भगवान विष्णु के प्रथम तीन अवतार मत्स्य, कूर्म और वराह प्रथम युग महायुग, सतयुग या सत्ययुग में, उसके बाद नरसिंह, वामन, परशुराम और राम ने त्रेतायुग, तथा श्रीकृष्ण अथवा बलराम ने द्वापर युग में अवतार लिया। भगवत पुराण के अनुसार इस युग में कल्कि नाम का आखरी अवतार धरती से अन्याय को खत्म करके न्याय की स्थापना करके इस युग का अंत करेगा और सतयुग की स्थापना होगी। जब-जब पृथ्वी पर कोई संकट आता है तो भगवान अवतार लेकर उस संकट को दूर करते हैं। भगवान शिव और भगवान विष्णु ने कई बार पृथ्वी पर अवतार लिया है। भगवान विष्णु 23 अवतार अब तक पृथ्वी पर अवतरित हो चुके हैं। उनके 24वें अवतार के बारे में कहा जाता है कि कलयुग के अन्त में कल्कि अवतार के रूप में उनका आना सुनिश्चित है।

भगवान विष्णु के इन सभी 24 अवतारों में से 10 पूर्ण अवतार तथा 14 अंशावतार माने जाते हैं। पूर्ण अवतार यह है –
1. मत्स्य अवतार, 2. वराह अवतार, 3. नृसिंह अवतार, 4. कूर्म अवतार, 5. वामन अवतार,
6. परशुराम अवतार, 7. राम अवतार, 8. कृष्ण अवतार, 9. बुद्ध अवतार, 10. कल्कि अवतार।

आइए जानें विस्तार से ….

1. श्री सनकादि मुनि : सृष्टि के प्रारंभ में जगतपिता ब्रह्मा ने मानव सृष्टि की रचना करने की इच्छा से घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तप अर्थ वाले सन नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार बाल-मुनियों के रूप में अवतार लिया। यह भगवान विष्णु के सर्वप्रथम अवतार माने जाते हैं। यह चारों प्राकट्य काल से ही मोक्ष मार्ग ध्यान में तल्लीन, सिद्ध एवं विरक्त थे।

2. हयग्रीव अवतार : धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार मधु और कैटभ नाम के दो शक्तिशाली दैत्य ब्रह्माजी से वेदों का हरणकर रसातल में पहुंच गए। वेदों का हरण हो जाने से ब्रह्माजी बहुत दुःखी हुए और भगवान विष्णु के पास पहुंचे। तब भगवान विष्णु ने हयग्रीव अवतार लिया, जिसकी गर्दन और मुख घोड़े के समान था। भगवान हयग्रीव रसातल में पहुंचे और मधु-कैटभ का वध करके, वेद पुनः ब्रह्मा को दे दिए।

3. नारद अवतार : देवर्षि नारद भगवान विष्णु का तीसरा अवतार हैं। नारद मुनि, ब्रह्मा के 17 मानस पुत्रों में से एक हैं। उन्होंने कठिन तपस्या से देवर्षि पद प्राप्त किया है। वह भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते हैं। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में देवर्षि नारद को भगवान का मन भी कहा गया है। श्रीमद्भागवत गीता के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है- देवर्षीणांचनारदः, अर्थात् देवर्षियों में मैं नारद हूं।

4. हंस अवतार : एक बार भगवान ब्रह्मा अपनी सभा में बैठे थे। वहां उनके मानस पुत्र सनकादि पहुंचे और भगवान ब्रह्मा से मनुष्यों के मोक्ष के संबंध में चर्चा करने लगे। तभी वहां भगवान विष्णु महाहंस के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने सनकादि मुनियों के संदेह का निवारण किया। इसके बाद सभी ने भगवान हंस की पूजा की। इसके बाद हंस रूपधारी भगवान विष्णु अदृश्य होकर अपने पवित्र धाम चले गए।

