संक्षिप्त ज्यौतिष ज्ञान
आज मानव ने अपने जीवन में काफी तरक्की कर ली है परन्तु फिर भी सभी चीजें उसके नियंत्रण में नहीं है। सबको उनकी मेहनत का फल एक जैसा नहीं मिलता। कोई बीमार है, कोई गरीब है, किसी को शादी की चिन्ता है और किसी को नौकरी नहीं मिल रही। कोई पाप करता है फिर भी मौज करता है और कोई शुभ कर्म करते हुए भी कष्ट उठा रहा है। आमतौर पर ज्योतिष विद्या को निरर्थक और अनावश्यक समझा जाता है, लेकिन जब हम उपरोक्त बातों के लगातार शिकार होते हैं तब लगता है कि जिन्दगी में ज्योतिष का भी महत्व होता है।
हमारे जीवन में रिश्ते अनमोल होते हैं लेकिन इनकी डोर बहुत नाजुक होती है, इसलिए इनके बीच कभी न कभी आपस में टकराव हो ही जाता है। प्रत्येक रिश्ता किसी न किसी ग्रह से संबंध रखता है। यदि आपकी माता आपसे नाराज है तो इसका मतलब कुण्डली में आपका चन्द्रमा अच्छा नहीं है। पिता से सम्बन्ध ठीक नहीं है तो इसका मतलब कुण्डली में सूर्य की स्थिति शुभ नहीं है। इसी प्रकार पति-पत्नी के रिश्ते के लिए शुक्र ग्रह, बहन-बेटियों के लिए बुध ग्रह, भाई व मित्रों के लिए मंगल ग्रह, बुजुर्गों और गुरूजनों के लिए बृहस्पति ग्रह प्रभावकारी होता है। यदि शनि की तिरछी नजर आप पर है तो नौकर-चाकर आपका नुक्सान करते हैं। राहू अपना प्रभाव दुष्ट मित्रों और पड़ोसियों के रूप में दिखाता है। केतु पालतू जानवर या अचल सम्पत्ति पर अपना प्रभाव दिखाता है।
यदि किसी ग्रह की दशा खराब चल रही है तो उससे जुड़े रिश्ते पर ध्यान देने से उससे संबंधित ग्रह भी मजबूत होता है। हम अपने रिश्तों में मिठास घोलकर सभी ग्रहों को अपने लिए सकारात्मक बना सकते हैं। इसके लिए अपनी सहनशक्ति मजबूत करने, दूसरों को माफ करने और अपनी गलती मानकर माफी मांग लेने की जरूरत है। आपकी यही व्यवहारिकता आपको आज के जटिल दौर में भी बेहद सामाजिक और प्रतिष्ठित व्यक्ति बना सकती है। भारतीय ज्योतिष ज्ञान वेदों जितना ही प्राचीन है। ऋग्वेद में ज्योतिष से संबंधित 30 श्लोक दिए गए हैं, यजुर्वेद में 44 तथा अथर्ववेद में 162 श्लोक पाए जाते हैं। इस विद्या का प्रयोग यज्ञों की तिथि, मुहूर्त, नक्षत्र, ऋतु, अयन आदि निश्चित करने में होता था। यदि ज्योतिष न हो तो सब विषय उलट-पुलट हो जाएँ।
ज्योतिष शास्त्र के दो प्रमुख भेद हैं- गणित ज्योतिष, फलित ज्योतिष।
1. गणित ज्योतिष : इसके अन्तर्गत ज्योतिष के आधार पर गणितीय सूत्रों द्वारा अथवा पंचांग की सहायता से ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति, गति तथा भौतिक संरचना पर विचार किया जाता है। वास्तविक ग्रह स्थिति ज्ञात करने के लिए गणित ज्योतिष सहायक है। यह फलित ज्योतिष का आधार बनता है। गणित ज्योतिष के तीन विभाग होते हैं – सिद्धान्त, तन्त्र और करण।
