संध्या और हवन का महत्त्व
प्राण वायु जीवन का आवश्यक तत्त्व है। इसके चलने से शरीर चलता है, इसके रुकने से शरीर रुक जाता है। जब यह चलता फिरता पुतला मौन हो जाता है अर्थात् शरीर से प्राण निकल जाने पर इसे अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है। परमात्मा ने प्राण वायु का प्रवाह इस प्रकार नियत किया है कि श्वांस की गति बिगड़ने पर शरीर रूपी यन्त्र बिगड़ जाता है जिसे हम रोग कहते हैं और इस प्रवाह का अन्त मृत्यु है। हमने मृत्यु को भयानक समझ लिया है जबकि मृत्यु तो केवल एक अवस्था परिवर्तन है। गीता में कहा गया है –
वासांसि जिर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽप्राणी।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णाः, नयन्यानि संयाति नवानि देही।।
अर्थात् जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त करती है।
हमने जीवन में अनेक प्रकार के भौतिक सुख-सुविधाएं एकत्रित कर ली हैं जिनके छूटने का विचार मृत्यु से भय उत्पन्न करता है। यदि हमें अपने द्वारा किए गए शुभ-अशुभ कर्मों का आभास रहता है तब मृत्यु से भय नहीं लगता। लेकिन आलस्य, परिवार का मोह, धन कमाने का लोभ और समाज में तिरस्कार का भय हमें यह सोचने का अवसर नहीं देता। इसका उपाय है – भगवद् स्मरण। अर्थात् उस पवित्र, पतितपावन, शक्तिपुंज, सर्वसम्पन्न, परमात्मा के सार्थक रूप ‘ॐ’ का जाप करना।
अतः हमें यह तीन कार्य प्रतिदिन करने चाहिए :-
(1) अपने व्यक्तिगत आचरण अर्थात् शुभ-अशुभ कर्मों पर ध्यान देना,
(2) इनमें आने वाली त्रुटियों को दूर करना और
(3) सर्वशक्तिमान परमात्मा का प्रतिदिन स्मरण करना।
मनुष्य का कर्तव्य : हमारे मन में नित्यप्रति संकल्प-विकल्प उठते रहते हैं जो हमारी विचारधारा ;मानसिक सोचद्ध का आधार बनते हैं। मनुष्य बिना विचारधारा के नहीं रह सकता। जिस प्रकार एक छोटा बच्चा जैसा अपने बड़ों को व्यवहार करते हुए देखता है वैसा ही करने का प्रयास करता है। यही अवस्था मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन में बनी रहती है अर्थात् मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है। शुभ कर्मों और शुद्ध आचरण से मृत्यु का भय दूर होता है। भगवद् स्मरण अथवा भक्ति के लिए घर-परिवार, धन्धा-रोजगार छोड़ने की आवश्यकता नहीं होती। घर में रहकर सुबह-शाम थोड़ा-सा समय इसके लिए निकाला जा सकता है।
सांसारिक और भौतिक सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हुए भगवद् स्मरण करना ही सच्ची भक्ति है। फिर संसार का कोई बन्धन हमें बांध नहीं सकता। मान्यता है कि प्रतिदिन नियमपूर्वक संध्या करने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। संध्या वंदन नहीं करने से आपके द्वारा किए पुण्यकर्मों का फल नहीं मिलता। संध्या वंदन में ‘पवित्रता’ का विशेष ध्यान रखा जाता है। सुबह और शाम को संध्या वंदन करने से सकारात्मक भावना का जन्म होता है जो कि हमारे भविष्य निर्माण के लिए जरूरी है। जिस प्रकार पहलवान अखाड़े में आने से पहले लंगर-लंगोट कस लेता है, यौद्धा अपने सभी अस्त्र-शस्त्र लेकर रणभूमि में जाता है, उसी प्रकार हमें जीवन संग्राम में उतरने से पूर्व अर्थात् काम पर जाने से पहले भगवद् स्मरण द्वारा आत्मिक बल अवश्य प्राप्त करना चाहिए।