5. कपिल मुनि : भगवान विष्णु ने पांचवा अवतार कपिल मुनि के रूप में लिया। इनके पिता महर्षि कर्दम व माता देवहूति हुए। शरशैय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह के देहत्याग के समय व्यास आदि ऋषियों के साथ भगवान कपिल भी वहां उपस्थित थे। भगवान कपिल के क्रोध से ही राजा सगर के साठ हजार पुत्र भस्म हो गए थे। भगवान कपिल सांख्य दर्शन के प्रवर्तक हैं। कपिल मुनि भागवत धर्म के प्रमुख बारह आचार्यों में से एक हैं।

6. नर-नारायण : सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु ने धर्म की स्थापना के लिए ‘नर-नारायण ’ दो रूपों में अवतार लिया। इस अवतार में वह अपने मस्तक पर जटा धारण किए हुए थे। उनके हाथों में चक्र, चरणों में हंस एवं वक्षस्थल में श्रीवत्स के चिन्ह थे। उनका सम्पूर्ण वेष तपस्वियों के समान था।

7. यज्ञ अवतार : भगवान विष्णु के सातवें अवतार का नाम यज्ञ है। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान यज्ञ का जन्म स्वायम्भुव मन्वन्तर में हुआ था। मनु और शतरूपा की पुत्री एवं रूचि प्रजापति की पत्नी आकूति के गर्भ से भगवान विष्णु स्वयं यज्ञ नाम से अवतरित हुए। भगवान यज्ञ के बारह पुत्र याम नामक बारह देवता कहलाए।

8. भगवान ऋषभदेव : भगवान विष्णु ने ऋषभदेव के रूप में आठवां अवतार लिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार महाराज नाभि की कोई संतान नहीं थी। इस कारण उन्होंने अपनी धर्मपत्नी मेरुदेवी के साथ पुत्र की कामना से यज्ञ किया। यज्ञ से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने महाराज नाभि को वरदान दिया कि मैं ही तुम्हारे यहां पुत्र रूप में जन्म लूंगा। वरदान स्वरूप कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने महाराज नाभि के यहां पुत्र रूप में जन्म लिया। पुत्र के अत्यंत सुंदर सुगठित शरीर, कीर्ति, तेल, बल, ऐश्वर्य, यश, पराक्रम और शूरवीरता आदि गुणों को देखकर महाराज नाभि ने उसका नाम ऋषभ अर्थात् श्रेष्ठ रखा।

9. दत्तात्रेय अवतार : एक बार माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती को अपने पातिव्रत्य पर अत्यंत गर्व हो गया। भगवान विष्णु ने उनका अंहकार नष्ट करने के लिए लीला रची। उसके अनुसार एक दिन नारद जी घूमते-घूमते देवलोक पहुंचे और तीनों देवियों को बारी-बारी जाकर कहा कि ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसूइया के सामने आपका सतीत्व कुछ भी नहीं। तीनों देवियों ने यह बात अपने स्वामियों को बताई और उनसे कहा कि वह अनुसूइया के पातिव्रत्य की परीक्षा लें। तब भगवान शंकर, विष्णु व ब्रह्मा साधु वेश बनाकर अत्रि मुनि के आश्रम आए। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। तीनों ने देवी अनुसूइया से भिक्षा मांगी, मगर यह भी कहा कि आपको निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी। अनुसूइया पहले तो यह सुनकर चौंक गई, लेकिन फिर साधुओं का अपमान न हो इस डर से उन्होंने अपने पति का स्मरण किया और कहा कि, ‘यदि मेरा पातिव्रत्य धर्म सत्य है तो यह तीनों साधु शिशु हो जाएं’। ऐसा कहते ही त्रिदेव 6-6 मास के शिशु बन गए और रोने लगे। अनुसूइया ने माता बनकर उन्हें गोद में लेकर स्तनपान कराया।

उद्धार जब तीनों देव अपने-अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं। नारद जी ने वहां आकर सारी बात बताई। तब तीनों देवियां अनुसूइया के पास आईं और क्षमा मांगी। देवी अनुसूइया ने त्रिदेवों को अपने पूर्व रूप में कर दिया। प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने उन्हें वरदान दिया कि हम तीनों अपने अंश से तुम्हारे गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे। इस प्रकार ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

