तांत्रिक विद्या का परिचय
भारत में तंत्र-मंत्र का इतिहास सदियों पुराना है। प्राचीनकाल से ही बंगाल, बिहार और राजस्थान तन्त्र के गढ़ रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने देवी पार्वती को विभिन्न अवसरों पर तंत्र का ज्ञान दिया। योग में तंत्र का विशेष महत्व है। यह शास्त्र प्रधानतः शाक्तों का ही है और इसके मंत्र प्रायः अर्थहीन और एकाक्षरी हुआ करते हैं, जैसे- ह्नीं, क्लीं, श्रीं, स्थीं, शूं, क्रू आदि। यह शास्त्र तीन भागों में विभक्त है – आगम, यामल और मुख्य तंत्र। तांत्रिकों का पंचमकार मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा-मैथुन और चक्रपूजा प्रसिद्ध है। इस शास्त्र का सिद्धान्त है कि कलियुग में वैदिक मंत्र, जप-तप और हवन-यज्ञ आदि का कोई फल नहीं होता। इस युग में सब प्रकार के कार्यों की सिद्धि के लिये तंत्र-शास्त्र में वर्णित मंत्रों और उपायों आदि से ही सहायता मिलती है।
तंत्र-मंत्र का लिखित प्रमाण मध्यकालीन इतिहास से मिलना शुरू हो जाता है। इसलिए लगभग सभी धर्मों में जीवन की समस्याओं का हल तंत्र-मंत्र के माध्यम से बताया गया है। यद्यपि अथर्ववेद संहिता में मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि का वर्णन और विधान है तथापि आधुनिक तंत्र का उसके साथ कोई संबंध नहीं हैं। हिन्दुओं की भांति बौद्धों में भी तंत्र का प्रचार हुआ और तत्संबंधी अनेक ग्रंथ बने। हिंदू तांत्रिक उन्हें ‘उपतंत्र’ कहते हैं। वाराही तंत्र में यह भी लिखा है कि जैमिनि, कपिल, नारद, गर्ग, पुलस्त्य, भृगु, शुक्र, बृहस्पति आदि ऋषियों ने भी कई उपतंत्रों की रचना की है। तंत्र परम्परा एक हिन्दू परम्परा तो है ही, यह जैन धर्म, सिख धर्म, बौ( धर्म, तिब्बत की बोन परम्परा, ताओ परम्परा तथा जापान की शिन्तो परम्परा में भी पाई जाती है। वैसे तो तन्त्र ग्रन्थों की संख्या हजारों में है, किन्तु मुख्य-मुख्य तन्त्र 64 कहे गये हैं। योग तथा तंत्र दोनों, अध्यात्मिक चक्रों की शक्ति को विकसित करने की विभिन्न पद्धतियों के बारे में बताते हैं।
तंत्र क्या है : तंत्र-मंत्र का नाम आते ही लोगों के जहन में एक कंकाल, खोपड़ी, ढेर सारी जलती हुई अगरबत्तियां, आदि नजर आती हैं। लोग इसे जादू-टोना, टोटका भी कहते हैं और यही वजह है कि लोग इससे दूर भागते हैं। भारतीय परम्परा में किसी भी व्यवस्थित ग्रन्थ, सिद्धान्त, विधि, उपकरण, तकनीक या कार्यप्रणाली को भी तन्त्र कहते हैं। साहित्यक रूप में जिस प्रकार पुराण ग्रन्थ मध्ययुग की दार्शनिक-धार्मिक रचनायें माने जाते हैं उसी प्रकार तन्त्रों में प्राचीन-आख्यान, कथानक आदि का समावेश होता है। तन्त्र का शाब्दिक उद्भव इस प्रकार माना जाता है – तनोति त्रायति तन्त्र। जिसका अभिप्राय है – तनना, विस्तार, फैलाव, इस प्रकार इससे त्राण होना तन्त्र है। व्याकरण शास्त्र के अनुसार तन्त्र शब्द ‘तन’ धातु से बना है जिसका अर्थ है – विस्तार। शैव सिद्धान्त के ‘कायिक आगम’ में इसका अर्थ किया गया है – तन्यते विस्तार्यते ज्ञानम् अनेन, इति तन्त्रम् । अर्थात् वह शास्त्र जिसके द्वारा ज्ञान का विस्तार किया जाता है। तन्त्र की निरुक्ति ‘तन’ (विस्तार करना) और ‘त्रै’ (रक्षा करना), इन दोनों धातुओं के योग से सिद्धि होती है। इसका तात्पर्य यह है कि तन्त्र अपने समग्र अर्थ में ज्ञान का विस्तार करने के साथ उस पर आचरण करने वालों का त्राण (रक्षा) भी करता है।
तन्त्र का सामान्य अर्थ है – विधि या उपाय। विधि या उपाय कोई सिद्धान्त नहीं है। डूबने से बचने के लिए तैरकर ही आना पड़ेगा। दौड़ने के लिए पाँव आगे बढ़ाने ही होंगे। पर्वत पर चढ़ना है तो ऊँचाई की तरफ कदम बढ़ाये बिना कोई चारा नहीं है। यह क्रियाएँ विधि कहलाती हैं। ‘वाराही तन्त्र’ में इस शास्त्र के सात लक्षण बताए हैं, उनमें व्यवहार ही मुख्य है। ये सात लक्षण हैं – (1) सृष्टि, (2) प्रत्यय, (3) देवार्चन, (4) सर्वसाधन (सिद्धियां प्राप्त करने के उपाय), (5) पुरश्चरण (मारण, मोहन, उच्चाटन आदि क्रियाएं), (6) षट्कर्म (शान्ति, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण के साधन), तथा (7) ध्यान (ईष्ट के स्वरूप का एकाग्र तल्लीन मन से चिन्तन)। तन्त्र-शास्त्र का एक नाम आगम शास्त्र भी है। भारतीय परम्परा में आगमों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन मन्दिरों, प्रतिमाओं, भवनों, एवं धार्मिक-आध्यात्मिक विधियों का निर्धारण इनके द्वारा हुआ है।
