हिन्दू शास्त्रों के अनुसार किसी भी कार्य के लिये गणेश जी प्रथम पूज्य माना गया है। गणों के स्वामी होने के कारण उनका एक नाम गणपति भी है। हाथी जैसा सिर होने के कारण उन्हें गजानन भी कहते हैं। उनका वाहन डिंक नामक मूषक है। चारों दिशाओं में सर्वव्यापकता की प्रतीक उनकी चार भुजाएँ हैं। माता पार्वती ने गणेश को जन्म न देते हुए उनके शरीर की रचना की थी। उस समय उनका मुख सामान्य था।

माता पार्वती ने गणेश की रचना के बाद उनको गुफा की पहरेदारी करने का आदेश दिया। माता ने कहा कि जब तक वह स्नान कर रही हैं, तब तक वह किसी को भी घर में प्रवेश न करने दे। उस समय शिवजी कैलाश से बाहर गए हुए थे। जब शिवजी वापिस लौटे और अन्दर जाने लगे, तो उस बालक ने उन्हें पहचाना नहीं और उनका रास्ता रोक लिया। शिवगणों के समझाने पर भी वहां से ना हटने पर क्रोध में आकर शिवजी ने उस बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया।

जब पार्वती स्नान करके बाहर निकलीं, तब गणेश को भूमि पर निर्जीव पड़ा देखकर व्याकुल हो उठीं। जब उन्होंने शिवजी को बताया कि यह उनका पुत्र था, तब शिवजी को उनकी भूल का भान हुआ। उन्होंने अपने गणों को आज्ञा दी कि किसी ऐसे जीव का मस्तक लेकर आयें, जिसकी माता उससे पीठ करके सो रही हो। तब शिवगण एक हाथी के बच्चे का सिर लेकर आये, जिसे शिवजी ने उस बालक के धड़ से जोड़ दिया और इस तरह भगवान गणेश का जन्म हुआ। भगवान शिव ने इन्हें प्रथम पूज्य होने का आशीर्वाद दिया था। परशुराम के परशु से इनका एक दांत टूटा था।

गणेश जी का विवाह :

गणेश जी का विवाह ऋग्वेद के उपवेद ‘स्थापत्यवेद’ के रचनाकार प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्रियों ऋद्धि सिद्धि के साथ हुआ था। नारद के परामर्श पर इन दोनों बहनों का चयन गणेश से विवाह के लिए किया गया। विश्वकर्मा ने अपनी पुत्रियों का विवाह खूब धूमधाम से किया। गणेश जी के उन दोनों बहनों से क्रमशः लाभ और क्षेम नामक दो पुत्र हुए।

एक बार की बात है कि शिव-पार्वती अपने पुत्रों के विवाह की चर्चा कर रहे थे कि उसी समय वहां पर सभी देवता अपनी समस्याओं के हल के लिए शिवजी की शरण में पहुंचे। उस समय भगवान शिवजी के साथ गणेश और कार्तिकेय भी बैठे थे। देवताओं की समस्या सुनकर शिवजी ने गणेश और कार्तिकेय से पूछा कि तुम दोनों में से कौन देवताओं की मदद करेगा। जब दोनों भाई मदद करने के लिए तैयार हो गए तो शिवजी ने उनके सामने पृथ्वी परिक्रमा की प्रतियोगिता रखी। प्रतियोगिता के अनुसार दोनों में से जो पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा, वही देवताओं की समस्या का समाधान करेगा और उसी का विवाह पहले होगा। कार्तिकेय अपनी सवारी मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा करने चले गए। परन्तु गणेश जी वहीं अपनी जगह पर खड़े रहे और सोचने लगे कि वह मूषक की मदद से पूरी पृथ्वी का चक्कर कैसे लगा सकते हैं? उसी समय उनके मन में एक उपाय आया। वह अपने पिता शिवजी और माता पार्वती के पास गए और उनकी सात बार परिक्रमा करके वापस अपनी जगह पर आकर खड़े हो गए।