2. फलित ज्योतिष : इसमें पृथ्वी पर पड़ने वाले ग्रहों और तारों के शुभ-अशुभ प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। ग्रहों तथा तारों से निकलने वाली किरणों के प्रभाव का अध्ययन करके उनका स्वभाव ज्ञात किया जाता है। ग्रहों तथा नक्षत्रों के स्वभाव के अनुसार विभिन्न घटनाक्रम का ज्ञान होता है। इसके पांच अंग होते हैं – होरा, प्रश्न, ताजिक, मुहूर्त, संहिता।
कुण्डली का स्वरूप :
कुण्डली को जन्म समय के ग्रहों की स्थिति की तस्वीर कहा जा सकता है। कुण्डली के तीन घटक होते हैं- भाव, राशि और ग्रह। स्थानीय समय को ईष्टकाल कहा जाता है। ईष्टकाल में जो राशि पूर्वी क्षितिज पर स्थित होती है उसे लग्न कहते हैं। कुण्डली के 12 खानों से भाव और अंकों से राशि का पता चलता है। प्रथम भाव को लग्न भी कहते हैं। कुण्डली में ग्रहों को उनके नाम के प्रथम अक्षर से दर्शाया जाता है। कुण्डली में ग्रहों को भावेश भी कहा जाता है। कुंडली को अंग्रेजी में (Horoscope) कहते हैं।
ग्रह, नक्षत्र एवं राशी परिचय :
ज्योतिष में ग्रहों एवं राशियों का बड़ा महत्व है। ग्रह अपनेे प्रभाव से मनुष्य के जीवन को निरंतर प्रभावित करते हैं। ज्योतिष शास्त्र नौ ग्रहों, सत्ताईस नक्षत्रों और बारह राशियों पर आधारित है। नौ ग्रह इस प्रकार हैं – सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, शनि, राहू, केतू। नक्षत्रों की संख्या 27 है। सभी ग्रह तीन-तीन नक्षत्रों के स्वामी होते हैं। प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण (नामाक्षर) होते हैं। नौ नक्षत्र चरणों से एक राशि बनती है। जिस प्रकार गणित में वृत्त की 360 डिग्री होती हैं, उसी प्रकार ज्योतिष में ब्रह्माण्ड को गोलाकार मानकर इसकी 360 कलाएं मानी जाती हैं। इस प्रकार एक राशि, जो राशिचक्र का बारहवाँ भाग होता है, 30 कलाओं की होती है। प्रत्येक राशि का स्वामी एक ग्रह होता है, जो इस प्रकार हैं – 1. मेष (मंगल), 2. वृषभ (शुक्र), 3. मिथुन (बुध), 4. कर्क (चन्द्र), 5. सिंह (सूर्य), 6. कन्या (बुध), 7. तुला (शुक्र), 8. वृश्चिक (मंगल), 9. धनु (गुरू), 10. मकर (शनि), 11. कुम्भ (शनि), 12. मीन (गुरू)।
राशियां तीन प्रकार की होती है –
(1) जन्म राशि – इसे चन्द्र राशि भी कहते हैं। इसका प्रयोग पूर्वी देशों में वुळण्डली मिलान में होता है।
(2) सूर्य राशि – यह जन्म के समय सूर्य की स्थिति बताती है। इसका प्रयोग पश्चिमी देशों में होता है।
(3) लग्न राशि – इस राशि से व्यक्ति के स्वभाव और व्यक्तित्व का पता चलता है।
कुंडली के 12 भाव :
1. प्रथम भाव : यह व्यक्ति के व्यक्तित्व का भाव होता है। इस भाव का स्वामी मंगल और कारक सूर्य ग्रह होता है।
2. द्वितीय भाव : यह धन और परिवार का भाव होता है। इस भाव का स्वामी शुक्र और कारक गुरु ग्रह होता है।
3. तृतीय भाव : यह भाई-बहन, साहस एवं वीरता का भाव होता है। इस भाव का स्वामी बुध और कारक मंगल ग्रह होता है।
