सनातन धर्म, अपने मूल रूप वैदिक धर्म के वैकल्पिक नाम से जाना जाता है। सनातन का अर्थ है – शाश्वत या हमेशा बना रहने वाला, अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। सनातन धर्म मूलतः भारतीय वैदिक धर्म है, जो किसी जमाने में पूरे भारतवर्ष तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए भारी धर्मान्तरण के बाद भी विश्व के इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी इसी धर्म में आस्था रखती है। सनातन धर्म, सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश किया गया है। यह धर्म विश्व का सबसे प्राचीन धर्म है, जिसके हर नीति, नियम में मानव कल्याण का उद्देश्य छिपा है। यह धर्म किसी एक व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि यह अनेक ऋषि-मुनियों के ज्ञान, विज्ञान व आध्यात्म द्वारा अर्जित किया गया है। वेद, पुराण आदि धर्मग्रंथ केवल किताबें नहीं हैं, बल्कि अतीत को देखकर भविष्य में मानव जीवन को श्रेष्ठतम बनने के लिये दर्पण हैं। यह धर्म किसी व्यक्ति को बाधित नही करता अपितु स्वतंत्र होकर जीवन जीने की शिक्षा देता है।

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तवयः मानो धर्मो हतोवाधीत।। – मनु स्मृति

अर्थात् जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश करता है। धर्म उसका रक्षण करता है जो उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है। अतः धर्म का नाश नहीं करना चाहिए। धर्म का नाश करने वाले का नाश अवश्य होता है।

असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योर्तिगमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय। – वृहदारण्य उपनिषद

अर्थात् हे ईश्वर मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो। जो व्यक्ति उस परम तत्व परब्रह्म परमेश्वर को नहीं मानते, वह मृत्युकाल में अनंत अंधकार में गिरते हैं। सत्य दो धातुओं से मिलकर बना है सत् और तत्। सत् का अर्थ यह और तत् का अर्थ वह। ‘अहं ब्रह्मास्मी’ और ‘तत्त्वमसि’ अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ और तुम ही ब्रह्म हो, दोनों ही सत्य है। यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्ममय है।

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। – ईश उपनिषद

अर्थात् पूर्ण ब्रह्म से समस्त जगत् की उत्पत्ति होने पर भी ब्रह्म की पूर्णता में कोई न्यूनता नहीं आती। वह शेष रूप में भी पूर्ण ही रहता है। पूर्ण जगत् की उत्पत्ति पूर्ण ब्रह्म से हुई है, यही सनातन सत्य है।

सनातन धर्म का इतिहास :

सिन्धु घाटी सभ्यता में सनातन धर्म के कई चिन्ह मिलते हैं। इनमें अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, शिवलिंग, पीपल इत्यादि प्रमुख हैं। इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के अनुसार इस सभ्यता के अन्त के दौरान मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ, जो स्वयं को आर्य कहते थे और संस्कृत नाम की एक हिन्द-यूरोपीय भाषा बोलते थे। एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं ही आर्य थे और उनका मूलस्थान भारत ही था।

कुछ हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल है कि आर्य भारत के निवासी नहीं थे और उनके आने से पहले से हड़प्पा सभ्यता मौजूद थी। इसका मतलब यह मानना होगा कि भारतीय संस्कृति का उद्गम आर्यों या उनकी वैदिक संस्कृति में नहीं बल्कि कहीं ओर है। बाहर से आने की मान्यता आर्यों को बाद में भारत पर आक्रमण करने वाले तुर्क, पठान और मुगलों की ही श्रेणी में डाल देती है। यह पंथ सनातन है। समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा हुए हैं तथा प्रगति की है।

हे मनुष्यों, आप अपने उत्पन्न होने की आधाररूपा अपनी माता प्रकृति को विनष्ट न करें। – ऋग्वेद-3-18-1

सनातन धर्म को यदि एक पंक्ति में कहना हो तो यही कहा जाएगा – जियो और जीने दो। भारतीय सनातन परपंरा की यही विशेषता भारत को ‘विश्व गुरु’ बनाती है। पुराण बताते हैं कि आदि सृष्टि की उत्पत्ति भारत के उत्तराखण्ड अर्थात् ब्रह्मावर्त क्षेत्र में ही हुई। प्रजापतियों से ही धरती पर मानव की आबादी हुई। आज धरती पर जितने भी मनुष्य हैं सभी प्रजापतियों की संतानें हैं।

अभगच्छत राजेन्द्र देविकां विश्रुताम्। प्रसूर्तित्र विप्राणां श्रूयते भरतर्षभ।। – महाभारत।

