सभी धर्म ग्रन्थों एवं पुराणों में सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन अलग-अलग तरह से किया गया है। सृष्टि की रचना को समझने से पहले हमें यह समझना होगा कि ब्रह्म और ब्रह्मा दो अलग-अलग शक्तियां हैं। ब्रह्म यानि ‘ॐ’ सृष्टि की उत्पत्ति का कारक है और ब्रह्मा (त्रिदेवों ‘ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव) में से एक) जीवों की उत्पत्ति का कारक है। सृष्टि की उत्पत्ति में ॐ की बड़ी महिमा है। ॐ समस्त जीव-जन्तुओं में ध्वनि के रूप में विद्यमान रहता है। इस एक शब्द को ब्रह्माण्ड का सार माना जाता है। धर्म का एक अंग यह भी माना गया है कि वह आत्मा, परमात्मा और सृष्टि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में लोगों की जिज्ञासा को पूरा करे। क्योंकि मनुष्य को उसके प्रश्नों के उत्तर मिले बिना, अपने धर्म के प्रति दृढ़ आस्था नहीं हो सकती और न ही वह आस्तिक बन सकता है।

ब्रह्माण्ड क्या है? ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कब हुई? यह प्रश्न आज भी जीवंत बना हुआ है। इस प्रश्न से भी अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति क्यों हुई? क्योंकि बिना कारण के कार्य का कोई अस्तित्व नहीं होता। आस्तिक लोग इसकी रचना ईश्वर की इच्छा मानते हैं जबकि नास्तिक लोग इसे स्वतः निर्मित मानते हैं। विभिन्न धर्म गुरुओं के भी अपने मत और व्याख्याएं हैं। अतः इन प्रश्नों का महत्व मानव को रहस्यीकृत करने की अपेक्षा उनका समाधान करने में है और यही धर्म का कर्तव्य भी है। अन्तरिक्ष में व्याप्त ग्रह, नक्षत्र एवं असंख्य तारों से युक्त सभी गैलेक्सियां अर्थात् समस्त चराचर प्रकृति ही ब्रह्माण्ड कही गई है।

सृष्टि की उत्पत्ति व रचना के प्रसंग में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि संसार में कोई भी क्रिया बिना कर्ता के नहीं होती। तो क्या संसार में कोई अदृश्य सत्ता ऐसी हो सकती है जिससे यह सृष्टि बनी है? अर्थात् संसार में हमारी इस आत्मा की ही भांति जीवात्मा से सर्वथा भिन्न सर्वव्यापक, निराकार, ज्ञान-बल-शक्ति से परिपूर्ण, जड़ प्रकृति की नियंत्रक एक अन्य समर्थ शक्ति अवश्य है। ऐसी समर्थ सत्ता से ही सूर्य, चन्द्र, ग्रह-उपग्रह, नक्षत्र और असंख्य आकाशगंगा से युक्त यह ब्रह्माण्ड अस्तित्त्व में आ सकता है। जब सृष्टि उत्पन्न हुई तो अन्य प्राणियों को उत्पन्न करने के बाद मनुष्यों को भी उत्पन्न किया गया होगा। सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों की उत्पत्ति माता-पिता से न होकर इच्छामात्र से परमात्मा व सृष्टिकर्ता करता है। अतः ईश्वर द्वारा इच्छित सृष्टि रचना को मानना हमारे लिए अनिवार्य व अपरिहार्य है। इसका अन्य कोई विकल्प भी नहीं है।

ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रचना :

सृष्टि के आदिकाल में न सत था न असत, न वायु थी न आकाश, न मृत्यु थी न अमरता, न दिन था न रात। उस समय केवल वही था, जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी ॐ रूपी शब्द शक्ति से श्वास ले रहा था, उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। चारों तरफ शान्ति और अंधकार ही अंधकार था। वही नित्य, अजन्मा, अक्षय, अव्यक्त और अवगुणों के अभाव के कारण निर्मल परंब्रह्म है, विद्वान जिसको ‘वासुदेव’ ;कृष्ण नहींद्ध भी कहते हैं। उसमें जन्म, रूप, आकार, वृद्धि, क्षय और नाश, इन छः विकारों का सर्वथा अभाव है। सर्वप्रथम उसमें इच्छा उत्पन्न हुई कि मैं एक से अनेक हो जाऊं अर्थात् ‘एकोऽहं बहुस्याम्’। ऐसी इच्छा परमेश्वर के हृदय में आते ही शब्द रूप ब्रह्म प्रकट हो गया। उस परमशक्ति को काल, महाकाल या सदाशिव कहा जाता है।

