शनिदेव की महिमा
शनिदेव प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में अहम भूमिका निभाते हैं। लोगों में शनिदेव के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्तियां प्रचलित हैं, इसलिये उसे क्रूर, अशुभ और दुख कारक माना जाता है। लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है, जितना उसे माना जाता है। सत्य तो यह है कि शनिदेव प्रकृति में संतुलन पैदा करते हैं और सभी जीवों के साथ उचित न्याय करते हैं। ज्योतिष में इन्हे न्याय तथा मृत्यु का देवता माना जाता है, इसलिये वह शत्रु नही मित्र है। ग्रंथों के अनुसार उनका जन्मस्थल सौराष्ट्र माना जाता है। मत्स्य पुराण के अनुसार शनिदेव का शरीर इन्द्र की नीलमणि जैसा है। शनिदेव सिर पर स्वर्ण मुकुट और तन पर नीले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। उनके एक हाथ में धनुष बाण है और एक हाथ वरद मुद्रा में रहता है। इनका वाहन गिद्ध तथा रथ लोहे का बना हुआ है। यह अपने हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल तथा वरमुद्रा धारण करते हैं। शनिदेव का वर्ण काला है, इसी कारण इनको काला रंग बहुत ही पसंद है। शनि के अधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। इनका सामान्य बीज मंत्र है – ॐ शं शनैश्चराय नमः। शनि भक्तों को इसका श्रद्धानुसार रोज एक निश्चित संख्या में जाप करना चाहिए। शनि जाप का वैदिक मन्त्र है –
ॐ नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड संभूतम् तं नमामि शनैश्चरम्।।
शनि को सन्तुलन और न्याय का ग्रह माना गया है। जो लोग अनुचित बातों के द्वारा जो बात समाज के हित में नही होती है और उसको मान्यता देने की कोशिश करते हैं, अपनी चलाने की कोशिश करते हैं, अनुचित विषमता अथवा अस्वभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि उनको ही पीड़ित करता है। जगत में सच्चे और झूठे का भेद समझना, शनि का विशेष गुण है।
शनिदेव को कल्याणकारी और जीव का परमहितैषी माना जाता है।
शनिदेव का जन्म :
ब्रह्मपुराण के अनुसार शनिदेव का जन्म सूर्य की पत्नी संज्ञा की छाया के गर्भ से हुआ। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे, तब छाया भगवान शंकर की भक्ति में इतनी ध्यान मग्न रहती थी कि उसे अपने खाने-पीने तक की सुध भी नहीं होती थी। इसका प्रभाव उसके पुत्र शनि पर पड़ा और उसका वर्ण श्याम हो गया। शनि के श्यामवर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर आरोप लगाया कि शनि उनका पुत्र नहीं है। इसलिए पिता सूर्य द्वारा अपनी माता का अपमान करने के कारण शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखते थे।
शनिदेव का वरदान :
शनिदेव ने काशी में शिवलिंग की स्थापना करके घनघोर तप किया और भगवान शंकर से मनोवांछित फल प्राप्त करके ग्रहों में सर्वोपरि पद प्राप्त किया। वर्तमान में यह स्थान काशी विश्वनाथ के नाम से जाना जाता है। शनिदेव ने अनेक वर्षों तक भूखे-प्यासे रहकर शिव आराधना की तथा घोर तपस्या से अपनी देह को दग्ध कर लिया था, तब शनिदेव की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने शनिदेव से वरदान मांगने को कहा। शनिदेव ने प्रार्थना की कि मेरी माँ छाया को, मेरे पिता सूर्य द्वारा बहुत अपमानित व प्रताड़ित किया गया है, इसलिए मेरी माता की इच्छा है कि मैं अपने पिता से भी ज्यादा शक्तिशाली बनूं। भगवान शिव ने उन्हें वरदान देते हुए कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा स्थान सर्वश्रेष्ठ रहेगा। तुम पृथ्वीलोक के न्यायाधीश व दंडाधिकारी बनोगे। जिस पर तुम्हारी कुदृष्टि पड़ेगी उसका अशुभ होना निश्चित है। साधारण मानव तो क्या देवता, असुर, सिद्ध, विद्याधर और नाग भी तुम्हारे नाम से भयभीत रहेंगे। शिव की उपासना करने वाले शनि के कोप से हमेशा बचे रहते हैं। भगवान राम के भक्त हनुमान के भक्तों पर भी शनि की कुदृष्टि कभी नहीं पड़ती। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है। एक बार रावण ने सभी देवताओं को हराकर अपने अधिकार में लिया था। वह शनिदेव को मुंह के बल लिटाकर, अपने पैरों के नीचे रखता था। जब हनुमान ने लंका आकर सभी देवताओं को उसकी कैद से मुक्त कराया। तब शनिदेव ने प्रसन्न होकर हनुमान को अपने मारक कोप से हमेशा मुक्त रहने का आशीर्वाद दिया और एक वर मांगने को कहा। हनुमान ने अपने भक्तों को हमेशा शनि के कोप से मुक्त रहने का आशीर्वाद मांगा। इसलिए हनुमान के उपासक भक्तों पर शनि की कुदृष्टि कभी नहीं पड़ती।
