हिन्दू धर्म से संबंधित लगभग सभी लोग समुद्र मंथन की कथा को जानते हैं। यह कथा समुद्र से निकले अमृत कलश के कारण प्रसि( है, जिसे पीने के लिए देवताओं और असुरों में विवाद उत्पन्न हो गया था। जिसके बाद भगवान विष्णु ने मोहिनी नामक स्त्री का रूप धारण कर देवताओं को अमृतपान करवाया था। लेकिन क्या आपको पता है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत के अलावा 13 अन्य वस्तुएं भी प्रकट हुई थी? इस लेख में हम समुद्र मंथन की कथा और उससे निकले 14 रत्नों का विवरण दे रहे हैं।

समुद्र मंथन की कथा :

धर्म ग्रंथों के अनुसार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग ऐश्वर्य, धन, वैभव आदि से श्रीहीन हो गया था। दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ शिवजी के दर्शनों के लिए कैलाश जा रहे थे। मार्ग में उन्हें देवराज इन्द्र मिले। इन्द्र ने दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। महर्षि दुर्वासा ने इन्द्र को आशीर्वाद स्वरूप भगवान विष्णु का प्रिय पारिजात पुष्प प्रदान किया। इन्द्रासन के गर्व में चूर इन्द्र ने उस पुष्प को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया। पुष्प का स्पर्श होते ही ऐरावत ने मदमस्त होकर इन्द्र का परित्याग कर दिया और उस दिव्य पुष्प को कुचलते हुए वन की ओर चला गया। इन्द्र द्वारा भगवान विष्णु के पुष्प का तिरस्कार होते देखकर उनके क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने देवराज इन्द्र को ‘श्री हीन’ हो जाने का शाप दे दिया। दुर्वासा ऋषि के शाप के फलस्वरूप उसी क्षण लक्ष्मी स्वर्गलोक को छोड़कर अदृश्य हो गईं। लक्ष्मी के चले जाने से इन्द्र आदि देवता निर्बल और श्रीहीन हो गए और उनका वैभव लुप्त हो गया। उस समय तीनों लोकों पर दैत्यराज बलि का राज्य था। इन्द्र सहित सभी देवता उससे भयभीत रहते थे।

इन्द्र को बलहीन जानकर दैत्यों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। इस समस्या के समाधान के लिए समस्त देवता ब्रह्मा जी के साथ भगवान नारायण के पास पहुंचे। उनकी स्तुति करके उन्होंने भगवान विष्णु को अपनी विपदा सुनाई। भगवान विष्णु ने देवताओं को समझाया कि संकट काल में मैत्रीपूर्ण भाव से रहना चाहिये। दैत्यों पर इस समय काल की विशेष कृपा है इसलिए जब तक तुम्हारे उत्कर्ष और दैत्यों के पतन का समय नहीं आता, तब तक तुम उनसे संधि कर लो। दैत्यों से मित्रता करके और क्षीरसागर को मथकर उसमें से अमृत निकालने का उपाय बताया और कहा कि अमृत पीकर तुम अमर हो जाओगे और तुममें दैत्यों को मारने का सामर्थ्य आ जायेगा। भगवान विष्णु की आज्ञा से देवराज इन्द्र ने दैत्यराज बलि से समझौता कर लिया। देवता और दैत्य समुद्र मंथन के लिये तैयार हो गये। मन्दराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी नाग को नेती बनाया गया। स्वयं भगवान श्री विष्णु कच्छप अवतार लेकर मन्दराचल पर्वत को अपने पीठ पर रखकर उसका आधार बन गये। वासुकी नाग को भी गहन निद्रा देकर उसके कष्ट को हर लिया। देवर्षि नारद के परामर्श पर देवताओं ने वासुकी नाग की पूँछ और दैत्यों ने मुँह की ओर का स्थान ले लिया और समुद्र को मथना प्रारंभ किया गया। समुद्र से एक-एक करके 14 रत्न निकले जिनका विवरण निम्न है:-