चूँकि वह सत्ता सामर्थ्य से युक्त है और उसके कार्य करने का माध्यम संकल्प ही है। इसलिए यह संकल्प करते ही शब्द रूपी ब्रह्म की ‘अदृश्य ऊर्जा शक्ति’ भी छिटककर अलग हो गई, जो संकल्परूपा आदिशक्ति कहलाईं। इसी शक्ति से ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रह, नक्षत्रों से युक्त सृष्टि की रचना हुई। इस शक्ति को आदिशक्ति, दुर्गा, भवानी, वैष्णवी, जगतजननी, जगतमाता व मूल प्रकृति भी कहा जाता है। सृष्टि रचना से सम्बन्धित निर्देशन एवं आदेश परमतत्त्व शब्द रूप ब्रह्म ने स्वयं अपने पास रखा और उत्पत्ति, संचालन और संहार से सम्बन्धित क्रियाकलाप शक्ति को सौंप दिया, परन्तु स्वयं को इन क्रिया कलापों से परे रखा।

उस शक्ति ने सबसे पहले महत्तत्व से अंहकार और अहंकार से ‘मन’ को उत्पन्न किया। मन से सतोगुण, तमोगुण, रजोगुण आदि तीन गुण तथा अग्नि, जल, वायु, मिट्टी, आकाश आदि पांच तत्त्व उत्पन्न किए। इन पांचों तत्त्वों के गुण, शब्द, रूप, गंध, रस व स्पर्श आदि को मिलाकर इन्द्रियों की रचना की तथा इन इन्द्रियों को धारण करने वाले मानव शरीर को उत्पन्न किया। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि इन्द्रियों से उत्पन्न विकारों से ही समस्त सृष्टि का संचालन होता है। सृष्टि रचना हेतू शक्ति ने सर्वप्रथम अग्नि तत्त्व से भगवान शिव के स्वरूप की संरचना की और सृष्टि रचना का कार्यभार दिया। परन्तु शिव ने सृष्टि रचना में अपनी असमर्थता जाहिर की और तपस्या में लीन हो गए। तब उसने जल तत्त्व से भगवान विष्णु की रचना की।

भगवान विष्णु की उत्पत्ति समुद्र के जल में एक बालक के रूप में हुई। अचानक देखते ही देखते बालक का आकार बढ़ने लगा और शेषसायी भगवान आंखें बंद किये प्रकट हुए। जब भगवान विष्णु ने अपनी आंखे खोली तो भगवान सूर्य नारायण की उत्पति हुई तथा उनके मन से चन्द्रमा और तारे बने। भगवान विष्णु ने अपनी नाभि से सहस्रदल कंवल के रूप में वायु तत्व से अपने ही एक अन्य स्वरूप की रचना करके सृष्टि रचना का कार्यभार उन पर डाल दिया, जिन्हें जगतपिता ब्रह्मा जी कहते हैं।

ब्रह्मा जी ने चारों तरफ दृष्टि डाली और जब अपने चारों तरफ किसी को नहीं देखा तब वह घबरा गए और उसी कमलदल की नाल में यह पता करने के लिए कि आखिर मैं कौन हूँ और कहां से आया हूँ, अन्दर जाने लगे। जितना अन्दर जाते गये कमल नाल उतना बढ़ता जाता। थक-हार कर ब्रह्मा जी वापस उसी स्थान पर आ गये और उन्होंने जोर से आवाज लगाई कि मैं कौन हूँ? मैं क्या करूं? तब आकाश से आवाज आई कि ‘तप करो’।

इस समाधि द्वारा उन्हें अपने अंतःकरण में भगवान पुरुषोत्तम ;विष्णुद्ध शेषशैय्या पर लेटे हुए दिखाई दिये। भगवान् विष्णु ने प्रत्यक्ष प्रकट होकर बताया कि आपका नाम ब्रह्मा है और आप मेरे ही रूप से बने हैं। आप जगत के रचयिता हैं। इस पर ब्रह्मा और विष्णु में विवाद हो गया कि हम में से बड़ा कौन है? उसी समय वहां भगवान शिव ज्योति स्तम्भ रूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा ने उनसे पूछा कि हम दोनों में से बड़ा कौन है?