भगवद् स्मरण से शक्ति : सांसारिक जीवन के आवश्यक तत्व – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – की प्राप्ति के साधन स्वरूप हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा हमारे लिए वुळछ नियम बनाए गए थे जो एक अपूर्व क्रम के साथ ‘सन्ध्या मन्त्रों’ में समाहित किए गए हैं। सवितृ-मन्त्र के साथ सविता देव ‘ॐ’ का आश्रय लेना पारिवारिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उन्नति का अचूक उपाय है। अतः प्रत्येक मनुष्य को प्रतिदिन दोनों समय सन्ध्या करनी चाहिए। प्रातःकाल की सन्ध्या ईशोपासना है, इसमें दिन में ब्रह्मचर्य पालन की प्रतिज्ञा करें। सायंकाल की सन्ध्या सन्यास है, इसमें प्रातःकाल की सन्ध्या में की गई प्रतिज्ञा की विवेचना करें कि पूरी हुई या नहीं? सन्ध्या का अभिप्राय भी यही है, तभी तो गृहस्थाश्रम में ब्रह्मचर्य और सन्यास दोनों का समावेश बताया गया है।
भगवद् स्मरण अथवा हवन-सन्ध्या से शक्ति-बल प्राप्ति में संदेह उत्पन्न होता है। जप, तप, यज्ञ, हवन, तीर्थ, व्रत, पूजा, पाठ, रीति-रिवाज आदि दैनिक गतिविधियां भक्ति के ही स्वरूप हैं। हमारे व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में भी इनका प्रमुख स्थान रहता है। इनसे व्यक्ति के धर्म की पहचान होती है। गीता में श्रीकृष्ण जी कहते है कि ‘यतो धर्मस्ततो जय’ अर्थात् जहां धर्म है वहां विजय है। आगे कहते हैं कि ‘वेदोेखिलो धर्ममुलं’ अर्थात् वेद धर्म का मूल है। सृष्टि की उत्पत्ति में ॐ की बड़ी महिमा है। समस्त जीव-जन्तुओं में ‘ॐ’ ध्वनि के रूप में विद्यमान रहता है। धर्म का एक अंग यह भी माना गया है कि वह आत्मा, परमात्मा और सृष्टि की उत्पति के सम्बन्ध में लोगों की जिज्ञासा को पूरा करे। क्योंकि मनुष्य को उसके प्रश्नों के उत्तर मिले बिना, अपने धर्म के प्रति दृढ़ आस्था नहीं हो सकती और न ही वह आस्तिक बन सकता है।
सन्ध्या संस्कृत में क्यों है : वेदों की भाषा किसी विशेष जाति अथवा देश-प्रदेश की भाषा नहीं है बल्कि यह मनुष्य मात्र की भाषा है। संस्कृत भाषा गागर में सागर भरने का काम करती है। इससे वेद-शास्त्रों में लिखे श्लोकों का अर्थ करना सरल है। इसीलिए ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के आवश्यक कत्र्तव्य कर्मों को संस्कृत में लिखा। इसमें वागिन्द्रिय की बलिष्ठता है अर्थात् जितने प्रकार के शब्द मनुष्य अपने मुख से निकाल सकते हैं वह सब शुद्ध उच्चारण के साथ जीभ पर लाए जा सकते हैं। इसके लिए