1. हलाहल (विष) : समुद्र मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला, जिसकी ज्वाला बहुत तीव्र थी। हलाहल विष की ज्वाला से सभी देवता तथा दैत्य जलने लगे और उनकी चमक फीकी पड़ने लगी। इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर की आराधना की। देवताओं तथा असुरों की प्रार्थना पर महादेव उस विष को हथेली पर रखकर पी गये, किन्तु देवी पार्वती ने विष को उनके कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया। अतः हलाहल विष के प्रभाव से शिव का कण्ठ नीला पड़ गया। इसीलिये महादेव को ‘नीलकण्ठ’ भी कहा जाता है।
हलाहल विष पीते समय शिवजी की हथेली से थोड़ा-सा विष पृथ्वी पर टपक गया, जिसे साँप, बिच्छू आदि जन्तुओं ने ग्रहण कर लिया, जिससे उनका स्वभाव विषैला हो गया। इससे तात्पर्य है कि परमात्मा रूपी अमृत हर इंसान के मन में स्थित है। अगर हमें अमृत की इच्छा है तो सबसे पहले हमें अपने मन को मथना पड़ेगा। जब हम अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही बाहर निकलेंगे। यही बुरे विचार विष है। हमें इन बुरे विचारों को परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए और इनसे मुक्त हो जाना चाहिए।

2. कामधेनु गाय : हलाहल विष के बाद समुद्र से कामधेनु गाय बाहर निकली। वह अग्निहोत्र ;यज्ञद्ध की सामग्री उत्पन्न करने वाली थी। इसलिए ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उसे ग्रहण कर लिया। पौराणिक गाथाओं में कामधेनु का वर्णन एक ऐसी चमत्कारी गाय के रूप में मिलता है, जिसमें दैवीय शक्तियाँ थीं और जिसके दर्शन मात्र से ही लोगों के दुःख व पीड़ा दूर हो जाती थी। यह कामधेनु जिसके पास होती थी, उसे हर तरह से चमत्कारिक लाभ होता था। इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था। जैसे देवताओं में भगवान विष्णु, सरोवरों में समुद्र, नदियों में गंगा, पर्वतों में हिमालय, भक्तों में नारद, सभी पुरियों में कैलाश, सम्पूर्ण क्षेत्रों में केदार क्षेत्र श्रेष्ठ है, वैसे ही सभी गायों में कामधेनु सर्वश्रेष्ठ है। कामधेनु मन की निर्मलता की प्रतीक है। क्योंकि विचारों का विष निकल जाने के बाद मन निर्मल हो जाता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर तक पहुंचना और भी आसान हो जाता है।

3. उच्चैश्रवा घोड़ा : समुद्र मंथन के दौरान तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला। इसे देवराज इन्द्र को दे दिया गया। उच्चैश्रवा के कई अर्थ हैं, जैसे- जिसका यश ऊँचा हो, जिसके कान ऊँचे हों अथवा जो ऊँचा सुनता हो। इस घोड़े का रंग श्वेत ;सफेदद्ध था। उच्चैश्रवा का पोषण अमृत से होता है और इसे घोड़ों का राजा कहा जाता है। घोड़ा मन की गति का प्रतीक होता है। मन की गति सबसे अधिक मानी गई है। यदि आपको अमृत चाहिए तो अपने मन की गति पर विराम लगाना होगा, तभी परमात्मा से मिलन संभव है।

4. ऐरावत हाथी : समुद्र मंथन के दौरान चौथे नंबर पर ऐरावत हाथी निकला। ऐरावत को शुक्लवर्ण और चार दाँतों वाला बताया गया है। उसकी चमक कैलाश पर्वत से भी अधिक थी। इसे इन्द्र को दे दिया गया था। इन्द्र ने इस दिव्य गुणयुक्त हाथी को अपनी सवारी के लिए रख लिया था। इसलिए इसे ‘इंद्रहस्ति’ अथवा ‘इंद्रकुंजर’ भी कहा जाता है। ऐरावत हाथी बुद्धि का और उसके चार दांत लोभ, मोह, वासना और क्रोध के प्रतीक हैं। शुद्ध व निर्मल बुद्धि द्वारा ही हम इन विकारों पर काबू रख सकते हैं।

5. कौस्तुभ मणि : समुद्र मंथन के दौरान पांचवे नंबर पर कौस्तुभ मणि प्रकट हुआ, जिसे भगवान विष्णु ने अपने हृदय पर धारण कर लिया। यह बहुत ही चमकदार थी और ऐसा माना जाता है कि जहाँ भी यह मणि होती है, वहाँ किसी भी प्रकार की दैवीय आपदा नहीं होती है। कौस्तुभ मणि भक्ति का प्रतीक है। जब आपके मन से सारे विकार निकल जाएंगे, तब भक्ति ही शेष रह जाएगी। यही भक्ति ही भगवान ग्रहण करेंगे।

