धर्म क्या है ?
धर्म प्रत्येक मनुष्य के जीवन में प्रमुख भूमिका निभाता है। जप, तप, यज्ञ, हवन, तीर्थ, व्रत, पूजा, पाठ, रीति-रिवाज आदि दैनिक गतिविधियां धर्म के ही अंग हैं। हमारे व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में भी इनका प्रमुख स्थान रहता है। इनसे व्यक्ति के धर्म की पहचान होती है। भारत एक ऐसा देश है, जहां धार्मिक विविधता और धार्मिक सहिष्णुता को कानून तथा समाज, दोनों द्वारा मान्यता प्रदान की गयी है। भारत विश्व की चार प्रमुख धार्मिक परम्पराओं हिन्दू, जैन, बौद्ध व सिख का जन्म स्थान है। भारतीयों का एक विशाल बहुमत स्वयं को इनमें से किसी न किसी धर्म से संबंधित अवश्य बताता है। भारत के संविधान में राष्ट्र को एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र घोषित किया गया है जिसमें प्रत्येक नागरिक को किसी भी धर्म या आस्था का स्वतंत्र रूप से पालन तथा प्रचार करने का अधिकार है।
धर्म, दर्शन और आध्यात्म – यह तीन शब्द हमें सुनने-पढ़ने को मिलते हैं। तीनों ही शब्दों का अर्थ अलग है, लेकिन यहां बात सिर्फ धर्म की करते हैं कि आखिर धर्म की परिभाषा क्या है। प्रत्येक व्यक्ति धर्म की अलग-अलग परिभाषा करता है। विद्वान लोग ग्रंथों से धर्म की परिभाषा निकालकर लोगों को बताते हैं, लेकिन सभी की परिभाषा में विरोधाभास की भरमार है। धर्म को परिभाषित करना उतना ही कठिन है जितना ईश्वर को। धर्म मानवीय मौलिक मूल्यों और सदगुणों से आगे की चीज है। अच्छे गुण जैसे सत्य, क्षमा, दया, धैर्य, पवित्रता, दान, सन्तोष, विवेक, विद्या, अक्रोध, अस्तेय, अच्छाई, सच्चाई, निर्धनों और निर्बलों की सहायता करना आदि। धर्म इन गुणों की शिक्षा तो देता है, इन्हें महत्व भी बहुत देता है।
सनातन परम्परा के अनुसार धर्म वह अनुशासित जीवन क्रम है, जिसमें लौकिक उन्नति तथा आध्यात्मिक परमगति दोनों की प्राप्ति होती है – यतोऽभ्युदयनिः श्रेयश्चसिद्धि स धर्मः। इसमें धर्म को जीवन में धारण करने, समझने और परिष्कृत करने की विधि बतलाया गया है, इसीलिए हिन्दुत्व में ‘सत्यम्-शिवम्-सुंदरम्’ कहा गया है। अतः सत्य ही धर्म है और धर्म ही सत्य है। सत्य को जानने से अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौचादि सभी स्वतः ही जाने जा सकते हैं। जो संप्रदाय, मजहब, रिलिजन अथवा विश्वास, सत्य को छोड़कर किसी अन्य रास्ते पर चल रहा है, वह सभी अधर्म के ही मार्ग हैं।
धर्म का शाब्दिक अर्थ :
धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है। धर्म संस्कृत भाषा का शब्द है। यह ‘धृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है, धारण करने वाला। इस तरह हम कह सकते हैं कि ‘धार्यते इति धर्मः’। अतः जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। धर्म को अंग्रेजी में रिलिजन (Religion) और ऊर्दू में मजहब कहते हैं। लेकिन यह उसी तरह सही नहीं है, जिस तरह दर्शन को फिलाॅसफी (Philosophy) कहा जाता है। मजहब का अर्थ सम्प्रदाय होता है, जबकि मत का अर्थ होता है आपका किसी विषय पर विचार। धर्म और सम्प्रदाय में मूलभूत अंतर है। ‘धर्म’ का अर्थ है कि जब कोई गुण जीवन में धारण करने योग्य होता है तो वह प्रत्येक मानव के लिए समान होना चाहिए। ‘सम्प्रदाय’ किसी एक व्यक्ति द्वारा निश्चित विशेष परम्परा को मानने वालों का समूह है। एक प्रकार से मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन या बौद्ध आदि धर्म न होकर सम्प्रदाय या समुदाय मात्र हैं। अपने सम्प्रदाय के नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना भी धर्म कहा जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि धर्म इंसान को अच्छाई के मार्ग पर लेकर जाता है।
परमात्मा ने सृष्टि के आरंभ में ही मानव कल्याण के लिए वेदों के माध्यम से इस अद्भुत रचना सृष्टि के सही संचालन व सदुपयोग के लिए दिव्य ज्ञान प्रदान किया। कुरान कहती है – मुस्लिम बनो। बाइबिल कहती है – ईसाई बनो। किन्तु वेद कहता है – मनुर्भव अर्थात् मनुष्य बनो – ऋग्वेद 10-53-6। अतः वेद ही मानव धर्म का नियम शास्त्र है। यह कहना गलत है कि वेद केवल आर्यों (हिंदुओं) के लिए है, उन पर जितना हक हिंदुओं का है उतना ही अन्य धर्मों का भी है।
