किसी आकृति, चित्र, प्रतिमा या प्रतीक पर श्रद्धा रखना ‘मूर्तिपूजा’ कहलाता है। मन के भावों को व्यक्त करने के लिए उपासना की प्रतीक मूर्तियों और छवियों का आश्रय लिया जाता है। इसमें व्यक्तिगत या सामुदायिक जाप, भजन, गायन, कीर्तन व आरती शामिल हैं। मन्दिरों में मूर्ति को श्रद्धा और भक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में व्यवहार करने के लिए संरक्षित किया जाता है। इस तरह मूर्ति आधारित मन्दिरों का विस्तार हुआ।

सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव आकाश, अग्नि, समुद्र, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र आदि की शक्ति से परिचित था। वह जानता था कि यह शक्तियां मानव शक्ति से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है, इसलिए वह इनकी आराधना करता था। बाद में धीरे-धीरे इसमें बदलाव आने लगा। वह मानने लगा कि कोई ऐसी शक्ति भी है, जो इन सभी को संचालित करती है। इस प्रकार उपासना के दो रूप साकार तथा निराकार प्रचलित हुए। हमारे ऋषि-मुनियों ने दोनों पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया था। निराकारवादी प्रायः साकार उपासना या मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं। मूर्तिपूजा के विरोध को ‘एनीकोनिज्म’ और इनको नष्ट करना ‘इकोनोक्लैज्म’ कहा जाता है। यह विरोधाभास धार्मिक समूहों के बीच हिंसा के साथ रहता है।

हिन्दू धर्म में उपासना की तमाम पद्धतियां प्रचलित हैं। इसमें साकार की उपासना भी होती है और निराकार की भी की जाती है। साकार ईश्वर की उपासना में मूर्तिपूजा का विशेष महत्व है। व्यक्ति का मन अत्यधिक चंचल और नकारात्मक होता है। मन को एकाग्र करने के लिए किसी आधार का होना आवश्यक है। अतः भक्ति में एकाग्रता के लिए मूर्ति का प्रयोग होता है। मूर्ति से चीजें थोड़ी आसान और भावनात्मक हो जाती हैं। किसी दैवीय आकृति या चित्र को मूर्ति या प्रतिमा कहा जाता है। हिंदू धर्म में मूर्ति एक छवि है, असली चीज नहीं है, लेकिन दोनों ही मामलों में छवि दर्शकों को भावनात्मक और वास्तविक मूल्य के बारे में याद रहती है। छवियों के चिंतन से प्रसन्नता, विश्वास, दृढ़ भक्ति का उदय होता है। इस प्रकार भक्ति के माध्यम से मोक्ष का शाही मार्ग उदय हो जाता है, जो धर्म का अन्तिम लक्ष्य है। शिवलिंग की पूजा का प्रचलल पुराणों की देन है। धीरे-धीरे नाग और यक्षों की पूजा का प्रचलन बढ़ने लगा। बौद्ध और जैन धर्म में भी मूर्तिपूजा भक्ति की एक आमप्रथा रही है।

मान्यता है कि भारत में मूर्तिपूजा का प्रचलन वैदिक काल से हुआ है। इससे पूर्व न तो मन्दिर थे और न ही मूर्ति, क्योंकि इसका इतिहास में कोई साक्ष्य नहीं मिलता। वेदों के अनुसार ईश्वर की न तो कोई प्रतिमा या मूर्ति है और न ही उसे प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है। इन्द्र और वरुण आदि देवताओं की चर्चा जरूर होती है। यह सही भी है कि आज तक परमात्मा की कोई मूर्ति नहीं बनी है। जब देवी, देवताओं, पितरों, गुरुओं और भगवानों की मूर्ति बनी, उसके बाद मूर्तिपूजा इतिहास का अभिन्न अंग रही है। भारत में समय-समय पर शक, कुषाण, हुण, मुगल, पठान, तुर्क, अंग्रेज आदि अनेक विदेशी संस्कृतियों का आक्रमण होता रहा है। इनमें जो लोग अनिश्वरवादी थे और निराकार ईश्वर को नहीं मानते थे, उन्होंने अपने आराध्य, पूर्वज आदि की मूर्तियां बनाकर उन्हें पूजना आरम्भ कर दिया। इससे हमारी संस्कृति एवं सभ्यता भी काफी प्रभावित हुई है।

मूर्तियां तीन तरह के लोगों ने बनाईं- एक वह जो वास्तु और खगोल विज्ञान के जानकार थे, उन्होंने तारों और नक्षत्रों के मंदिर बनाए। ऐसे दुनियाभर में सात मंदिर थे। दूसरे, वह जो अनीश्वरवादी अपने पूर्वजों या प्राॅफेट के मरने के बाद उनकी याद में मूर्ति बनाते थे। तीसरे वह, जिन्होंने बाद में अपने-अपने देवता गढ़ लिए थे। हर कबीले का एक देवता या कुलदेवता और कुलदेवी होते थे। महावीर स्वामी और बुद्ध के जाने के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ा और हजारों की संख्या में संपूर्ण देश में जैन और बौद्ध मंदिर बनने लगे। जिसमें बुद्ध और महावीर की मूर्तियां रखकर उनकी पूजा होने लगी। इन मंदिरों में हिन्दू भी बड़ी संख्या में जाने लगा जिसके चलते बाद में दुर्गा, विष्णु, शिव, राम, कृष्ण, शनि देव और हनुमान आदि देवी-देवताओं के मन्दिर बनाए जाने लगे।

मूर्ति या पत्थर की पूजा क्यों करते हैं?