विद्यार्थियों को निरन्तर अभ्यास करवाया जाता है। यदि ऐसा अभ्यास संस्कृत में किया जाए तो अन्य भाषाओं की अपेक्षा अधिक लाभ होगा। क्योंकि संस्कृत वर्णमाला में सभी ध्वनियां जो मनुष्य के मुख से निकल सकती हैं, एक अनूठे क्रम के साथ सम्मिलित हैं। दूसरी भाषाओं में यह बात नहीं है। फारसी में ‘ड’ और ‘ट’ नहीं और अंग्रेजी में ‘क्ष’ तथा ‘ज्ञ’ नहीं होते। अतः सन्ध्या मन्त्रों का अभ्यास करने के लिए किसी अन्य भाषा की अपेक्षा संस्कृत भाषा अधिक उपयुक्त है।
मन कैसे लगायें : मन की चंचलता सम्यक् ध्यान में बाधक है। योगियों का सबसे बड़ा शत्रु मन कहा जाता है। अनियंत्रित मन मनुष्य को पथभ्रष्ट कर देता है परन्तु सध जाए तो इससे बड़ा उपयोगी और कोई नहीं। मन को नियंत्रित करने के लिए शरीर को स्थिर करना आवश्यक है। जिस प्रकार पानी को हिलाते रहने से उसमें प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार शरीर को स्थिर न रखने से मन भी स्थिर नहीं हो पाता।
सन्ध्या के मन्त्रों में कहीं सृष्टि की विचित्रता को देखकर, कहीं इन्द्रियों के लिए बल मांगकर, कहीं पवित्रता के प्रार्थी होकर, कहीं कल्याण तथा कहीं अभय याचना से परमात्मा के स्वरूप को पहचानने का प्रयास किया जाता है। सन्ध्या के मन्त्रों से इनका रहस्य प्रकट होता है। मन्त्रों से मन-मस्तिष्क शुद्ध होता है। प्रतिदिन अभ्यास करने से जब मन्त्रों का अर्थ प्रकट हो जाएगा, तब मन नियंत्रित हो जाएगा और सन्ध्या हमारे स्वभाव का एक अंग बन जाएगी। ज्योंहि किसी मन्त्र का उच्चारण करेंगे उसका भाव मन को प्रसन्न कर देगा। जीवन में समय-असमय आने वाली विपदा मनुष्य को भगवद् भक्ति के लिए प्रेरित करती हैं। सन्ध्या मन्त्रों में उत्तम स्वास्थ्य, धन-धान्य, अन्तःकरण की शुद्धि, उत्तम संतान, शत्रुओं पर विजय एवं ब्रह्म प्राप्ति के लिए परमात्मा से प्रार्थना की जाती है। प्राकृतिक पदार्थों को प्राप्त कर उन पर आसक्त मत रहो। प्रवृत्ति में निवृत्ति की झलक दिखनी चाहिए।
सन्ध्या के नियम :
1. सन्ध्या का समय : सन्ध्या के लिए दिन और रात की सन्धि का समय उपयुक्त होता है। इसके लिए एक निश्चित स्थान आरक्षित रखना चाहिए। इससे सन्ध्या का प्रचार-प्रसार भी होगा और लोग कत्र्तव्य-परायण हो जाएंगे। सन्ध्या का आसन सिर, गर्दन और छाती को सीधा रखते हुए सुखासन (चौकड़ी) है। इस आसन में हम देर तक बैठ सकते हैं और इसी से ध्यान ठीक लगता है।
2. शरीर की शुद्धि : शरीर की शुद्धि के लिए प्रातःकाल स्नान करें और सायंकाल हाथ-मुंह धो लें। एक बात ध्यान रहे कि सन्ध्या मुख्य है और नियम गौण। यद्यपि सन्ध्या को नियमों से पृथक् नहीं कर सकते परन्तु रोग आदि किसी विशेष अवस्था में नियम आवश्यक नहीं। जबरदस्ती की सन्ध्या से सन्ध्या न करना अच्छा है। परमात्मा का ध्यान नहीं करोगे कोई बात नहीं, परन्तु पुण्य के बदले पाप मत करो।