भगवान शिव ने उन दोनों को उस ज्योति स्तम्भ का आरम्भ और अन्त पता करने के लिए कहा। वुळछ समय पश्चात् दोनों थक-हार कर खाली हाथ वापिस आ गए और भगवान शिव से क्षमा मांगने लगे। तब भगवान शिव ने कहा कि आप दोनों में से कोई भी एक श्रेष्ठ नहीं, बल्कि दोनों ही श्रेष्ठ हैं। हम तीनों एक ही शक्ति से उत्पन्न हुए हैं तथा हम तीनों को मिलकर सृष्टि की रचना करना है। इस प्रकार भगवान सदाशिव ‘काल’ और आदिशक्ति ‘माया’ द्वारा ब्रह्माण्ड में त्रिदेवों की स्थापना हुई। अब तीन और शक्तियों की उत्पत्ति हो चुकी थी। ब्रह्मा जगत के रचयिता बने, विष्णु जगत के पालनहार और स्वयं भगवान शिव विनाशक बने। भगवान सदाशिव की आज्ञा से ब्रह्मा जी ब्रह्मलोक में, शिव जी कैलाश पर्वत पर और विष्णु जी क्षीरसागर में स्थित होते हैं।

सृष्टि निर्माण के लिए शक्ति की आवश्यकता भी होती है। अतः ब्रह्म स्वरूप सदाशिव ‘काल’ ने जगतजननी आदिशक्ति ‘माया’ की सहायता से कालान्तर में लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती की रचना की। इस प्रकार एक सम्पूर्ण सृष्टि की रूपरेखा बनी और वास्तव में सृष्टि निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ।

ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना हेतू सर्वप्रथम अपनी इच्छा शक्ति से चार मानव बालकों सनत, सनंदन, सनातन और सनत कुमार को उत्पन्न किया तथा सृष्टि रचना का भार उठाने के लिए कहा। परन्तु बालक रुप में उत्पन्न होने के कारण उनमें कोई भी सक्षम नहीं था। क्योंकि उनकी जीवात्मा में प्रेरणा का अभाव था।

ब्रह्मा जी द्वारा उत्पन्न मानव बालकों के सक्षम न होने पर वह भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवान विष्णु ने उन्हें ‘चर्तुश्लोकी भागवत’ का ज्ञान दिया। इस ज्ञान को आधार बनाकर ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना के लिए वेदों की रचना की। इसके बाद ब्रह्मा जी ने स्वयं अपने शरीर के विभिन्न अंगों से मानस पुत्रों को उत्पन्न किया।

ब्रह्मा जी ने उन्हें वेद ज्ञान दिया और आदेश दिया कि सृष्टि रचना में अपनी भूमिका निभाओ। इस प्रकार धरती पर मानव सृष्टि का आरम्भ हुआ। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने का संकल्प लिया तब उनके

1. मन से मरीचि 2. नेत्रों से अत्रि 3. मुख से अंगिरा 4. कान से पुलस्त्य 5. नाभि से पुलह 6. हाथ से क्रेतु
7. प्राण से वशिष्ठ 8. त्वचा से भृगु (रूचि) 9. छाया से कर्दम तथा 10. अंगूठे से दक्ष उत्पन्न हुए।

इसके अतिरिक्त ब्रह्मा जी के

1. दाहिने स्तन से धर्म 2. पीठ से अधर्म 3. हृदय से काम 4. दोनों भौहों से क्रोध
5. नीचे के ओठ से लोभ 6. लिंग से समुद्र 7. कण्ठ से सरस्वती तथा 8. गोद से नारद आदि उत्पन्न हुए।

