हिन्दु धर्म के प्रमुख देवता
देवता शब्द ‘द्वि’ धातु से निकला है जिसका अर्थ प्रकाशमान होता है। अर्थात् वह अलौकिक शक्ति जो अमर, प्राकृतिक और पूजनीय है। देवता इस तरह के पुरुषों के लिये प्रयुक्त होता है और देवी इस तरह की स्त्रियों के लिये। हिन्दू धर्म में देवताओं को या तो परमेश्वर ‘ब्रह्म’ का लौकिक रूप माना जाता है या उन्हें ईश्वर का सर्गुण रूप माना जाता है। बृहदारण्य उपनिषद के अनुसार देव वास्तव में केवल एक ‘ॐ’ है, जिसके कई रूप प्रचलित हैं। वास्तव में मूलशक्ति स्वयं सृष्टि में देवी-देवताओं के विविध मूर्त रूपों में विद्यमान रहती हैं। हिंदू धर्म में कोई भी उपासक अपनी रुचि के अनुसार अपने देवता के चुनाव के लिये स्वतंत्र है। शास्त्रों में इस बात की उचित व्यवस्था है कि कार्य और उद्देश्य के अनुसार किसी भी देवता की उपासना की जा सकती है। हिन्दू धर्म के सभी देवी और देवता अन्य धर्मों में अलग-अलग रूप और रंग में चित्रित किए गए हैं। देवताओं को सुर और दैत्यों को असुर कहा गया है। हिन्दू धर्म में देवी या देवताओं की कहानी एक पुराण में अलग है, तो दूसरे में अलग। पुराणों से अलग वेद और स्मृतियों को जानना चाहिए। हिन्दू धर्म में देवी और देवताओं की संख्या 33 करोड़ बताई जाती रही है, जबकि वैदिक ग्रंथों में देवताओं की संख्या 33 कोटी बताई गई है।
आइये, जानते हैं कि वास्तव में हिन्दू देवी-देवताओं की संख्या 33 करोड़ है या इसके पीछे कोई और कहानी है। देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते हैं। कोटि का एक अर्थ प्रकार (type) होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता है, लेकिन यहाँ कोटि का अर्थ प्रकार है। जब धर्म ग्रंथों में सभी जीव 84 लाख प्रकार के ही बताये गये हैं तो देवी-देवताओं की संख्या 33 करोड़ कैसे संभव हो सकती है। असल में यह देवता वैदिक ग्रंथो के अनुसार 33 प्रकार या 33 तरह के होते हैं, इसलिये इन्हें 33 करोड़ नहीं मानना चाहिये।
वैदिक धर्म ग्रंथों में कुल 33 प्रकार के देवी-देवताओं का वर्णन मिलता है। 12 आदित्य, 11 रुद्र, 8 वसु तथा दो अश्वनि कुमारों को मिलाकर इन देवताओं की संख्या 33 होती है। कुछ विद्वान अश्वनि कुमारों के स्थान पर प्रजापति और इंद्र को स्थान देते हैं। 12 आदित्यों में एक विष्णु और 11 रुद्रों में एक शिव माने जाते हैं। अन्य देवी-देवता इन्हीं के विभिन्न स्वरूपों से उत्पन्न होते हैं।
बारह (12) आदित्य के नाम : ब्रह्मा के मन से उत्पन्न मानस पुत्र मरिचि ऋषि के विद्वान पुत्र कश्यप ऋषि की पत्नी दक्ष पुत्री अदिति से जन्मे पुत्रों को आदित्य कहा गया है। वेदों में जहां अदिति के पुत्रों को आदित्य कहा गया है, वहीं सूर्य को भी आदित्य कहा गया है। 12 आदित्य वर्ष के 12 महीनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वैदिक या आर्य लोग दोनों ही इनकी स्तुति करते थे।
आदित्यों के नाम इस प्रकार है – 1. धाता (चैत्र), 2. आर्यमन (वैशाख), 3. मित्रा (ज्येष्ठ), 4. वारूण (आषाढ़), 5. इन्द्र (श्रावण), 6. विवस्वान (भाद्रपद), 7. पूषा (आश्विन), 8. पर्जन्य (कार्तिक), 9. अंशुमन (मार्गशीर्ष), 10. भग (पौष), 11. त्वष्टा (माघ), 12. विष्णु (फाल्गुन) आदि।