4. चतुर्थ भाव : कुंडली में चैथा भाव माता एवं आनंद का भाव है। इस भाव का स्वामी चन्द्र और कारक चन्द्र ग्रह होता है।
5. पंचव भाव : कुंडली में पाँचवां भाव संतान एवं ज्ञान का भाव होता है। इस भाव का स्वामी सूर्य और कारक गुरु ग्रह होता है।
6. षष्ठ भाव : यह भाव शत्रु, रोग एवं उधारी को दर्शाता है। इस भाव का स्वामी बुध और कारक केतू ग्रह होता है।
7. सप्तम भाव : सातवाँ भाव विवाह एवं पार्टनरशिप का प्रतिनिधित्व करता है। इसका स्वामी शुक्र और कारक शुक्र व बुध होते है
8. अष्टम भाव : कुंडली में आठवाँ भाव आयु का भाव होता है। इसका स्वामी मंगल तथा कारक शनि, मंगल व चन्द्र ग्रह होते हैं।
9. नवम भाव : कुंडली में नवम भाव भाग्य, कर्तव्य एवं धर्म का भाव होता है। इस भाव का स्वामी गुरु और कारक गुरु ग्रह होता है।
10. दशम भाव : दसवाँ भाव करियर और व्यवसाय का भाव होता है। इस भाव का स्वामी शनि और कारक शनि ग्रह होता है।
11. एकादश भाव : ग्यारहवाँ भाव आय और लाभ का भाव है। इस भाव का स्वामी शनि और कारक गुरु ग्रह होता है।
12. द्वादश भाव : कुंडली में बारहवाँ भाव व्यय और हानि का भाव होता है। इस भाव का स्वामी गुरु और कारक केतू ग्रह होता है।
किसकी दशा में क्या फल मिलेगा :
दशाफल महादशा, अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर्दशा में भावों के स्वामी ग्रहों पर निर्भर करता है। यह ग्रहों की आपसी मित्रता/शत्रुता, युति, दृष्टि एवं कुण्डली के विभिन्न योगों पर निर्भर होता है। किस दशा में हमें क्या फल मिलेगा, इसके लिए कुछ बातें ध्यान रखने योग्य हैं –
1. सभी ग्रह उस भाव का फल देते हैं जहां वह बैठे होते हैं। जैसे कोई ग्रह सप्तम भाव में है और जातक की विवाह की आयु है तो उसकी दशा में विवाह हो सकता है, यदि उसकी कुण्डली में विवाह का योग है।
2. किसी भी मनुष्य को वही फल मिल सकता है जो कि उसकी कुण्डली में निर्धारित हो। उदाहरण के तौर पर अगर किसी की कुण्डली में विवाह का योग नहीं है तो उत्तम दशा होने पर भी विवाह नहीं हो सकता।
3. ग्रह अपने कारकत्व के हिसाब से भी फल देते हैं। जैस सूर्य सरकारी नौकरी का कारक है। अतः सूर्य की दशा में सरकारी नौकरी मिल सकती है। इसी तरह शुक्र विवाह का कारक है। समान्यतः देखा गया है कि दशा में भाव के कारकत्व, ग्रह के कारकत्व से ज्यादा मिलते हैं।
4. कितना फल मिलेगा यह ग्रह की शुभता और अशुभता पर निर्भर करता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी दशा में नौकरी मिलने का योग है और दशा का स्वामी शुभ है तो नौकरी बहुत अच्छे वेतन की मिलेगी। ग्रह शुभ नहीं है तो नौकरी मिली भी तो तनख्वाह अच्छी नहीं होगी।
5. कोई भी ग्रह दशा पूरी तरह से अच्छी या बुरी नहीं होती है। इसलिये दशा को अच्छा या बुरा मानकर फलादेश करने की बजाय यह देखना चाहिए कि उस दशा में क्या-क्या फल मिल सकते हैं।