यह सभी ब्रह्मा जी के मानस पुत्र कहे जाते हैं। अन्य देवी-देवताओं की उत्पत्ति का सम्बन्ध इन्हीं से माना जा सकता है। इस सबके बावजूद भी ब्रह्मा जी को लगा कि मेरी सृष्टि में वृद्धि नहीं हो रही है तो वह भगवान विष्णु के परामर्श पर भगवान शिव के पास गए और उन्हें अपनी समस्या बताई। भगवान शिव ने उन्हें अपना अर्धनारिश्वर स्वरूप दिखाया। ब्रह्मा जी ने शिवजी के अर्धनारिश्वर स्वरूप से प्रेरणा पाकर अपने शरीर को दो भागों में विभक्त कर दिया। इनमें से एक भाग से पुरुष तत्त्व तथा दूसरे से स्त्री तत्त्व की उत्पत्ति हुई। पुरुष का नाम मनु और स्त्री का नाम शतरूपा हुआ। तब ब्रह्मा ने कहा कि हे मनु! तुम पुरुष हो, मैंने तुम्हें वह ताकत दी है, जिससे तुम भारी से भारी काम करके अपने परिवार का पालन-पोषण कर सको तथा अपने परिवार की हरसंभव रक्षा कर सको। हे शतरुपा! तुम्हारा स्त्री का रूप है। मैंने तुमको प्रेम, करूणा, दया, साहस तथा किसी भी परिस्थिति में धैर्य रखने का सामथ्र्य दिया है। तुम दोनों एक-दूसरे के पूरक हो। तुम दोनो में कोई भी एक श्रेष्ठ नहीं बल्कि दोनों ही श्रेष्ठ हो। इस प्रकार मनु और शतरूपा ने मानवीय सृष्टि की शुरुआत की।

ब्रह्मा का जीवन काल :

श्रीमद्भागवत् के अनुसार ब्रह्मा का एक दिवस 1000 महायुग अर्थात् ‘सहस्र युग अहर्यद ब्रह्मणो दिवौः’ का होता है और यही वैज्ञानिक रूप से सूर्य की खगोलीय आयु भी है। ब्रह्मा के एक दिन को एक कल्प कहा जाता है। एक कल्प 4,32,00,00,000 मानव वर्षों का होता है। इतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि की भी है। दो कल्प यानी 8,64,00,00,000 मानव वर्ष ब्रह्मा के एक दिन और रात बनाते हैं। इस प्रकार,

1 ब्रह्म दिवस = 8 अरब 64 करोड़ सौर अथवा मानव वर्ष
1 ब्रह्म मास = 30 ब्रह्मा के दिन (दो खरब 59 अरब 20 करोड़ मानव वर्ष)
1 ब्रह्म वर्ष = 12 ब्रह्मा के मास (31 खरब 10 अरब 4 करोड़ मानव वर्ष)
1 परार्ध = 50 ब्रह्मा के वर्ष
1 महाकल्प = 2 परार्ध – 100 ब्रह्मा के वर्ष

ब्रह्मा जी के एक दिन में 14 इन्द्र जन्म लेते और मरते हैं और इनकी जगह नए देवता इन्द्र का स्थान लेते हैं। इसके बाद ब्रह्मा की रात्रि होती है। दिन की इस गणना के आधार पर ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष होती है, फिर ब्रह्मा मर जाते है और दूसरे देवता ब्रह्मा का स्थान ग्रहण करते हैं। इस प्रकार ब्रह्मा का जीवन काल 31 पदम 10 खरब 40 अरब मानव वर्ष का होता है। ब्रह्मा की आयु के बराबर विष्णु का एक दिन होता है। इस आधार पर विष्णु जी की आयु 100 वर्ष है। विष्णु जी के 100 वर्ष शंकर जी का एक दिन होता है। इस दिन और रात के अनुसार शंकर जी की आयु 100 वर्ष होती है।

सृष्टि की उत्पत्ति और विकास में कार्य और कारण का सिद्धान्त कार्य करता है। कुछ लोग मानते हैं कि ईश्वर या परमेश्वर ने ब्रह्माण्ड या सृष्टि को छः दिन में रचा और सातवें दिन उसने आराम किया। धरती पर उसने सबसे पहले मानव को रचा और उसकी ही छाती की पसली से एक स्त्री को रचा। वैज्ञानिक शोध कतई इस तरह की कहानी को सच नहीं मान सकते। वेदों में सृष्टि रचना को वैज्ञानिक तरीके से समझाया गया है। वेदों में ब्रह्माण्ड उत्पत्ति का जो सिद्धान्त है विज्ञान आज उसके नजदीक पहुंच गया है। यह सात दिन या सात करोड़ वर्ष का मामला नहीं है, यह अनंतकाल के अंधकार के बाद अरबों वर्षों के क्रमशः विकास का परिणाम है।