यहीं से प्रसारित होती हैं। इस जगह सिंदूर लगाने से दिमाग तनाव मुक्त, शान्त एवं तन्दुरूस्त रहता है। इससे चेहरे पर झुर्रियां भी नहीं पड़ती। सिंदूर पारा नामक धातु से बनता है जो इस जगह को चैतन्य अवस्था में रखता है। सिंदूर विवाह के बाद लगाया जाता है। क्योंकि विवाह के बाद महिला की सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं और अतः दिमाग को शांत और व्यवस्थित रखना जरूरी हो जाता है। आजकल महिलाएं अपनी मांग में कलर पेंसिल लगाती हैं जोकि धार्मिक एवं स्वास्थ्य दोनों तरह से गलत है।

4. माथे पर मांग टिका : माथे के बीचों-बीच पहने जाने वाला यह आभूषण सिंदूर के साथ मिलकर महिलाओं की सुंदरता में चार चांद लगा देता है। ऐसा माना जाता है कि नववधू को मांग टीका सिर के बीचों-बीच इसलिए पहनाया जाता है ताकि वह विवाह के बाद हमेशा अपने जीवन में सही और सीधे रास्ते पर चले।

5. माथे पर बिन्दी : सुहागिन स्त्रियों को अपने माथे (ललाट) पर कुमकुम या सिंदूर से लाल बिंदी लगानी चाहिए। कुमकुम या सिंदूर की बिंदी को माथे पर लगाना पवित्र माना जाता है। आजकल स्टीकर बिंदी का चलन है, चाहें तो इसे भी लगा सकती हैं। बिंदी माथे पर दोनों भौहों के मध्य में लगाई जाती है। माथे पर बिंदी हमेशा मध्यमा उंगली से लगाना शुभ होता है।

6. आंखों में काजल/सुरमा : महिलाएं अपनी आंखों की सुंदरता बढ़ाने के लिए काजल लगाती हैं। चेहरे की सबसे खूबसूरत चीज और मन का आईना होती हैं आपकी आंखें, जिनका श्रृंगार होता है काजल। इसके अलावा काजल बुरी नजर से भी बचाए रखता है। पहले काजल घर में घी या तेल से भी बनाया जाता था। प्रतिदिन रात में काजल लगाने से आँखे स्वस्थ रहती है।

7. गले का मंगलसूत्र : विवाहित महिलाओं का सबसे खास और पवित्र गहना मंगल सूत्र माना जाता है। इसके काले मोती महिलाओं को बुरी नजर से बचाते हैं। यह सुहागन स्त्री की प्रथम और प्रमुख निशानी है। हार, कंठी, माला आदि गले में पहने जाने वाले अन्य आभूषण हैं। सभी सुहागन महिलाओं को मंगलसूत्र हमेशा पहनकर रखना चाहिए, लेकिन रात को नहीं।

8. कान के कुण्डल/बालियां : कान में पहने जाने वाला यह आभूषण चेहरे की सुंदरता को बढ़ाने का काम करता है। इसे पहनने से महिलाओं का चेहरा खिल उठता है। मान्यता है कि विवाह के बाद बहू को खासतौर से पति और ससुराल वालों की बुराई करने और सुनने से बचना चाहिए। कानों में झुमके, बालियां आदि पहनना केवल फैशन नहीं है, इनका शरीर पर एक्युपंचर प्रभाव भी पड़ता है। कान में छेद कराकर उसमें कोई धातु धारण करना मासिक धर्म को नियमित करने में सहायक होता है। शरीर को ऊर्जावान बनाने के लिए सोने के ईयररिंग और ज्यादा ऊर्जा को कम करने के लिए चांदी के ईयररिंग्स पहनने की सलाह दी जाती है। इसी तरह अलग-अलग तरह की स्वास्थ्य समस्याओं के लिए अलग-अलग धातु के ईयररिंग्स पहनने की सलाह दी जाती रही है।

9. नाक की नथ (विवाहित) : सुहागिन स्त्रियों के लिए नाक में आभूषण पहनना अनिर्वाय माना जाता है। नाक में नथ पहनने से स्त्री की सुन्दरता और भी बढ़ जाती है। महिलाओं को कान, नाक और गले में स्वर्ण आभूषण अवष्य पहनना चाहिए। आजकल महिलाएं नाक में छोटी नोजपिन पहनती हैं, जिसे लौंग भी कहा जाता है।

10. हाथों में मेहंदी : मेहंदी के बिना हर सुहागन का श्रृंगार अधूरा माना जाता है। विवाह, व्रत, त्यौहार तथा किसी भी शुभ कार्यक्रम के दौरान महिलाएं हाथों और पैरों मे मेहंदी रचाती हैं। ऐसा माना जाता है कि नववधू के हाथों में मेहंदी जितनी गाढ़ी रचती है, ससुराल में उसे उतना ही अधिक प्रेम मिलता है। सभी महिलाओं को मेहंदी अवश्य लगानी चाहिए।

