भारत व्रत, पर्व व त्यौहारों का देश है। वैसे तो जीवन में प्रत्येक पल का विशेष महत्व है परन्तु कुछ तिथियों का हमारे जीवन में विशेष महत्व होता है। प्रत्येक तिथि और वार का हमारे मन-मस्तिष्क पर विशेष प्रभाव पड़ता है। इसीलिए इनके प्रभाव को जानकर ही व्रत और त्यौहार बनाए गए हैं। किन्तु जब से आधुनिक मनुष्य अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार व्रत और त्यौहार देखने लगा है तब से वह बड़ा भ्रमित रहता है। उसे लगता है दो होली और दो दीपावली कैसे हो सकती हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता।

आमतौर पर अंग्रेजी तारीख 24 घंटे में बदलती हैं, जबकि हिन्दू पंचांग के अनुसार एक तिथि 19 घंटे से लेकर 26 घंटे तक की होती है। इसका मतलब है कि तिथि मध्यांतर या मध्य रात्रि में भी बदल सकती है। इस प्रकार उस तिथि को मुख्य माना जाता है जो उदयकाल में स्थित हो। एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक का समय जिसे वेदों में अहोरात्र कहा गया है, उसी को एक तिथि माना जाता है। पृथ्वी के चारों ओर चन्द्रमा की कक्षा अण्डाकार होती है, जिससे कभी चन्द्रमा हमारी पृथ्वी के करीब होता है और आकाश में तेजी से चलता है और कभी-कभी यह दूर होता है और धीमी गति से चलता है। इस परिवर्तनशील गति के कारण चन्द्रमा को सूर्य से 12 डिग्री की दूरी तय करने वाला समय हर दिन बदलता रहता है, जिससे एक तिथि 19 से 26 घंटे तक हो सकती है। अर्थात् तिथि दिन या रात किसी भी समय बदल सकती है।

हिन्दू नववर्ष (विक्रमी संवत) का पहला दिन अपने आप में अनूठा दिन है। इसे नव-संवत्सर भी कहते हैं। यह दिन सृष्टि का प्रथम दिवस, सतयुग का प्रारम्भ, त्रेतायुग में भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक, द्वापर युग में धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक के अलावा कलयुग के प्रथम सम्राट परीक्षित के राज्याभिषेक का दिन भी माना जाता है। इस दिन पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूर्ण करती है और दिन-रात बराबर होते हैं। इसके पश्चात् दिन बड़े और रात्रि छोटी होने लगती है। इसी दिन समाज सुधार के युग प्रणेता स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की थी। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘यदि हमें गौरव से जीने का भाव जगाना है, अपने अन्तर्मन में राष्ट्र भक्ति के बीज को पल्लवित करना है तो राष्ट्रीय तिथियों का आश्रय लेना ही होगा।

शुभ-अशुभ तिथियां :

चूंकि सौर दिवस से चन्द्र दिवस छोटा होता है, इसलिए कई बार एक दिन में दो तिथियां भी पड़ सकती हैं। इस प्रकार तिथियों की तीन स्थितियां बनती हैं। जिस तिथि में केवल एक बार सूर्योदय होता है, उसे सुधि तिथि कहते हैं। जिसमें सूर्योदय नहीं होता यानि जो तिथि सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाती है, उसे छय तिथि कहते हैं। तीसरी स्थिति जिसमें दो सूर्योदय हो जाएं उसे वृद्धि तिथि कहते हैं। शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की कलाएं क्षीण रहने से प्रतिपदा से लेकर पंचमी तक अशुभ कही गई हैं। षष्ठी से दशमी तक जैसे-जैसे चन्द्रमा की कलाएं बढ़ती हैं, ये तिथियां मध्यम फल प्रदान करती हैं। शुक्ल पक्ष की शेष तिथियां उत्तम फल देने वाली होती हैं। इसी प्रकार कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से पंचमी तक चन्द्रमा की कलाएं उत्तम होने के कारण ये पांचों तिथियां शुभ फल देने वाली होती हैं। षष्ठी से दशमी तक मध्यम और एकादशी से अमावस्या तक पांच तिथियां अशुभ फलदायक होती हैं। अतः सामान्यतः शुक्ल पक्ष की पंचमी से कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तक 15 तिथियां शुभ होती हैं तथा कृष्ण पक्ष की पंचमी से लेकर शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तक 15 तिथियां मध्यम या अशुभ फल देने वाली होती हैं।

तिथियां पांच प्रकार की होती हैं –

नन्दा तिथियाँ – प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी – यह तिथि भवन निर्माण के लिए श्रेष्ठ मानी गई हैं।
भद्रा तिथियाँ – द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी – यह तिथियां अनाज, गाय-भैंस, वाहन खरीदने के लिए श्रेष्ठ मानी गई हैं।
जया तिथियाँ – तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी – यह तिथियां कानूनी मामले निपटाने के लिए श्रेष्ठ मानी गई हैं।
रिक्ता तिथियाँ – चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशीद् – यह तिथियां तन्त्र साधना के लिए श्रेष्ठ मानी गई हैं।
पूर्णा तिथियाँ – पंचमी, दशमी, अमावस्या और पूर्णिमा – यह तिथियां मांगलिक कार्यों के लिए श्रेष्ठ मानी गई हैं।

प्रदोष व्रत – प्रत्येक महीने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत रखा जाता है। हिन्दू धर्म में एकादशी को विष्णु से तथा प्रदोष को शिव से जोड़ा गया है। किन्तु यह जरूरी नहीं कि प्रत्येक प्रदोष को शिव की उपासना करें। अलग-अलग दिन पड़ने वाले प्रदोष की महिमा अलग-अलग होती है।

1. रविवार – जो प्रदोष रविवार के दिन पड़ता है उसे भानु प्रदोष कहते हैं। इस दिन व्रत खने से जीवन में सुख और लम्बी आयु प्राप्त होती है। रवि प्रदोष व्रत खने से सूर्य सम्बन्धी परेशानियां दूर हो जाती हैं।

2. सोमवार – सोमवार की त्रयोदशी को सोम प्रदोष कहते हैं। इस दिन व्रत रखने से चन्द्र सम्बन्धी परेशानियां दूर होकर, मनोंवाछित फल प्राप्त होता है। अक्सर लोक सन्तान के लिए यह व्रत रखते हैं।

3. मंगलवार – मंगलवार को आने वाली त्रयोदशी को भौम प्रदोष कहते हैं। इस दिन व्रत रखने से स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियां दूर होती हैं और कर्ज से छुटकारा मिलता है।

4. बुधवार – बुधवार को आने वाली त्रयोदशी को सौम्य प्रदोष कहते हैं। इस दिन व्रत रखने से शिक्षा एवं ज्ञान सम्बन्धी परेशानियां दूर होती हैं।

5. गुरूवार – गुरूवार को आने वाली त्रयोदशी को गुरूवारा प्रदोष कहते हैं। शत्रु विनाश के लिए इस दिन व्रत किया जाता है।

6. शुक्रवार – शुक्रवार को आने वाली त्रयोदशी को भृगुवारा प्रदोष कहते हैं। इस दिन व्रत रखने से धन और पैतृक सम्पदा की प्राप्ति होती है।

7. शनिवार – शनिवार को आने वाली त्रयोदशी को शनि प्रदोष कहते हैं। इस दिन व्रत रखने से नौकरी और पदोन्नति सम्बन्धी परेशानियां दूर होती हैं।