3. मन्त्रों का उच्चारण : जिस प्रकार विद्यालय में छोटे बच्चे जोर-जोर से बोलकर पढ़ते हैं और बड़े बच्चे मन में पढ़ते हैं, उसी प्रकार प्रारम्भ में सन्ध्या उपासक को समूह में बैठकर मन्त्रों का उच्चारण बोलकर करना चाहिए। आधुनिक मानवीय समाज में देखा-देखी का भाव बहुत होता है। जो काम मनुष्य अकेला संकोच सहित करता है, वह मिलकर निःसंकोच तथा तत्परता से कर सकता है।
4. सन्ध्या विधि : सन्ध्या विधि में शुद्धिकरण मन्त्रों का क्रम, निम्न प्रकार से है :
1. शिखा-बन्धन, 2. आचमन, 3. इन्द्रिय स्पर्श, 4. मार्जन, 5. प्राणायाम, 6. अघमर्षण मन्त्र, 7. पुनराचमन
8. मनसा परिक्रमा, 9. उपस्थान मन्त्र, 10. पुनराचमन, 11. पुनः गुरुमन्त्र, 12. नमस्कार मन्त्र
5. हवन अथवा यज्ञ : अग्नि के माध्यम से ईश्वर की उपासना करने की प्रक्रिया को हवन या यज्ञ कहते हैं। हवि, हव्य अथवा हविष्य वह पदार्थ हैं जिनकी अग्नि में आहुति दी जाती है। यज्ञ की अग्नि पदार्थ के गुणों को कई गुना बढ़ा देती है। इसमें जो भी वस्तु डाली जाती है, वह उसे सूक्ष्म बनाकर पवन देव के माध्यम से पितरों और देवताओं में बाँट देती है। आहूति हेतू मृगी मुद्रा (अँगूठा, मध्यमा और अनामिका) और हंसी मुद्रा (अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा और अनामिका) को शुभ माना गया है। ऋषि-मुनि वायु प्रदूषण कम करने के लिए यज्ञ करते थे। इससे रोगकारक किटाणु नष्ट होते हैं और हमारे आस-पास का वातावरण शुद्ध होता है।
6. हवन कुण्ड : कुण्ड इस प्रकार बनाने चाहिए कि बाहर से चैकोर रहें, लम्बाई, चैड़ाई और गहराई समान हो परन्तु उन्हें भीतर तिरछा बनाया गया हो। लम्बाई, चैड़ाई 24-24 अँगुल हो तो गहराई भी 24 अँगुल रखनी चाहिये परन्तु उसमें तिरछापन इस तरह देना चाहिये कि पेंदा छः अँगुल चैड़ा रह जाए। आकार के अनुसार एक कुण्ड में एक बार में चार से नौ व्यक्ति तक बैठ सकते हैं। पूर्व दिशा में वेदी पर कलश की स्थापना होने से शेष तीन दिशाओं में ही याज्ञिक बैठते हैं। प्रत्येक दिशा में अधिकतम तीन व्यक्ति बैठ सकते हैं।
7. समिधा : समिधा का अर्थ है वह लकड़ी जिसे जलाकर यज्ञ किया जाए। उत्तम स्वास्थ्य एवं सामाजिक समृद्धि के अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन में ऐसी औषधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं, जो इस उद्देश्य को भली प्रकार पूरा कर सकती हैं। नवग्रह शान्ति हेतू सूर्य (मदार), चन्द्रमा (पलाश), मंगल (खैर), बुध (चिड़चिड़ा), बृहस्पति (पीपल), शुक्र (गुलर), शनि (शमी), राहू (दुर्वा) और केतू (कुशा) की समीधा कही गई है। ऋतुओं के अनुसार समिधा के लिए इन वृक्षों की लकड़ी विशेष उपयोगी सिद्ध होती है, जैसे – वसन्त ऋतु में शमी; ग्रीष्म ऋतु में पीपल; वर्षा ऋतु में ढाक (बिल्व); शरद ऋतु में पाकर या आम; हेमन्त ऋतु में खैर; शिशिर ऋतु में गूलर, बड़। एक बात विशेष रूप से ध्यान रखें कि हवन की लकड़ियाँ सुखी और स्वच्छ होनी चाहिए।