ग्यारह (11) रुद्र के नाम : कश्यप ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अपना वचन सत्य करने के लिए कश्यप ऋषि की पत्नी सुरभी के गर्भ से ग्यारह रुद्रों के रूप में अवतार लिया। इन्होंने युद्ध में दैत्यों को हराकर इन्द्र को पुनः स्वर्ग का राज्य दिलवाया। रुद्र हमारे शरीर में विभिन्न प्राकृतिक तत्त्वों के रूप में स्थित रहते हैं। भिन्न ग्रन्थों में एकादश रुद्रों के नामों में भिन्नताएँ मिलती हैं। भगवान शिव का रूद्राभिषेक भी जब किया जाता है तो वह भी उनके रूपों की भांति 11 बार ही करने की परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि संकटमोचन हनुमान उनके रूद्रावतार ही हैं, जो इस रूप में धरती पर श्रीराम की उनके इस अवतार में सहायता करने के लिए आए थे।
रुद्रों के नाम इस प्रकार है – 1. मनु (हृदय), 2. मन्यु (इन्द्रियां), 3. शिव (प्राण), 4. महत (आकाश), 5. ऋतुध्वज (वायु), 6. महिनस (अग्नि), 7. उम्रतेरस (जल), 8. काल (पृथ्वी), 9. वामदेव (सूर्य), 10. भव (चन्द्र) और 11. धृतध्वज (ताप) आदि।
आठ (8) वसुओं के नाम : पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह देवताओं का एक वर्ग है, जिसके अंतर्गत आठ देवता माने गये हैं। दक्ष प्रजापति की पुत्री तथा धर्म की पत्नी ‘वसु’ के गर्भ से ही सब वसु उत्पन्न हुए थे। इनको बाद में जलंधर से हुए युद्ध में देवताओं की सहायता करने पर भगवान शिव ने वरदान स्वरूप संसार में धर्म की स्थापना के लिए प्राकृतिक शक्तियों का अधिपति बनाया गया। इनकी सहायता से ही सभी प्रकार के धार्मिक आयोजन सम्भव हो सकते हैं। महाभारत के प्रसिद्ध चरित्रों में से एक (महाराज शांतनु व गंगा के पुत्र) देवव्रत भीष्म भी आठ वसुओं में से एक थे।
वसुओं के नाम इस प्रकार है – 1. आप (जल), 2. ध्रुव (नक्षत्र), 3. सोम (चन्द्रमा), 4. धरा (पृथ्वी), 5. अनिल (वायु), 6. अनल (अग्नि), 7. प्रत्यूष (आकाश), 8. प्रभाष (सूर्य)। वशिष्ठ ऋषि के श्राप के कारण इनको पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा था।
दो अश्वनि कुमार : अश्वनि कुमार त्वष्टा की पुत्री प्रभा से उत्पन्न सूर्य के औरस पुत्र हैं। इन्हें आयुर्वेद का आदि आचार्य भी माना जाता है। इनके नाम नासत्य और त्रस्त हैं। यह मूल रूप से चिकित्सक थे। इनका संबंध दिन और रात के संधिकाल से है। आयुर्वेद का ज्ञान सर्वप्रथम ब्रह्मा ने दक्ष को दिया। दक्ष ने अश्वनि कुमारों को यह ज्ञान दिया तथा अश्वनि कुमारों से यह ज्ञान इन्द्र तक पहुंचा। इन्द्र से भारद्वाज ऋषि ने यह ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद अन्य ऋषि-मुनियों तक पहुंचा, जिनमें ‘चरक’ और ‘सुश्रुत’ प्रमुख हैं। इनके नाम से प्रसिद्ध संहिताएं आज भी चिकित्सा के क्षेत्र में उपयोगी बनी हुई हैं। पांच पांडवों में नकुल और सहदेव इन दोनों के पुत्र थे।
