बाबा खाटू श्याम का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। खाटू श्याम जी का असली नाम बर्बरीक है। खाटू श्याम जी घटोत्कच और नागकन्या मौरवी के पुत्र हैं। भीम और हिडिम्बा बर्बरीक के दादा-दादी थे। राजस्थान के सीकर जिले में रिंगस कस्बे से 18 किलोमीटर की दूरी पर श्री खाटू श्यामजी का मन्दिर स्थिति है, जहाँ प्रभु के दर्शन मात्र से ही जीवन में खुशियों एवं सुख-शांति के भंडार भर जाते हैं। बर्बरीक ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी, जिसके आशीर्वादस्वरुप भगवान ने शिव ने बर्बरीक को 3 चमत्कारी बाण प्रदान किए। इसी कारणवश बर्बरीक का नाम ‘तीन बाणधारी’ के रूप में भी प्रसिद्ध है। भगवान अग्निदेव ने बर्बरीक को एक दिव्य धनुष दिया था, जिससे वो तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने में समर्थ थे।

श्याम बाबा के शीश के दान को तीन जगहों से जोड़ा जाता है, जिसमें हरियाणा के इलाके बीड़ बबरान (हिसार) चुलकाना (पानीपत), और सिसला (कैथल) धाम का नाम शामिल है। इन तीनों जगहों पर ही बाबा की पूजा की जाती है। ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि बाबा ने शीश का दान कहां दिया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार हिसार के नजदीक बीड़ बबरान वह जगह है, जहां बर्बरीक की भगवान श्री कृष्ण ने परीक्षा ली थी, जहां आज भी वह पेड़ मौजूद है जिसके पत्तों में छेद हो गए थे। आज भी इन पत्तों में सुराख हैं। जिस ऐतिहासिक पीपल के पेड़ के नीचे बर्बरीक ने शीश का दान दिया था, वह चुलकाना धाम में मौजूद है और इसके पत्तों में भी प्राकृतिक रूप से छेद पाए जाते हैं। जिस स्थान पर बर्बरीक का शीश रखा गया था, वह स्थान कुरुक्षेत्र के 48 कोस की धरती के मध्य में है। वीर बर्बरीक की पूजा सिसला गांव में श्याम बाबा के नाम से होती है।

जयपुर के सीकर जिले के रिंगस में स्थित प्रसिद्ध खाटू श्याम जी का मंदिर का निर्माण खाटू गांव के शासक राजा रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर द्वारा सन् 1027 में करवाया गया था। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार राजा रूपसिंह को स्वप्न में खाटू के कुंड में श्याम का सिर मिलने के बाद उनका मंदिर बनवाने के लिए और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिए प्रेरित किया गया। कथा के अनुसार एक गाय उस स्थान पर आकर रोज अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी। बाद में खुदाई के बाद वह शीश प्रकट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिए एक ब्राह्मण को सूपुर्द कर दिया गया। तब राजा रूपसिंह ने खाटू गांव में खाटू श्याम जी के नाम से मंदिर का निर्माण करवाया। जबकि सन् 1720 में एक मशहूर दीवान अभयसिंह ने इसका पुर्ननिर्माण कराया। खाटू श्याम जी के मंदिर के पास पवित्र तालाब है जिसका नाम है – श्यामकुंड। माना जाता है कि इस कुंड में नहाने से मनुष्य के सभी रोग ठीक हो जाते हैं और व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। इसीलिए प्रतिबर्ष लाखों श्रद्धालु इस पवित्र कुंड में स्नान करते है, खासतौर से वार्षिक फाल्गुन मेले के दौरान यहां डुबकी लगाने की बहुत मान्यता है।

लाक्षागृह की दुर्घटना से बचकर वनवास के दौरान जब पांडव अपनी जान बचाते हुए भटक रहे थे, उन्हें एक राक्षस मिला जिसका नाम हिडिम्ब था। उसने मानव की गंध पाकर अपनी बहन हिडिम्बा को मानव मांस लाने के लिए कहा, किन्तु भीम को देखकर वह आकर्षित हो गई। भीम ने हिडिम्ब राक्षस का वध कर दिया। तब भीम का विवाह हिडिम्बा से हुआ। हिडिम्बा ने भीम से एक पुत्र को जन्म दिया जिसे घटोत्कच कहा जाता था। घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक हुआ। घटोत्कच की मृत्यु महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण द्वारा हुई थी।