10. आदिराज पृथु : भगवान विष्णु के एक अवतार का नाम आदिराज पृथु है। धर्म ग्रंथों के अनुसार स्वायम्भुव मनु के पौत्र विष्णु भक्त ध्रुव के वंश में वेन नामक राजा हुआ। उसने भगवान को मानने से इंकार कर दिया और स्वयं की पूजा करने के लिए कहा। ऋषियों ने मंत्र पूत कुशा से उसका वध कर दिया। वेन के अत्याचारों के कारण धरती से अन्न और औषधियां उत्पन्न होना बंद हो गया। इसलिए ऋषियों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मंथन किया, जिससे पृथु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। पृथु के दाहिने हाथ में चक्र और चरणों में कमल का चिह्न देखकर ऋषियों ने बताया कि पृथु के वेष में स्वयं श्रीहरि का अंश अवतरित हुआ है। इस अवतार में पृथु ने धरती को गाय बनाकर उससे जगत के लिए अन्न और औषधियों का दोहन किया।

11. मत्स्य अवतार : भगवान विष्णु का यह पहला पूर्ण अवतार था, जो उन्होंने एक मछली के रूप में लिया था। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने प्रलय के बाद सृष्टि को बचाने के लिए मत्स्यावतार लिया था। इस अवतार में स्वयं भगवान विष्णु ने राजा सत्यव्रत को तत्त्वज्ञान दिया था और उन्हें बताया की किस प्रकार से सृष्टि का विनाश होगा और तुम्हें किस तरह से सप्तऋषियों, औषधियों, बीजों व प्राणियों का बचाव करना होगा। इस अवतार में भगवान विष्णु ने प्रलयकाल में जीव की उत्पत्ति व बचाव को महत्व दिया है।

12. वराह अवतार : दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया, तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु ने वराह रूप में अवतार लिया। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों की प्रार्थना पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर, अपने दांतों पर रखकर, पृथ्वी को बाहर ले आए। जब हिरण्याक्ष ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। भगवान वराह ने युद्ध में हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया।

13. भगवान नृसिंह : दैत्यों का राजा हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान विष्णु से भी अधिक बलवान मानता था। उसके राज में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था उसको दंड दिया जाता था। किन्तु उसका पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात जब हिरण्यकश्यप का पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकश्यप ने उसे मृत्युदंड दे दिया। किन्तु हर बार भगवान विष्णु के चमत्कार से वह बच गया। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रह्लाद को लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई। भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। आज भी इस घटना का प्रतीक होली का त्यौहार मनाया जाता है। जब हिरण्यकश्यप स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था, तब भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध कर दिया।

14. कूर्म/कच्छप अवतार : पुराणों के अनुसार इस अवतार में भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर समुद्र मंथन में सहायता की थी। एक बार महर्षि दुर्वासा ने शिवजी के दर्शनों के लिए कैलाश जाते हुए मार्ग में दुर्वासा ने इन्द्र को आशीर्वाद देकर भगवान विष्णु का प्रिय ‘पारिजात पुष्प’ प्रदान किया। देवराज इन्द्र द्वारा उस पुष्प का तिरस्कार करने पर उन्होंने इन्द्र को श्राप देकर ‘श्रीहीन’ कर दिया। इन्द्र जब भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर समुद्र मंथन द्वारा अमृत प्राप्त करने के लिए कहा, ताकि अमृत पीकर देवता अमर हो सकें। इसके लिए मंदराचल पर्वत को मधानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्र को मथना प्रारम्भ किया। किन्तु समुद्र में मंदराचल का कोई आधार न होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने विशाल कूर्म के रूप में अवतार लेकर अपनी पीठ की मदद से उसे आधार दिया और समुद्र मंथन का उद्देश्य पूरा किया।