11. कलाई में चूड़ियां : चूड़ियां सुहाग का प्रतीक मानी जाती हैं। ऐसा माना जात है कि सुहागिन स्त्रियों की कलाइयां चूड़ियों से भरी हानी चाहिए। नई दुल्हन की चूड़ियों की खनक से उसकी उपस्थिति का एहसास होता है। चूड़ियों के रंगों का भी विशेष महत्त्व है। लाल रंग की चूड़ियां इस बात का प्रतीक होती हैं कि विवाह के बाद वह पूरी तरह खुश और संतुष्ट है। हरा रंग विवाह के बाद उसके परिवार के समृद्धि का प्रतीक होता है। विवाहित महिलाओं के लिए हाथों में कांच की चूड़ियां पहनना शुभ माना जाता है। लेकिन हाथ में चिटकी हुई चूड़ियां पहनना अशुभ माना जाता है। इन्हें समय पर बदल देना चाहिए। इसके पीछे एक विज्ञान छुपा है। दरअसल, कांच में सात्विक और चैतन्य अंश प्रधान होते हैं। इस वजह से चूड़ियों के आपस में टकराने से जो आवाज पैदा होती है वह नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाती है।

12. बाजूबंद : कड़े के सामान आकृति वाला यह आभूषण सोने या चांदी का बना होता है। यह बाहों में कोहनी के ऊपर पहना जाता है, इसलिए इसे बाजूबंद कहा जाता है। पहले सुहागिन स्त्रियों को हमेशा बाजूबंद पहने रहना अनिवार्य माना जाता था। मान्यता है कि स्त्रियों को बाजूबंद पहनने से परिवार के धन की रक्षा होती है।

13. हाथ की उंगलियों में अंगूठी : यह हाथों में उंगलियों की शोभा एवं सुन्दरता बढ़ाने वाला आभूषण हैं। यह सोने एवं चांदी से बनी होती है। आजकल इसमें अन्य धातुओं का भी प्रयोग होने लगा है। विवाह के पहले मंगनी या सगाई की रस्म में वर-वधू द्वारा एक-दूसरे को अंगूठी पहनाई जाती है। अंगूठी को सदियों से पति-पत्नी के आपसी प्यार और विश्वास का प्रतीक माना जाता रहा है। ग्रह शान्ति के लिए इनमें रत्न भी धारण किए जाते हैं।

14. कमर में कमरबंद/तागड़ी : कमरबंद कमर में पहना जाने वाला चांदी का आभूषण होता है, जिसे स्त्रियां विवाह के बाद पहनती हैं। कमरबंद इस बात का प्रतीक है कि सुहागन अब अपने घर की स्वामिनी है। इसमें महिलाएं चाबियों का गुच्छा अपनी कमर में लटकाकर रखती है।

15. पाजेब/पायल : पैरों के टखने पर पहने जाने वाले आभूषण हमेशा सिर्फ चांदी से ही बने होते हैं। हिंदू धर्म में सोना को पवित्र धातु का स्थान प्राप्त है, जिससे बने मुकुट देवी-देवता धारण करते हैं और ऐसी मान्यता है कि पैरों में सोना पहनने से धन की देवी-लक्ष्मी का अपमान होता है। चांदी की पायल पहनने से पैरों की पिंडलियां, कमर, पीठ, एड़ी, घुटनों के दर्द और हिस्टीरिया रोगों से राहत मिलती है। इसके अतिरिक्त चांदी की पायल हमेशा पैरों से रगड़ाती रहती है जो स्त्रियों की हड्डियों के लिए काफी फायदेमंद है। इससे उनके पैरों की हड्डी एवं नसों को मजबूती मिलती है।

16. पैरों की उंगलियों में बिछिया : पैरों के अंगूठे और छोटी अंगुली को छोड़कर बीच की तीसरी अंगुली में चांदी का बिछिया पहना जाता है। विवाह में फेरों के वक्त लड़की जब सिलबट्टे पर पैर रखती है, तो उसकी भाभी उसके पैरों में बिछुआ पहनाती है। यह रस्म इस बात का प्रतीक है कि दुल्हन विवाह के बाद आने वाली सभी समस्याओं का हिम्मत के साथ मुकाबला करेगी। विवाहित हिंदू महिलाओं के पैरों में बिछिया जरूर नजर आ जाता है। इसे पहनने के पीछे भी विज्ञान छिपा है। पैर की जिन उंगलियों में बिछिया पहना जाता है उसका कनेक्शन गर्भाशय और दिल से है। इन्हें पहनने से महिला को गर्भधारण करने में आसानी होती है और मासिक धर्म चक्र भी नियम से चलता है। आमतौर पर बिछिया चांदी की होने की वजह से यह जमीन से ऊर्जा ग्रहण करती है और पूरे शरीर तक पहुंचाती है।

हिन्दू धर्म में जिस तरह लाल रंग विवाहित महिला के जीवन में खुशियों और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है ठीक उसी तरह एक रंग ऐसा भी है जिसे पहनना वर्जित माना गया है और वो है काला रंग। किसी भी शुभ अवसर पर काले रंग के कपड़े पहनना बेहद अशुभ माना जाता है। अतः इस बात का विशेष ध्यान रखें कि कोई भी शुभ अथवा धार्मिक कार्य करते समय काले कपड़े न पहनें।