अर्थात् सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई।

प्राचीनकाल में भारतीय सनातन धर्म में गाणपत्य, शैव, वैष्णव, शाक्त और सौर नाम के पाँच सम्प्रदाय होते थे। गाणपत्य गणेश की, वैष्णव विष्णु की, शैव शिव की, शाक्त शक्ति की और सौर सूर्य की पूजा आराधना किया करते थे। लेकिन प्रत्येक सम्प्रदाय के समर्थक अपने देवता को दूसरे सम्प्रदायों के देवता से बड़ा समझते थे और इस कारण से उनमें वैमनस्य बना रहता था। समाज में धार्मिक एकता बनाए रखने के उद्देश्य से तत्कालीन धर्मगुरुओं ने लोगों को सिखाया कि सभी देवी-देवता समान हैं। विष्णु, शिव और शक्ति आदि सभी देवता परस्पर एक-दूसरे के भी भक्त हैं। विष्णु, शिव और शक्ति सब एक ही सत्य की व्याख्या है। मान्यता है कि उनकी इन शिक्षाओं से सभी सम्प्रदायों के समर्थक इस सत्य को मानने लगे और सनातन धर्म की उत्पत्ति हुई।

सनातन धर्म का सारा साहित्य वेद, पुराण, शास्त्र, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता आदि श्रुति एवं स्मृति ग्रन्थ देवभाषा संस्कृत में लिखे गए हैं। कालान्तर में भारत में मुस्लिम शासन हो जाने के कारण संस्कृत भाषा का ह्रास होने लगा तथा सनातन धर्म की अवनति होने लगी। इस स्थिति को सुधारने के लिये विद्वान संत तुलसीदास ने प्रचलित भाषा में धार्मिक साहित्य ‘राम चरित मानस’ की रचना करके सनातन धर्म की रक्षा की। जब औपनिवेशिक ब्रिटिश प्रशासन को भारत में विभिन्न धर्मों के मानने वालों का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिये जनगणना करने की आवश्यकता पड़ी तो सनातन शब्द से अपरिचित होने के कारण उन्होंने यहाँ के धर्म का नाम हिन्दू धर्म रख दिया।

आधुनिक और समसामयिक चुनौतियों का सामना करने के लिए इसमें समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं, जैसे कि राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद आदि महापुरूष सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा, अस्पृश्यता जैसी असुविधाजनक परंपरागत कुरीतियों से असहज महसूस करते रहे और इन पुरानी परम्पराओं का अन्त किया। इन कुरीतियों की जड़ों (तात्कालिक धर्मशास्त्रों) में मौजूद उन श्लोकों और मंत्रो को ‘क्षेपक’ (आरोपित) कहा। इन्हें त्याज्य घोषित किया और इनके अर्थों को बदलकर लिखा।

यद्यपि आज सनातन का पर्याय हिन्दू है, परन्तु बौद्ध और जैन धर्मावलम्बी भी अपने आप को सनातनी कहते हैं। यहां तक कि नास्तिक लोग जोकि चार्वाक दर्शन को मानते हैं, वह भी स्वयं को सनातनी कहते हैं। सनातनी होने के लिए किसी विशिष्ट पद्धति, कर्मकांड, वेशभूषा को मानना जरुरी नहीं। बस वह सनातन धर्मी परिवार में जन्मा हो, उसके सनातनी होने के लिए पर्याप्त है। सनातन धर्म में विभिन्नताओं को देखते हुए कई बार इसे कठिन और समझने में मुश्किल धर्म समझा जाता है। इसका कारण है कि यह धर्म किसी एक दार्शनिक, मनिषी, सन्त या ऋषि के विचारों की उपज नहीं है, न ही यह किसी खास समय में पैदा हुआ। यह तो अनादि काल से प्रवाहमान और विकासमान रहा है। साथ ही यह किसी एक दृष्टांत, सिद्धान्त या तर्क को भी वरीयता नहीं देता।

विज्ञान जब किसी तत्त्व, वस्तु या विचार का मूल्यांकन करता है तो उस प्रक्रिया में धर्म के अनेक विश्वास और सिद्धान्त धराशायी हो जाते हैं। विज्ञान भी सनातन सत्य को पकड़ने में अभी तक कामयाब नहीं हुआ है किंतु वेदों में जिस सनातन सत्य की महिमा का वर्णन है, विज्ञान धीरे-धीरे उससे सहमत होता नजर आ रहा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और समाधि की अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्माण्ड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया है। वेदों में ही सर्वप्रथम ब्रह्म और ब्रह्माण्ड के रहस्य से पर्दा हटाकर ‘मोक्ष’ की धारणा का महत्व समझाया गया। मोक्ष के अतिरिक्त आत्मा की कोई गति नहीं, इसीलिए ऋषियों ने मोक्ष के मार्ग को ही सनातन मार्ग माना है।