शासन व्यवस्था
राज्य संचालन की गतिविधि को शासन कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, राज करने या राज चलाने को शासन कहा जाता है। व्यवस्थाओं के संचालन के लिए सरकार की स्थापना करते हैं। एक प्रक्रिया के रूप में, शासन किसी भी आकार के संगठन में काम कर सकता है। एक अकेले व्यक्ति से लेकर पूरी मानव जाति तक और यह किसी भी उद्देश्य के लिए काम कर सकता है। एक सरकार शासन करने वाली आपस में जुड़ी विभिन्न अवस्थाओं से मिलकर बनी होती है, जो अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करती हैं, विशेषकर बल-आधारित शक्तियों का राजनीति शासन को संचालित करने का एक माध्यम है।
शासन के प्रकार :
सरकार से तात्पर्य किसी राज्य को एक मूर्त रूप देने वाली संस्था से है। कोई भी राज्य, तब तक पूर्ण नही कहलाता, जब तक उसमें कोई सरकार स्थापित नहीं हो। केवल कुछ लोगों के समूह को राज्य नहीं कहते। लेकिन लोगों के समूह पर यदि कोई सरकार है तो वो राज्य कहलाता है। सरकार के चार प्रकार होते हैं :-
1. राजतंत्र (Monarchy)
2. लोकतंत्र (Democracy)
3. संघात्मक शासन
4. संसदात्मक शासन प्रणाली
1. राजतंत्र (Monarchy) :
राजतन्त्र संसार की सबसे पुरानी एवं स्वाभाविक शासन प्रणाली है, जिसमें एक व्यक्ति ;राजाद्ध शासन का सर्वोसर्वा होता है। इस प्रणाली के अंतर्गत राज्य की सर्वोच्च सत्ता और समस्त शक्ति केवल एक व्यक्ति के हाथ में होती है, जिसे राजा, सम्राट, बादशाह आदि कहा जाता है। राजा, शासित जनता द्वारा चुना हुआ नहीं होता बल्कि वंशानुगत होता है या किसी दूसरे राजा को युद्ध में पराजित करके राजा बनता है। राजा का पुत्र अथवा राजघराने का कोई व्यक्ति ही राजगद्दी पर बैठ सकता था, चाहे वह अयोग्य क्यों न हो।
राजतंत्र में अधिकांशतः राजा निरंकुश शासन करते हैं, किन्तु गणराज्यों में यह समझा जाता था कि मुखिया को जनसाधारण से चुना जा सकता है। राजतंत्र के सन्दर्भ में भारत की स्थिति भिन्न है। वैदिक साहित्य में राजतंत्र में राजा का कल्याणकारी विचार निहित था। प्राचीन काल में राजतंत्र होने के बावजूद प्रजा पर अत्याचार नहीं होता था। राजा कोई सामान्य मनुष्य न होकर देवता के समान होता था। वह सलाहकारों के बिना न तो शासन करता था, न ही यज्ञ-अनुष्ठान। राजा धर्म और समाज का रक्षक होता था। वर्तमान में, लगभग 44 देशों में राज्य के प्रमुख के रूप में एक सम्राट है। इनमें से 3 अफ्रीका में, 6 ओशिनिया में,10 उत्तरी अमेरिका में,12 यूरोपीय देशों में और 13 एशियाई देशों में हैं। ब्रिटेन और जापान में आज भी राजतंत्र प्रचलित है।
राजतन्त्र शासन के गुण :
⁜ प्रशासन में एकरूपता।
⁜ सरल शासन व्यवस्था।
⁜ संघर्ष रहित शासन व्यवस्था।
⁜ संकट काल में अधिक उपयुक्त।
राजतन्त्र शासन के दोष :
⁜ सरकार के निरंकुश होने का भय।
⁜ प्रशासनिक दक्षता का अभाव।
⁜ विशाल राज्यों के लिए उपयुक्त नहीं।
⁜ स्थानीय स्वशासन की उपेक्षा।
2. लोकतंत्र (Democracy) :
डेमोक्रेसी शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द डेमोस ओर क्रेशिया से हुई है। डेमोस का अर्थ है, लोग तथा क्रेशिया का अर्थ शासन से है। अतः लोकतंत्र का आशय ‘लोगों का शासन’ से है। लोकतन्त्र दो शब्दों से मिलकर बना है – लोक + तन्त्र। लोक का अर्थ है जनता तथा तन्त्र का अर्थ है शासन। लोकतन्त्र एक ऐसी शासन प्रणाली है, जिसके अन्तर्गत जनता अपनी स्वेच्छा से निर्वाचन में आए हुए किसी भी दल को मत देकर अपना प्रतिनिधि चुन सकती है तथा उसकी सत्ता बना सकती है। यह शासन व्यवस्था सरकार के सभी प्रकारों में सबसे सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली है और आज के युग में यह शासन प्रणाली सबसे अधिक लोकप्रिय शासन प्रणाली है। यह शासन प्रणाली जनता को पूरी तरह समानता का अधिकार प्रदान करती है और इसमें सत्ता किसी एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित नहीं होती बल्कि सत्ता की चाबी जनता के हाथ में होती है।