15. भगवान धन्वन्तरि : समुद्र मंथन के दौरान सबसे अंत में हाथ में अमृतपूर्ण स्वर्ण कलश लिये श्याम वर्ण, चतुर्भुज रूपी भगवान धन्वन्तरि प्रकट हुए। जब पृथ्वी पर मनुष्य रोगों से अत्यन्त पीड़ित हो गए तो इन्द्र ने धन्वन्तरि जी से प्रार्थना की वह पृथ्वी पर अवतार लें। इन्द्र की प्रार्थना स्वीकार कर भगवान धन्वन्तरि ने काशी के राजा दिवोदास के रूप में पृथ्वी पर अवतार धारण किया। इन्द्र की प्रार्थना पर भगवान धन्वन्तरि ने देवों के वैद्य का पद स्वीकार किया। इनके द्वारा रचित ‘धन्वन्तरि-संहिता’ आयुर्वेद का मूल ग्रन्थ है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने धन्वन्तरि जी से ही इस शास्त्र का उपदेश प्राप्त किया था।

16. मोहिनी अवतार : समुद्र मंथन के दौरान सबसे अंत में अमृत कलश निकला। जैसे ही अमृत मिला दैत्यों का अनुशासन भंग हो गया और सारे दैत्य उसके पीछे भागे। इसी छीना-झपटी में इन्द्र का पुत्र जयन्त अमृत कुंभ लेकर भाग गया। असुरों व देवताओं में भयंकर मार-काट मच गई। देवता परेशान होकर भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को अमृत पान कराने के लिए मोहिनी अवतार लिया। मोहिनी ने अमृत कलश लेकर मधुर गीत गाते हुए तथा नृत्य करते हुए देवताओं व असुरों को अमृत पान कराना प्रारंभ किया। वास्तव में मोहिनी अमृत पान तो सिर्फ देवताओं को ही करा रही थी, जबकि असुर समझ रहे थे कि वह भी अमृत पी रहे हैं। इस प्रकार भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर देवताओं को अमर किया।

17. वामन अवतार : सतयुग के अन्त में प्रह्लाद के पौत्र दैत्यराज बलि ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। सभी देवता इस विपत्ति से बचने के लिए भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं स्वयं देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हें स्वर्ग का राज्य दिलाऊंगा। कुछ समय पश्चात् भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया। एक बार जब बलि महान् यज्ञ कर रहा था, तब भगवान वामन बलि की यज्ञशाला में गए और राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांगी। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान की लीला समझ गए और उन्होंने बलि को दान देने से मना कर दिया। लेकिन बलि ने फिर भी भगवान वामन को तीन पग धरती दान देने का संकल्प ले लिया। भगवान वामन ने विशाल रूप धारण कर एक पग में धरती और दूसरे पग में आकाश को नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि ने भगवान वामन को अपने सिर पर पग रखने को कहा। बलि के सिर पर पग रखने से वह पाताल लोक पहुंच गया। बलि की दानवीरता देखकर भगवान ने उसे पाताल लोक का स्वामी बना दिया। इस तरह भगवान वामन ने देवताओं की सहायता कर उन्हें स्वर्ग पुनः लौटाया।

18. श्रीहरि अवतार : प्राचीन समय में त्रिकूट नामक पर्वत की तराई में एक शक्तिशाली गजेंद्र अपनी हथिनियों के साथ रहता था। एक बार वह परिवार सहित तालाब में स्नान करने गया। वहां एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया और पानी के अंदर खींचने लगा। मगर से बचने के लिए गजराज ने पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन सफल नहीं हो सका। गजेंद्र जब सारे प्रयास करके थक गया और उसे अपना काल नजदीक दिखाई देने लगा, तब उसने भगवान श्रीहरि का ध्यान किया। गजेंद्र की स्तुति सुनकर भगवान श्रीहरि प्रकट हुए और उन्होंने अपने चक्र से मगरमच्छ का वध कर दिया। भगवान श्रीहरि ने गजेंद्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया। मान्यता है गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का नियमित पाठ करने तथा गजेंद्र मोक्ष का चित्र घर में लगाने से आने वाली बाधा दूर होती है।

