आयुर्वेद, ऋषि-मुनियों द्वारा प्रचलित प्राचीन चिकित्सा पद्धति है जिसकी शुरूआत हजारों वर्ष पहले भारत में हुई थी। आज विश्व में ज्यादातर आधुनिक और वैकल्पिक चिकित्सा उपकरण आयुर्वेद से लिए गए हैं। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रारम्भ वेदों से हुआ था और बाद में यह मानव तक पहुंचा। आयुर्वेद की शुरूआत अथर्ववेद से हुई, जो चार वेदों में से एक है। इसमें तरह-तरह की औषधियों के विषय में जानकारी दी गयी है। सदियों से अनेक ऋषि-मुनियों और विद्वान महापुरुषों द्वारा आयुर्वेद पर कई लेख लिखे गए हैं। इनमें सबसे प्रमुख पौराणिक ग्रन्थ हैं – चरक संहिता, सुश्रुता संहिता और अष्टांग अहिृदयं।

आयुर्वेदिक चिकित्सा शास्त्र ‘सुश्रुत संहिता’ के अनुसार भगवान धनवंतरी ने वाराणसी के पौराणिक राजा दिवोदास के रूप में अवतार लिया तथा आचार्य सुश्रुत और अन्य चिकित्सकों को औषधियों (दवाइयों) के विषय में ज्ञान दिया। ‘चरक संहिता’ के अनुसार आयुर्वेद का ज्ञान सर्वप्रथम ब्रह्मा ने दक्ष को दिया। प्रजापति दक्ष ने यह ज्ञान अश्वनि कुमारों को दिया तथा अश्वनि कुमारों से यह ज्ञान इन्द्र तक पहुंचा।

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरूषार्थों का आधार आरोग्य है। मनुष्यों के लिए रोग विघ्नरूप है। जिस समय जप, तप, व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य और आयु में विघ्न करने वाले रोग उत्पन्न हो गए, तब मानव कल्याण हेतु पुण्यात्मा महर्षिगण हिमालय पाश्र्व में एकत्रित हुए। इन रोगों की शान्ति का उपाय जानने के लिए भारद्वाज ऋषि के नेतृत्व में अनेक ऋषिगण इन्द्र के पास पहुंचे। भारद्वाज ऋषि ने इन्द्र से शीघ्र ही ‘त्रिसूत्री आयुर्वेद’ का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया। त्रिसूत्र से अभिप्राय हेतू (रोग का कारण), लिंग (स्वरूप) एवं औषधि (दवाई) है। सम्पूर्ण आयुर्वेद इनकी उत्पति, संरचना एवं निदान पर आधारित है। भारद्वाज मुनि ने इस ज्ञान के फलस्वरूप दीर्घायु प्राप्त की थी। दीर्घायु की कामना से अन्य ऋषियों ने भी भारद्वाज ऋषि से इस आयुवर्धक आयुर्वेद को ग्रहण किया।

रोग मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं – साध्य और असाध्य। रोगी की प्रकृति के अनुसार औषध करने से साध्य रोग शान्त हो सकते हैं, असाध्य रोगों के लिए योग, आसन, प्राणायाम आदि अन्य उपाय किए जाते हैं। संक्षेप में शारीरिक रोगों के कारण वात, पित और कफ हैं और मानसिक रोगों के कारण रजोगुण और तमोगुण हैं। शारीरिक रोग औषधियों से और मानसिक रोग सम्यक् (आध्यात्मिक) ज्ञान से शान्त होते हैं। साध्य रोगों के मुख्यतः वात, पित्त एवं कफ तीन कारण होते हैं –

1. वात रोग – शरीर में सभी चालन क्रियाएं वात की विशेषता हैं। वात की वजह से मांसपेशियांे एवं जोड़ों में दर्द होता है। वात के कारण पेट फूलना, गठिया, आर्थराइटिस, उच्च रक्तचाप, डायबिटिज और गुर्दे सम्बन्धी बीमारियां होती हैं। सामान्यतः प्रतिदिन व्यायाम करके तथा शरीर की तेल मालिश से वात रोगों से बचाव होता है।