लोकतंत्र की परिभाषाएं :
⁜ अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपने ‘गेटिसबर्ग’ भाषण में लोकतंत्र को ‘जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए’ रूप में परिभाषित किया।
⁜ सिले के अनुसार, ‘लोकतंत्र, ऐसी सरकार है, जिसमे सभी का हिस्सा होता है।’
⁜ ब्राइस के अनुसार, ‘लोकतंत्र, लोगों का शासन है, जिसमें लोग संप्रभु इच्छा को वोट के रूप में व्यक्त करते हैं।’
⁜ डायसी के अनुसार, ‘लोकतंत्र, वह शासन है, जिसमे देश का बड़ा भाग शासन करता है।’
यद्यपि लोकतन्त्र शब्द का प्रयोग राजनीतिक सन्दर्भ में किया जाता है, किन्तु लोकतन्त्र का सिद्धान्त दूसरे समूहों और संगठनों के लिये भी संगत है। प्राचीनकाल में भारत में सुदृढ़ व्यवस्था विद्यमान थी। इसके साक्ष्य हमें प्राचीन साहित्य, सिक्कों और अभिलेखों से प्राप्त होते हैं। विदेशी यात्रियों एवं विद्वानों के वर्णन में भी इस बात के प्रमाण हैं। प्राचीन गणतांत्रिक व्यवस्था में आजकल की तरह ही शासक एवं शासन के अन्य पदाधिकारियों के लिए निर्वाचन प्रणाली थी। योग्यता एवं गुणों के आधार पर इनके चुनाव की प्रक्रिया आज के दौर से थोड़ी भिन्न जरूर थी। सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार नहीं था। वर्तमान संसद की तरह ही प्राचीन समय में परिषदों का निर्माण किया गया था जो वर्तमान संसदीय प्रणाली से मिलता-जुलता था। गणराज्य या संघ की नीतियों का संचालन इन्हीं परिषदों द्वारा होता था। किसी भी मुद्दे पर निर्णय होने से पूर्व सदस्यों के बीच में इस पर खुलकर चर्चा होती थी। सही-गलत के आकलन के लिए पक्ष-विपक्ष पर जोरदार बहस होती थी। उसके बाद ही सर्वसम्मति से निर्णय का प्रतिपादन किया जाता था।
प्रजातंत्र या लोकतंत्र दो प्रकार का होता है –
(क) प्रत्यक्ष प्रजातंत्र : जब किसी राज्य के निवासी सार्वजनिक विषयों पर प्रत्यक्ष रूप से स्वयं विचार-विमर्श करते है और इसके आधार पर नीतियों का निर्धारण और विधि निर्माण होता है, तो ऐसे शासन को प्रत्यक्ष प्रजातंत्र कहते है। प्रत्यक्ष प्रजातंत्र कम जनसंख्या वाले एवं छोटे आकार वाले राज्यों मे ही संभव है। बड़े आकार वाले राष्ट्रों मे जहाँ नागरिकों की संख्या करोड़ों मे होती है, वहां प्रत्यक्ष प्रजातंत्र संभव नही है। वर्तमान में भारत में पंचायत राज व्यवस्था के अन्तर्गत ग्राम सभाओं में प्रत्यक्ष प्रजातंत्र की व्यवस्था है।
(ख) अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र : जब जनता निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से विधि निर्माण तथा प्रशासनिक कार्यों पर नियंत्रण रखने का कार्य करती है तो उसे अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र कहते है। इसमें जनता निश्चित अवधि के लिए अपने प्रतिनिधि चुनती है, जो कार्यपालिका का गठन करते हैं और कानूनों का निर्माण करते हैं। इस प्रणाली में जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से होती है।
3. संघात्मक शासन :
इसमें शासन की शक्तियों का केंद्र और राज्यों के बीच विभाजन पाया जाता है। अर्ध- संघात्मक व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें संघात्मक शासन के साथ-साथ एकात्मक शासन के लक्षण भी पाए जाते हैं। इसके अन्तर्गत लिखित संविधान सर्वोच्च एवं कठोर होता है। शक्तियों का विभाजन और स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा होता है। इस तरह की शासन व्यवस्था में सत्ता एक व्यक्ति या दल पर केंद्रित नहीं होती है। इस प्रकार की शासन प्रणाली में भी मुख्य कार्यपालक द्वारा