देवताओं का वर्गीकरण : देवताओं के सम्बन्ध में कहा जाता है, ‘तिस्त्रो देवता’ अर्थात् देवता तीन है, किन्तु यह प्रधान देवता है। इनके द्वारा सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार किया जाता है। शास्त्रों में जिन्हें देवता या भगवान की संज्ञा दी जाती है उनमें भगवान शिव सर्वोपरि माने जाते हैं, उनके बाद विष्णु और ब्रह्मा का नाम लिया जाता है। हालांकि पूजा की दृष्टि से विष्णु एवं भगवान शिव ही ज्यादा लोकप्रिय हैं। एक अपवाद को छोड़ दिया जाये तो ब्रह्मा की पूजा कहीं नहीं की जाती। वेदों में वर्णित देवताओं में मुख्य रूप से अग्नि, ईन्द्र, सोम, मित्रा, वरुण, सूर्य, अश्विनौ, द्यौ आदि वर्णन हुआ है। यह देवता ईश्वर के साकार स्वरूपों जैसे- राम, कृष्ण, हनुमान, शनिदेव, लक्ष्मी, गणेश, बालाजी, दुर्गा आदि से अलग हैं।
देवताओं का वर्गीकरण कई प्रकार से हुआ है, इनमें चार प्रकार मुख्य हैं :
1. स्थान क्रम से वर्णित देवता – इनका वर्गीकरण तीन कोटियों में किया गया है – पृथ्वीस्थानीय, द्युस्थानीय और अंतरिक्षस्थानीय। अग्नि, वायु और सूर्य क्रमशः इन तीन कोटियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
2. परिवार क्रम से वर्णित देवता – इनमें 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र, 2 अश्वनि कुमार आदि 33 देवता आते हैं।
3. वर्ग क्रम से वर्णित देवता – इन देवताओं में इन्द्रावरुण, मित्रावरुण आदि देवता आते हैं।
4. समूह क्रम से वर्णित देवता – इन देवताओं में सर्वदेवों की गिनती की जाती है।
अन्तरिक्षस्थानीय यानि अन्तरिक्ष में निवास करने वाले देवताओं की संख्या 3 (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) है। द्युस्थानीय यानि ऊपरी आकाश में निवास करने वाले देवताओं की संख्या 33 है। बृहदारण्य उपनिषद में तैंतीस देवताओं का विस्तार से परिचय मिलता है। तीसरे पृथ्वीस्थानीय यानि पृथ्वी पर रहने वाले देवता 33 करोड़ माने जाते हैं। जो पृथ्वीलोक के देवता कहे गए हैं, उनमें आठ वसुओं का भी स्मरण किया जाता है। इनमें विभिन्न वंश एवं जाति पर आधारित सभी पित्तर, कुलदेवी और कुल देवता भी शामिल हैं।
प्राकृतिक दैवीय शक्तियाँ :
वेदों में जिन देवताओं का उल्लेख है, उनमें अधिकतर प्राकृतिक शक्तियों के नाम है जिन्हें देव कहकर संबोधित किया गया है। देव कहने से उनका महत्व प्रकट होता है। वेदों के अनुसार सृष्टि का निर्माण पांच प्राकृतिक तत्वों से हुआ है जिनमें से एक आकाश है, बाकी चार पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि हैं। वैदिक ऋषि-मुनि मन्त्रों द्वारा इन प्राकृतिक शक्तियों की स्तुति की गई है।
1. सूर्य देव : मूर्तिशास्त्र की दृष्टि से विष्णु और सूर्य के मूल स्वरूप में बड़ी समानता है। हिंदू धर्म में सूर्य का महत्व वैदिक काल से ही स्वीकर किया गया। सूर्य का नवग्रह में प्रथम स्थान है, शेष आठ ग्रह, चन्द्र (सोम), मंगल (कुज), बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु हैं। सूर्य को ग्रहों का राजा कहा जाता है।
2. चन्द्र देव : चंद्रमा को अग्नि, इंद्र, सूर्य आदि देवताओं के सामान ही माना गया है। चन्द्रमा को जल और शीतलता का कारक माना जाता है। चन्द्र देव ब्रह्मा के मानस पुत्र अत्रि के पुत्र थे। चन्द्र का विवाह दक्ष प्रजापति की नक्षत्र रुपी 27 कन्याओं से हुआ। मान्यता है कि दक्ष के शाप से मुक्ति के लिए चंद्रमा द्वार स्थापित शिवलिंग ही वर्तमान में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात है। इसे द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान प्राप्त है।