2. पित्त रोग – शरीर में पाचन सम्बन्धी सभी क्रियाएं पित्त की वजह से होती हैं। कब्ज, बुखार, पेट में जलन होना, मुंह के छाले, पसीने की दुर्गंध, ज्यादा गुस्सा आना जैसे लक्षण पित्त बढ़ने के कारण हैं। मसालेदार भोजन बंद करके अंकुरित अनाज, हरी सब्जी, दाल और दलिया आदि का प्रयोग करके पित्त रोगों से बच सकते हैं।

3. कफ रोग – कफ रोग सूखा एवं चिकनाई युक्त दो प्रकार के होते हैं। शरीर में श्वसन सम्बन्धी सभी क्रियाएं कफ के कारण होती है। शरीर में उपस्थित कफ की मात्रा वात एवं पित्त को संतुलित करती है। खांसी, जुकाम, सांस की तकलीफ, ज्यादा पसीना आना, डिप्रेशन आदि कफ बढ़ने के लक्षण है। गर्म कपड़े पहनना, गर्म पानी प्रयोग करना तथा आहार और जीवन शैली बदलकर कफ रोगों से बच सकते हैं।

साध्य रोगों का उपचार विभिन्न प्रकार के रसों से किया जाता है। रसों की उत्पत्ति का कारण जल और पृथ्वी है। इनमें आकाश, वायु और अग्नि मिलने से इसके छः प्रकार बन जाते हैं – मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय। मधुर, अम्ल और लवण यह रस वायु को शान्त करते हैं लेकिन कटु, कषाय और तिक्त यह वायु को बढ़ाते हैं। कटु, अम्ल और लवण यह पित्त को बढ़ाते हैं जबकि मधुर, कषाय और तिक्त यह रस पित्त को शान्त करते हैं। मधुर, अम्ल और लवण कफ को बढ़ाते हैं तथा कषाय, कटु और तिक्त, कफ को शान्त करते हैं।

आयुर्वेद का मूल उद्देश्य स्वास्थ्यवर्धक पदार्थों का सेवन और अहितकारी पदार्थों का त्यागकर दीर्घ, निरोगी और सुखी जीवन प्राप्त करना है। आयुर्वेद के अनुसार जीवन जीने से मनुष्य में उत्तम स्वास्थ्य के दस लक्षण, बुद्धि, सिद्धि, स्मृति, मेधा, धृति, कीर्ति, क्षमा तथा दया आदि उत्पन्न होते हैं। बुद्धि से उपलब्धि, सिद्धि से साध्य साधन, स्मृति से स्मरण शक्ति, मेधा से अतीत का स्मरण, धृति से धारण करने की शक्ति, कीर्ति से यश, क्षमा से परोपकार की भावना, दया से सब प्राणियों के दुख मिटाने की इच्छा आदि गुण प्रकट होते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार आहार से शरीर में रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र यह सात धातुएँ बनती हैं। जब तक यह शरीर में उचित परिमाण और स्वाभाविक स्वरूप में रहती है, तब तक शरीर स्वस्थ रहता है। जब इनकी मात्रा न्यूनाधिक अथवा विकृत स्वरूप में होती हैं तो शरीर में रोग की उत्पत्ति होती है। नित्यप्रति स्वाभावतः विविध कार्यों में उपयोग होने से इनका क्षय भी होता रहता है, किंतु आहार के रूप में हम जो पदार्थ ग्रहण करते हैं, उनसे इन धातुओं की क्षति पूर्ति और पुष्टि होती रहती है।

आहार चार प्रकार से ग्रहण किया जाता है – भक्ष्य (निगलना), चोष्य (चूसना), लेह्य (चाटना) और पेय (पीना)। मनुष्य में शारीरिक बल और पाचन शक्ति सदा एक समान नहीं रहती। युवावस्था में अधिक तथा बचपन और वृ(ावस्था में कम होती है। इसी प्रकार मौसम और शारीरिक श्रम का भी प्रभाव पड़ता है। इसका ध्यान रखते हुए औषधि की मात्रा का निर्णय किया जाता है।