मूर्तिपूजा, ईश्वर तक पहुंचने के रास्ते को सरल बनाती है। मन की एकाग्रता और चित्त को स्थिर करने में मूर्तिपूजा से सहायता मिलती है। मूर्ति को आराध्य मानकर उपासना करने और नैवेद्य अर्पित करने से सम्बन्धित देवता के प्रति मन में आस्था और विश्वास उत्पन्न होता है। ईश्वर में श्रद्धा, आस्था और विश्वास ही जीवन की सफलता और मनोकामनाओं की पूर्ति का आधार है। जब हम वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र आदि की शक्तियों का प्रचूर लाभ उठाते हैं तो इनके प्रतीक देवताओं की मूर्ति पूजा का विरोध क्यों होता है? परमात्मा भी प्रकृति की इन शक्तियों के बिना कुछ नहीं कर सकता, यहां तक कि सृष्टि भी नहीं रच सकता। परमात्मा की उपासना के लिए उसके आश्रय स्वरूप जड़ प्रकृति की पूजा करनी पड़ती है क्योंकि जड़ और चेतन का परस्पर गहरा सम्बन्ध है। अतः परमात्मा किसी मूर्ति के बिना उपास्य कैसे हो सकता है?

मूर्ति में विराजमान ईश्वर अपनी रक्षा क्यों नहीं कर पाते?

वेदों में केवल और केवल एक ही ईश्वर की उपासना का विधान हैं। वेदों में जो अनेक देवता लिखे हैं, वह सब प्राकृतिक शक्तियां हैं। जिस प्रकार व्यक्ति का चित्र व्यक्ति स्वयं नहीं होता और अपनी रक्षा नहीं कर सकता। उसी प्रकार मूर्ति परमात्मा का प्रतीक होती है स्वयं परमात्मा नहीं। काशी के बारे में पढ़ने या सुनने से भी अधिक प्रभावी होता है उसका प्रत्यक्ष दर्शन। ठीक उसी प्रकार जीवन का लक्ष्य हासिल करने के लिए किसी भी वस्तु का प्रत्यक्ष दर्शन यानी व्यावहारिक ज्ञान सबसे अधिक जरूरी है। ऋग्वेद भाष्य मंत्र 1/164/39 में यहीं भाव इस प्रकार दिया हैं- उस परमात्मा देव में सब देव अर्थात दिव्य गुण वाले सुर्यादी पदार्थ निवास करते हैं। वेदों का स्वाध्याय करके उसी परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। जो लोग उसको न जानते, न मानते और उसका ध्यान नहीं करते, वह नास्तिक मंदगति, सदा दुःख सागर में डूबे ही रहते हैं। वैदिक काल में भी निराकार ईश्वर की पूजा होती थी जिसे कालांतर में मूर्ति पूजा का स्वरुप दे दिया गया।

किस प्रकार करें मूर्ति का चुनाव :

मूर्ति हमारी श्रद्धा, आस्था और विश्वास का प्रतीक हैं, अतः प्रतिदिन इनकी पूजा अवश्य करें।
घर में पूजा के लिए छोटी मूर्ति का प्रयोग करें। मूर्ति पूजा को अंतिम पूजा न मानें।
मूर्तियां किसी मिश्रधातु या मिट्टी की और छः ईंच तक ऊंची हो तो बेहतर होगा।
घर के मन्दिर में रखी मूर्ति का मुंह अन्दर की तरफ, आशीर्वाद की मुद्रा में हो तो उत्तम होगा।
गणेश जी की बाईं तरफ की सूंड वाली उत्तम मानी गई है। लक्ष्मी की मूर्ति गणेश जी के दाईं तरफ रखें।
घर के मन्दिर में रखे शिवलिंग का आकार अंगूठे के आकार से बड़ा नहीं होना चाहिए।
किसी भी देवता की एक से अधिक मूर्ति नहीं होनी चाहिए। अलग-2 देवताओं की मूर्तियां रख सकते हैं।
मूर्ति ठीक से बनी हुई हो और सुंदर हो। युद्ध की मुद्रा या निद्रा की मुद्रा की मूर्तियों का प्रयोग न करें।
जब मूर्तियां पुरानी हो जाएं या रूप खराब हो जाए तो उनका जल विसर्जन करें।
नदियों में विसर्जन के बजाय इसे मिटटी में भी दबा सकते हैं, व्यर्थ इधर-उधर ना फैंकें।