6. कल्प वृक्ष : समुद्र मंथन के दौरान छठे नंबर पर कल्पवृक्ष प्रकट हुआ। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह वृक्ष सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला वृक्ष था। देवताओं के द्वारा इसे स्वर्ग में स्थापित कर दिया गया। कई पौराणिक ग्रंथों में कल्पवृक्ष को ‘कल्पद्रूम’ एवं ‘कल्पतरू’ के नाम से संबोधित किया गया है। कल्पवृक्ष इच्छाओं का प्रतीक है। अगर आप अमृत (परम पद ) प्राप्ति के लिए प्रयास कर रहे हैं तो अपनी सभी इच्छाएं परमात्मा को अर्पित कर दें। मन में इच्छाएं होंगी तो परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं है।

7. रंभा अप्सरा : समुद्र मंथन के दौरान सातवें नंबर पर ‘रंभा’ नामक अप्सरा प्रकट हुई। वह सुंदर वस्त्र व आभूषण पहने हुई थीं और उसकी चाल मन को लुभाने वाली थी। वह स्वंय ही देवताओं के पास चली गई। देवताओं ने रंभा को इन्द्र को सौंप दिया, जो उनकी सभा की प्रमुख नृत्यांगना बन गई। अप्सरा मन में छिपी वासना का प्रतीक है। जब आप किसी विशेष उद्देश्य में लगे होते हैं तब वासना आपका मन विचलित करने का प्रयास करती हैं। उस स्थिति में मन पर नियंत्रण होना बहुत जरूरी है।

8. वारूणी अर्थात् मदिरा : समुद्र मंथन के दौरान आठवें नंबर पर वारूणी प्रकट हुई। भागवत महापुराण के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान लक्ष्मी से पहली उनकी बड़ी बहन अलक्ष्मी निकली थीं। समुद्र से वारुणी यानि मदिरा लेकर निकलने वाली स्त्री ही अलक्ष्मी थीं। मदिरा को भगवान विष्णु की अनुमति से दैत्यों को दे दिया गया। देवी अलक्ष्मी आलस्य, गरीबी और दरिद्रता की देवी हैं। इसलिए उन्होंने आसुरी शक्तियों का वरण किया। समुद्र से उत्पन्न होने के कारण उन्हें लक्ष्मी की बड़ी बहन कहा जाता है। वास्तव में वारूणी का अर्थ ‘मदिरा’ है और यही कारण है कि दैत्य हमेशा मदिरा में डूबे रहते थे। नशा कैसा भी हो व्यक्ति के लिए बुरा ही होता है। परमात्मा को पाना है तो सबसे पहले नशा छोड़ना होगा तभी परमात्मा से साक्षात्कार संभव है।

9. देवी लक्ष्मी : समुद्र मंथन के दौरान नौवें नंबर पर देवी लक्ष्मी प्रकट हुई। क्षीरसागर से जब देवी लक्ष्मी प्रकट हुई, तब वह खिले हुए श्वेत कमल के आसन पर विराजमान थीं। उनके श्री अंगों से दिव्य कान्ति निकल रही थी। देवी लक्ष्मी को देखकर असुर, देवता, )षि आदि सभी चाहते थे कि लक्ष्मी उन्हें मिल जाएं, लेकिन लक्ष्मी ने स्वंय ही भगवान विष्णु का वरण कर लिया। लक्ष्मी धन, वैभव, ऐश्वर्य व अन्य सांसारिक सुखों का प्रतीक है। जब हम अमृत (परम पद) प्राप्त करना चाहते हैं तो सांसारिक सुख भी हमें अपनी ओर खींचते हैं, लेकिन हमें उस ओर ध्यान न देकर केवल ईश्वर भक्ति में ही ध्यान लगाना चाहिए।

10. चन्द्रमा : समुद्र मंथन के दौरान दसवें नंबर पर ‘चन्द्रमा’ अपने बाल रूप में प्रकट हुए, जिन्हें भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया। चन्द्रमा को जल का कारक एवं शीतलता का भी प्रतीक माना गया है। विष पीने से इसका असर भगवान शिव के मस्तिष्क पर होने लगा, इसलिए शिव ने इसे अपने मस्तिष्क पर धारण कर लिया। जब आपका मन बुरे विचार, लालच, वासना, नशा आदि से मुक्त हो जाएगा, तब वह चंद्रमा की तरह शीतल हो जाएगा। परमात्मा को पाने के लिए ऐसा ही मन चाहिए। ऐसे मन वाले भक्त को ही अमृत प्राप्त होता है।

11. पारिजात वृक्ष : समुद्र मंथन से ग्यारहवें नंबर पर ‘पारिजात वृक्ष’ प्रकट हुआ। इस वृक्ष की विशेषता यह थी कि इसे छूने से ही थकान मिट जाती थी। यह वृक्ष भी देवताओं के हिस्से में चला गया। समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष के निकलने का अर्थ सफलता प्राप्त होने से पहले मिलने वाली शांति है। जब आप परमात्मा के निकट पहुंच जाते हैं तो आपकी थकान स्वयं ही दूर हो जाती है और मन में शांति का अहसास होता है।