तन्त्र की तीन परम्परायें मानी जाती हैं – (1) शैव आगम या शैव तन्त्र, (2) वैष्णव संहितायें, तथा (3) शाक्त तन्त्र। शैव आगमों की चार विचारधारायें हैं – (1) शैव सिद्धान्त , (2) तमिल शैव, (3) कश्मीरी शैवदर्शन, तथा (4) वीरशैव या लिंगायत शैव दर्शन। वैष्णव संहिता की दो विचारधारायें मिलती हैं – (1) वैखानस संहिता तथा (2) पंचरात्र संहिता। तांत्रिक साधना प्रकृति में छिपी शक्ति पर अधिकार करने का एक उपक्रम है। तंत्र शास्त्र में दो तरह की साधनाओं का वर्णन मिलता है- पहली दक्षिणमार्गी और दूसरी वाममार्गी। तंत्र साधना, तंत्र क्रिया को वाममार्गी साधना कहते हैं, जो असाधारण और भयावह होती है। लेकिन इस तंत्र साधना का परिणाम तुरंत मिलता है। असाधारण प्रयत्य करने पर इसकी प्रतिक्रिया भी असाधारण होती है।
मंत्र क्या है : सनातन संस्कृति के धर्मशास्त्रों में वैदिक मंत्रों का काफी गुणगान किया गया है। मंत्रों को देववाणी बताकर उनके जाप से जीवन के उत्थान की बात कही गई है। शास्त्रों में कहा गया है कि ‘मनः तारयति इति मंत्रः’ अर्थात् मंत्रों में वह शक्ति होती है कि वो मानव को तार देते हैं। हर देवी देवता के अपने मंत्र होते हैं और उनके स्मरण मात्र से मानव के उन्नति और उसकी सफलता के द्वार खुलते हैं। मंत्रों को मुख्यतः तीन प्रकार से श्रेणीबद्ध किया गया है। जो वैदिक, तांत्रिक और शाबर मंत्रों में विभक्त है।
(1) वैदिक मंत्र : यदि धार्मिक कर्मकांड में मंत्र की बात की जाए तो सबसे पहले वैदिक मंत्रों की बात होती है। मान्यता है कि वैदिक मंत्रों को सिद्ध करने में काफी समय लगता है। लेकिन वैदिक मंत्रों को सिद्ध कर लिया है, तो उसकी जिंदगी में उस मंत्र का प्रभाव हमेशा बना रहता है।
(2) तांत्रिक मंत्र : वैदिक मंत्र की अपेक्षा तांत्रिक मंत्र जल्दी सिद्ध हो जाते हैं और अपना फल भी मानव को जल्दी दे देते हैं। लेकिन तांत्रिक मंत्रों का प्रभाव वैदिक मंत्रों की अपेक्षा कम समय तक बना रहता है।
(3) शाबर मंत्र : वैदिक और तांत्रिक दोनों मंत्रों से शाबर मंत्र अलग होते हैं। शाबर मंत्र बहुत जल्द सिद्ध हो जाते है। यानी वह जातक को अपना प्रभाव जल्द देते हैं। ये मंत्र शीघ्र सिद्ध होते हैं, इसलिए इनका प्रभाव भी ज्यादा देर तक नहीं रहता है।
सभी धर्मों में कर्मकाण्ड और पूजा-उपासना के तरीके अलग-अलग हैं, परन्तु तन्त्र के सम्बन्ध में सभी एकमत हैं। सभी धर्मों का मानना है मानव के भीतर अनन्त ऊर्जा छिपी हुई है, उसका पाँच-सात प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग में आता है, शेष भाग बिना उपयोग के ही पड़ा रहता है। इन धर्म-सम्प्रदायों के अनुयायी अपनी छिपी हुई शक्तियों को जगाने के लिए प्रायः एक समान विधियां ही काम में लाते हैं। तंत्र द्वैत को नहीं मानता है। यह अहंकार को पूरी तरह समाप्त करने की बात करता है, जिससे द्वैत का भाव पूर्णतया विलुप्त हो जाता है। तंत्र के विशेष सिद्धान्त तथा पद्धतियां हैं, जो जानने और समझने में जटिल होती हैं। तंत्र-मंत्र की सभी तांत्रिक कियाएं जिनमें – सम्मोहन, वशीकरण, उचाटन मुख्य हैं, जो कि ‘मंत्र महार्णव’ तथा ‘मंत्र महोदधि’ नामक ग्रंथों में वर्णित हैं। तंत्र साधना के बारे में कहा जाता है कि इस मार्ग के पथिकों के लिए यह कार्य तलवार की धार पर चलने के समान कठिन है। यदि कोई साधक बिना जानकारी और तैयारी के तंत्र क्रिया करता है और उसमें कोई गलती हो जाती है तो ऐसे में उक्त साधक की मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए तंत्र साधना करने वाला साधक इस साधना को करने से पहले स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और शक्तिशाली बनाता है। क्योंकि तांत्रिक साधना करने के वाले को साधना काल में कभी-कभी डरावने, भूत, प्रेत, पिशाच, देव, दानव जैसी आकृतियां भी दिख सकती है।