ब्राह्मण का पद एक उपलब्धि है जिसे प्रखर प्रज्ञा, भाव-संवेदना, प्रचण्ड साधना और परमात्मा की निःस्वार्थ आराधना से प्राप्त किया जा सकता है। ब्राह्मण होने का अधिकार सभी को है चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या संप्रदाय से हो, लेकिन ब्राह्मण होने के लिए कुछ नियमों का पालन करना होता है। ब्राह्मण एक अलग वर्ग तो है लेकिन इसमें कोई भी प्रवेश कर सकता है। बुद्ध क्षत्रिय थे, स्वामी विवेकानंद कायस्थ थे, पर यह सभी अति उत्ड्डष्ट स्तर के ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण थे । ‘ब्राह्मण’ शब्द उन्हीं के लिये प्रयुक्त होना चाहिये, जिनमें ब्रह्मचेतना और धर्मधारणा जीवित और जाग्रत हो, भले ही वो किसी भी वंश में क्यों ना उत्पन्न हुए हों।

देह शूद्र है, मन वैश्य है, आत्मा क्षत्रिय है और परमात्मा ब्राह्मण। इसलिए परमात्मा का नाम ब्रह्म है। ब्रह्म से ही ब्राह्मण बना है। जन्म के साथ अपने को ब्राह्मण समझ लेना अज्ञान है। बुद्ध, जैनों के चैबीस तीर्थंकर, राम, ड्डष्ण यह सब क्षत्रिय थे, होना चाहिए सब ब्राह्मण, मगर थे सब क्षत्रिय। क्योंकि ब्राह्मण होने के पहले क्षत्रिय होना जरूरी है- भोग यानी शूद्र, तृष्णा यानी वैश्य, संकल्प यानी क्षत्रिय और समर्पण यानी ब्राह्मण। जब संकल्प पूरा हो जाए, तभी समर्पण की संभावना है। ब्राह्मण वह है जो शांत, तपस्वी और यज्ञशील हो। जैसे वर्षपर्यन्त चलने वाले सोम युक्त यज्ञ में श्रोता मंत्र ध्वनि करते हैं वैसे ही मेंढक भी करते हैं। जो स्वयं ज्ञानवान हो और संसार को भी ज्ञान देकर भूले भटकों को सन्मार्ग पर ले जाता हो, ऐसे सज्जनों को ही ब्राह्मण कहते हैं।

मनुस्मृति जन्मना समाज व्यवस्था का कहीं भी समर्थन नहीं करती। महर्षि मनु ने मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव पर आधारित समाज व्यवस्था की रचना करके वेदों में परमात्मा द्वारा दिए गए आदेश का ही पालन किया है। मनुस्मृति में वर्ण व्यवस्था को ही बताया गया है और जाति व्यवस्था को नहीं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में कहीं भी जाति या गोत्र शब्द ही नहीं है, बल्कि वहां चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है। यदि जाति या गोत्र का इतना ही महत्त्व होता तो मनु इसका उल्लेख अवश्य करते कि कौन-सी जाति ब्राह्मणों से संबंधित है, कौन-सी क्षत्रियों से, कौन-सी वैश्यों और शूद्रों से। आधुनिक समाज के लिए जाति एवं गौत्र व्यवस्था आवश्यक है। हिन्दू ब्राह्मण अपनी धारणाओं से अधिक धर्माचरण को महत्त्व देते हैं। यह धार्मिक पन्थों की विशेषता है। स्मृति पुराणों में ब्राह्मण के 8 भेदों का वर्णन मिलता है – छात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनुचान, भृग, कल्प, )षि और मुनि। किसी सामान्य व्यक्ति के लिए जन्म से ब्राह्मण होना संभव नहीं है, किन्तु कर्म से कोई भी ब्राह्मण बन सकता है। इसके कई प्रमाण वेदों और ग्रंथो में मिलते हैं, जैसे-

मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने।
वाल्मीकि चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने।
कबीर व रविदास ने शुद्रकुल में जन्म लेकर ब्रह्मणत्व प्राप्त किया।
सत्यकाम जाबाल गणिका ;वेश्याद्ध के पुत्र थे परन्तु वह ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए।
क्षत्रिय कुल में जन्में विश्वामित्र व शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया।

ब्राह्मण समाज का इतिहास प्राचीन भारत के वैदिक धर्म से आरंभ होता है। मनुस्मृति के अनुसार आर्यावर्त वैदिक लोगों की भूमि है। ब्राह्मण व्यवहार का मुख्य स्रोत वेद हैं। ब्राह्मणों के सभी सम्प्रदाय वेदों से प्रेरणा लेते हैं। पारंपरिक तौर पर यह विश्वास है कि वेद अपौरुषेय तथा अनादि हैं, और अनादि सत्य का प्राकट्य है, जिनकी वैधता शाश्वत है। वेदों को श्रुति माना जाता है।

धार्मिक व सांस्कृतिक रीतियों एवं व्यवहार में विविधताओं के कारण और विभिन्न वैदिक विद्यालयों से उनके संबन्ध के चलते, ब्राह्मण समाज विभिन्न उपजातियों में विभाजित है। जैसे द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी, मिश्रा, शास्त्री आदि। ब्राह्मण, भारत में आर्यों की समाज व्यवस्था अर्थात्् वर्ण व्यवस्था का सबसे ऊपर का वर्ण है। भारत के सामाजिक बदलाव के इतिहास में जब भारतीय समाज को हिन्दू के रूप में संबोधित किया जाने लगा, तब ब्राह्मण वर्ण भी जाति में परिवर्तित हो गया। ब्राह्मण को विप्र, द्विज, द्विजोत्तम या भूसुर भी कहा जाता है। ब्राह्मण वर्ण अब हिन्दू समाज की एक जाति भी है।

शास्त्रों में बताए गए ब्राह्मण के गुण :

वैदिक धर्म की रक्षा करने वाला ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह सब प्राणियों के धर्म की रक्षा करने में समर्थ है।
ब्राह्मण को वेदों में बताई गई त्रयी विद्या ‘अ उ म’ इन तीन अक्षरों से सम्बन्ध रखने वाली प्रणव विद्या का मनन, चिन्तन एवं विचार करना चाहिए।
आध्यात्मिक दृष्टि से यज्ञोपवीत के बिना जन्म से ब्राह्मण भी शुद्र के समान ही होता है।
ब्राह्मण किसी भी जीव को कष्ट न देकर औरदृउसकी जीविका का हनन न करके, अपनी जीविका चलाने की इच्घ्छा करे।
गृहस्थ ब्राह्मण को क्रोध और राग-द्वेष दृष्टि का त्याग करके सत्य, श्रद्धा, धैर्य, पवित्रता, शास्त्र, ज्ञान आदि छः कर्मों में ही स्थित रहना चाहिये।
बुद्धिमान ब्राह्मण स्वल्पाहार करते हुए इन्द्रियों को जीते और काम तथा क्रोध को अधीन करके ब्रह्मपद को प्राप्त करने का प्रयत्न करे।
संकटकाल उपस्थित होने पर ब्राह्मण को अपने ज्ञानबल का आश्रय लेकर मानव समाज को जीवन निर्वाह करना सिखाना चाहिये।
नित्य पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान करे और यज्ञशिष्ठ अन्न का ही भोजन करे।
ब्राह्मण को वेद का विद्वान, तत्त्वज्ञानी, सदाचारी और चतुर होना चाहिये।
ज्ञानपूर्वक कर्म करने वाले ब्राह्मण को सर्वत्र सिद्धि प्राप्त होती है।
नियमपूर्वक शास्त्रोक्त कर्म करने वाला ब्राह्मण मन, वचन और शारीरिक कर्मों के पापों से लिप्त नहीं होता।
सदाचारी ब्राह्मण को ही हवन, यज्ञ, वेदपाठ का फल प्राप्त होता है, दुराचारी को नहीं।