पश्चिमी भाषाओं में धर्म शब्द का समतुल्य शब्द मिलना बहुत कठिन है। सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ स्वीकार किए गये हैं जिनमें धर्म प्रमुख है। तीन अन्य पुरुषार्थ यह हैं- अर्थ, काम और मोक्ष। पुराणों के अनुसार धर्म, ब्रह्मा के दाहिने वक्ष से उत्पन्न एक मानस पुत्र हैं। साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ यह हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्गुण आदि।
मनुस्मृति के अनुसार –
श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवत्र्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत्।।
धर्म का सर्वस्व क्या है, यह सुनो और सुनकर उस पर चलो! जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ नहीं करना चाहिये, यह धर्म की कसौटी (सर्वस्व) है। इसी तरह भगवद्गीता में कहा है –
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जब-जब धर्म की ग्लानि (पतन) और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब धर्म की स्थापना के लिए मैं अपना सृजन करता हूँ ;अवतार लेता हूँ।
धर्म की परिभाषा : व्यक्ति, वस्तु, स्थान, समय और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करना धर्म है।
भगवान श्री कृष्ण शांति, प्रेम और करुणा के प्रतीक थे। श्री कृष्ण स्वयं भी परिस्थिति के अनुसार जो उचित हो, वही करने पर जोर देते थे। लड़ाई के मैदान में वह एक शूरवीर योद्धा थे। अपनी प्रेमिका के साथ होते, तो एक शानदार प्रेमी होते थे। गीता में श्रीकृष्ण जी कहते है कि ‘यतो धर्मस्ततो जय’ अर्थात् जहां धर्म है वहां विजय है। आगे कहा है कि ‘वेदोेऽखिलो धर्ममुलं’ अर्थात् वेद धर्म का मूल है।
वेदों के आधार पर महर्षि मनु ने धर्म के निम्न 10 लक्षण बताए है।
यदि यह गुण या लक्षण किसी भी व्यक्ति में है तो वह धार्मिक है :-
1. धृति (दृढ़ निश्चय) – जीवन में सदैव धैर्य रखना और कठिनाइयों से ना घबराना।
2. क्षमा – शक्ति होते हुए भी दूसरों को माफ करना। मान-अपमान, हानि-लाभ की चिन्ता ना करना।
3. दम (समाधि) – अपने मन को वश में करना। मन को धर्म में प्रवृत्त कर, अधर्म से रोकना।
4. अस्तेय – चोरी न करना। मन, वचन और कर्म से किसी भी परपदार्थ या धन का लालच न करना ।
5. शौच – शरीर, मन एवं बुद्धि को पवित्र रखना। राग, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, वैमनस्य से दूर रहना।
6. इंद्रिय-निग्रह – ग्यारह इंद्रियों को अपने वश में रखना और वासनाओं से बचना।
(पांच ज्ञानेन्द्रियां – कान, आंख, नाक, जीभ, त्वचा; पांच कर्मेन्द्रियां – हाथ, पैर, मुंह, उपस्थ, गुदा; ग्यारहवां मन)।
7. धी – बुद्धिमान बनना अर्थात् प्रत्येक काम सोच-विचारकर करना। मन को धर्म कार्यों में लगाना।
8. विद्या – परमसत्य वेद ज्ञान ग्रहण करना। सत्पुरुषों का संग, योगाभ्यास, ब्रह्मचर्य से मन को स्थिर रखना।
9. सत्य – सच बोलना, सत्य का आचरण करना। मन, कर्म और वचन से एकसा व्यवहार करना।
10. अक्रोध – क्रोध के समय मन को वश में करना और अकारण किसी पर क्रोध न करना।
वास्तविक धर्म : किसी भी वस्तु के स्वाभाविक गुणों को उसका धर्म कहते है। अग्नि का धर्म उसकी गर्मी और तेज है, गर्मी और तेज के बिना अग्नि की कोई सत्ता नहीं। मनुष्य का स्वाभाविक गुण मानवता है और यही उसका धर्म है। जब भी कोई सामाजिक संस्था या संगठन आदि बनाया जाता है तो उसके सुचारू रूप से संचालन के लिए नियम पूर्व ही निर्धारित कर दिये जाते हैं। मानवता का संदेश देने वाले वैदिक सनातन धर्म के अतिरिक्त अन्य सभी धर्म किसी व्यक्ति विशेष द्वारा चलाये गए हैं, जैसे इस्लाम धर्म पैगंबर मुहम्मद द्वारा, ईसाई धर्म ईसा मसीह द्वारा और जैन धर्म महावीर स्वामी द्वारा आदि। धर्म चलाते समय उन्होंने स्वयं को ईश्वर का दूत व ईश्वर पुत्र बताया, ताकि लोग उनका अनुसरण करें। क्योंकि सभी अनुयायियों को धर्म के चलाने वाले पर विश्वास लाना आवश्यक है। अतः यह धर्म नहीं, मत है। यह सब मत वैज्ञानिक भी नहीं है, जबकि धर्म और विज्ञान का आपस में अभिन्न संबंध है। जहां धर्म है वहां विज्ञान भी है। जैसे बाईबल में सूर्य को पृथ्वी के चारों ओर घूमना बताया जाता था, जबकि वेद कहता है कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर जल सहित परिक्रमा करती है। विज्ञान का कोई भी क्षेत्र वेदों से भिन्न नहीं है। अतः जो मत विज्ञान की कसौटी पर खरा नहीं उतरते, वह धर्म भी नहीं है।