कुछ समय बाद कार्तिकेय पृथ्वी का पूरा चक्कर लगाकर वापस कैलाश पहुंचे और स्वयं को विजेता कहने लगे। शिवजी ने गणेश से पूछा कि तुम पृथ्वी की परिक्रमा करने क्यों नहीं गए? गणेश जी ने उत्तर दिया कि माता-पिता में ही तो पूरा संसार बसा है, चाहे मैं पृथ्वी की परिक्रमा करूं या अपने माता-पिता की, एक ही बात है। यह सुनकर शिवजी बहुत खुश हुए और उन्होंने गणेश जी को देवताओं की समस्या दूर करने की आज्ञा दी। इसके साथ ही शिवजी ने गणेश जी को यह भी आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति सर्वप्रथम तुम्हारी पूजा और व्रत करेगा उसके सभी दुःख दूर होंगे और भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी

गणेश जी की पुत्री :

हमारे धर्म ग्रन्थों में अनेकों ऐसे देवी-देवता हैं जिनका उल्लेख पुराणों में नहीं है, फिर भी लोगों के बीच उनकी काफी मान्यता है। ऐसी ही एक देवी हैं – माँ संतोषी। संतोषी माता को संतोष की देवी कहा जाता है। कहते हैं। जब गणेश जी के पुत्रों लाभ और क्षेम ने वनलता/मनसा देवी को गणेश जी के हाथ पर रक्षासूत्र बांधते हुए देखा, तब उन्होंने अपनी माताओं से पूछा कि उनकी बहन कौन है? गणेश जी को दुविधा में देखकर आदिशक्ति ने त्रिदेवियों के अंश से एक कन्या की उत्पत्ति की, जिसको गणेश जी की पुत्री माना गया है। इस कन्या का नाम संतोषी था। सन्तान प्राप्ति के लिए 16 शुक्रवार का व्रत इसी के नाम से किया जाता है।

गणेश जी के प्रतीक और उनका महत्व :

हमारे ऋषि मुनि इतने गहन बुद्धिमान थे कि उन्होंने दिव्यता को शब्दों के बजाय प्रतीकों के रूप में दर्शाया। क्योंकि शब्द तो समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन प्रतीक कभी नहीं बदलते। जब भी हम अपने ईष्ट देव का ध्यान करें, हमें उनके प्रतीकों को अपने मन में रखना चाहिये। जैसे हाथी के सिर वाले भगवान का ध्यान करते समय यह याद रखें कि गणेश जी ज्ञान रूप में हमारे भीतर ही हैं। इसी प्रकार,

गणेश जी का बड़ा पेट उदारता और संपूर्ण स्वीकार को दर्शाता है।
गणेश जी का ऊपर उठा हुआ हाथ रक्षा का प्रतीक है। अर्थात्, ‘घबराओ मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ।’
गणेश जी का झुका हुआ हाथ, जिसमें हथेली बाहर की ओर है, उसका अर्थ है – अनंत दान और साथ ही आगे झुकने का निमंत्रण देना। यह इस बात का भी प्रतीक है कि हम एक दिन इसी मिट्टी में मिल जायेंगे।
गणेश जी एकदन्त हैं, जिसका अर्थ है एकाग्रता।
गणेश जी अपने एक हाथ में अंकुश लिए हैं, जिसका अर्थ है -जागृति और नियंत्रण। ज्ञान के साथ, बहुत-सी ऊर्जा उत्पन्न होती है और बिना किसी नियंत्रण के उससे व्याकुलता हो सकती है।

हिंदू पौराणिक कथाओं में प्रथम पूज्य भगवान गणेश को 108 अलग-अलग नामों से पुकारा गया है, इनमे वक्रतुंड, विनायक, गणपति, विघ्नहर्ता, एकदंत, हरिद्रा, कपिला, गजानन के अलावा भी कई और नाम शामिल हैं। गणेश भक्तों के अनुसार गणेश जी केवल शंकर-पार्वती के पुत्र और प्रमुख देवता ही नहीं बल्कि जीवन में उपयोग होने वाले सभी सुख-साधनों के दाता भी हैं। गणेश जी को मानने वालों का मुख्य प्रयोजन उनको सर्वत्र देखना है। इनके अनुसार गणेश जी संसार के प्रत्येक कण में विद्यमान है।

गणेश जी के अवतार :