नामित एक मंत्रिपरिषद होती है, जो मुख्य कार्यपालक हो और उसके कार्यों में सहायता देती है, किंतु उसकी व्यक्ति व्यस्थापिका में से लिए हुए नहीं होते हैं। मंत्री परिषद के सदस्यों का कार्यकाल मुख्य कार्यपालक की मर्जी पर निर्भर करता है। मंत्रिमंडल का उल्लेख हमें अर्थशास्त्र, मनुस्मृति, शुक्रनीति, महाभारत, इत्यादि में प्राप्त होता है। यजुर्वेद और ब्राह्मण ग्रंथों में इन्हें ‘रत्न’ कहा गया। महाभारत के अनुसार मंत्रिमंडल में 6 सदस्य होते थे। मनु के अनुसार सदस्य संख्या 7-8 होती थी। शुक्राचार्य ने इसके लिए 10 सदस्यों की संख्या निर्धारित की थी।
1. पुरोहित : यह राजा का गुरु माना जाता था। राजनीति और धर्म दोनों में निपुण व्यक्ति को ही यह पद दिया जाता था।
2. उपराज (प्रतिनिधि) : इसका कार्य राजा की अनुपस्थिति में शासन व्यवस्था का संचालन करना था।
3. प्रधान : प्रधान अथवा प्रधानमन्त्री, मन्त्रिमण्डल का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य था। वह सभी विभागों की देखभाल करता था।
4. सचिव : वर्तमान के रक्षा मन्त्री की तरह ही इसका काम राज्य की सुरक्षा व्यवस्था सम्बन्धी कार्यों को देखना था।
5. सुमन्त्र : राज्य के आय-व्यय का हिसाब रखना इसका कार्य था। चाणक्य ने इसको समर्हत्ता कहा।
6. अमात्य : अमात्य का कार्य सम्पूर्ण राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का नियमन करना था।
7. दूत : वर्तमान काल की इंटेलीजेंसी की तरह दूत का कार्य गुप्तचर विभाग को संगठित करना था। यह राज्य का अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील विभाग माना जाता था।
4. संसदात्मक शासन प्रणाली :
संसदीय शासन प्रणाली की परिभाषा संसदात्मक शासन वह शासन प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका पर व्यवस्थापिका का नियंत्रण होता है। इस प्रणाली में कार्यपालिका व्यवस्थापिका की एक ऐसी समिति होती है जो उसी में से ली जाती है और उसी के प्रति उत्तरदाई होती है। इस शासन व्यवस्था के अंतर्गत सत्ता, चुनाव के आधार पर कुछ व्यक्तियों के हाथ में आती है। इसमें व्यक्ति के गुण और संस्कृति के आधार पर सरकार का चुनाव होता है। इस तरह की शासन व्यवस्था भी केवल कुछ लोगों के हाथ में शक्ति हस्तांतरण की एक व्यवस्था पर है जिसमें आम लोगों का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं होता।
प्रजातंत्र या लोकतंत्र की विशेषताएं :
प्रत्येक व्यक्ति का लक्ष्य स्वयं का विकास होता है। इसके लिए व्यक्ति को अवसर की आवश्यकता होती हैं। प्रजातंत्र या लोकतंत्र ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें सभी को अपने सर्वांगीण विकास के लिए बिना किसी भेदभाव के समान अवसर प्राप्त होते है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था नागरिकों कि गरिमा तथा समानता, स्वतंत्रता, भ्रातृत्व और न्याय के सि(ांत पर आधारित है। प्रजातंत्र या लोकतंत्र की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं :-
1. उत्तरदायी शासन व्यवस्था : प्रजातंत्र या लोकतंत्र में जनता प्रत्यक्ष अथवा अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन करती है। इसमे जनता का शासक वर्ग पर निरंतर प्रभाव रहता है। प्रश्न पूछने एवं आलोचना के माध्यम से जनता शासन से उत्तरदायित्व व्यवहार करा सकती है। यहाँ शासन कि सत्ता मूलतः जनता की होती है, जो नियत अवधि के लिए ही प्रतिनिधियों को सौपी जाती है। अतः शासन का जनता के प्रति उत्तरदायित्व अनिर्वाय होता है अन्यथा अगले चुनाव में जनता के पास किसी अन्य को सत्ता सौंपने का विकल्प होता है।
