पित्तरों के बारे में लोगों की हमेशा जिज्ञासा बनी रहती है कि वह कौन होते हैं? उनकी नाराजगी से क्या होता है? पित्तर हमारे वह पूर्वज होते हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर शेष होता है अर्थात् जिनके हमारे प्रति कुछ कर्म अधूरे रह गए हों या जिनकी इच्छाएं अधूरी रह गई हों वह पित्तर बन जाते हैं। मनुष्य लोक यानि भूलोक से ऊपर पितृ लोक स्थित है। पितृ लोक से ऊपर सूर्य लोक है और इससे ऊपर स्वर्ग लोक है। मृत्यु के बाद आत्मा सबसे पहले पितृलोक में जाती है जहां उसे उसके पूर्वज मिलते हैं। अपने पुण्यों के अनुसार आगे सूर्यलोक की तरफ बढ़ती है। अधिक पुण्य होते हैं तब आत्मा को स्वर्ग लोक भेजा जाता है। अधिकांश आत्माएं पितृलोक से ही पुनः पृथ्वी लोक पर जन्म लेती हैं। हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में हमारे आसपास रहते हैं और हमें देखते रहते हैं। जब वह महसूस करते हैं कि परिवार के लोग ना तो उनके प्रति श्रद्धा रखते हैं और ना ही किसी शुभ अवसर पर हमें याद करते हैं, तब यह आत्माएं दुःखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं जिसे ‘पितृदोष’ कहा जाता है।

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पित्तरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं जिसमे हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तथा उस उर्जा के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है, इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं। इस पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को पुण्य प्राप्त होता है। आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र ऊध्र्वमुख होने लगता है। 15 दिन तक अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पित्तर उसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। इसलिए अपने पित्तरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, इससे उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है। जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथी को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पित्तरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप श्राद्ध करता है, उसके घर, परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है।

गरूड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के पश्चात् मृतक व्यक्ति की आत्मा प्रेत रूप में यमलोक की यात्रा शुरू करती है। सफर के दौरान संतान द्वारा प्रदान किये गये पिण्डों से मृत आत्मा को बल मिलता है। इस दौरान प्रतिदिन स्नान के बाद तर्पण करके ही कुछ खाना पीना चाहिए। कुछ व्यक्ति अपने कर्मों से अर्जित पुण्यों से देव लोक एवं पितृ लोक में स्थान प्राप्त करते हैं। यहां अपने योग्य शरीर मिलने तक ऐसी आत्माएं निवास करती हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि वह पित्तरों में अर्यमा नामक पित्तर हैं। यह कहकर श्री कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि पित्तर भी वही हैं अर्थात् पित्तरों की पूजा करने से भगवान विष्णु की ही पूजा होती है। पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरगण वर्ष भर प्रसन्न रहते हैं और आर्शीवाद देते हैं।

मान्यता है कि जो लोग जीवित रहते हुए अपने माता-पिता का अनादर नहीं करते हैं तथा मृत्यु के बाद अपने पित्तरों का श्राद्ध भी नहीं करते, किसी निरपराध जीव की हत्या करते हैं, ऐसे लोगों के अगले जन्म में कुंडली में पितृदोष होता है। यदि आपके भी जीवन में ढेरों कष्ट एक साथ हैं, लंबे समय से आपके कोई काम नहीं बन रहे हैं, तो आपको अपनी कुंडली किसी विशेषज्ञ ज्योतिष को दिखाना चाहिए और पितृदोष के कष्टों को दूर करने के लिए उपाय करने चाहिए। पितृ दोष को बहुत अशुभ प्रभाव देने वाला माना जाता है। यह व्यक्ति की कुंडली में एक ऐसा दोष माना गया है जो सभी दुखों को एक साथ देने की क्षमता रखता है। जिसकी कुंडली में पितृदोष लगा होता है, उसके कोई काम आसानी से नहीं बनते। व्यक्ति जीवन में काफी उतार-चढ़ाव महसूस करता है। धन की कमी परेशान करती है, तरक्की में बाधा आती है, गर्भधारण आसानी से नहीं होता या गर्भपात हो जाता है। कुल मिलाकर पितृदोष होने पर परिवार अच्छी तरह से फल-फूल नहीं पाता है।