पुराणों के अनुसार गणेश जी ने आसुरी शक्तियों को खत्म करने के लिए समय-समय पर वक्रतुण्ड, एकदंत, महोदर, विकट, गजानन, लम्बोदर, विघ्नराज और धूम्रवर्ण नामक आठ अवतार लिए थे। यह अवतार मनुष्य के काम, क्रोध, मद, लोभ, ईष्र्या, मोह, अहंकार और अज्ञान आदि आठ तरह के दोष दूर करते हैं। इनका कौन-सा अवतार किस दोष को खत्म करता है, यह उनकी कथाओं में बताया गया है।

1. वक्रतुंड : श्रीगणेश ने इस रुप में अहंकारी राक्षस मत्सरासुर के पुत्रों का वध किया था। यह राक्षस शिव भक्त था और उसने शिवजी की तपस्या करके वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी से भय नहीं रहेगा। मत्सरासुर ने देवगुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से देवताओं को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र भी थे सुंदरप्रिय और विषयप्रिय, यह दोनों भी बहुत अत्याचारी थे। उसके आतंक से मुक्ति हेतू सभी देवता शिव की शरण में पहुंच गए। शिव ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह गणेश का आह्वान करें, गणपति वक्रतुंड अवतार लेकर आएंगे। देवताओं ने आराधना की और गणपति ने वक्रतुंड के रुप में मत्सरासुर के दोनों पुत्रों का संहार किया और मत्सरासुर को भी पराजित कर दिया। वही मत्सरासुर बाद में गणपति का भक्त हो गया।

2. एकदंत : महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा ली। शुक्राचार्य ने उसे हर तरह की विद्या में निपुण बनाया। शिक्षित होने पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया। सारे देवता उससे भयभीत रहने लगे। देवताओं ने मिलकर गणपति की आराधना की। तब भगवान गणेश एकदंत रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं, एक दांत, बड़ा पेट और उनका सिर हाथी के समान था। उनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और एक खिला हुआ कमल था। एकदंत ने मदासुर को युद्ध में पराजित किया और देवताओं को अभयदान दिया।

3. महोदर : जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के खिलाफ खड़ा किया। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर यानी बड़े पेट वाला। वह मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना ईष्ट बना लिया।

4. विकट : भगवान विष्णु ने जलंधर नाम के राक्षस के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। उसने भी अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।

5. गजानन : धनराज कुबेर से लोभासुर का जन्म हुआ। वह शुक्राचार्य की शरण में गया और उसने शुक्राचार्य के आदेश पर शिवजी की उपासना शुरू की। शिव लोभासुर से प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे निर्भय होने का वरदान दिया। इसके बाद लोभासुर ने सारे लोकों पर कब्जा कर लिया। तब देवगुरु वृहस्पति ने सारे देवताओं को गणेश की उपासना करने की सलाह दी। गणेश ने गजानन रूप में दर्शन दिए और देवताओं को वरदान दिया कि मैं लोभासुर को पराजित करूंगा। गणेशजी ने लोभासुर को युद्ध के लिए संदेश भेजा। शुक्राचार्य की सलाह पर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली।

6. लंबोदर : एक बार क्रोधासुर नाम के एक दैत्य ने ने भगवान सूर्यदेव की उपासना करके उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सभी देवता भयभीत हो गए। इस वरदान के कारण वह देवताओं से युद्ध करने निकल पड़ा। देवताओं के अनुरोध पर गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया कि वो संसार में कभी अजेय यौद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।

7. विघ्नराज : एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम ‘मम’ रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं उसे शम्बरासुर मिला। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्माण्ड का राज मांग लिया। शम्बरासुर ने अपनी पुत्री मोहिनी के साथ उसका विवाह कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने ईष्र्यावश सारे देवताओं को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया तथा तीनों लोकों पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। शिव आज्ञा से देवताओं ने गणेश की उपासना की। गणेश विघ्नेश्वर के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर देवताओं को छुड़वाया।

9. धूम्रवर्ण : एक बार सूर्यदेव को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वो शुक्राचार्य के समीप गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने भगवान शिव को अपनी तपस्या से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए और खुद का एक राज्य बसा लिया। उसने भी देवताओं पर बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका आकार और रंग धुंए जैसा विकराल था। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत-सी ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को पराजित किया और उसे अपनी भक्ति प्रदान की।