आयुर्वेद में छः प्रकार की औषधियों का वर्णन किया गया है, जिनमें 16 प्रकार के फल, 16 प्रकार की जड़, 4 प्रकार के स्नेहक (घी, तेल, वसा, मज्जा), 5 प्रकार के लवण (सैन्धव, सौवर्चल, काला नमक, काच नमक, समुद्री नमक), 8 प्रकार के मूत्र (भेड़, बकरी, गाय, भैंस, हाथी, ऊंट, घोड़ा, गधा), 8 प्रकार के दूध (भेड़, बकरी, गाय, भैंस, हथिनी, ऊंटनी, घोड़ी, स्त्री) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त 6 प्रकार के शोधन वृक्ष हैं जिनमें 3 वृक्षों की पत्तियों का रस (आक, कैर, बड़) और 3 वृक्षों की छाल (नीम, पीपल, कीकर) का औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। जो वैद्य औषधियों को नाम, रूप, गुण और प्रयोग की विधि सहित जानता है, वही उत्तम वैद्य होता है। प्रयोग विधि जाने बिना औषधियों का ज्ञान निरर्थक है। इसके अतिरिक्त देश, काल, प्रकृति, व्याधि, आयु और बल आदि देखकर औषधियों का प्रयोग करना जो जानता है, वही उत्तम वैद्य होता है।

आयुर्वेद के आठ अंग : आयुर्वेद चिकित्सा के आठ अंगों का वर्णन गीता में भी किया गया है और इनका नाम संस्कृत में ‘चिकित्सयम अष्टांगायम’ के नाम से पाया गया है। आयुर्वेद के आठ अंग निम्न हैं –

1. काया चिकित्सा (General Medicine) – साधारण सर्दी, खांसी, बुखार व पेट दर्द से जुड़ी चिकित्सा।
2. कौमार भृत्य (Pediatrics) – महिला एवं शिशु रोगों से जुड़ी चिकित्सा।
3. शल्यतंत्र (Surgical Techniques) – हड्डियों व जोड़ों की सर्जरी से जुड़ी चिकित्सा।
4. शालाक्यतंत्र (ENT) – आँख, कान, नाक, गला, मुहँ और दांत की चिकित्सा।
5. भूतविद्या (Psycho Therapy) – दैवीय प्रकोप, ग्रह-नक्षत्रों, भूत-प्रेत, दिमाग से जुड़ी चिकित्सा।
6. अगदतंत्र (Toxicology) – स्थावर, जांगम और कृत्रिम विष की चिकित्सा।
7. रसायनतंत्र (Renjunvention and Geriatrics) – धातु पुष्टि और रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति से रोग और वृधवस्था को दूर करने वाली चिकित्सा।
8. वाजीकरण तंत्र (Sexology) – कामोत्तेजक, वीर्य और यौन सुख से जुड़ी चिकित्सा।

आयुर्वेद चिकित्सा के घटक : आयुर्वेद चिकित्सा में रोगी की लंघन, वृंहण, रुक्षण, स्नेहन, स्वेदन एवं स्तंभन आदि षट्कर्म क्रियाएं की जाती है। इनकी सहायता से शरीर के विषैले तत्त्व बाहर निकाले जाते हैं।

(1) लंघन : यह दो प्रकार की होती है –

(अ) संशोधन : इसमें प्राकृतिक एवं स्वाभाविक क्रियाओं द्वारा मल विसर्जन किया जाता है। इसके अन्तर्गत वमन, विरेचन, वस्ती, नस्य व रक्त मोक्षण आदि पांच प्रकार की क्रियाएं की जाती हैं। लंघन के अन्तर्गत रोग शमन हेतू किए जाने वाले पंचकर्म निम्न हैं:-

1. वमन (Emesis) : मुख के माध्यम से उलटी करवाना। (खांसी, दमा, एनिमीया, डायबिटीज)
2. विरेचन (Purgation) : गुदा मार्ग से दोषों को निकालना। (अस्थमा, सोरायसिस, डायबिटीज)
3. वस्ती : वस्ती को वात रोगों की चिकित्सा कहा गया है। यह दो प्रकार की होती है:-
(अ) आस्थापन/निरूह वस्ती (Decoction Enema) : इस प्रक्रिया में रोगी के आन्तरिक दोषों को विभिन्न प्रकार की औषधियों से शोधन करके निकाला जाता है।
(ब) अनुवसना वस्ती (Oil Enema) : इसमें विभिन्न औषधि से सिद्ध स्नेहक का प्रयोग होता है।
4. नस्य : जुकाम, गला, मस्तिक, दांत व कान के रोग में नाक से औषधि को शरीर में प्रवेश किया जाता है। यह दो प्रकार से किया जाता है:
(अ) मर्श नस्य : इसमें औषधि की मात्रा 6-8 बूंद तक होती है।
(ब) प्रतिमर्श नस्य : इसमें औषधि की मात्रा 1-2 बूंद होती है।
5. रक्त मोक्षण (Blood Filter) : शरीर से दूषित रक्त बाहर निकालकर रक्त को शुद्ध करना।

