ग्रहण एक खगोलीय घटना है जो तब होती है जब कोई खगोलीय पिण्ड अस्थायी रूप से किसी अन्य पिंड की छाया में आ जाता है। कभी ग्रहण पूर्ण होता है और कभी आंशिक हो सकता है। ग्रहण शब्द का प्रयोग अक्सर सूर्य ग्रहण (जब चंद्रमा की छाया पृथ्वी की सतह को पार करती है) या चंद्र ग्रहण (जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में चला जाता है) के विषय में किया जाता है। चूँकि चंद्रमा की कक्षा का तल पृथ्वी की कक्षा के तल से झुका हुआ है, इसलिए प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या को ग्रहण नहीं होता। पृथ्वी और चन्द्रमा की कक्षाएँ जिन बिंदुओं पर मिलती हैं उन्हें चन्द्रपात कहते हैं। सबसे अनुकूल परिस्थितियों में ग्रहण तभी हो सकता है जब सूर्य और चन्द्रमा, चन्द्रपातों के निकट हों। एक कैलेंडर वर्ष में चार से सात ग्रहण हो सकते हैं।

सूर्य ग्रहण : सूर्य ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी के दर्शक के लिए चंद्रमा सूर्य के सामने से गुजरता है। यह केवल अमावस्या को होता है। सूर्य ग्रहण का पूर्ण या आंशिक या वलयाकार होना, इस पर भी निर्भर करता है कि दर्शक पृथ्वी पर कहाँ खडा है। अलग-अलग स्थान से दर्शक को अलग-अलग प्रकार से ग्रहण दिखाई दे सकता है। चन्द्रमा के पृथ्वी के निकट होने पर पूर्ण ग्रहण और दूर होने पर वलयकार सूर्य ग्रहण होगा। चन्द्रमा में बहुत अधिक बदलाव नहीं होता इसलिए वलयकार सूर्य ग्रहण भी लगभग पूर्ण सूर्य ग्रहण जैसा ही दिखाई देता है, बस इसमें पूर्णता के समय हल्का का सूर्य का किनारा दिखाई देता है जिसे अग्नि कुण्डल (रिंग आफ फायर) कहते है। पूर्ण सूर्य ग्रहण 7 मिनट 31 सेकंड तक रह सकता है और 250 किलोमीटर तक के ट्रैक के साथ देखा जा सकता है।

चन्द्र ग्रहण : चंद्र ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया से होकर गुजरता है। यह केवल पूर्णिमा के दौरान होता है, जब चंद्रमा सूर्य से पृथ्वी के सबसे दूर होता है। सूर्य ग्रहण के विपरीत, चन्द्रग्रहण लगभग पूरे गोलार्ध से देखा जा सकता है। चंद्र ग्रहण तीन प्रकार के होते हैं- उपछाया ग्रहण (जब चंद्रमा केवल पृथ्वी की उपछाया को पार करता है), आंशिक ग्रहण (जब चंद्रमा आंशिक रूप से पृथ्वी की छाया की प्रच्छाया, छाया का गर्भ या केंद्र में आ जाता है) और पूर्ण ग्रहण (जब चंद्रमा पूरी तरह से पृथ्वी की छाया की प्रच्छाया में आ जाता है)। पूर्ण चन्द्रग्रहण तीनों चरणों से होकर गुजरता है। चन्द्रग्रहण आमतौर पर औसत लगभग 30 मिनट से लेकर एक घंटे तक हो सकता है।

वृहस्पति जैसे विशाल ग्रहों के कई चंद्रमा हैं और इस प्रकार अक्सर ग्रहण प्रदर्शित होते हैं। जिसमें चार बड़े चंद्रमा हैं और इनका अक्षीय झुकाव कम है, जिससे ग्रहण अधिक बार बनते हैं। जब भी ये पिंड बड़े ग्रह की छाया से गुजरते हैं तभी ग्रहण होता है।