19. परशुराम अवतार : महर्षि परशुराम भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक थे। भगवान विष्णु ने छठे पूर्ण अवतार के रूप में परशुराम का रूप धारण किया तथा धरती से हैययवंशी क्षत्रियों का नामोनिशान मिटा दिया। प्राचीनकाल में महिष्मती नगरी पर शक्तिशाली हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्त्रबाहु) का शासन था। वह बहुत अभिमानी और अत्याचारी था। उसको भगवान दत्तात्रेय से एक सहस्त्र भुजाएं और अजेय होने का वरदान प्राप्त था। एक बार अग्निदेव ने उससे भोजन का आग्रह किया। उसने घमंड में कहा कि सभी ओर मेरा ही राज है, आप जहां से चाहें, भोजन प्राप्त कर सकते हैं। तब अग्निदेव ने वनों को जलाना शुरु किया।
एक वन में ऋषि आपव तपस्या कर रहे थे। अग्नि ने उनके आश्रम को भी जला डाला। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने सहस्त्रबाहु को श्राप दिया कि भगवान विष्णु, परशुराम के रूप में जन्म लेंगे और न सिर्फ सहस्त्रबाहु का नहीं बल्कि समस्त क्षत्रियों का सर्वनाश करेंगे। इस प्रकार भगवान विष्णु ने भार्गव कुल में महर्षि जमदग्नि के पांचवें पुत्र के रूप में जन्म लिया। महिष्मती नगरी के अभिमानी और अत्याचारी राजा हैययवंशी सजस्त्रार्जुन से अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए परशुराम ने सम्पूर्ण पृथ्वी को हैययवंशी क्षत्रिय विहीन करने का प्रण लिया था। उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से हैययवंशी क्षत्रियों का विनाश किया। भगवान शिव से प्राप्त अस्त्र ‘परसा’ के कारण इनका नाम परशुराम प्रसिद्ध हुआ।

20. श्रीराम अवतार : त्रेतायुग में राक्षसराज रावण का बहुत आतंक था। उससे देवता भी डरते थे। उसके वध करने के लिए भगवान विष्णु ने राजा दशरथ के यहां माता कौशल्या के गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लिया। पिता के कहने पर वनवास गए। वनवास भोगते समय राक्षसराज रावण उनकी पत्नी सीता का हरण कर ले गया। गिद्धराज जटायु के माध्यम से उन्हें इस बात का पता चला। सीता की खोज करते हुए वानरराज सुग्रीव और हनुमान की सहायता से भगवान श्रीराम लंका पहुंचे। वहां भगवान श्रीराम और रावण का घोर युद्ध जिसमें रावण मारा गया। इस प्रकार भगवान विष्णु ने राम अवतार लेकर देवताओं को भय मुक्त किया। इस अवतार में भगवान विष्णु ने अनेक राक्षसों का वध किया और स्वयं मर्यादा का पालन करते हुए धरती पर लोगों को धर्म का पाठ पढ़ाया। भगवान विष्णु के इस अवतार को आज सबसे अधिक पूजा जाता है। क्योंकि श्रीराम ने धरती से बुराई को पूरी तरह से खत्म कर दिया था, इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के नाम से भी जाना जाता है।

21. महर्षि वेदव्यास : पुराणों में महर्षि वेदव्यास को भी भगवान विष्णु का ही अंश माना गया है। महर्षि वेदव्यास नारायण के अवतार थे। यह महाज्ञानी महर्षि पराशर के पुत्र रूप में प्रकट हुए थे। उनका जन्म मत्स्यराज की पोष्यपुत्री सत्यवती के गर्भ से यमुना के द्वैपायन द्वीप पर हुआ था। इनके शरीर का रंग काला था, इसलिए उनका एक नाम कृष्णद्वैपायन भी था। इन्होंने ही मनुष्यों की आयु और स्मरण शक्ति को देखते हुए वेदों के विभाग किए। इसलिए इन्हें वेदव्यास भी कहा जाता है। महाभारत ग्रंथ की रचना भी इन्होंने ही की थी।