महाभारत युद्ध के बारे में जब बर्बरीक को सूचना मिली थी तो वो भी युद्ध में भाग लेने के लिए जाने लगे। लेकिन बर्बरीक की मां ने ये वचन ले लिया कि जो हार रहा होगा उसका साथ देना। इसीलिए श्याम बाबा हारे का सहारा कहलाये। रास्ते में बर्बरीक को श्रीकृष्ण ब्राह्मण भेष में मिले और पूछा युद्ध के लिए सिर्फ तीन बाण लेकर कर क्यों जा रहे हो। बर्बरीक ने कहा कि ये बाण इतने सक्षम है कि किसी भी सेना को समाप्त कर सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने जब उनसे पूछा वो युद्ध में किसकी तरफ हैं, तो उन्होंने कहा था कि जो पक्ष हारेगा वह उसकी ओर से लड़ेंगे। श्री कृष्ण यह सुनकर सोच में पड़ गए, क्योंकि बर्बरीक के इस वचन के बारे में कौरव भी जानते थे। कौरवों ने पहले ही योजना बना ली थी कि पहले दिन वो कम सेना के साथ लड़ेंगे और हारने लगेंगे। ऐसे में बर्बरीक उनकी तरफ से युद्ध कर पांडवों की सेना का नाश कर देंगे।

श्री कृष्ण युद्ध का परिणाम जानते थे और उन्हें डर था कि कहीं पांडवों के लिए उल्टा न पड़ जाए। ब्राह्मण बने श्री कृष्ण ने बर्बरीक से एक पीपल के वृक्ष की ओर इशारा करके कहा कि वो एक बाण से पेड़ के सारे पत्तों को भेदकर दिखा दे। बर्बरीक ने भगवान का ध्यानकर एक बाण छोड़ दिया। उस बाण ने पीपल के सारे पत्तों को छेद दिया और ब्राह्मण बने श्री कृष्ण के पैर के चारों तरफ ही घूमने लगा। दरअसल श्रीकृष्ण ने एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा दिया था। बर्बरीक ने ब्राह्मण से अपना पैर हटाने को कहा। ब्राह्मण बने श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से एक दान देने का वचन माँगा। बर्बरीक ने दान देने का वचन दे दिया। ब्राह्मण ने बर्बरीक से कहा कि उसे दान में बर्बरीक का सिर चाहिए। दान में बर्बरीक ने उनको शीश दे दिया, लेकिन आखिर तक उन्होंने यु( देखने की इच्छा जाहिर की। श्रीकृष्ण ने इच्छा स्वीकार करते हुए उनका सिर युद्ध वाली जगह पर एक पहाड़ी पर रख दिया ताकि वह महाभारत का युद्ध देख सके। वह स्थान वर्तमान में कैथल के सिसला गांव में है।

बर्बरीक का शीश जिस पक्ष की ओर देखता था उसी पक्ष की जीत शुरू हो जाती थी। युद्ध का फैसला ना होते देखकर श्री कृष्ण ने दंडक ऋषि को आदेश दिया कि वह बर्बरीक के शीश को लेकर कुछ समय के लिए समाधि ले लें ताकि महाभारत के युद्ध का अंत हो सके। श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र चलाकर शीश को दंडक ऋषि की गोद में पहुंचा दिया जिसे लेकर दंडक ऋषि गांव सिसला की धरती में समा गए।

महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया तो सभी पांडव आपस में लड़ने लगे कि जीत का सेहरा किसके सिर बांधा जाए। श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को इस युद्ध के साक्षी बताते हुए, प्रश्न का उत्तर उन्हीं से जानने को कहा। दंडक ऋषि वीर बर्बरीक का शीश लेकर प्रकट हुए। बर्बरीक ने बताया कि इस युद्ध की विजय का श्रेय एकमात्र श्रीकृष्ण को जाता है, उन्हें जीत भगवान श्रीकृष्ण की वजह से मिली है। युद्ध की विजय के पीछे सब कुछ श्रीकृष्ण की ही माया थी। जिस पर श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर कहा कि कलियुग में आप श्याम नाम से पूजे जायेंगे और अपने भक्तों की कामना पूरी करेंगे। खाटू श्याम के बारे में यह प्रसिद्ध है कि आज भी वह माता को दिए वचनों के अनुसार इस संसार में हारने वाले इंसान का साथ देते हैं, तभी उन्हें हारे का सहारा कहा जाता है।

जो भक्त जीवन के हर मोड़ पर अपने आपको हारा महसूस करता है और खाटू श्याम की शरण में जाता है तो उस हारे का सहारा खाटू श्याम जी बनते हैं। उन्हें अक्सर ‘श्याम बाबा’, ‘हारे का सहारा’, और ‘कलियुग का अवतार’ जैसे नामों से संबोधित किया जाता है। खाटू धाम में आस लगाने वालों की झोली बाबा खाली नहीं रखते। श्याम भक्त उन्हें ‘हारे का सहारा’ कहकर पुकारते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि सच्चे मन से बाबा के नाम का उच्चारण करने मात्र से ही सभी संकट दूर हो जाते हैं।