पितृदोष हमारे जीवन में आने वाली एक अदृश्य बाधा है जो पित्तरों के रूष्ट होने के कारण आती हैं। पित्तरों के रूष्ट होने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे बुजुर्गों की सेवा ना करना, शुभ और धार्मिक अवसरों पर याद ना रखना, अंत्येष्टि कर्म में त्रुटि होना, उचित रीति से श्रद्धापूर्वक पिंडदान ना करना, श्राद्धकर्म ना करना आदि। इसके प्रभाव से मानसिक अवसाद, व्यापार में नुक्सान, विवाह में समस्या, कैरियर में समस्या, आपसी कलह आदि अनेक प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। पितृ दोष दो प्रकार के होते हैं –

1. अधोगति वाले पित्तरों के कारण और

2. ऊध्र्वगति वाले पित्तरों के कारण।

अधोगति वाले पितृदोषों का कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, अतृप्त इच्छाएं, पुत्र-पौत्र, सम्पत्ति आदि का मोह या उसका दुरूपयोग होते देखना, विवाह में गलत निर्णय होना आदि में अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं। ऊध्र्वगति वाले पित्तर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते। किन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा पारम्परिक रीति-रिवाजों का पालन ना करने पर पितृदोष उत्पन्न करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में जब नवम भाव में सूर्य और राहू की युति हो रही हो तो यह माना जाता है कि पितृ दोष योग बन रहा है। ज्योतिष में लग्न पत्रिका के प्रथम, पंचम, अष्टम और द्वादश भाव से भी पितृदोष का विचार किया जाता है। इनमें गुरु, शनि और राहू/केतू की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।

पितृदोष के लक्षण :

बार-बार स्वप्न में पूर्वजों का आना। शुभ एवं मांगलिक अवसरों पर रुकावट या बाधा उत्पन्न होना।
घर में किसी एक सदस्य का बीमार रहना, अविवाहित या विवाह बाधित होना।
घर में प्रवेश करते ही मन खराब होना, कलह और तनाव की स्थिति बनी रहना।
घर के मुखिया का सम्मान कम होना, व्यक्ति कर्ज में डूब जाना या बुरी संगत में पड़ जाना।
अक्सर खाना खाते समय बाल निकलना। घर में बदबू या दुर्गंध का आना, लेकिन कारण पता न चलना।

पितृदोष शांति के उपाय :

पित्तरों से जाने-अनजाने किए गए अपराधों की क्षमा मांगे और आगे से ऐसी भूल न करने का प्रण लें।
माता-पिता, बहन, पुत्री, पत्नी और बुजुर्गों का उचित भाव-पूर्वक आदर-सम्मान करें।
घर में पित्तरों का स्थान (थान) बनाकर नियमित रूप से प्रत्येक अमावस्या को पित्तरों को भोग लगाना।
ईष्ट देवी-देवताओं से संबंधित गृह शांति पाठ करना। इससे पितृ दोष का प्रभाव कम होता है।
शुद्ध अन्तःकरण से बड़-पीपल आदि पवित्र वृक्षों की नियमित पूजा करना और दान देना।
भयंकर पितृदोष होने पर विद्वान ब्राह्मण द्वारा शास्त्रोक्त नारायण बलि और नागबलि का आयोजन करना।
शाम के समय पीपल पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने से पितृ दोष का प्रभाव कम होता है।
अमावस्या के दिन पित्तरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक भोजन बनाएं और चावल, बूरा, घी का भोग लगाएं तथा एक-एक रोटी गाय, कुत्ता और कौआ को खिलाएं। इससे पितृदोष शांत होने लगता है।