22. श्रीकृष्ण अवतार : द्वापरयुग के अन्त में भगवान विष्णु ने कंस जैसे अधर्मी राजाओं का अन्त करके धरती को पापियों से भारमुक्त करने के लिए श्रीकृष्ण अवतार लिया था। सम्पूर्ण 64 कलाओं में निपुण भगवान श्रीकृष्ण वसुदेव और देवकी के पुत्र थे। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा की कारागार में हुआ था। इनका बचपन गोकुल में बीता। भगवान श्रीकृष्ण ने इस अवतार में अनेक चमत्कार किए। यह अवतार महाभारत के युद्ध में कौरवों के विनाश का प्रमुख कारण बना था। श्री कृष्ण ने इस अवतार में धरती पर कर्म का महत्व बताते हुए ‘गीता ज्ञान’ के माध्यम से अर्जुन का मोहभंग करके उसे धर्मयुद्ध के लिए प्रेरित किया। इस युद्ध में श्रीकृष्ण, अर्जुन के सारथि बने थे। यह युद्ध अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना के लिए लड़ा गया था। धर्मराज युधिष्ठिर को राजा बनाकर धर्म की स्थापना की। भगवान विष्णु का यह अवतार सभी अवतारों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

23. बुद्ध अवतार : धर्म ग्रंथों के अनुसार बौद्धधर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध को भी भगवान विष्णु का नौंवा अवतार माना जाता है। एक समय दैत्यों ने राज्य की कामना से देवराज इंद्र से पूछा कि हमारा साम्राज्य स्थिर रहे, इसका उपाय क्या है। तब इंद्र ने बताया कि सुस्थिर शासन के लिए यज्ञ एवं वेदविहित आचरण आवश्यक है। दैत्य वैदिक आचरण एवं महायज्ञ करने लगे, जिससे उनकी शक्ति और बढ़ने लगी। इससे घबराकर सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने देवताओं के हित के लिए बुद्ध का रूप धारण किया। उनके हाथ में मार्जनी थी और वह मार्ग को बुहारते हुए चलते थे। इस प्रकार भगवान बुद्ध दैत्यों के पास पहुंचे और उन्हें उपदेश दिया कि यज्ञ करना व्यर्थ है। यज्ञ की अग्नि से कितने ही प्राणी भस्म हो जाते हैं। बुद्ध के उपदेश से प्रभावित होकर दैत्यों ने यज्ञ करना छोड़ दिया। जिससे उनकी शक्ति कम हो गई। महात्मा बुद्ध ने संसार में शून्यवाद की अवधारणा को स्थापित किया, जिसके अनुसार समस्त सांसारिक क्रियाएं व्यर्थ हैं। बुद्ध ने अपने अनुयाईयों को चार आर्यसत्य, अष्टांगिक मार्ग, पंचशील आदि की शिक्षाएं प्रदान की है। चार आर्य सत्य हैं – दुख (इच्छाएं), दुख के कारण (रोग, बुढ़ापा, मृत्यु), दुख निरोध (आशा-तृष्णा), दुख निरोध का उपाय (अष्टांगिक मार्ग)।

24. कल्कि अवतार : भगवान विष्णु का यह अवतार अभी तक इस धरती पर नहीं जन्मा है। लेकिन धर्म ग्रंथो के अनुसार माना जाता है कि कल्कि अवतार कलयुग के अंतिम दिनों में होगा। यह अवतार सम्पूर्ण 64 कलाओं से युक्त होगा। पुराणों के अनुसार भगवान कल्कि विष्णुयशा नामक तपस्वी ब्राह्मण के घर पुत्र रूप में जन्म लेंगे। कल्कि देवदत्त नामक घोड़े पर सवार होकर संसार से पापियों का विनाश करेंगे और धर्म की पुर्नस्थापना करेंगे। विष्णु के इस अवतार द्वारा सृष्टि का संहार करके सतयुग की स्थापना की जाएगी।