3. इन्द्र देव : देवराज इन्द्र को देवताओं का अधिपति माना गया है। ऋग्वेद के लगभग एक-चैथाई सूक्त इन्द्र से सम्बन्धित हैं। इंद्र की पत्नी इंद्राणी कहलाती है। वह बादलों और विद्युत का देवता है। वही वर्षा द्वारा अन्न पैदा करता है और वही स्वर्ग पर शासन करता है। सफेद हाथी ‘ऐरावत’ पर सवार इन्द्र का अस्त्र वज्र है।
4. आकाश : यह सबसे अधिक उपयोगी एवं प्रथम तत्व हैै। जिस प्रकार परमात्मा असीम एंव निराकार है, उसी प्रकार आकाश तत्व असीम एवं निराकार है। आकाश के बिना मानव या अन्य प्राणियों की कल्पना नहीं की जा सकती। शास्त्रों में आकाश को पिता भी माना गया है। आकाश का गुण शब्द है। हमारे शरीर में शब्द की उत्त्पति इस आकाश तत्व के कारण से ही होती हैं।
5. वायु देव : वायु देव को पवन देव भी कहा जाता है। जगत की समस्त वायु, पवन देव के अधीन रहती है। हनुमान और भीम को पवन पुत्र माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार पवन देव को वायव्य दिशा का स्वामी माना गया है। भगवान वायु में कई महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं। वह पृथ्वी के सभी जीवों के लिए आधार है।
6. अग्नि देव : प्राकृतिक शक्तियों में ऊर्जा एवं प्रकाश के देवता अग्नि देव का स्थान अहम है। यज्ञ, हवन और विवाह में अग्नि द्वारा ही देवताओं की पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री स्वाहा अग्नि देव की पत्नी हैं। अग्निदेव अपनी पत्नी स्वाहा के माध्यम से ही हविष्य ग्रहण करते हैं। इसलिए हवन के समय, मंत्र पाठ करते हुए स्वाहा कहकर हवन सामग्री की आहूति अग्नि को समर्पित करते हैं।
7. वरुण देव : धर्म ग्रंथों के अनुसार प्राकृतिक शक्तियों में तीसरा स्थान वरुण अर्थात् जल का माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार जल के देवता वरुण देव को ईशान कोण का स्वामी माना गया है। मकर पर विराजमान मित्रा और वरुण दोनों भाई हैं और जल जगत के देवता है। ऋग्वेद के अनुसार वरुण देव सागर के सभी मार्गों के ज्ञाता हैं। वरुण देव को देवता और असुर दोनों का ही मित्र माना जाता है।
8. पृथ्वी : धर्म ग्रंथों के अनुसार वेन के अत्याचारों के कारण धरती से अन्न और औषधियां उत्पन्न होना बंद हो गईं। इसलिए ऋषियों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मंथन किया, जिससे पृथु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। भगवान विष्णु के अंशावतार राजा पृथु ने धरती को समतल बनाकर जगत के लिए अन्न और वनस्पतियां उत्पन्न की। एक माता के समान अपनी सन्तान का पालन करने के लिए धरती को माता कहा जाने लगा। भगवान शिव की चौथी पत्नी ‘उमा देवी’ भी यही हैं, इसलिए मंगल ग्रह को धरती पुत्र भी कहा जाता है। अथर्ववेद के 12वें कांड के प्रथम सूक्त में पृथ्वी को समर्पित 63 ऋचाएं मिलती हैं। इनमें पृथ्वी को ‘मातृभूमि’ कहा गया है। पर्वत, वन और नदियां इसकी शोभा बढ़ाते हैं। इसके अंग सात द्वीप हैं जो सात महासागरों से घिरे हुए हैं।