तीर्थ यात्रा का हिन्दू संस्कृति और हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व है। वह स्थान जहां पहुंचकर हमारा मन, प्राण और शरीर निर्मल हो जाएं, वही तीर्थ है। इसलिए हिन्दू धर्म से संबंधित हर जन जाति के मनुष्य की हार्दिक इच्छा रहती है कि वह अपने जीवन में भारत के सभी तीर्थो के दर्शन करके अपने जीवन को सफल करे। जिसके लिए मनुष्य अपना घर बार, बच्चे छोड़कर तीर्थ यात्रा पर निकल जाता है। कभी-कभी तो वह अपने जीवन भर की सारी सम्पत्ति को भी एक बार में न्यौछावर करने के लिए तैयार हो जाता है। सवाल यह उठता है कि तीर्थों में ऐसा क्या है जिसके लिए मनुष्य यह त्याग और बलिदान देने के लिए तैयार हो जाता है। इस त्याग और बलिदान की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। मन्दिरों और तीर्थों को ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। वहां जाने से हमारे मन को शांति मिलती है। शांत मन और सकारात्मक सोच के साथ किए गए काम में सफलता मिलती है।

इस संसार में जितने भी तीर्थ हैं वह सभी भगवान और भक्तों के साथ से ही बने है। कहने का मतलब यह है कि भक्त बिना भगवान नही, भगवान बिना भक्त नही और इन दोनों के बिना तीर्थ नहीं। तीर्थ यात्रा का असली उद्देश्य तो आत्मा का उ(ार करना है। इस लोक और परलोक के भोगों की प्राप्ति के लिए और भी बहुत से साधन है। इसलिए हर व्यक्ति को चाहिए कि वह भोगों की प्राप्ति के लिए तीर्थ यात्रा न करे, बल्कि आत्मा के कल्याण के लिए तीर्थ यात्रा करे। जो लोग आत्मा के कल्याण के लिए श्र(ा व भक्तिपूर्वक नियम का पालन करते हुए तीर्थ यात्रा करते है, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति के साथ अन्य लाभ भी होता है।

तीर्थ का अर्थ : ‘तीर्थ’ शब्द का आधुनिक तरीके से अर्थ निकाला जाए तो ‘ती’ शब्द से तीन और ‘र्थ’ शब्द से अर्थ निकलता है। इस तरह से इसका अर्थ बनता है ‘तीन अर्थों की सिद्धि’ यानि जिससे तीन पदार्थों की प्राप्ति हो उसे तीर्थ कहते हैं। मानव जीवन के चार प्रमुख लक्ष्य माने जाते है – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। जिसको पूर्ण करने हेतु मनुष्य का पृथ्वी पर जन्म हुआ है। इन चारों में अर्थ ;धनद्ध तो तीर्थ यात्रा करने में खर्च होता है। अतः इसकी प्राप्ति तीर्थों में नही होती है। सीधी भाषा में कहा जाए तो चाहे आप कितने भी तीर्थों के दर्शन करते रहो, वहां आपको धन की प्राप्ति नही हो सकती। धन की प्राप्ति रोजगार से होती है। धर्म, काम और मोक्ष, इन तीनों की प्राप्ति तीर्थ यात्रा से हो जाती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में तीर्थ करने की इच्छा रखता है।

प्रसिद्ध 67 तीर्थों में 4 धाम, 12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ और सप्तपुरियों का ही महत्व है। काशी, मथुरा, अयोध्या, द्वारका, गया, कांची और अवंति (उज्जैन) यह सप्तपुरियां हैं। कुछ लोग बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री यात्रा को चार धाम यात्रा मानते हैं जबकि वास्तव में यह एक ही धाम है। इनकी यात्रा का भी विशेष महत्व है, इसलिए इन्हें छोटी चार धाम कहते हैं। ‘यमुनोत्री’ यमुना नदी का उद्गम स्त्रोत है। यमुना को सूर्य की पुत्री और यम की बहन माना जाता है। ‘गंगोत्री’ के गोमुख को गंगा का उद्गम स्त्रोत माना जाता है। हिन्दू आस्था का प्रमुख केन्द्र गंगा नदी भारत की सबसे पवित्र नदी है। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में पांडवों द्वारा स्थापित मन्दिर का पुनरुद्धार 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने ‘केदारनाथ’ के रूप में किया था। भगवान विष्णु की विश्राम स्थली ‘बद्रीनाथ’ प्रमुख चार धाम और छोटी चार धाम, दोनों का हिस्सा है।

तीर्थ यात्रा करने के पीछे लोगों की अलग-अलग मंशा होती है। सात्विक मनुष्य केवल भक्ति भाव से तीर्थ यात्रा करते हैं। जो व्यक्ति सात्विक और राजसी वृत्ति के हैं, वह धर्म के लिए तीर्थ यात्रा करते है। तामसी वृत्ति के व्यक्ति सांसारिक और परलौकिक कामनाओं की सिद्धि के लिए तीर्थ यात्रा करते है। परंतु जो व्यक्ति निष्काम भाव से यात्रा करते है, केवल उन्हें ही मोक्ष प्राप्त होता है। जो व्यक्ति सकाम भाव से तीर्थ यात्रा करते है। उन्हे इस लोक में स्त्री-पुत्र आदि और परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति होती है। परंतु उन्हे मोक्ष प्राप्त नही हो सकता।