2. समानता पर आधारित शासन : प्रजातंत्र समानता के सिद्धान्त पर आधारित शासन प्रणाली है। इस शासन प्रणाली में सभी नागरिकों को बिना भेदभाव के समान नागरिक व राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। सामाजिक एवं आर्थिक समानता पर भी वर्तमान प्रजातंत्र में बल दिया जाता है। धर्म, जाति, लिंग सामाजिक स्तर आदि के आधार पर भेदभाव न होना तथा आर्थिक दृष्टि से सभी को न्यूनतम आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन समानरूप से उपलब्ध होना, प्रजातंत्र या लोकतंत्र का प्रमुख लक्ष्य हैं।
3. स्वतंत्रता की पोषक प्रणाली : प्रजातंत्र में नागरिकों को सर्वांगीण विकास के लिए अनेक प्रकार की स्वतंत्रताएँ प्राप्त होती है। राजनैतिक स्वतंत्रता के अतिरिक्त नागरिकों को अनेक प्रकार की धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रताओं के अधिकार भी प्राप्त होते है। प्रजातंत्र में नागरिकों को मत देने, निर्वाचित होने, सार्वजनिक पद ग्रहण करने, भाषण एवं अभिव्यक्ति देने, सूचना प्राप्त करने, सम्मेलन सभा करने, समूह बनाने, व्यापार व्यवसाय करने आदि की स्वतंत्रताएँ प्राप्त होती है। नागरिक यदि शासन की नीतियों से असहमत हो तो संयमित विरोध की स्वतंत्रता भी उन्हें प्राप्त है। स्वतंत्रता प्रजातंत्र की आत्मा है। बिना स्वतंत्रता प्रजातंत्र सम्भव नही हैं।
4. कानून का शासन : प्रजातंत्र की चैथी विशेषता यह है कि सरकार जनता की इच्छाओं पर आधारित कानून के अनुसार कार्य करती है। इसे कानून का शासन भी कहा जाता है, जिसका आशय है कि कानून के समक्ष सभी व्यक्ति समान है। समान अपराध करने पर अपराधी को समान दण्ड दिया जाता है, चाहे उसका मान अथवा पद कोई भी क्यों न हों। यह किसी व्यक्ति विशेष एवं समूहों का शासन न होकर कानून पर आधारित शासन है, इसलिए इसमें संविधान का होना भी अवश्यक है, जिसमे मूलभूत कानूनों का उल्लेख होता हैं। सरकार नागरिकों के ऐसे कार्यों के विरुद्ध सख्त आदेश दे सकती है जिससे किसी कानून का उल्लंघन हुआ है।
5. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव : प्रजातंत्र में चुनाव कराना ही पर्याप्त नही हैं, बल्कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होने चाहिए ताकि सत्ता में बैठे लोगों के लिए भी जीत-हार की समान संभावना हो। चुनाव के समय मतदाता पर किसी भी प्रकार का दबाव न हो एवं चुनाव व्यवस्था पक्षपात रहित हो। चुनावों में विभिन्न राजनैतिक दलों और निर्दलीय स्वतंत्र प्रत्याशियों को भी चुनाव में भाग लेने की स्वतंत्रता होती है। भारत सहित विश्व के अधिकांश प्रजातांत्रिक देशों में खुली चुनावी प्रतियोगिता होती है। मतदाता अपनी पसंद के प्रत्याशी का निर्भीकता से गुप्त मतदान द्वारा चुनाव कर सकें, इसी पर प्रजातंत्र का व्यवहारिक स्वरूप निर्भर हैं।
6. लिखित संविधान का होना : शासन संगठन के मूलभूत सिद्धान्त तथा प्रक्रिया निश्चित होना प्रजातंत्र का महत्वपूर्ण लक्षण है, जिससे कोई भी सत्तारूढ़ दल अपने बहुमत के आधार पर इसे जैसा चाहे वैसा परिभाषित या परिवर्तित न कर सके। शासन के अंगों का गठन, शासन की शक्तियाँ एवं कार्य, प्रक्रिया आदि संविधान में स्पष्ट हों, इसलिए लिखित संविधान का होना आवश्यक माना गया है। प्रजातंत्र नागरिकों की समानता एवं स्वतंत्रता पर आधारित हैं। अतः संविधान के मूलभूत कानूनों में भी परिभाषित होना आवश्यक है।
7. स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका : संविधान की समस्त व्यवस्थाएँ व्यवहार में लागू की जा सके, इसलिए प्रजातंत्र में स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका का होना उसका महत्वपूर्ण लक्षण है। शासन का व्यवहार संविधान के अनुकूल हों, नागरिक अधिकार सुरक्षित हों, कानूनों के उल्लंघनकर्ता दण्डित हों, इस हेतु न्यायपालिका को स्वतंत्र रखा गया है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका आवश्यक हैं।