12. पांचजन्य शंख : समुद्र मंथन के दौरान बारहवें नंबर पर ‘पांचजन्य शंख’ प्रकट हुआ। इसे भगवान विष्णु ने अपने पास रख लिया। इस शंख को ‘विजय का प्रतीक’ माना गया है, साथ ही इसकी ध्वनि को भी बहुत ही शुभ माना गया है। शंखनाद से सभी अदृश्य शत्रुओं का विनाश हो जाता है। इसलिए शंख को धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल किया जाता है। विष्णु पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी समुद्रराज की पुत्री हैं तथा शंख उनका सहोदर भाई है। अतः यह भी मान्यता है कि जहाँ शंख है, वहीं लक्ष्मी का वास होता है। इन्हीं कारणों से मन्दिरों में पूजा के दौरान शंख को बजाया जाता है। जब आप परमात्मा से एक कदम दूर होते हैं तो मन का खालीपन ईश्वरीय नाद यानी स्वर से भर जाता है। इसी स्थिति में आपको ईश्वर का साक्षात्कार होता है।

13. शारंग धनुष : इस धनुष का निर्माण, भगवान शिव के धनुष पिनाक के साथ, विश्वव्यापी वास्तुकार और अस्त्र-शस्त्रों के निर्माता भृगुवंशी विश्वकर्मा द्वारा किया गया था। इसे भगवान विष्णु ने अपने पास रख लिया। समय के साथ यह भगवान विष्णु के अवतार और ऋषि ऋचिक के पौत्र परशुराम को प्राप्त हुआ। परशुराम ने अपने जीवन का उद्देश्य पूरा करने के पश्चात् यह धनुष भगवान राम को दे दिया। श्रीराम ने इसका प्रयोग किया और इसे जल के देवता वरुण को दे दिया। वरुण ने द्वापर युग में महाभारत काल में खांडव-दहन के दौरान भगवान श्री कृष्ण को दे दिया। श्रीकृष्ण ने यह धनुष महासागर में फैंककर वरुण को वापस लौटा दिया।

14. भगवान धन्वन्तरि : समुद्र मंथन के दौरान सबसे अंत में हाथ में अमृतपूर्ण स्वर्ण कलश लिये श्याम वर्ण, चतुर्भुज रूपी भगवान धन्वन्तरि प्रकट हुए। अमृत का शाब्दिक अर्थ ‘अमरता’ है। हिन्दू ग्रंथों में यह अमरत्व प्रदान करने वाले रसायन के अर्थ में प्रयुक्त होता है। यह शब्द सबसे पहले ऋग्वेद में सोम के विभिन्न पर्यायों में आया है। अमृत-वितरण के पश्चात् देवराज इन्द्र की प्रार्थना पर भगवान धन्वन्तरि ने देवों के वैद्य का पद स्वीकार कर लिया और अमरावती उनका निवास स्थान बन गया। जब पृथ्वी पर मनुष्य रोगों से अत्यन्त पीड़ित हो गए तो इन्द्र की प्रार्थना स्वीकार कर भगवान धन्वन्तरि ने काशी के राजा दिवोदास के रूप में पृथ्वी पर अवतार धारण किया। इनके द्वारा रचित ‘धन्वन्तरि-संहिता’ आयुर्वेद का मूल ग्रन्थ है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने धन्वन्तरि जी से ही इस शास्त्र का उपदेश प्राप्त किया था।

मोहिनी अवतार क्यों लिया :

समुद्र से प्रकट होने वाला चैदहवां और अंतिम रत्न ‘अमृत’ था। अमृत को देखकर देव और दानव आपस में लड़ने लगे। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर युक्तिपूर्वक देवताओं को अमृत पान करवा दिया। समुद्र मंथन को अगर लाइफ मैनेजमेंट के नजरिए से देखा जाए तो हम पाएंगे कि सीधे-सीधे किसी को अमृत नहीं मिलता। उसके लिए पहले मन के विकारों को दूर करना पड़ता है और अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना पड़ता है। समुद्र मंथन में 14 नंबर पर अमृत निकला था। इस 14 अंक का अर्थ है- 5 कर्मेन्द्रियां, 5 ज्ञानेन्द्रियां तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन सभी पर नियंत्रण होने से परमात्मा प्राप्त होते हैं। जब आपका तन निरोगी और मन निर्मल होगा तभी इसके भीतर परमात्मा की प्राप्ति होगी।