तीर्थ के प्रकार : उस नदी, सरोवर, मन्दिर या भूमि को तीर्थ कहा जाता है जहां ऐसी दिव्य शक्तियां है कि उनके संपर्क में जाने से मनुष्य के पाप अज्ञात रूप से नष्ट हो जाते है। तीर्थ 9 प्रकार के होते है। 3 प्रकार के तीर्थ ऐसे हैं जो अपने स्थान पर सदा के लिए स्थित हैं और मनुष्य खुद चलकर उनके पास जाता है। जैसे- नित्य तीर्थ, भगवदीय तीर्थ और संत तीर्थ। बाकी 6 तीर्थ ऐसे है जो सदा हमारे आस-पास रहते है। जिनका महत्त्व किसी तीर्थ स्थलों से कम नही है। इन छः तीर्थो का विवरण इस प्रकार है –

1. भक्त तीर्थ 2. गुरू तीर्थ 3. माता तीर्थ 4. पिता तीर्थ 5. पति तीर्थ 6. पत्नी तीर्थ

1. नित्य तीर्थ : नित्य तीर्थ वो होते हैं जहां की भूमि में सृष्टि के प्रारम्भ से ही पावन, दिव्य और मंगलकारी शक्तियां विद्यमान होती हैं। अर्थात् जिस स्थान पर इस सृष्टि के प्रारंम्भ से ही ईश्वर किसी न किसी रूप में वास करते रहे हैं। उदाहरण के लिए कैलाश, मानसरोवर, काशी, उज्जैन, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम् आदि नित्य तीर्थ है। इसी तरह गंगा, यमुना, नर्मदा, कावेरी आदि पवित्र नदियां भी नित्य तीर्थ की श्रेणी में आती हैं।

2. भगवदीय तीर्थ : भगवदीय तीर्थ वो तीर्थ हैं, जहां भगवान ने किसी न किसी रूप में अवतार लिया हो या उन्होंने वहां कोई लीला की हो या फिर भगवान ने अपने किसी भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर दर्शन दिए हो या भक्त की प्रार्थना पर सदा के लिए वहां वास किया हो, यह सभी स्थल भगवदीय तीर्थ है। इस धरती पर भगवान के चरण जहां-जहां पड़े वह भूमि दिव्य हो गई। अतः ऐसे सभी स्थल भगवदीय तीर्थ की श्रेणी में आते है। उदाहरण के लिए 12 ज्योतिर्लिंग, द्वारिका, मथुरा, वृंदावन, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, कोणार्क आदि।

3. संत तीर्थ : जो जीवनमुक्त, देहातीत, परमभक्त या भगवद् प्रेम तन्मय संत हैं, उनका शरीर भले ही पांच भौतिक तत्त्वों से निर्मित और नश्वर हो, किंतु उस देह में परमात्मा के दिव्यगुण ओत-प्रोत हैं। उस देह से उन दिव्य गुणों की ऊर्जा सदा बाहर निकलती रहती है। जो भी भूमि, मनुष्य, वस्तु आदि उसके संपर्क में आते हैं, वह उर्जा उसको प्रभावित करती है। इसलिए जहां-जहां संत के चरण पड़ते है, वह भूमि तीर्थ बन जाती है। संत की जन्म भूमि, संत की साधना भूमि, संत की देहत्याग भूमि विशेष रूप से पवित्र होती है।

हमारे आस-पास स्थित तीर्थ :

1. भक्त तीर्थ : श्रीकृष्ण भक्तश्रेष्ठ विदुर जी से कहते है कि आप जैसे भगवान के प्रिय भक्त स्वयं ही तीर्थ रूप होते है। आप लोग अपने हृदय में विराजित भगवदज्ञान के द्वारा तीर्थों को भी महातीर्थ बनाते हैं।

2. गुरू तीर्थ : सूर्य दिन में प्रकाश करता है, चंद्रमा रात्रि में प्रकाश करता है तथा दीपक एक स्थान विशेष में उजाला करता है। परंतु गुरू अपने शिष्य के हृदय में दिन-रात सदा प्रकाश फैलाते रहते है। वह शिष्य के सम्पूर्ण अज्ञानमय अंधकार का नाश कर देते है। इसलिए शिष्य के लिए गुरू ही परम तीर्थ है।

3. माता एवं पिता तीर्थ : सन्तान के लिए इस लोक और परलोक के लिए माता-पिता के समान कोई तीर्थ नहीं है। जिसने माता-पिता का पूजन नहीं किया, उसको वेदों से क्या प्रयोजन है? व्यक्ति के लिए माता-पिता की सेवा पूजन ही धर्म है। वही तीर्थ है, वही मोक्ष है और वही जन्म का शुभ फल है।

4. पति तीर्थ : जो स्त्री अपने पति के दाहिने चरण को प्रयाग और बाएं चरण को पुष्कर समझकर पति के चरणोदक से स्नान करती है, उसे इन तीर्थों के स्नान के समान पुण्य प्राप्त होता है।

5. पत्नी तीर्थ : जिस घर में सभी प्रकार के सदाचार का पालन करने वाली, प्रशंसा के योग्य आचरण करने वाली, धर्म साधना में लगी हुई, सदा पतिव्रत का पालन करने वाली तथा ज्ञान की अनुरागिणी स्त्री रहती है, उस घर में देवता सदा निवास करते है। पितृ भी उसके घर में रहकर सदा उसके कल्याण की कामना करते है। परिवार कल्याण के लिए ऐसी स्त्री के समान कोई तीर्थ नहीं है। अतः भार्या के समान सुख नहीं है।