शनिदेव का श्राप :
शनि, भगवान सूर्य तथा छाया के पुत्र हैं। शनिदेव भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति किया करते थे। उनकी पत्नी सती, साध्वी एवं परम तेजस्विनी थी। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के श्राप के कारण है। किसी कारण से क्रोधित होकर उसने शनिदेव को श्राप दिया कि जिस किसी पर उनकी दृष्टि पड़ेगी, वह नष्ट हो जाएगा। जब शनिदेव ने उसे मनाया और समझाया तो उसको अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ। किन्तु श्राप के प्रतिकार की शक्ति उसमें नहीं थी। शनिदेव नहीं चाहते थे कि उनके द्वारा किसी का अनिष्ट हो, इसलिए शनिदेव अपना सिर नीचा करके रहने लगे।
शनिवार का व्रत :
शनिदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए शनिवार को व्रत रखना चाहिए। यह व्रत वैसे तो किसी भी शनिवार को शुरू कर सकते हैं, परन्तु श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारम्भ करना अति मंगलकारी होता है। व्रत करने वाले को प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा की विधि सहित पूजन करनी चाहिए। शनि मन्दिर में जाकर शनिदेव को सरसों का तेल, नीले लाजवन्ती के फूल, काले तिल तथा गुड़ आदि अर्पण करना चाहिए। शनि भक्तों को कच्चा दूध मिला जल पीपल की जड़ में अर्पित करना चाहिए। पीपल के तने में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए। शनिदेव के नाम से दीपोत्सर्ग करना चाहिए। आपसे जाने-अनजाने जो भी अपराध हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए। शनि की पूजा के पश्चात् राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए। प्रतिवर्ष ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अमावस्या को शनि जयंति धूमधाम से मनाई जाती है।
शनि की साढ़े साती :
ज्योतिष के अनुसार कुंडली में शनि की तृतीय, सप्तम तथा दशम दृष्टि मानी गई है। यह एक राशि में 30 महीने रहते हैं। यह मकर व कुम्भ राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है। शनि की साढ़ेसाती की गणना तीन प्रकार से होती हैं, पहली लगन से, दूसरी चन्द्र राशि से और तीसरी सूर्य राशि से। उत्तर भारत में प्राचीनकाल से शनि की साढ़े साती की गणना चन्द्र राशि से करने का विधान चला आ रहा है। इस मान्यता के अनुसार जब शनिदेव गोचर में जातक की कुंडली में स्थित चन्द्र राशि पर भ्रमण करते हैं तो साढ़ेसाती मानी जाती है। इसका प्रभाव राशि में आने के 30 माह पहले से और 30 माह बाद तक अनुभव होता है। इसे शनि की ढैय्या कहते हैं। साढ़ेसाती के दौरान शनिदेव जातक के पिछले किये गये कर्मों का हिसाब लेते है। जैसे किसी नौकर को पूरी जिम्मेदारी देने के कुछ समय बाद मालिक हिसाब मांगता है। हिसाब में भूल होने या गल्ती करने पर जिस प्रकार नौकर को सजा दी जाती है, उसी प्रकार शनि देव भी प्राणी को उसके बुरे कर्मों की सजा देते हैं। जिन लोगों ने अच्छे कर्म किये होते हैं तो उनको साढ़ेसाती के दौरान शुभ परिणाम भी प्राप्त होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि ग्रह यदि रोहिणी नक्षत्र भेदन कर दे, तो पृथ्वी पर 12 वर्षों का घोर अकाल आ जाए और प्राणियों का बचना ही कठिन हो जाए। शनि ग्रह जब रोहिणी भेदन कर बढ़ जाता है, तब यह योग आता है। यह योग महाराज दशरथ के समय में आने वाला था। जब ज्योतिषियों ने महाराज