(ब) शमन : इसके अन्तर्गत बाहरी क्रियाएं जैसे व्रत, उपवास, व्यायाम, पानी, धूप, मिट्टी आदि शारीरिक क्रियाओं द्वारा मल विसर्जन किया जाता है।

(2) वृंहण : इसमें शारीरिक कमजोरी को दूर करने के लिए पौष्टिक आहार दिया जाता है।

(3) रुक्षण : यह एक आयुर्वेदिक उपचार है जो रोगी के शरीर से अतिरिक्त नमी या वसा को सुखाकर या कम करके संतुलन बहाल करता है। यह शरीर की अतिरिक्त चर्बी को कम करने में मदद करती है।

(4) स्नेहन : यह दो प्रकार से होता है –
(अ) आंतरिक स्नेहन : इसमें रोगी को औषधीय तेल या घी को निर्धारित अवधि तक मौखिक रूप से सेवन कराया जाता है।
(ब) बाह्य स्नेहन : इसमें तेल या घी से रोगी के शरीर की मालिश की जाती है, जैसे अभ्यंग (मालिश), शिरोधारा, जानुवस्ति आदि।

(5) स्वेदन : यह शरीर की नाड़ियों को खोलता है और दोषों को संतुलित करता है। इस प्रक्रिया में रोगी के शरीर को औषधीय जड़ी-बूटियों के काढ़े से बनी भाप या अन्य तकनीकों से पसीना दिलाया जाता है।

(6) स्तंभन : इसका मतलब स्तंभन दोष (ED) का इलाज है, जिसमें शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और जीवनशैली में बदलाव शामिल हैं। इसमें विशेष दवाईयां, नियमित व्यायाम, पौष्टिक आहार लेना, तनाव कम करना जैसे विकल्प शामिल हो सकते हैं।

मौसम के अनुसार आहार का क्रम :

मौसम के अनुसार वर्ष को दो अयन और छः ऋतुओं में बांटा गया है। जब सूर्य उतरायण में होता है तब आदान काल (ग्रहण) होता है। इससे शिशिर, बसन्त और ग्रीष्म यह तीन ऋतुएं बनती हैं। जब सूर्य दक्षिणायन में होता है तब विसर्ग काल (त्याग) होता है। इससे वर्षा, शरद और हेमन्त यह तीन ऋतुएं बनती हैं। विसर्ग काल और आदान काल के आदि और अन्त में भी मनुष्यों में शारीरिक दुर्बलता आती है। इस दौरान खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

इतिहासकारों के अनुसार आयुर्वेद का उपयोग सिन्धु घाटी सभ्यता में भी किया जाता था। आज भी बौद्ध धर्म और जैन धर्म में भी इसकी कुछ अवधारणाओं और प्रथाओं को देखा गया है। आमतौर पर आयुर्वेदिक चिकित्सा को जहां वैज्ञानिक तौर पर पालन ना किए जाने वाली चिकित्सा प्रणाली कहा जाता है, वहीं अधिकांश शोधकर्ता आयुर्वेद को विज्ञान से जुड़ा मानते हैं। अधिक सोना, देर रात तक जागना, अधिक खाना, अधिक चलना, विपरीत मौसम में रहने से भी मनुष्यों में रोग उत्पन्न होते हैं। स्नान किए बिना, वस्त्र पहने बिना, बिना पूजन किए, माता-पिता एवं अतिथियों को खिलाये बिना, गन्दे बर्तनों में पकाया गया अथवा परोसा गया, निन्दा/चुगली या बात करते हुए तथा अनजान व्यक्तियों के सामने भोजन नहीं करना चाहिए। मनुष्य को स्वस्थ्य एवं निरोगी रहने के लिए मन, वचन और कर्म से पाप रहित होकर पुण्य कर्म करने चाहिए। इसके लिए समय-समय पर धर्मात्मा और ज्ञानी पुण्यात्माओं का संग करते रहना चाहिए। पुण्य कर्मों से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।