कर्म और भाग्य
सुख और दुःख जीवन का हिस्सा होते हैं और प्रारब्ध के अनुसार आते-जाते रहते हैं। यह भी परम सत्य है कि भाग्य देव की कृपा के बिना जीवन में कुछ भी मिलना संभव नहीं है। इस प्रकार हमारे भाग्य में जो लिखा है, वही होता है, उसे कोई बदल नहीं सकता है। कई बार हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति बहुत दान-धर्म करता है, पूजा-पाठ करता है, फिर भी उसे दुःख भोगने पड़ते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसा कुछ न करके भी खुशी से रहते हैं। वर्षा ऋतु में जब सभी स्थानों पर पानी ही पानी हो जाता है, तब भी चातक पक्षी जो केवल वर्षा की बूंदे ही पीता है, कई बार प्यासा रह जाता है, जबकि इसमें बादलों का कोई दोष नहीं होता है। प्रायः हमारे साथ जो भी अच्छा या बुरा घटित होता है, हम उसे प्रारब्ध या नसीब कहते हैं। जीवन में घटने वाली घटनाओं और दुघर्टनाओं के लिए केवल भाग्य को दोष देना उचित नहीं होता। क्योंकि यदि भाग्य ही सब कुछ होता, तो कर्म का कोई अर्थ ही नहीं होता। जीवन जो कुछ घटित होता है, उसके लिए मनुष्य स्वयं उत्तरदायी होता है। भाग्य का अर्थ है कि केवल भगवान जानता है कि व्यक्ति के जीवन में क्या घटित होने वाला है।
कर्म का महत्त्व :
महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन ने स्वजनों को अपने सामने खड़ा पाया तो उसका शरीर निस्तेज हो गया। उसके हाथों से धनुष छूट गया और वह प्राणहीन मनुष्य के समान नीचे जमीन पर बैठ गया, तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा कि राज्य तुम्हारे भाग्य में है या नहीं यह तो बाद में देखा जायेगा, पहले तुम्हें कर्म करना पड़ेगा अर्थात् तुम्हें स्वजनों के खिलाफ युद्ध तो करना ही पड़ेगा।
भगवान श्री कृष्ण ने उसे गीता के रूप में कर्म का उपदेश देते हुए कहा –
कर्मण्ये वाधिकारस्ते, मा फलेसु कदाचन।
मा कर्म फलहेतूर्भू, तेसंगोऽस्ति कर्मणा।।
तुलसीदास ने भी श्रीरामचरित मानस में लिखा है- ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा’ अर्थात् महत्त्व तो कर्म का है। इसका अर्थ यह हुआ कि पहले हम अपना कार्य करें, फल की चिंता बाद में करें। किसान जब खेत में बीज बोता है तो उसे पता नहीं होता कि बारिश होगी या नहीं। बीज से अंकुर फूटेगा या नहीं। अगर पौधे आ भी गए तो उस पर फल आएंगे या नहीं। लेकिन फिर भी किसान समय पर बीजों को जमीन में बोता है, समय पर खाद, पानी देकर मेहनत करता है और फसल की चिंता ईश्वर पर छोड़ देता है।
कर्म, मनुष्य के जीवन में तीन प्रकार से आते हैं – संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म, क्रियमान कर्म। संचित कर्म बैंक में फिक्स्ड डिपाॅजिट जैसे हैं। जब संचित कर्म समय के साथ आपके सामने आता है तो उसको प्रारब्ध कहते है। वर्तमान परिस्थिति को ही प्रारब्ध या भाग्य कहते हैं। क्रियमान कर्म तीन प्रकार के होते हैं- अच्छा कर्म या सुकर्म, बुरा कर्म या विकर्म और अकर्म। अच्छा कर्म सकारात्मक है, विकर्म नकारात्मक है, अकर्म का दोनों से कोई संबंध नहीं है। सुकर्म से पुण्य होता है और विकर्म से पाप होता है। अकर्म पाप और पुण्य से ऊपर है जो ना पाप बनाता है ना पुण्य बनाता है। कर्म या विकर्म फिर से संचित कर्म में चला जाएगा और अकर्म हमें कर्म बंधन से मुक्त करेगा। यह आपको कर्म बंधन से छुटकारा देता है। कर्मों का परिणाम संचित कर्म में परिवर्तित हो जाता है।
भाग्य का महत्त्व :