दशरथ को बताया कि यदि शनि का योग आ जाएगा तो प्रजा अन्न-जल के बिना तड़प-तड़प कर मर जाएगी। प्रजा को इस कष्ट से बचाने हेतु महाराज दशरथ अपने रथ पर सवार होकर नक्षत्र मंडल में पहुंचे। पहले तो उन्होंने नित्य की भांति शनिदेव को प्रणाम किया, इसके पश्चात् क्षत्रिय धर्म के अनुसार उनसे युद्ध करते हुए उन पर संहारास्त्र का संधान किया। शनिदेव, महाराज दशरथ की कर्तव्यनिष्ठा से अति प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा। महाराज दशरथ ने कहा कि जब तक सूर्य, नक्षत्र आदि विद्यमान हैं, तब तक आप पृथ्वी पर संकटभेदन न करें। शनिदेव ने उन्हें वरदान देकर संतुष्ट किया।
शनिदेव को तेल चढ़ाने की कथा :
※ शनिदेव को तेल चढ़ाने के लिए यह पौराणिक कथा काफी प्रचलित है। मान्यता है कि शिव से अमरत्व का वरदान प्राप्त कर रावण अपने अहंकार में चूर हो गया था और उसने अपने बल से सभी ग्रहों को बंदी बना लिया। शनिदेव को भी उसने बंदीग्रह में उलटा लटका दिया था। जिस समय हनुमान प्रभु श्रीराम के दूत बनकर लंका गए हुए थे, रावण ने अहंकार में आकर हनुमान की पूंछ में आग लगवा दी थी। इसी बात से क्रोधित होकर हनुमान ने पूरी लंका जला दी थी। लंका जल गई और सारे ग्रह आजाद हो गए, लेकिन उल्टा लटका होने के कारण शनि के शरीर में भयंकर पीड़ा हो रही थी और वह दर्द से कराह रहे थे। शनि के दर्द को शांत करने के लिए हनुमान ने उनके शरीर पर तेल से मालिश करके दर्द से मुक्त किया था। उसी समय शनिदेव ने वचन दिया था कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा भक्ति से मुझ पर तेल चढ़ाएगा उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।
※ दूसरी कथा के अनुसार एक बार शनिदेव को अपने बल और पराक्रम पर घमंड हो गया था। लेकिन उस काल में हनुमान के बल और पराक्रम की कीर्ति चारों दिशाओं में फैली हुई थी। जब शनिदेव को हनुमान के बारे में पता चला तो वह हनुमान से युद्ध करने के लिए निकल पड़े। शनिदेव जब हनुमान के पास पहुंचे तो देखा कि हनुमान एक शांत स्थान पर अपने स्वामी श्रीराम की भक्ति में लीन बैठे है। शनिदेव ने उन्हें देखते ही युद्ध के लिए ललकारा। जब हनुमान ने शनिदेव की युद्ध की ललकार सुनी तो वह शनिदेव को समझाने पहुंचे। लेकिन शनिदेव ने एक बात न मानी और युद्ध के लिए अड़ गए। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में शनिदेव बुरी तरह हारकर घायल हो गए, जिसके कारण उनके शरीर में पीड़ा होने लगी। इसके बाद हनुमान ने शनिदेव को सरसों का तेल लगाने के लिए दिया, जिससे उनका पूरा दर्द गायब हो गया। इसी कारण शनिदेव ने कहा कि जो मनुष्य मुझे सच्चे मन से तेल चढ़ाएगा, मैं उसकी सभी पीड़ा हर लूंगा और सभी मनोकामनाएं पूरी करूंगा। इस प्रकार शनिदेव को तेल चढ़ाने की परंपरा की शुरुआत हुई। शनिवार का दिन शनिदेव का दिन होता है। इस दिन शनिदेव पर तेल चढ़ाने से सभी मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती है।
चमत्कारिक शनि सिद्ध पीठ :
शनि के चमत्कारिक सिद्ध पीठों में तीन पीठ ही मुख्य माने जाते हैं, इन सिद्ध पीठों मे जाने और अपने किये गये पापों की क्षमा मांगने से जाने-अनजाने जो भी पाप किए होते हैं, उनके अन्दर कमी आकर जातक को फौरन लाभ मिलता है।
1. महाराष्ट्र का शिंगणापुर गांव का सिद्ध पीठ :
शनि शिंगणापुर, भारत के महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर जिले में स्थित एक गाँव है जो शनि देवता के मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है। यहां पर शनि भगवान की 5 फुट 9 ईंच ऊँची और 1 फुट 6 ईंच चैड़ी काले रंग की स्वयंभू मूर्ति है जो संगमरमर के चबूतरे पर खुले में ही विराजमान है। यहां पर शनिदेव सर्दी, गर्मी, आंधी, तूफान सभी मौसम में बिना छत्र धारण किए रहते हैं। शिंगणापुर गांव मे शनिदेव का अद्भुत चमत्कार है। शनि भगवान की आज्ञा से इस गांव में आज तक किसी ने अपने घर में ताला नही लगाया, इसी बात से इस सिद्ध पीठ की महानता का अन्दाजा लगाया जा सकता है।