गणेश कथा के विचारणीय तथ्य :

※ पार्वती के शरीर पर मैल क्यों था : पार्वती ऊर्जा का प्रतीक है और मैल अज्ञान का प्रतीक है तथा भगवान शिव सरलता, शान्ति और ज्ञान के प्रतीक हैं। उनके मैले होने का अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति राजसिक हो सकता है और उसकी विषयों में आसक्ति हो सकती है। विषयों में आसक्ति होना ही आध्यात्म का मैल है।

※ शिव को क्रोध क्यों आया : भगवान शिव, जो शान्ति और ज्ञान के प्रतीक हैं, क्या इतने गुस्से वाले थे कि उन्होंने अपने ही पुत्र का सिर धड़ से अलग कर दिया? गणेश जी द्वारा भगवान शिव का मार्ग रोकने का अर्थ है अज्ञानता। मस्तिष्क का एक गुण है कि वह स्वयं ज्ञान को नहीं पहचानता। अज्ञान को ज्ञान से जीता जा सकता है। इसी बात को दर्शाने के लिए शिव ने गणेशजी के सिर को काट दिया था।

※ गणेश जी का कटा हुआ सिर कहां गया : भगवान शिव ने इस घटना को जीवंत रखने के लिए गणेश जी के सिर को एक गुफा में रख दिया। वर्तमान में इस गुफा को भुवनेश्वर गुफा के नाम से जाना जाता है। यह गुफा उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में स्थित है। जहां गणेश जी का मन्दिर बना हुआ है। पिता का अपमान करने वाले तथा पिता की आज्ञा न मानने वाले व्यक्ति का सिर समाज में नीचा अर्थात् कटा हुआ रहता है।

※ गणेश के धड़ पर हाथी का सिर क्यों : हाथी ‘ज्ञान शक्ति’ और ‘कर्म शक्ति’, दोनों का ही प्रतीक है। बुद्धि और सहजता, हाथी के मुख्य गुण होते हैं। उसका विशालकाय सिर विशाल बुद्धि और ज्ञान का सूचक है। हाथी कभी भी अवरोधों से बचकर नहीं निकलते, न ही वह उनसे रुकते हैं। बल्कि उन्हें अपने मार्ग से हटाकर आगे बढ़ते रहते हैं। इसलिए जब हम गणेश पूजन करते हैं, तो हमारे भीतर यह सभी गुण जागृत हो जाते हैं।

※ गणेश जी का वाहन चूहा क्यों : यह एक गहरा रहस्य है। एक बार शिवजी के वरदान से असुर गजमुख चारों तरफ आतंक मचाए हुए था। वह सभी देवताओं को वश में करके शक्तिशाली बनना चाहता था। उसने ऋषि-मुनियों को भी आतंकित करना शुरू कर दिया था। पराशर ऋषि के श्राप से वह मूषक बन गया था, लेकिन उसने आतंक मचाना नहीं छोड़ा। वह ऋषियों के वस्त्र कुतर देता और आश्रम के पौधे उजाड़ देता था। ऋषियों की प्रार्थना पर गणेश जी ने उस असुर को युद्ध में परास्त कर अपना वाहन बना लिया। बाद में गजमुख भी अपने इस रूप से खुश हुआ और गणेश जी का प्रिय मित्र भी बन गया। चूहे का स्वभाव कुतरना होता है। चूहा उन रस्सियों को काटकर अलग कर देता है जो हमें बांधती हैं। चूहा उस मन्त्र के समान है जो अज्ञान की परतों को पूरी तरह काट सकता है और उस परमज्ञान को प्रत्यक्ष कर देता है, जिसके प्रतीक भगवान गणेश हैं।

※ कार्तिकेय कहां गए : गणेश जी के विवाह के पश्चात् कार्तिकेय (सुब्रह्मण्यम) ने अपने माता-पिता और भाई से विदा ली और कैलाश पर्वत की मनसा झील के नजदीक क्रुंचा श्रेणी पर चले गए। बाद में वह भारत के दक्षिणी भाग में जाकर सुब्रह्मण्यम स्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए। कार्तिकेय की बाली और दीवोसना नामक दो पत्नियां थीं। इस पूरी घटना का वर्णन स्कंद पुराण में किया गया है।