भाग्य के बारे में मनुष्य बिलकुल अंधकार में है। यदि इस भ्रामक बात को मान भी लें कि भाग्य पहले ही लिख दिया जाता है तो फिर मेहनत, परिश्रम, योग्यता आदि का कोई महत्त्व ही नहीं है, फिर हम कर्म क्यों करते हैं? वास्तव में सूर्य पुत्र भगवान श्री भाग्य देव भी 33 करोड़ देवी-देवताओं में से एक हैं। सभी देवी देवताओं की कृपा, उनका आशीर्वाद व उनके द्वारा दी जाने वाली सुख-सुविधाएं मनुष्यों तक पंहुचने का कार्य भाग्यदेव को दिया गया है। यदि कोई मनुष्य कुछ गलत काम करता है, तो उससे कुछ छीनने का कार्य भी भाग्य का ही है। मनुष्यों तक सुख-सुविधा को पंहुचाने का कार्य भाग्य का है, इसलिए धीरे-धीरे भाग्यदेव देवताओं में बहुत लोकप्रिय हो गए। यह देखकर सभी देवी-देवताओं ने ईष्र्यावश भाग्य देवता का बहिष्कार करने का निर्णय किया। भाग्य देव का कार्य बन्द होने से जब देवलोक एवं भूलोक दोनों में स्थिति नियंत्रण से बाहर होने लगी तो ब्रह्मा जी देवलोक में प्रकट हुए। उन्होंने सभी देवी-देवताओं को समझाया कि देवता सुख-सुविधाओं की उत्पत्ति तो कर सकते हैं किन्तु उन्हें मनुष्यों तक पहुंचा नहीं सकते क्योंकि जो विधि का विधान है, उसका कोई विकल्प नहीं है। देवताओं ने ब्रह्मा जी से क्षमा मांगते हुए भाग्यदेव को अपना कार्य करने को कहा। ब्रह्मा जी के कहने पर भाग्यदेव उसी समय अपना कार्य करने के लिए तैयार हो गए।
कौन है भाग्य देवता :
एक समय पाताल लोक में एक बहुत ही शक्तिशाली एवं मायावी असुर ‘आज्ञा’ का साम्राज्य था। उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया कि तीनों लोकों में कोई भी उसकी किसी भी आज्ञा को टाल न सके। भगवान शिव ने आज्ञा को इस शर्त पर वरदान दिया कि तुम्हें जिसको आज्ञा देनी हो, वह तुम्हारे सामने उपस्थित होना चाहिए। यदि उसको आज्ञा देने में चूक गए तो यह वरदान समाप्त हो जायेगा। आज्ञासुर ने शिव के वरदान का सबसे पहले सूर्य देव पर ही प्रयोग करने का निश्चय किया। इसके लिए उसने निश्चय किया कि सूर्य को रसातल में आने की आज्ञा दी जाए। किन्तु जैसे-जैसे आज्ञा का रथ सूर्य देव के निकट पंहुचता जा रहा था, सूर्य की गर्मी असहनीय होती जा रही थी। उसके साथी उसे आवाजें लगा रहे थे, भाग आज्ञा … भाग आज्ञा …, लेकिन वह आगे बढ़ता गया। सूर्य के सामने पहुंचते ही अग्नि की एक लपट उसके मुंह में प्रवेश कर गई। उसने किसी तरह अपने मुंह में घुसे हुए अग्नि पुंज को बाहर उगल दिया और तुरन्त ही जान बचाकर वहां से भाग निकला। उस अग्नि पुंज ने एक बालक का रूप ले लिया।
सूर्य देव ने उस बालक से पूछा कि वह कौन है? बालक ने आज्ञासुर के साथियों को चिल्लाते हुए सुना था ‘भाग आज्ञा’, ‘भाग आज्ञा’, साथ ही उसने आज्ञा असुर को वहां से भागते हुए भी देखा था। अतः बालक ने उत्तर दिया ‘भाग … गया …।’ सूर्य देव ने समझा कि बालक अपना नाम ‘भाग्य’ बता रहा है। वास्तविकता ज्ञात होने पर भगवान शिव के वरदान को सार्थक करने के लिए सूर्य देव ने उस बालक को वरदान दिया कि वह किसी भी लोक में आ-जा सकता है। सूर्यनारायण ने बालक को यह भी वरदान दिया कि मनुष्यों को जो कुछ भी प्राप्त होगा वह भाग्य द्वारा ही प्राप्त होगा। यदि मनुष्यों से कुछ छीना भी जायेगा तो वह भी भाग्य द्वारा ही होगा। इसके साथ ही आज्ञासुर को भगवान शिव द्वारा दिया गया वरदान भी समाप्त हो गया, क्योंकि आज्ञासुर ने सूर्यनारायण को आज्ञा देने का मन बनाया था और उनके समक्ष पहुँचकर भी वह उनको आज्ञा देने में सफल नहीं हो पाया था।
गणेशजी को भाग्य का देवता क्यों कहा जाता है?
गणेश जी भगवान शिव व देवी पार्वती की संतान है। परमतत्त्व से जन्म होने के कारण वैसे भी गणेश जी दिव्य है। वह गणों के प्रमुख यानी लीडर हैं। इस तरह गणेशजी स्वयं नेतृत्व के प्रतीक हैं। उनके परिवार में दो पत्नी ऋद्धि सिद्धि, उनके दो पुत्र लाभ व क्षेम हैं। ऋद्धि का अर्थ समृद्धि यानि भौतिक वैभव से है और सिद्धि का अर्थ काम को करने की क्षमता देने वाली शक्ति से है। इसी तरह उनके पुत्र लाभ का अर्थ है फायदा और क्षेम का अर्थ है जो फायदा हुआ है उसका रक्षक। उनकी दो पत्नियां समृद्धि और क्षमता को देने वाली है तथा एक पुत्र फायदा तो दूसरा मिले फायदे की रक्षा करता है। भाग्यशाली पुरुष को इन्हीं सबकी आवश्यकता होती है। हर व्यक्ति चाहता है उसके जीवन में सुख हो, शांति हो, सामथ्र्य हो और यह सब जो उसने प्राप्त किया है, वह सुरक्षित रहे। इस तरह गणेशजी की आराधना व्यक्ति के भाग्य का निर्माण करती है। उनकी आराधना से उनका समूचा परिवार प्रसन्न होकर भाग्य को सौभाग्य में बदल सकता है, इसलिए गणेशजी को भाग्य का देवता कहा गया है।