2. मध्यप्रदेश के ग्वालियर के पास शनिदेव मन्दिर :
लंका दहन से पूर्व जब हनुमान देवताओं को आजाद कर रहे थे, तब शनिदेव ने शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण उनको सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिए कहा। शनिदेव के कहने पर हनुमान ने शनिदेव को लंका से फेंका था। यहां उनका फेंका हुआ शनिदेव का अलौकिक पिण्ड है। शनिदेव के गिरने से यहां गड्ढा हो गया था जो आज भी विद्यमान है। कहते हैं बाद में विक्रमादित्य ने यहां मन्दिर बनवाया था। इतिहासकारों के अनुसार तत्कालीन ग्वालियर रियासत के महाराज दौलतराव सिंधिया ने मन्दिर की व्यवस्था के लिए जागीर लगवाई। प्रत्येक शनिश्चरी अमावस्या को यहां भारी मेला लगता है। इस मन्दिर में साढ़ेसाती से पीड़ित जातक शनिदेव पर तेल चढ़ाकर उनसे आशीर्वाद लेते हैं। साथ ही पहने हुए कपड़े, जूते आदि वहीं पर छोड़कर, समस्त दरिद्रता को त्यागकर और क्लेशों को छोड़कर वापिस अपने घर चले जाते हैं। इस पीठ की पूजा करने पर भी तुरन्त फल मिलता है।
3. कोकिला वन :
यह सिद्ध पीठ उत्तर प्रदेश के कोसी के पास, कोसी से छः किलोमीटर दूर नन्द गांव से सटे हुए कोकिला वन में स्थित है। कुछ लोग भगवान के अवतार रूप में किए गए कार्यों पर शीघ्रता से विश्वास नहीं कर पाते। रामायण के पुष्पक विमान की बात सुनकर लोग जो नही समझते थे। रामेश्वरम् के रामकुंड में साक्षात रूप से पत्थर को पानी में तैरता हुआ पाया, तब रामसेतू पर यकिन आया। श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को भी लोगों ने सामान्य व्यक्ति की तरह सहज रूप में देखा। इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने इन कहावतों और पुराणों की कथाओं के अनुसार शनिदेव को दर्शन दिया और वचन भी दिया कि जो इस वन की परिक्रमा करेगा और शनिदेव की पूजा अर्चना करेगा, वह मेरी कृपा की तरह से ही शनिदेव की कृपा प्राप्त कर सकेगा। मान्यता है कि जब श्री कृष्ण का जन्म हुआ तो सभी देवताओं के साथ शनिदेव भी उनके बालरूप का दर्शन करने आए किन्तु यशोदा ने शनिदेव को श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं करने दिया। इसलिए शनिदेव की प्रार्थना पर श्रीकृष्ण ने कोकिला वन में शनिदेव को कोयल रूप में दर्शन दिए और यहीं रहकर उनके भक्तों का कल्याण करने को कहा।
शनिदेव की कृपा प्राप्त करने के उपाय :
※ आपातकाल में शनिदेव का गुणगान करो। जीवन के अच्छे समय में शनिदेव के दर्शन करो।
※ दुखद प्रसंग में भी शनिदेव पर विश्वास रखो। जीवन के हर पल शनिदेव की प्रति कृतज्ञता प्रकट करो।
※ शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए प्रतिदिन सुबह स्नान करके पीपल के पेड़ की जड़ में कच्चे दूध में काला तिल और शहद मिलाकर अर्पण करें।
※ शनिवार की शाम को शनि मन्दिर में जाकर किसी निर्धन व्यक्ति को काले वस्त्रों का दान करें तथा उनका आशीर्वाद लें। ऐसा करने से लंबे समय से चली आ रही परेशानी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।
※ शनिवार को सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद सरसों के तेल का चैमुखा दीया पीपल के पेड़ के नीचे जलाएं। ऐसा करने से आपका रुका हुआ व्यापार चलने लगेगा और धन की वृद्धि होगी।
※ शनि की पहली प्रिय वस्तु है काला कपड़ा। शनिवार के दिन काला कपड़ा और काली उड़द का दान करने से शनिदेव की प्रसन्नता मिलती है।
※ शनि ग्रह को प्रसन्न करने के लिए शनिवार के दिन सरसों के तेल का दान करें। शनिवार की शाम सरसों के तेल से बना खाना जरूरतमंद लोगों में बांटे।
※ पीपल के पत्ते पर 27 काली उड़द के दाने रखकर शनि मंदिर में अर्पण करें। ऐसा करने से स्वास्थ्य की समस्या खत्म हो जाएगी।
※ एक बड़े पान के पत्ते पर अपनी उम्र के बराबर काली उड़द के दानों को बहते पानी में प्रवाह करें। ऐसा करने से आपके घर की नकारात्मकता दूर हो जाएगी।